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भारतीय फिल्म उद्योग दुनिया में सबसे बड़ा है। हर साल यह बीस से अधिक भाषाओं में हज़ार से अधिक फिल्मों का निर्माण करता है। आज के भारतीय सिनेमा के इस दौर में एक अभिनेत्री के बिना किसी फिल्म की कल्पना नहीं की जा सकती है। लेकिन भारतीय सिनेमा का एक वह दौर भी था जहां महिलाओं का फिल्मों में काम करना वर्जित था। भारतीय सिनेमा की पहली फिल्म में महिलाओं का किरदार भी पुरुष कलाकारों ने निभाया था। महिलाओं के लिए अभिनय का संघर्ष काफी चुनौतीपूर्ण और लंबा रहा है। आज भी महिला कलाकारों का समान वेतन जैसे कई मुद्दों पर संघर्ष जारी है। भारतीय सिनेमा का वर्तमान काफी प्रतिभावान अदाकाराओं से भरपूर है। यह लेख समर्पित है भारतीय सिनेमा में अभिनय करनेवाली पहली महिला ‘दुर्गाबाई कामत’ को, जिन्होंने अभिनय को पेशे के तौर पर चुना और यह साहसी कदम उठाते हुए सिनेमा के बंद दरवाज़े को भारतीय महिलाओं के लिए खोला।

शुरुआती सफर

20वीं सदी की शुरुआत में सिनेमा भारत में एक उभरता हुआ उद्योग था लेकिन यह विशेष रूप से पुरुषों के लिए आरक्षित था। महिलाएं उस समय काफी बंदिशों में गुज़ारा करती थीं। फिल्मों में काम करना तो दूर, महिलाओं का फिल्में देखना भी बुरा माना जाता था। ऐसे समय में दुर्गाबाई कामत ने कई अन्य महिलाओं के लिए मार्ग प्रशस्त करते हुए सिनेमा में कदम रखा। दुर्गाबाई कामत एक मराठी थिएटर अभिनेत्री थीं। उनकी बेटी कमलाबाई के द्वारा दिए एक साक्षात्कार से पता चलता है कि उनका जन्म ब्राह्मण समुदाय में कथित तौर पर 1879 में हुआ था। उन्होनें सातवीं कक्षा तक पढ़ाई की थी। उनकी शादी मुंबई के जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स में इतिहास के शिक्षक आनंद नानोस्कर से हुई थी। लेकिन 1903 में उन्होनें अपने पति से अलग होने का फैसला लिया। उस समय उनकी बेटी कमलाबाई तीन साल की थीं। उन्होंने अपनी और अपनी बेटी के पालन-पोषण की ज़िम्मेदारी खुद से उठाने का निर्णय लिया।

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20वीं सदी की शुरुआत में सिनेमा भारत में एक उभरता हुआ उद्योग था लेकिन यह विशेष रूप से पुरुषों के लिए आरक्षित था। महिलाएं उस समय काफी बंदिशों में गुज़ारा करती थीं। फिल्मों में काम करना तो दूर, महिलाओं का फिल्में देखना भी बुरा माना जाता था। ऐसे समय में दुर्गाबाई कामत ने कई अन्य महिलाओं के लिए मार्ग प्रशस्त करते हुए सिनेमा में कदम रखा।

पितृसत्तात्मक समाज की बंदिशो में जी रही महिलाओं के लिए उन दिनों रोजगार के बहुत कम विकल्प हुआ करते थे और समाज में अकेली मां के लिए नौकरी पाना और भी कठिन कार्य था। उस समय लोग सोचते थे कि महिलाएं केवल घर, बच्चों और अपने पति की शादी के बाद देखभाल करने के लिए ही उपयुक्त हैं। औरतों के लिए अभिनय के पेशे को सम्मानजनक नज़रों से नही देखा जाता था। लेकिन कहते हैं कि इंसान की मजबूरी और कोशिशें हमेशा बंदिशों को तोड़ने का साहस देती हैं। ऐसा ही किया दुर्गाबाई कामत ने। समाज की परवाह किए बिना उन्होनें एक ट्रैवलिंग थिएटर कंपनी जो की अलग-अलग स्थानों पर जाकर नाटकों का प्रदर्शन किया करती थी, वहां काम करना शुरू कर दिया।

