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जिस समाज में महिलाओं का स्थान इतना निम्न समझा जाता हो कि उन्हें पैदा ही न होने दिया जाए, हर तरह से उनका शोषण किया जाए वहां लिंगानुपात कम होना बहुत बड़ी बात नहीं है। लेकिन इस पितृसत्तात्मक समाज में लड़कियों को पैदा लेने से पहले ही मारे जाने के कारण शोषण का सामना भी महिलाएं ही करती हैं। भारत में सबसे कम लिंगानुपात हरियाणा राज्य में है। साल 2018 के सेक्स रेशियो सेंसस के अनुसार हरियाणा में प्रति हज़ार पुरुषों पर मात्र 879 महिलाएं हैं। कम लिंगानुपात, कन्या भ्रूण हत्या, पितृसत्तात्मक समाज ने पारो (पार जगह से लाई गई महिला) प्रथा को जन्म दिया है। इस प्रथा में शामिल हुई महिला को मोल्की यानी खरीदकर लाई गई महिला कहा जाता है जिस कारणवश इस प्रथा को मोल्की प्रथा भी कहा जाता है। सरल शब्दों में समझें तो दूसरी जगहों से अपने घर के लिए एक बंधुआ मज़दूर ब्याह कर नहीं बल्कि खरीदकर लाई जाती है।

पारो प्रथा मुख्य रूप से हरियाणा में प्रचलित है लेकिन राजस्थान, पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी कई जगहों पर इस प्रथा का पालन किया जात है। इस प्रथा के अंतर्गत  झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, बिहार, पश्चिम बंगाल के सुदूर गांवों से भयंकर गरीबी में रह रहे परिवारों को रुपए देकर उनकी लड़कियां खरीदी जाती हैं। कभी शहरों में काम करने के बहाने लाईं जाती हैं, अपहरण करकर भी इन्हें लाया जाता है। परिवार को इस धोखे में रखकर कि उनकी बेटी किसी दूसरे राज्य के संपन्न परिवार में ब्याह कर ले जाई जा रही है, के बहाने भी लड़कियों को इस प्रथा में झोंक दिया जाता है। इन्हें खुद के इलाकों से लाकर हरियाणा के मेवात में लाईं जाती हैं जो कि इस खरीद- फरोख्त का बडा गढ़ माना जाता है। हिंदुस्तान टाइम्स में छपी खबर के मुताबिक एनजीओ दृष्टि स्त्री अध्ययन प्रबोधन केंद्र द्वारा किए गए एक क्षेत्र अध्ययन से पता चला है कि हरियाणा में सर्वेक्षण किए गए 10,000 घरों में से 9,000 से अधिक विवाहित महिलाओं को अन्य राज्यों से खरीदा गया था।

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लड़कियां इस प्रथा में एक बार नहीं बल्कि बार-बार बेची जाती हैं। छोटी उम्र की लड़कियों को अधेड़ उम्र के व्यक्ति लेकर जाते हैं। बहुत से पुरुष मिलकर एक लड़की को भी ले कर जाते हैं क्योंकि यह ख़रीद-फरोख्त जिसे ‘शादी’ का नाम दिया जाता है, दरअसल यह कहीं भी रजिस्टर नहीं होती। शादी रजिस्टर न होने पर लड़की का वैवाहिक कानून के अंतर्गत कोई भी अधिकार प्राप्त नहीं होते जिससे शोषण कानून की देख से बच जाता है। ऐसा नहीं है कि एक लड़की एक ही घर में सदा के लिए रह जाती है। कई मामलों में परिवार किसी लड़की को कुछ वक्त रखते हैं, जरूरत ख़त्म होने के बाद फिर से बेच देते हैं। ‘पति’ की मृत्यु के बाद भी इनका शोषण ख़त्म नहीं होता, इन्हें दोबारा बेच दिया जाता है या घर से निकाल दिया जाता है। जिन घरों में इन्हें खरीदकर लाया जाता है वे काम चलाऊ भोजन व्यवस्था पर इन लड़कियों/महिलाओं से घर के सभी काम, खेत-खलिहान के काम कराते हैं, अपनी यौन आवश्यकताओं को पूरा करते हैं जिससे इन महिलाओं जीवन मात्र ‘सेक्स स्लेव’ बनकर रह जाता है। मानवीय जीवन के मूलभूत अधिकार भी इनके हिस्से नहीं आते। 

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पारो प्रथा में शामिल हुई महिला को मोल्की यानी खरीदकर लाई गई महिला कहा जाता है जिस कारणवश इस प्रथा को मोल्की प्रथा भी कहा जाता है। सरल शब्दों में समझें तो दूसरी जगहों से अपने घर के लिए एक सीमित समय, आजीवन बंधुआ मज़दूर ब्याह कर भी नहीं खरीदकर लाई जाती है।

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संधियां लिंग के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करती हैं और इसके तहत सभी देशों को सभी क्षेत्रों में महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा, उनकी हर क्षेत्र में भागीदारी सुनिश्चित करने की आवश्यकता होती है। संपत्ति के स्वामित्व और हिंसा से स्वतंत्रता, शिक्षा तक समान पहुंच और सरकार में भागीदारी राज्य की जिम्मेदारी है। लेकिन जब ये महिलाएं इस प्रथा में घसीटी जा रही हैं तब वे इन इन मानवाधिकारों से वंचित रखी जा रही हैं। इसीलिए बतौर लोकतांत्रिक देश हम अपने नागरिकों के एक बड़े वर्ग को मानवाधिकार मुहैया कराने में विफल हुए हैं। इसमें न सिर्फ महिलाएं बल्कि दलित, आदिवासी, बहुजन, धार्मिक अल्पसंख्यक भी शामिल हैं। इस प्रथा में भी हमें धर्म और जाति, ख़ासतौर से जाति का रोल देखना समझना होगा। ये लड़कियां जिन इलाकों से लाईं जा रही हैं, जिन इलाकों के परिवारों से लाईं जा रही हैं वे दलित, बहुजन, आदिवासी बहुल राज्य हैं।

