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जाति व्यवस्था हमारे समाज की एक घिनौनी सच्चाई है। सदियों से जाति व्यवस्था का प्रयोग एक असमान सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए होता आ रहा है जिसमें समाज के एक बड़े तबके को नियमित रूप से शोषित किया जाता है और सत्ता कुछ चुनिंदा वर्गों के हाथों में रहती है। भारतीय इतिहास में जाति व्यवस्था को गिराने के लिए कई आंदोलन किए गए हैं, जिन्होंने दलितों, आदिवासियों, महिलाओं, अल्पसंख्यकों आदि को इस क्रूर व्यवस्था से मुक्ति दिलाने में मदद की। आज अगर इन वंचित वर्गों की स्थिति थोड़ी बेहतर है तो इसका श्रेय इन आंदोलनों की शुरुआत करने वाले समाज सुधारकों को जाता है। इस लेख में हम जाति व्यवस्था के ख़िलाफ हुए ऐसे ही पांच महत्वपूर्ण आंदोलनों की बात करेंगे। 

1. भीमा कोरेगाव का युद्ध (1818)

1 जनवरी 1818 को भारत के इतिहास में पहली बार दलितों ने ब्राह्मण शोषकों के खिलाफ़ शस्त्र उठाए थे और उन पर जीत हासिल की थी। यह सशस्त्र आंदोलन ‘भीमा कोरेगांव के युद्ध’ के नाम से जाना जाता है क्योंकि यह महाराष्ट्र के भीमा नदी के नज़दीक कोरेगाव में हुआ था। उस समय महाराष्ट्र में ब्राह्मण पेशवाओं का शासन था, जो दलितों पर नृशंस अत्याचार करने के लिए जाने जाते हैं। पेशवा बाजीराव द्वितीय को खत्म करने के लिए ‘महार’ जाति के दलितों ने ब्रिटिश सेना की सहायता ली थी। ब्रिटिश सेना का हिस्सा बनकर और नए हथियार चलाने में प्रशिक्षण लेकर उन्होंने खुद को अपने अत्याचारियों से लड़ने के लिए सशक्त किया। पेशवाई सेना से कहीं ज़्यादा छोटी होने के बावजूद महार पल्टन घमासान युद्ध के बाद उन्हें हराने में सफल हुई और महाराष्ट्र में पेशवाई शासन हमेशा के लिए खत्म हो गया। आज कोरेगाव में इन साहसी दलित सैनिकों की स्मृति में एक विजय स्तंभ है, जहां हर साल जाति व्यवस्था के खिलाफ हुए इस आंदोलन को याद करने के लिए लोग इकट्ठे होते हैं।

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2. सत्यशोधक समाज आंदोलन (1873)

जोतिराव ‘जोतिबा’ फुले और उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले द्वारा शुरु किया यह आंदोलन दलितों के ही नहीं, समाज के हर शोषित वर्ग के उत्थान के लिए महत्वपूर्ण था। आज अगर भारत में लड़कियों और महिलाओं को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है तो इसका श्रेय जाता है सावित्रीबाई फुले को, जिन्होंने भारत में पहला बालिका विद्यालय स्थापित किया था, खासतौर पर दलित और अल्पसंख्यक लड़कियों को पढ़ाने के लिए । जोतिबा और सावित्रीबाई ने शिक्षा की ज्योति को समाज के सबसे वंचित तबकों तक पहुंचाने में बहुत बड़ा योगदान निभाया। उनका मानना था समाज से जाति व्यवस्था के कलंक को हटाने और सभी लोगों में बराबरी लाने का एकमात्र रास्ता शिक्षा ही है, जिसके बिना कोई भी व्यक्ति खुद को सशक्त कर अपनी परिस्थितियों को बदल नहीं सकता। जोतिबा और सावित्रीबाई ने शिक्षा में समानता लाने के अलावा बाल विवाह खत्म करने, अंतर्जातीय और विधवा विवाह को बढ़ावा देने और महिला-विरोधी वैवाहिक कर्मकांड रद्द करने के लिए भी काम किया था। 

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सदियों से जाति व्यवस्था का प्रयोग एक असमान सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए होता आ रहा है जिसमें समाज के एक बड़े तबके को नियमित रूप से शोषित किया जाता है और सत्ता कुछ चुनिंदा वर्गों के हाथों में रहती है।

3. वैकोम सत्याग्रह (1924 )

