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हेल्थ यानी कि स्वास्थ्य, भारतीय परिपेक्ष में यह बात कही जाती है कि स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क का वास होता है। इस धारणा ने मस्तिष्क की हालत को हमेशा ही नज़रंदाज़ किया है जिसके परिणास्वरूप इस देश की आधी से ज़्यादा आबादी यह मानने को तैयार नहीं होती कि एक शारीरिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति भी मानसिक तौर पर अस्वस्थ हो सकता है। शारीरिक, मानसिक और सामाजिक बेहतरी का किसी व्यक्ति में उपस्थित होना उसके स्वस्थ होने का परिचायक है, इनमें से एक भी जगह थोड़ी सी गड़बड़ी भी व्यक्ति के अस्वस्थ होने की निशानी है।

इस बात पर गौर करें तो ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज स्टडी 2017 के अनुसार 197.3 मिलियन भारतीय लोग मानसिक विकार से ग्रसित हैं यानी इस देश की 197 मिलियन से ज़्यादा जनता अस्वस्थ है लेकिन क्योंकि अस्वस्थता मानसिक है इसीलिए यह समाज मानने से इनकार कर रहा है कि वे अस्वस्थ हैं। फिर भी कुछ संख्या में जो लोग इस मुद्दे से वाकिफ हैं और समझते हैं क्या वे इसके संवैधानिक प्रावधान भी जानते हैं ताकि वे और लोगों तक भी अपनी बात, संवैधानिक प्रावधानों के ज़रिये पहुंचा सकें। जिस देश में व्यक्ति दर व्यक्ति ये जानता है कि धारा 302 के तहत मर्डर का चार्ज लगता है उसी व्यक्ति को क्या ये मालूम नहीं होना चाहिए कि अगर वह अस्वस्थ है तो उसके पास क्या संवैधानिक अधिकार हैं? ज़रूर मालूम होना चाहिए। लेख में आगे हम यही बात रखने जा रहे हैं। लेकिन उससे पहले कुछ आंकड़े और अन्य जानकारियों के बारे में पता होना भी अहम है।

वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन यानि विश्व स्वास्थ्य संगठन, मानसिक स्वास्थ्य को पहचानते हुए कहता है, ‘मानसिक स्वास्थ्य और कल्याण, जीवन की गुणवत्ता के लिए मौलिक हैं। लोगों के जीवन को सार्थक अनुभव कराने, रचनात्मक और सक्रिय नागरिक बनाने में सक्षम बनाता है।’ बेहतर जीवन जीने और सक्रिय नागरिक बोध के लिए मानसिक स्वास्थ्य होना किसी भी देश के लिए एक अहम मुद्दा होना चाहिए। लेकिन भारत जैसे विकासशील देश में भी ये मुद्दा अभी भी दूर-दूर तक प्राथमिकताओं में शामिल होता नज़र नहीं आता है।

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ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज 2017 की रिपोर्ट के अनुसार 45.7 मिलियन भारतीय डिप्रेसिव डिसॉर्डर और 44.9 मिलियन भारतीय एंजायटी डिसॉर्डर से जूझ रहे हैं। ये आंकड़े 2017 के हैं। कोविड महामारी के दौरान स्थिति और भयावह हुई है। 80 डीबी कम्युनिकेशन की रिपोर्ट के मुताबिक कंपनी के सर्वे में शामिल 80 फ़ीसद युवा लोग मानसिक रूप से अस्वस्थ्य महसूस कर रहे हैं। एक ऐसा वक़्त जब हम लोग मानसिक अस्वस्थता की ओर बढ़ रहे हैं तब नागरिकों को इसके संवैधानिक प्रावधानों की खबर होना बहुत ज़रूरी हो जाता है ताकि वे किसी भी तरह के शोषण से खुद को मुक्त रख सकें एवं किसी भी परिस्थिति में उनके परिचित व्यक्ति कोर्ट का रुख़ कर अपने अधिकारों का वहन कर सकें।

क्या है मेंटल हेल्थकेयर एक्ट 2017 ?