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संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) और ऑक्सफोर्ड गरीबी और मानव विकास पहल (ओपीएचआई) के वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक (एमपीआई), 2018 के अनुसार अनुसूचित जनजाति से संबंधित हर दूसरा व्यक्ति और अनुसूचित जाति से संबंधित हर तीसरा व्यक्ति गरीब है। इसी तरह हर तीसरा मुसलमान गरीब है। जानकार बताते हैं कि जिन राज्यों में ये प्रथा चलन में है वहां के सवर्ण, मध्यवर्गीय अमीर परिवार अपनी ही जाति, धर्म की लड़कियों से ब्याह रचा लेते हैं चाहे वे गरीब ही क्यों न हों। लेकिन वे गरीब परिवार जो ऐसा नहीं कर पाते, वे पुरुष जो अधेड़ उम्र के होते हैं जिनकी शादियां संभव नहीं होती, तलाकशुदा, विधुर, शराबी आदि पुरुष इस खरीद-फरोख्त में शामिल बिचौलियों (मिडिल मैन) से मिलते हैं जिनके सामने शादी की समस्या रखी जाती है और तब खरीदकर, अगवा कर, धोखे से लाई गईं लड़कियों को इनके हवाले रुपए लेकर कर दिया जाता है। 

पारो प्रथा एक ऐसी प्रथा जो मूलभूत मानवाधिकारों से भी महिलाओं को वंचित कर रही है तब हमें इसके निवारण भी सोचने होंगे जो सामाजिक, राजनीतिक हो और इस प्रथा के मिटने में सहयोगी हो।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक सेल्फी विद डॉटर फाउंडेशन के निदेशक 37 वर्षीय सुनील जगलान ने दावा किया है कि लड़कियों की तस्करी का चलन अहिरवाल क्षेत्र से शुरू हुआ लेकिन अब इसमें जाट समुदाय समेत अलग-अलग समुदायों से आनेवाले लोग शामिल हैं। साथ ही धीरे-धीरे यह प्रथा हरियाणा राज्य के अन्य क्षेत्रों जैसे जींद, रोहतक, हिसार, कुरुक्षेत्र में भी फैल गई। सुनील जगलान यह दावा करते हैं कि जींद स्थित उनके सेल्फी-विद-डॉटर फाउंडेशन द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार हरियाणा राज्य के बाहर से 1.30 लाख दुल्हनों की ‘खरीद’ की गई है। यह प्रथा मानव तस्करी के अंतर्गत आती है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 23 (1) के अंतर्गत मानव तस्करी और बेगारी और इसी तरह के अन्य प्रकार के जबरन श्रम निषिद्ध हैं और इस प्रावधान का कोई भी उल्लंघन कानून के अनुसार दंडनीय अपराध है।

पारो प्रथा एक ऐसी प्रथा जो मूलभूत मानवाधिकारों से भी महिलाओं को वंचित कर रही है तब हमें इसके निवारण भी सोचने होंगे जो सामाजिक, राजनीतिक हो और इस प्रथा के मिटने में सहयोगी हो। इस प्रथा के मूल में घटता लिंगानुपात है और घटते लिंगानुपात की जड़ कन्या भ्रूण हत्या, पितृसत्ता मौजूद है। हमें मानसिक रूप से यह बदलाव करना होगा कि समाज की संरचना में महिलाओं का भाग भी महत्वपूर्ण है, कानूनी प्रावधान और तंत्र को भ्रूण हत्याओं, महिला शोषण को रोकने पर और भी पहुंच बनाने की ज़रूरत है। 

जिन परिवारों से यह लड़कियां लाईं जाती हैं, वे परिवार गरीबी के कारण ऐसा करते हैं इसीलिए उस ओर से सोचते हुए हमें देश के प्रत्येक नागरिक के पास इतनी मूलभूत सुविधाएं होनी चाहिए कि वे खाना, कपड़ा, मकान और शिक्षा से वंचित न हो। एक प्रक्रिया जो इस पूरी प्रक्रिया में निजी तौर पर महसूस हई वह है ट्रेसिंग। पुलिस कंप्लेंट प्रक्रिया को और भी सरल बनाते हुए, ऐसी लड़कियों की ट्रेसिंग की जानी चाहिए जिससे उनकी मदद की जा सके। इस सबके लिए हमें एक मजबूत पुलिसिया तंत्र की ज़रूरत है। साल 2024 में चुनाव हैं, इस देश के चुनावों में किसी भी पार्टी के मेनिफेस्टो में से ऐसी लड़कियां अपनी जगह नहीं बना पातीं। इस ओर भी पार्टियों का ध्यान खींचने की ज़रूरत है और अगर यह सबसे वे परिचित हैं तो उन्हें खुद इस ओर बड़े बदलाव करने की ज़रूरत है।

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तस्वीर साभार: Foreign Affairs

मेरा नाम आशिका शिवाँगी सिंह है, फिलहाल मिरांडा हाउस कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातक कर रही हूँ। मैं उस साहित्य और राजनीति की पक्षधर हूँ जो शोषितों की पक्षधर है। रोज़मर्रा के जीवन में सवाल करना, नई-नई आर्ट सीखना, व्यक्तित्व में लर्निंग-अनलर्निंग के स्पेस को बढ़ाना पसंद है।

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