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दुर्गाबाई अधिकतर काम के लिए कंपनी के साथ घूमती रहती थीं, विभिन्न स्थानों पर प्रदर्शन करती रहती थी। चूंकि उनकी बेटी कमलाबाई को भी उनके साथ यात्रा करनी पड़ती थी, इसलिए उन्होंने अपने साथ होमस्कूल करने का फैसला किया ताकि कमलाबाई इतना घुमंतू जीवन जीने के बावजूद शिक्षा प्राप्त कर सकें। कमलाबाई की शिक्षा थिएटर कंपनी में काम करते हुए ही हुई। अभिनय, गायकी सब उन्होनें थिएटर कंपनी में ही सिखा। दुर्गाबाई ने पितृसत्तात्मक समाज को चुनौती देते हुए अभिनय करने का जो साहसी फैसला लिया उसकी उन्हें कीमत भी चुकानी पड़ी। ब्राह्मण समाज ने उन्हें बहिष्कृत कर दिया। कमलाबाई एक साक्षात्कार में बताती हैं, “उन दिनों, पुरुष ही महिलाओं की भूमिका निभाया करते थे। इसलिए मेरी मां और मैं इन पुरुषों से सबसे अधिक विरोध सहते थे। हम उनके पहले स्वाभाविक दुश्मन थे। कुछ कंपनियों का तो नियम यह था कि वे महिलाओं को काम पर ही नहीं रखती थीं।”

बड़े पर्दे पर आगाज़

साल 1913 में जब दादा साहब फाल्के ने भारत की पहली फिल्म ‘राजा हरिशचंद्र’ बनाने की तैयारी की तब लाख कोशिशों के बाद भी उन्हें कोई महिला कलाकार नहीं मिल पाई। बाद में उन्हें महिलाओं की भूमिका के लिए पुरुषों से काम करवाना पड़ा क्योंकि कोई भी परिवार अपने घर की महिलाओं को सिनेमा में शामिल होने की अनुमति नहीं देता था। खुद महिलाएं भी बदनामी के डर से इस पेशे में कदम रखने से बचती थी। लेकिन दादा साहब जानते थे की पर्दे पर महिला कलाकारों के बिना जीवन की वास्तविकता को दिखाना मुमकिन नही था। इसलिए उन्होनें अपनी दूसरी फिल्म के लिए महिला कलाकार की खोज शुरू की। दुर्गाबाई की थिएटर मंडली के संचालक से दादा साहब की जान-पहचान थी। उन्हें दुर्गाबाई के बारे में जानकारी मिली। तब उन्होंने दुर्गाबाई को फिल्म में काम करने का प्रस्ताव दिया। आर्थिक तंगी होने की वजह से दुर्गाबाई ने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। न सिर्फ उन्होनें बल्कि उनकी बेटी ने भी फिल्म में किरदार निभाया।

दुर्गाबाई और उनकी बेटी कमलाबाई की साल 1913 में दादा साहब द्वारा निर्मत ‘मोहिनी भस्मासुर’ पहली फिल्म थी। दुर्गाबाई ने फिल्म में देवी पार्वती और उनकी बेटी ने मोहिनी का किरदार निभाया। जहां दुर्गाबाई ने भारतीय सिनेमा की पहली महिला अभिनेत्री होने का इतिहास बनाया, वहीं उनकी बेटी पहली बाल अभिनेत्री बनी। इस तरह मां बेटी की इस जोड़ी ने सिनेमा में आनेवाली महिलाओं के लिए रास्ता बनाया। दुर्गाबाई कामत की यह पहली और आखिरी फिल्म थी लेकिन उनकी बेटी कमलाबाई गोखले ने आगे भी अपना फिल्मी करियर जारी रखा। आगे उनके परिवार के सदस्यों विक्रम गोखले और मोहन गोखले ने सिनेमा में अपना खास योगदान दिया। 116 वर्ष की उम्र मे 17 मई 1997 को दुर्गाबाई कामत का निधन हुआ।