केरल के कोट्टायम ज़िले के वैकोम शहर में श्री महादेव का मंदिर था। इस मंदिर में प्रवेश की अनुमति सिर्फ़ ब्राह्मणों को थी और मंदिर को घेरने वाली चारों सड़कों पर किसी दलित की परछाई तक नहीं पड़ सकती थी। इस नियम का पालन बहुत सख्ती से किया जाता था और इसका उल्लंघन करनेवालों को कठोर सज़ा दी जाती थी। जनवरी 1924 में दलित क्रांतिकारी टी. के. माधवन ने ‘छुआछूत विरोधी समिति’ बनाई जिसका लक्ष्य था धार्मिक स्थलों में दलितों को प्रवेश दिलाना क्योंकि ‘भगवान की नज़र में हर इंसान बराबर है’। मार्च 1924 में भारी मात्रा में दलित प्रदर्शनकारियों ने मंदिर की सड़कों को घेर लिया। उन्होंने ‘सत्याग्रही’ के तौर पर अपना परिचय दिया। मंदिर के सामने उन्होंने कई धरने और भूख हड़ताल किए, जिसके लिए उन्हें नृशंस अत्याचार सहना पड़ा। वे फिर भी पीछे नहीं हटे और उनकी कोशिशें रंग लाईं जब चारों सड़कें सभी जातियों के लिए खोल दी गईं। कई सालों बाद 1936 में दलितों को कानूनी तौर पर मंदिर में प्रवेश का अधिकार भी मिला।

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4. आत्मसम्मान आंदोलन  (1925)

तमिलनाडु के आत्मसम्मान आंदोलन की शुरुआत काँग्रेस के एस. रामनाथन ने की थी। आंदोलन का नेतृत्व उन्होंने क्रांतिकारी ई. वी. रामस्वामी ‘पेरियार’ को सौंपी। इस आंदोलन का मकसद था महिलाओं को मनुवादी व्यवस्था के बंधनों से मुक्त करना और उन्हें अपनी ज़िंदगी अपने तरीके से जीने के लिए सशक्त करना। पेरियार नारीवादी थे। वे मानते थे की जाति व्यवस्था महिलाओं के लिए उतनी ही हानिकारक है जितनी दलितों के लिए। महिलाओं के शरीर और यौनिकता पर पाबंदियां लगाकर, उन्हें घर-गृहस्थी और बच्चे पालने तक सीमित रखकर ही जाति व्यवस्था को कायम रखा जाता है, क्योंकि महिलाओं पर नियंत्रण रखे बिना परिवार और समाज पर नियंत्रण रखना संभव नहीं है। 

पेरियार मानते थे कि जाति व्यवस्था के आमूल विनाश के लिए महिलाओं को इसके कब्ज़े से छुड़ाना आवश्यक है। उन्होंने महिलाओं को अंतरजातीय और अंतरधर्मीय विवाह करने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने ऐसे की विवाह कराए और इन्हें ‘आत्मसम्मान विवाह’ के नाम से जाना गया, क्योंकि इनमें किसी तरह के धार्मिक रीति-रिवाज़ का पालन नहीं होता था और शादी रजिस्ट्री से ही संपन्न होती थी। ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ में महिलाओं ने भारी मात्रा में भाग लिया। अंतरजातीय और अंतरधर्मीय विवाहों को बढ़ावा देने के साथ साथ उन्होंने की जरूरी नारीवादी मुद्दों पर काम किया। देवदासी प्रथा पर रोक लगाने, महिलाओं को शारीरिक और यौनिक आज़ादी दिलवाने, उन्हें तलाक का अधिकार दिलाने और गर्भनिरोध के बारे में जागरूकता फैलाने में उनकी यहां भूमिका रही। 

5. महाड सत्याग्रह (1927) 

अगस्त 1923 में बंबई लेजिस्लेटिव काउंसिल ने यह प्रस्तावना की थी कि जिन सार्वजनिक स्थानों का निर्माण व देखरेख ब्रिटिश सरकार करती हो, उनका प्रयोग करने का अधिकार हर भारतवासी को दिया जाए, चाहे वह किसी भी जाति का हो। 1924 में बंबई नगरपालिका ने यह प्रस्तावना लागू कर दी। ऊंची जाति के हिंदुओं ने इसका कठोर विरोध किया क्योंकि वे दलितों के इन जगहों पर आने के ख़िलाफ़ थे। ऊंची जातियों के इस विरोध के जवाब में 20 मार्च 1927 में बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर स्थानीय दलितों को बंबई के नज़दीक महाड ले गए। महाड के ‘चवदार तालाब’ में से उन सब ने पानी पिया। मकसद यही संदेश भेजने का था कि दलितों का भी सार्वजनिक स्थानों पर पूरा अधिकार है और वे भी उस तालाब से पानी पी सकते हैं जिससे ऊंची जाति के लोग पीते हैं। स्थानीय उच्च जाति के हिंदू इस आंदोलन से बहुत नाराज़ थे। उन्होंने पूरा तालाब खाली करवाकर गौमूत्र से उसका शुद्धिकरण करवाया, पर वे आंदोलन को रोक नहीं पाए। हर साल बाबासाहेब और उनके साथी ‘महाड सत्याग्रह’ करते रहे और 20 मार्च को उन्होंने ‘सशक्तिकरण दिवस’ के रूप में मनाया।

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तस्वीर साभार : velivada

Eesha is a feminist based in Delhi. Her interests are psychology, pop culture, sexuality, and intersectionality. Writing is her first love. She also loves books, movies, music, and memes.

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