समाजकानून और नीति भारत उन देशों में शामिल जहां सबसे अधिक गैरबराबरी: ग्लोबल इनइक्वॉलिटी रिपोर्ट 2022

भारत उन देशों में शामिल जहां सबसे अधिक गैरबराबरी: ग्लोबल इनइक्वॉलिटी रिपोर्ट 2022

ताज़ा 'विश्व असमानता रिपोर्ट 2022' के अनुसार भारत उन देशों की सूची में शामिल है जहां गरीबी और असमानता सबसे व्यापक स्तर पर मौजूद है। भारत में असमानता का यह रूप इतना बढ़ गया है कि केवल कुछ मुठ्ठीभर लोगों के हाथ में देश की कुल आय पहुंच गई है। इस असमानता में केवल एक छोटा सा वर्ग धन-धान्य से संपन्न हो गया है।

भारत में अमीर और गरीब के बीच की खाई और अधिक गहरी हो रही है। ताज़ा ‘विश्व असमानता रिपोर्ट 2022’ के अनुसार भारत उन देशों की सूची में शामिल है जहां गरीबी और असमानता सबसे व्यापक स्तर पर मौजूद है। भारत में असमानता का यह रूप इतना बढ़ गया है कि केवल कुछ मुठ्ठीभर लोगों के हाथ में देश की कुल आय पहुंच गई है। इस असमानता में केवल एक छोटा सा वर्ग धन-धान्य से संपन्न हो गया है। भारत की केवल एक प्रतिशत आबादी देश की कुल आय के 22 फीसद हिस्से की मालिक बन गई है। रिपोर्ट के अनुसार भारत के मात्र दस प्रतिशत लोग देश की आधे से भी ज्यादा संपत्ति रखते हैं। 10 प्रतिशत अमीर लोगों की आय भारत की कुल आय का 57 फीसद है। इससे अलग भारत की आधी आबादी 13.1% पर गुजारा कर रही है। रिपोर्ट में भारत को बहुत ही गरीब और असमानता वाला देश कहा गया है। विश्व असमानता 2022 की यह रिपोर्ट भारत में मौजूद अमीर-गरीबी की चिंताजनक तस्वीर सामने लेकर आई है। 

रिपोर्ट में सामने आई मुख्य बातें

  • भारत के केवल एक प्रतिशत आबादी के पास देश की कुल आय का 22% है।
  • भारत के 10 प्रतिशत अमीर लोगों की आय भारत की कुल आय का 57 फीसदी हिस्सा है।
  • भारत के मध्यवर्ग के पास देश की कुल आय का केवल 29.5% है।
  • देश के सबसे अमीर एक प्रतिशत लोगों की औसत आय तीन करोड़ 24 लाख 49 हजार 360 रुपये है।
  • भारत में आय की असमानता को इस बात से समझा जा सकता है कि नीचे के 50 फीसद लोग सालाना 53,610 रुपये ही कमा पाते हैं।
  • एक औसत भारतीय घर की सालाना कमाई नौ लाख 83 हजार 10 रुपये है।

विश्व असमानता रिपोर्ट में भारत सरकार के द्वारा जारी किए गए असमानता डेटा की गुणवत्ता को बहुत खराब भी कहा गया है। रिपोर्ट में इस बात को भी कहा गया है कि 1980 के मध्य में भारत की अर्थव्यवस्था में उदारीकरण और विनियमन नीतियों से आय में वृद्धि और असमानता देखी गई है। केवल एक प्रतिशत आर्थिक सुधारों से लाभान्वित हुए हैं। निम्न और मध्यम आय वर्ग के बीच विकास बहुत धीमा होने की वजह से गरीबी बनी हुई है।

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दुनिया में मौजूद जेंडर असमानता

वैश्विक असमानता 2022 की रिपोर्ट अनुसार विश्व में आय के क्षेत्र में महिलाएं लैंगिक असमानता का सामना कर रही हैं। वर्तमान में विश्व पटल पर जेंडर आय असमानता बहुत ज्यादा अधिक है। तीन दशक में महिलाओं की स्थिति में ज्यादा परिवर्तन नहीं आया है। कुल आय में 1990 के समय महिला योगदान 30 प्रतिशत था वह वर्तमान में केवल 35 प्रतिशत तक ही पहुंच पाया है। महिलाओं के 50 प्रतिशत योगदान का आकलन किया गया है। बीते तीस वर्ष की प्रगति बहुत धीमी है।

ताज़ा ‘विश्व असमानता रिपोर्ट 2022’ के अनुसार भारत उन देशों की सूची में शामिल है जहां गरीबी और असमानता सबसे व्यापक स्तर पर मौजूद है। भारत में असमानता का यह रूप इतना बढ़ गया है कि केवल कुछ मुठ्ठीभर लोगों के हाथ में देश की कुल आय पहुंच गई है। इस असमानता में केवल एक छोटा सा वर्ग धन-धान्य से संपन्न हो गया है।

