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हमारे समाज में बॉलीवुड फिल्मों और उनके गानों का कितना प्रभाव पड़ता है, यह किसी से छिपा नहीं है। अगर हम बात करें बॉलीवुड के आइटम सॉन्ग्स की तो इनका भी हमारे समाज की युवा पीढ़ी पर अच्छा-खासा असर देखने को मिलता है। क्या आपने कभी गौर किया है कि अक्सर बॉलीवुड के आइटम सॉन्ग्स में औरतों को ‘चिकनी चमेली, मुन्नी बदनाम, जलेबी बाई और तंदूरी मुर्गी’ जैसे उपनामों से बुलाया जाता है जैसे महिला कोई वस्तु हो। अगर गौर करें तो आइटम सॉन्ग्स का फिल्मों की कहानी से कोई लेना-देना नहीं होता है। ये गाने सिर्फ फिल्मों में ग्लैमर और मेल गेज़ को ध्यान में रखकर ही बनाए जाते हैं। फिल्मों में आइटम सॉन्ग्स की कोई खास ज़रूरत होती नहीं हैं। ये सिर्फ और सिर्फ औरतों को ऑब्जेक्टिफाई करते हैं और एक वस्तु की तरह पेश करते हैं।

इसमें कोई शक नहीं हैं कि बॉलीवुड के आइटम सॉन्ग्स यौन हिंसा, रूढ़िवादी सोच और पितृसत्ता को बढ़ावा देते हैं और यह पूरी तरह से मेल गेज़ को ध्यान में रखकर लिखे जाते हैं। वैसे बॉलीवुड नारी शक्तिकरण की बातें तो करता है और दमदार महिला किरदारों पर फिल्म भी बनाता है पर जब गानों पर बात आती है तो वह सेक्सिट, मेल गेज़ से भरे और महिला-विरोधी होते हैं। 

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पीछा करना और यौन हिंसा को बढ़ावा देना है

शाहिद कपूर की फिल्म आर.राजकुमार के गाने ‘गंदी बात’ का उदाहरण लीजिए। यह गाना स्टॉकिंग यानि पीछा करना और यौन हिंसा को एकदम सही बताता है। इस गाने में हीरो अपनी हीरोइन से कहता है कि अगर उसने हीरो की बात नहीं मानी तो वह उसके साथ ‘गंदी बात करेगा’। इसमें गंदी बात से मतलब है ज़बरदस्ती करना। सिनेमा हर तरीके से समाज को प्रभावित करता है ऐसे में जाहिर है कि इन गानों का भी युवा पीढ़ी और भारतीय समाज पर पूरी तरह से असर पड़ता ही होगा। ऑक्सफैम इंडिया की 2018 की स्टडी के मुताबिक, 95% लड़कियों ने यह शिकायत की थी कि जब वे बाहर घूमने जाती हैं तो अक्सर बॉलीवुड के इन्हीं आइटम सॉन्ग्स को लड़के और कई आदमी अपने फोन में बजाते थे या उनके आस-पास से गुजरते हुए तेज़ आवाज़ में गाने लगते थे। बल्कि मीटू आंदोलन के दौरान तनु श्री दत्ता ने नाना पाटेकर पर भी फिल्म ‘हॉर्न ओके प्लीज’ के एक आइटम सॉन्ग की शूंटिग के दौरान ही यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था।

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राउडी राठौर के गाने ‘आ रे प्रीतम प्यारे’ गाने में आदमियों का ग्रुप लड़कियों के पीछे भागता है और वह हंसकर उनके लिए नाच रही होती है। यह सब यहीं दिखाता है कि औरतें मेल गेज़ को पसंद करती हैं जबकि ऐसा बिल्कुल भी नहीं है।

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आइटम सॉन्ग्स में मेल गेज़

बॉलीवुड के लगभग आइटम सॉन्ग्स में यही दिखाया जाता है कि एक औरत आदमियों के एक खास ग्रुप के लिए डांस करती है जिसमें आदमी औरत के शरीर पर भद्दे कमेंट करते हैं या फिर औरत खुद ही आदमी को खुश करने के लिए खुद को ही ऑब्जेक्टिफाई करने लगती है। अब हॉरर- कॉमेडी मूवी स्त्री के गाने ‘कमरिया’ को ले लीजिए जबकि यह फिल्म महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार और समाज द्वारा किए जानेवाले उत्पीड़न को उजागर करने के दावे करती है। लेकिन दूसरी तरफ मेल गेज़ को ध्यान में रख कर ‘कमरिया’ जैसा गाना भी दिखाती है। वहीं, राउडी राठौर के गाने ‘आ रे प्रीतम प्यारे’ गाने में आदमियों का ग्रुप लड़कियों के पीछे भागता है और वह हंसकर उनके लिए नाच रही होती है। यह सब यहीं दिखाता है कि औरतें मेल गेज़ को पसंद करती हैं जबकि ऐसा बिल्कुल भी नहीं है।

औऱत को एक वस्तु/सामान की तरह पेश करना

दबंग-1 और दबंग-2 फिल्म के ‘मुन्नी बदनाम’ और ‘फेवीकॉल गाने’ और साल 1977 में आई इनकार फिल्म के ‘मुंगरा’ गाने में एक औरत या तो तंदूरी मुर्गी और गुड़ के बराबर है या फिर उसमें शराब की बोतल जितना नशा है। यह पितृसत्तात्मक सोच ही तो है जिससे इन गानों औरतें ही आदमियों को लुभाने के लिए अपनी तुलना तंदूरी मुर्गी और गुड़ से कर रही है और आदमी एक औरत में शराब की बोतल जितना नशा दिख रहा है।

हिंसक मर्दानगी को बढ़ावा देना

अर्जुन कपूर की पहली फिल्म में उनका एक गाना है, ‘हुआ छोकरा जवां रे।’ यह गाना ना सिर्फ औरतों को ऑब्जेक्टिफाई करता हैं बल्कि हिंसक मर्दानगी को बढ़ावा भी देता है। इन गानों में आदमियों को एक विशेष तरीके में बर्ताव करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, अगर वे ऐसा ना करें तो उन्हें ‘मर्द’ नहीं समझा जाएगा। हमारे अभिनेता, अभिनेत्री और डायेक्टर नारीवाद की बात तो करते हैं और कई जगह पर लैंगिक समानता को प्रामोट भी करते हैं लेकिन ये सारी बातें उनकी फिल्मों में से कहीं गायब नज़र आती हैं और टोकनिज़म की बात लगती है। जबकि हम सब जानते हैं कि सिनेमा समाज का आईना है और उसका समाज पर कई मायनों में प्रभाव पड़ता है। अगर हम महिलाओं के लिए एक सुरक्षित समाज का निर्माण चाहते हैं तो हमें इन गानों को गाना और सुनना दोनों ही बंद कर देना चाहिए।

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तस्वीर साभार : Times of India

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