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बॉलीवुड में क्यों हीरो ही एवरग्रीन हैं? बॉलीवुड को शादीशुदा, मां बन चुकी और तीस की उम्र पार कर चुकी हीरोइनों के प्रति उदासीनता दिखाने वाली इंडस्ट्री कहा जा सकता है। एक वक्त के बाद, खासतौर से शादी के बाद अभिनेत्रियां पर्दे पर मां, पत्नी और बहन की भूमिका में ही नजर आती है। वहीं, दूसरी ओर 60 साल से अधिक उम्र का हीरो पर्दे पर हूबहू वैसा ही बना रहता है जैसा तीस साल पहले था। वह एक्शन करता है, गुंडों से लड़ता है और अपने से कम उम्र की हीरोइन के साथ रोमांस भी करता नज़र आता है। ऐसे बहुत से उदाहरण हमारे सामने हैं जहां हीरो और हीरोइन की उम्र में तीस साल से भी ज्यादा का अंतर होता है, लेकिन इस पुरुष प्रधान इंडस्ट्री में मानो सब चलता है।

हमेशा ऐसा होता है कि किसी हीरोइन के शादी और बच्चे के लिए ब्रेक के बाद उसकी सिनेमा में उस तरह से वापसी नहीं होती है जैसे ब्रेक पर जाने से पहले उसने काम किया होता है। मुख्य किरदारों में शामिल करने के बावजूद भी उन किरदारों का प्रारूप बदल जाता है। 40 साल की उम्र में कमबैक करनेवाली महिला कलाकारों को यदि काम मिलता है तो वह पर्दे पर भी किसी की पत्नी या फिर मां का किरदार निभाती नजर आती हैं। शादी, परिवार और एक समय के बाद बॉलीवुड में हीरोइनों को काम देने में वह उदारता नहीं देखी जाती जो पुरुष कलाकारों को मिलती है।

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हीरो प्रधान बॉलीवुड फिल्में

बॉलीवुड में फिल्मों की सफलता का आधार हीरो को माना जाता है। फिल्म की कहानी में दर्शकों की दिलचस्पी कम होती है उससे पहले यह जानने की उत्सुकता रहती है कि फिल्म में कौन सा हीरो है। तमाम फिल्मी प्रचार तंत्र भी इसी बात को बढ़ावा देता है। ‘सलमान खान की फिल्म में नया चेहरा, जब सलमान की पहली फिल्म आई थी तब उस हीरोइन की उम्र मात्र छह साल थी।’ अभिनेता की लोकप्रियता को ही ध्यान में रखते हुए हीरोइन को लीड रोल में लिया जाता है और फिर बाकी की चीजों पर ध्यान दिया जाता है। लोकप्रियता और व्यापार को बरकरार रखने के लिए हिंदी फिल्मों के हीरो अपने से कम उम्र के किरदारों को निभाना पसंद करते हैं और साथ में अपने से आधी उम्र की हीरोइनों के साथ पर्दे पर रोमांस करते हैं।

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बॉलीवुड को शादीशुदा, मां बन चुकी और तीस की उम्र पार कर चुकी हीरोइनों के प्रति उदासीनता दिखाने वाली इंडस्ट्री कहा जा सकता है। एक वक्त के बाद, खासतौर से शादी के बाद अभिनेत्रियां पर्दे पर मां, पत्नी और बहन की भूमिका में ही नजर आती है। वहीं, दूसरी ओर 60 साल से अधिक उम्र का हीरो पर्दे पर हूबहू वैसा ही बना रहता है जैसा तीस साल पहले था।