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दुर्गाबाई कामत के इतिहास को सहेजने की जरूरत है। दुर्गाबाई एक साहसी महिला थीं जिन्होंने अभिनय को अपना पेशा बनाया, वह एक अकेली माँ थी जिन्होंने पितृसत्तात्मक समाज द्वारा महिलाओं के लिए बनाई गई सीमाओं को तोड़ा।

आज का सिनेमा और औरतें

पिछले दशकों में भारतीय सिनेमा ने फिल्मों के माध्यम से महिलाओं को चित्रित करने के तरीके में महत्वपूर्ण बदलाव किया है। आधुनिक फिल्में महिलाओं को अधिक स्वतंत्र, आत्मविश्वासी और करियर उन्मुख के रूप में दर्शाती हैं। सिनेमा में महिलाओं की भूमिकाएं समय के साथ बदल गई हैं। अब एक महिला का किरदार कहानी को अपनी प्रतिभा और कला से आगे बढ़ाने के लिए सक्षम है। भारतीय फिल्म उद्योग में महिलाओं ने व्यक्तिगत फिल्मों को सफलता दिलाने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेकिन आज भी सिनेमा के कई मुद्दों में सुधार की जरूरी दरकार है। भारतीय सिनेमा में मजबूत महिला पात्रों को उचित सम्मान और श्रेय देने के इतिहास का अभाव है। बॉलीवुड की अधिकतर फिल्में महिलाओं को या तो घरेलू महिला के रूप में दिखाती हैं या फिर ‘ग्लैमरस’ किरदारों में अधिक दिखाया जाता है। कॉमेडी ,रोमांस या एक्शन फिल्म हो, हर फिल्म में एक ‘आइटम सांग’ जरूर रखा जाता है। एक जरूरी मुद्दा पैसों सै जुड़ा है। अक्सर महिला कलाकारों को ‘इक्वल पे’ का मुद्दा उठाते हुए देखा जाता है। उनका कहना होता है कि पुरुष कलाकारो को जितना भुगतान मिलता है उसका एक तिहाई भी वही काम के लिए महिला कलाकारों को नही दिया जाता जो कि सरासर जेंडर के आधार पर होनेवाला भेदभाव है।

दुर्गाबाई कामत के इतिहास को सहेजने की जरूरत है। दुर्गाबाई एक साहसी महिला थीं जिन्होंने अभिनय को अपना पेशा बनाया, वह एक अकेली मां थी जिन्होंने पितृसत्तात्मक समाज द्वारा महिलाओं के लिए बनाई गई सीमाओं को तोड़ा। दुर्गाबाई और कमलाबाई को देखने के बाद कई महिलाओ ने भारतीय सिनेमा में कदम रखा। मां-बेटी की यह जोड़ी लाखों महिलाओं के लिए प्ररेणा बनी लेकिन दुखद है कि दुर्गाबाई के जीवन का अधिकांश इतिहास खो गया है। इसे सहेजने की ज़रूरत है क्योंकि दुर्गाबाई कामत वह हस्ती थीं जिन्होंने साबित किया कि भले ही यह पितृसत्तात्मक समाज एक अभिनेत्री को देखना पसंद न करता हो, लेकिन आने वाला वक्त उतना ही महिलाओं का होगा जितना की पुरूषों का है।

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I am Monika Pundir, a student of journalism. A feminist, poet and a social activist who is giving her best for an inclusive world.

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