मार्च 27, 2017 को लोकसभा ने मेंटल हेल्थकेयर एक्ट 2017 पारित किया था। ऐसा नहीं है कि भारतीय में पहले कोई हेल्थकेयर एक्ट नहीं था। इससे पहले मेंटल हेल्थकेयर एक्ट 1987 मौजूद था लेकिन इसका पुरजोर खंडन किया गया क्योंकि इसमें मानसिक रूप से अस्वस्थ्य लोगों के अधिकारों की बात को नहीं रखा गया था और एक रास्ता बना रहा था जहां मानसिक विकार से ग्रसित लोगों को बाकी लोगों से अलग रखा जाए और मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की आत्महत्या से होनेवाली मौत को कानूनन अपराध घोषित करता था।

मेंटल हेल्थ केयर एक्ट 2017 ने मानसिक विकार को परिभाषित किया जिसके अनुसार, ‘सोच, मनोदशा, धारणा, अभिविन्यास, या स्मृति का पर्याप्त विकार जो जीवन की सामान्य मांगों को पूरी करने की क्षमता नहीं रखता, किसी निर्णय पर नहीं पहुंच पाता। साथ ही वे मानसिक दिक्कतें जो शराब और नशीली दवाओं के दुरुपयोग से जुड़ी हैं।’ नैशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नॉलजी इन्फॉर्मेशन में छपे एक लेख के मुताबिक इसी के साथ इंडियन पीनल कोड 309 को भी ख़ारिज किया गया जिसके तहत मानसिक रूप से पीड़ित व्यक्ति का आत्महत्या करना कानून अपराध था। इस कानून के तहत मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के अधिकारों की सुरक्षा की गई है जिसके तहत वे जैसा चाहें उस तरह का इलाज करा सकते हैं।

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इस एक्ट के तहत कुछ ज़रूरी प्रावधान हैं

मानसिक विकार से ग्रसित व्यक्तियों के अधिकार :

  • व्यक्ति को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं जो कि गुणवत्ता में अच्छी हो, आसानी से निर्वाह किया जा सकें, उनका होना ज़रूरी है। अमानवीय व्यवहार से मुक्ति, मुफ्त कानूनी सेवा मिलने का प्रावधान है। व्यक्ति अपना खुद का कैसा इलाज करवाना चाहता है उसी पर निर्भर है और अपना नॉमिनी चुनने के लिए भी आज़ाद है।
  • राष्ट्रीय और राजकीय स्तर पर मेंटल अथॉरिटी के अन्तर्गत साइकोलॉजिस्ट, प्रैक्टिशनर, मेंटल हेल्थ नर्स का रजिस्ट्रेशन होना अनिवार्य है।
  • मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति की स्वीकारोक्ति
  • मानसिक रूप से पीड़ित व्यक्ति के दाखिल होने की प्रक्रिया से लेकर उसके इलाज और डिस्चार्ज की प्रक्रिया का व्याख्यान एक्ट में मौजूद है।
  • आत्महत्या को कानूनन अपराध से हटाना और इलेक्ट्रोकंवल्सिव थेरेपी के दिशा निर्देश

मानसिक रूप से पीड़ित व्यक्ति द्वारा की गई आत्महत्या इस एक्ट के तहत कानूनन अपराध नहीं है। साथ ही यह सरकार की ज़िम्मेदारी है कि व्यक्ति फिर से आत्महत्या करने की कोशिश ना करे। मानसिक रूप से पीड़ित व्यक्ति को इलेक्ट्रोकनवल्सिव थेरेपी बिना अनेस्थेशिया दिए नहीं की जा सकती और बच्चों पर इस थेरेपी का इस्तेमाल निषेध है।

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सज़ा के प्रावधान

इस अधिनियम के तहत मेंटल हेल्थकेयर एक्ट के प्रावधानों का उल्लंघन करने पर 6 महीने तक की कैद या 10,000 रुपये का जुर्माना एक या दोनों हो सकते हैं। बार-बार अपराध करने वालों को दो साल तक की जेल या 50,000-5 लाख रुपये का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। मानसिक अस्वस्थता को पहचानना ज़रूरी है ताकि समय रहते हम उसका इलाज करा सकें। मानसिक दिक्कतों का इलाज कराना या इस बारे में खुलकर बात करना शर्म की, तथाकथित इज्ज़त डुबाने की बात नहीं है। जब महसूस हो तब इस मसले में कानूनी मदद भी लें क्योंकि संविधान आपके अधिकारों की रक्षा करता है। 

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तस्वीर साभार : HR Daily Advisor

मेरा नाम आशिका शिवाँगी सिंह है, फिलहाल मिरांडा हाउस कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातक कर रही हूँ। मैं उस साहित्य और राजनीति की पक्षधर हूँ जो शोषितों की पक्षधर है। रोज़मर्रा के जीवन में सवाल करना, नई-नई आर्ट सीखना, व्यक्तित्व में लर्निंग-अनलर्निंग के स्पेस को बढ़ाना पसंद है।

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