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कोरोना महामारी को आए लगभग दो साल बीत चुके हैं। इन दो सालों में अलग प्रकार के लोगों को अलग-अलग समस्याओं का सामना करना पड़ा है। कई लोगों को अचानक घर में ‘क़ैद’ होना पड़ गया, ऐसा इसलिए क्योंकि घर सबके लिए महफूज़ जगह नहीं होती, तो किसी को घर लौटने के लिए मीलों लंबा मुश्किल सफर तय करना पड़ा। कई लोगों की पढ़ाई या नौकरी छूट गई तो कहीं किसी की पढ़ाई या नौकरी एक ‘स्क्रीन’ में आकर सिमट गई। इन तमाम मुश्किलों में एक अहम मुद्दा जिसपर हमने कम ध्यान दिया वह है-मानसिक स्वास्थ्य। उदाहरण के तौर पर कोविड के चलते खुद को अकेला पाना आम बात होती जा रही है। इसलिए यूके में एक लोनलिनेस (loneliness ) मंत्री नियुक्त किया गया है।

बात आंकड़ों की

दुनियाभर के विभिन्न शोधकर्ताओं ने पाया है कि विश्वभर में अकेले साल 2020 में ही चिंता (एंग्जायटी) के सामान्य से 76 मिलियन और अवसाद के 53 मिलियन ज़्यादा मामले सामने आए हैं। किंग्स कॉलेज लंदन की रिपोर्ट के मुताबिक कोविड के चलते मेंटल हेल्थ के मरीजों में मृत्यु की दर भी काफी बढ़ गई है। पर्सनैलिटी डिसऑर्डर या डिमेंशिया के मरीजों की मृत्यु दर में चार गुना बढ़त देखी गई है। यह रिपोर्ट विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस के लिए तैयार की गई जिसका इस वर्ष मुख्य ‘थीम’ है: ‘असमान दुनिया में मेंटल हेल्थ।’

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महिलाओं और युवाओं पर और गहरा असर

सबकी मुश्किलें एक जैसी नहीं होतीं। इस रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं पर महामारी के सामाजिक और आर्थिक परिणामों का ज़्यादा असर पड़ता है। बच्चों के स्कूल बंद होने या घर में किसी के बीमार पड़ने पर एक महिला का घरेलू काम औसत रूप से काफी बढ़ जाता है। नौकरीपेशा महिलाओं की सैलरी कम होने से उनकी बचत भी कम होती है और इस वजह से उनका आर्थिक बोझ भी बढ़ जाता है। घरेलू काम और आर्थिक तंगी से उनकी समस्याएं बहुत बढ़ गई हैं। युवाओं पर स्कूल-कॉलेज बंद होने और रोज़गार के साधन कम होने से काफी मानसिक दबाव बनता है। महामारी के चलते दोस्तों से न मिल पाने और एक जगह बंद रहने से भी स्वास्थ्य ख़राब हो रहा है। इस प्रकार 20-24 साल की आयु के युवाओं में एंग्जायटी और डिप्रेशन के अनेक मामले देखने को मिले हैं। 

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“समय सब सही कर देगा, रोना कमज़ोरी का लक्षण है।” अक्सर मानसिक समस्याओं से जूझते मरीजों की परेशानियों को नज़रअंदाज़ किया जाता है। इन भ्रांतियों को जल्द से जल्द तोड़ने की कोशिश करी जानी चाहिए और सही चिकित्सक मदद ली जानी चाहिए।

वहीं, हाल ही में जारी की गई यूनिसेफ की नई रिपोर्ट ‘स्टेट ऑफ द वर्ल्ड्स चिल्ड्रेन (SOWC)’ के मुताबिक, भारत में 15 से 24 साल के बीच की उम्र के 14 फीसदी युवा, औसतन 19 फीसदी निराशा महसूस करने वाले अन्य देशों के बच्चों की तुलना में अधिक निराशा महसूस करते हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बच्चों की मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं के पीछे का कारण कोविड-19 के दौरान लगाए गए प्रतिबंध हैं। स्कूल बंद होने, उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी घर में कैद होने के कारण बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक दुनियाभर में हर पांच में से एक युवा जिनकी उम्र 15 से 24 साल के बीच है वे अवसादग्रस्त हैं या चीज़ों में कम दिलचस्पी लेते हैं।

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मेन्टल हेल्थ के प्रति जागरूकता

“समय सब सही कर देगा, रोना कमज़ोरी का लक्षण है।” अक्सर मानसिक समस्याओं से जूझते मरीजों की परेशानियों को नज़रअंदाज़ किया जाता है। इन भ्रांतियों को जल्द से जल्द तोड़ने की कोशिश करी जानी चाहिए और सही चिकित्सक मदद ली जानी चाहिए। ज़रूरत है कि मेंटल हेल्थ को किसी भी अन्य फिज़िकल बीमारी की समानता से देखा जाए। सरकारी अस्पतालों में भी काउंसिलर हो जो कि उचित फीस पर मरीजों को ज़रूरी सेवा उपलब्ध करा पाएं। भारत में स्वास्थ्य मंत्री के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य मंत्री भी होना चाहिए क्योंकि इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के हिसाब से ही भारत में हर सात में से एक व्यक्ति मानसिक रूप से पीड़ित है।

भारत में सिर्फ 30,000 मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ हैं जो कि हमारी बड़ी आबादी के लिए बहुत कम हैं। इसके साथ ही विशेषज्ञों की उचित ट्रेनिंग होनी चाहिए और आम लोगों तक ये सुविधाएं पहुंचनी चाहिए। मानसिक रोग के शुरुआती स्तर पर ही इलाज शुरू करना होगा। इसके लिए कोविड हेल्पलाइन की तरह ही मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी हेल्पलाइन चलाई जा सकती है। सोशल मीडिया के ज़रिए मेंटल हेल्थ की जानकारी जन-जन तक और तेज़ी से पहुंचाई जा सकती है। आज 50 करोड़ से ज़्यादा भारतीय सोशल मीडिया का इस्तमाल करते हैं। ऐसे में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति अनेक मीडिया कैंपेन चलाकर लोगों को जागरूक किया जा सकता है। ऑनलाइन ही ज़रूरतमंदों को मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक से जोड़ा जा सकता है। भारत में जहां 1 लाख 40 हज़ार लोगों की मृत्यु आत्महत्या से होती है वहां मानसिक स्वास्थ्य जैसे विषय को टाला नहीं जा सकता। 

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तस्वीर साभार : Very Well Mind

सुचेता चौरसिया टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान (TISS) मुंम्बई में मीडिया एंड कल्चरल स्टडीज़ की छात्रा हैं। अपने लेखन के ज़रिए वह समाज के हर भाग के लोगों में समरसता का भाव लाना चाहती हैं। वह पर्यावरण, लैंगिक समानता, फ़िल्म व साहित्य से जुड़े मुद्दों में रुचि रखती हैं। किताबें पढ़ना, बैडमिंटन खेलना, फोटोज़ खींचना उनके अन्य शौक हैं।

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