दुनियाभर में आय की असमानता में महिलाओं की स्थिति बहुत बुरी है। भारतीय समाज में पहले से हाथिये पर रहने को मजबूर महिलाएं आय की समानता में बहुत पीछे है। भारत में लैंगिक असमानता एक बहुत ही गंभीर समस्या है। रिपोर्ट के अनुसार भी भारत में लैंगिक असमानता बहुत अधिक है। महिला श्रम आय का हिस्सा 18 फ़ीसद के बराबर है। यह संख्या एशिया के कुल औसत 21 फ़ीसद से भी कम है। यह दर दुनिया की कुल दर से काफी कम है। 1990 के बाद से भारत की महिला श्रम की आय में केवल आठ प्रतिशत की ही वृद्धि हुई है। रिपोर्ट में भी इस बात को कहा गया है कि क्षेत्रीय औसत के हिसाब से भी यह बढ़ोत्तरी पर्याप्त नहीं है।

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अमीर-गरीब की गहरी होती खाई

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वर्तमान वैश्विक असमानता की स्थिति ऐसे बनी हुई है जैसे बीसवीं शताब्दी के पश्चिमी साम्राज्य मे बनी हुई थी। रिपोर्ट में यह बात कही गई है कि सरकार और निजी क्षेत्र के बीच संपत्ति का असंतुलन बढ़ रहा है। पिछले चालीस सालों में देश अमीर हो रहे हैं, लेकिन वहां की सरकारें गरीब होती जा रही है। संपत्ति का केन्द्र निजी हाथों में हो गया है। सार्वजनिक क्षेत्र की संपत्ति शून्य और अमीर देशों मे बहुत नकारात्मक हो गई है। दुनिया में यूरोप में असमानता की दर सबसे कम देखी गई है। यूरोप में दस प्रतिशत लोगों के पास 36 फ़ीसद आय है।

पूर्वी एशिया में यह आंकड़ा 43 फीसद के करीब है। वहीं दक्षिण अमेरिका में दस फीसदी लोगों के पास 55 फ़ीसद आय है। निजी हाथों में संपत्ति की बागडोर बढ़ती जा रही है। कोविड-19 के समय ने यह चलन विशेष रूप से और अधिक बढ़ा दिया है। महामारी के दौरान सरकारों ने सकल घरेलू उत्पाद का 10-20 फ़ीसद के बराबर निजी क्षेत्र से उधार लिया हुआ है। वर्तमान में सरकारों की कम संपत्ति होना भविष्य में असमानता का मुकाबला करने में कमजोर साबित होगी। यही नहीं इक्कीसवीं सदी में जलवायु परिवर्तन जैसी विशेष चुनौतियों का सामना करने पर भी प्रभाव पड़ेगा।

हाल ही भारत सरकार की ओर से भी गरीबी इंडेक्स जारी किया गया। इस इंडेक्स के अनुसार भारत की आबादी का बहुत बड़ा वर्ग गरीबी में रहने के लिए मजबूर है। बिजनेस स्टैंडर्ड में प्रकाशित खबर अनुसार नीति आयोग की बहुआयामी गरीबी सूचकांक (एमपीआई) के मुताबिक देश में हर चार में से एक आदमी बहुआयामी तौर पर गरीब है। देश के बड़े राज्यों में गरीबी की मार बहुत अधिक है। बिहार में सबसे ज्यादा 51.91 फ़ीसद जनता गरीब है। दूसरे नंबर पर झारखंड 42.16 फ़ीसद और तीसरे पर उत्तर प्रदेश में 37.79 फ़ीसद लोग गरीबी में जी रहे है।

इससे पहले संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) और ऑक्सफोर्ड पॉवर्टी एंड ह्यूमन डेवलपमेंट इनीशिएटिव द्वारा जारी किए गए गरीबी सूचकांक के अनुसार भारत की कुल आबादी का 27.9 फीसद लोग गरीबी में रहने को मजबूर है। भारत 109 देशों की सूची में 62वें नंबर पर है। इस सूंचकाक मुख्य रूप से पीने के पानी की कमी, पौष्टिक आहार की कमी, और छह साल से कम उम्र के स्कूल जाने वाले बच्चों जैसे बिंदु शामिल है। दूसरी ओर इस रिपोर्ट की तुलना पूर्व की सूचनाओं से नहीं की जा सकती है क्योंकि यह एमपीआई आधारित पहली रिपोर्ट है। 2014 के बाद जब से भाजपा सरकार केन्द्र में सत्ता में आई है यह सरकार द्वारा जारी की गई गरीबी की पहली रिपोर्ट है। नीति आयोग ने पहले के समय गरीबी का अनुमान लगाने वाली पद्धति को बदल दिया है।

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तस्वीर साभार : Business Today     

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