भले ही कितनी भी उम्र ढल जाए बॉलीवुड का हीरो हमेशा जवान बना रहा है। ऐसा नहीं है कि यह सब फिल्मों में नया-नया चलन है। सौ साल से ज्यादा पुराने भारतीय सिनेमा के इतिहास में हमेशा से ऐसा देखा गया है जहां महिला कलाकारों को पुरुष कलाकारों से कम माना जाता है। शुरुआत से लेकर अब तक अभिनेत्रियों की उपस्थिति को ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता है। आज भले ही कुछ फिल्में महिला प्रधान बन रही हो, लेकिन उनकी सफलता को लेकर उतना कोई निश्चिंत नहीं रहता है और न ही वह उत्साह दिखता है जो एक हीरो की फिल्म रिलीज होने से पहले देखने को मिलता है।

हीरो रिपीट हो सकता है हीरोइन क्यों नहीं

हाल ही में रिलीज हुई फिल्म ‘सूर्यवंशी’ में 90 के दशक के हिट गीत ‘टिप टिप बरसा पानी’ को रिक्रिएट किया गया है। गाने के बोल वही हैं, अंदाज भी लगभग वही है। हीरो भी पुराना है लेकिन हीरोइन नयी है। साल 1994 में आई फिल्म ‘मोहरा’ में रवीना टंडन और अक्षय कुमार पर फिल्माये गए इस गाने में अक्षय कुमार की मौजूदगी बनी हुई है। इस बार गीत गाती हीरोईन रवीना की जगह कैटरीना कैफ है। रील की रियल्टी यही है कि यहां 90 के दशक का हीरो तो रिपीट हो सकता है लेकिन हीरोइन नहीं। फिल्म उघोग का यह पैटर्न यह दिखाता है कि यहां महिला किरदारों को आज भी एक शोपीस की तरह ही माना जाता है। उनकी अदाकारी को कम महत्व देकर उनकी शारीरिक सुंदरता को ज्यादा महत्व दिया जाता है। एक वक्त के बाद महिला के शरीर में आये बदलावों को सिनेमा जगत पर्दे पर दिखाने से परहेज करता है।

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पितृसत्ता से ग्रसित सोच सिनेमा जगत में पूरी तरह से देखने को मिलती है। कहते है सिनेमा समाज का आइना होता है, पर्दे में बड़े उम्र के आदर्श हीरो के साथ कम उम्र की महिला कलाकारों का काम करना उस पूर्वाग्रह को दिखाता है जो समाज में देखने को मिलती है। पितृसत्तात्मक सोच के अनुसार शादी, प्यार में महिला की उम्र पुरुष से कम होनी चाहिए। इसी रीत पर सिनेमा जगत में अधेड़ उम्र के हीरो के साथ उनसे आधी उम्र की हीरोइनों को तो आसानी से स्वीकार कर लिया जाता है। दूसरी ओर पर्दे पर जब हीरो के साथ उससे बड़ी उम्र की हीरोइन की जोड़ी बनकर आती है तो उसको लेकर प्रतिक्रिया रूढ़िवाद से ग्रसित होती है। इतना ही नहीं असल ज़िंदगी में अगर कोई हीरोइन अपने से कम उम्र के पुरुष के साथ रिलेशनशिप या शादी करती है तो उसके लिए अनुचित भाषा का भी इस्तेमाल किया जाता है।

आज भी बॉलीवुड की बड़े बजट की फिल्में खासतौर पर पुरुष केंद्रित मनोरंजन पर ही आधारित होती है। फिल्म का पूरा केन्द्र हीरो होता है, जिसमें हीरोइन की भूमिका न के बराबर होती है।

दिलीप कुमार से लेकर अक्षय कुमार

बॉलीवुड में अभिनेत्रियों के काम करने की एक सीमा शुरू से ही बना दी गई है। शुरुआत से लेकर अब तक यह चलन चलता आ रहा है। 50 की उम्र पार कर चुका अभिनेता अभी पर्दे पर 25 की उम्र के किरदार निभाता नज़र आ रहा है। दिलीप कुमार के ज़माने से लेकर आज तक यह चलता आ रहा है। 1970 के समय में रिलीज हुई गोपी, बैराग जैसी फिल्मों में दिलीप कुमार लगभग बीस साल की हीरोइन सायरा बानो के साथ पर्दे पर नजर आए थे। साल 1980 में फिल्म ‘दयावान’ में विनोद खन्ना और माधुरी दीक्षित की जोड़ी में भी उम्र का एक बड़ा अंतर देखने को मिला था। नये चेहरे और नये टैलेंट की दुहाई देने वाला बॉलीवुड महिला कलाकारों के लिए तो यह बात अपनाता है लेकिन हीरो वही पुराना चाहता है।

इक्कीसवीं सदी में उम्र के अंतर से बनी अटपटी जोड़ियां पर्दे पर और ज्यादा दिखने लगी है। बॉलीवुड के अक्षय कुमार से लेकर खान एक्टर साल दर साल एक ही तरह के रूप में आगे बढ़ रहे हैं और उनके साथ फिल्मों में नयी हीरोईनों की एंट्री हो रही है। नये टैलेंट को लॉन्च करने के नाम पर बॉलीवुड इंडस्ट्री में लगातार बड़े एक्टर नयी और अपने से कम उम्र की अभिनेत्रियों के साथ काम करते नज़र आते हैं। यह ट्रेंड सिनेमा जगत में स्थापित पुरुषवादी मानसिकता को दिखाता है और जिस पर सवाल न के बराबर होता है।

निर्माता-निर्देशक इस बात पर अक्सर यह दलील देते नज़र आते हैं कि दर्शक यही चाहते हैं बल्कि सच्चाई यह है कि दर्शकों के पास तो विकल्प ही नहीं होता है। आज भी बॉलीवुड की बड़े बजट की फिल्में खासतौर पर पुरुष केंद्रित मनोरंजन पर ही आधारित होती है। फिल्म का पूरा केन्द्र हीरो होता है, जिसमें हीरोइन की भूमिका न के बराबर होती है। वर्तमान में फिल्मों के पैटर्न के अनुसार फिल्म में अभिनेत्री की भूमिका कहानी में अनफिट एक रोमांटिक सॉग तक सीमित कर दी जाती है जिसका कहानी से भी कोई वास्ता नहीं रहता है।

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सीनियर हीरोइन के लिए सीमित होते विकल्प

वैसे तो पूरा हिंदी सिनेमा अभिनेताओं पर आधारित फिल्में बनाने के लिए ही जाना जाता है। यदि कुछ महिला कलाकारों ने दोबारा काम करना चुना है तो उनके लिए भूमिकाओं को एक दायरे में बांध दिया जाता है। करियर में ब्रेक लेकर वापसी करने वाली बड़े नामों वाली अभिनेत्रियों को एक तय किरदारों में ही भूमिका दी जाती है। अधिकतर अभिनेत्रियों ने शादी के बाद की फिल्मों में शादीशुदा महिला के किरदार ही निभाए हैं या सिंगल मदर के रोल में नजर आई हैं। ज्यादा उम्र की अभिनेत्रियों को पत्नी या मां के रोल दिया जाना, सिनेमा जगत की सकीर्ण मानसिकता को जाहिर करता है। दूसरी ओर अपने दौर में खूब नाम और शोहरत कमाने वाली इन महिला अभिनेत्रियों को जब बॉलीवुड की मुख्यधारा में वह जगह नहीं मिली तो ये टीवी या ओटीटी प्लैटफार्म पर काम करती नजर आती हैं।

पर्दे पर पचास साल की उम्र में नौजवान का किरदार निभाने वाले इन एक्टरों की सरोकारिता पर भी सवाल उठना चाहिए। इंडस्ट्री में महिला अभिनेत्रियों के साथ होते भेदभाव पर ये लोग चुप्पी थाम लेते हैं। वहीं ,जब एक एक्टर 25 साल बाद अपनी फिल्म के रीमेक गाने में काम कर सकता है तो उसके साथ की महिला अभिनेत्री को भी तो काम दिया जा सकता है। 

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मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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