साल 2021 के अदालतों के वे फैसले जहां रूढ़िवादी और पितृसत्तात्मक सोच की मिली झलक
साल 2021 के अदालतों के वे फैसले जहां रूढ़िवादी और पितृसत्तात्मक सोच की मिली झलक
FII Hindi is now on Telegram

कोरोना महामारी के बीच धीरे-धीरे अब लोगों की रुकी ज़िंदगी सामान्य होने लगी है। पूरे साल मुश्किल से ही सही पर सरकारी और गैर सरकारी दफ्तर अपने-अपने काम में लगे रहे। साल के खत्म होने के पहले पूरे साल का जायज़ा लेना, आनेवाले समय के लिए एक बेहतर योजना का आधार बन सकता है। असमानता और असहायता के बीच आज भी आम जनता की उम्मीद देश की कानून व्यवस्था पर टिकी हुई है। न्यायायिक व्यवस्था से यह उम्मीद की जाती है कि वह अपने फैसले बिना किसी पूर्वाग्रह और पक्षपात के दे। लेकिन इस साल हमारे अदालतों ने ऐसे कई फैसले सुनाए, जो लैंगिक समानता की लड़ाई को और मुश्किल बना देते हैं। इन फैसलों में हमें न सिर्फ पितृसत्ता की झलक मिली, बल्कि सर्वाइवर कॉम्प्लेक्स और विक्टिम ब्लेमिंग भी दिखी। आज हम साल 2021 के उन्हीं फैसलों की बात करेंगे जो समस्याजनक रहे।   

1. ‘स्किन टू स्किन’ कॉन्टैक्ट के बिना स्तन दबोचना/छूना यौन उत्पीड़न नहीं : बॉम्बे हाई कोर्ट  

बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच की न्यायमूर्ति पुष्पा गनेडीवाला ने एक नाबालिग बच्ची के यौन उत्पीड़न के केस की सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया था। कोर्ट के अनुसार ‘स्किन टू स्किन’ कॉन्टैक्ट के बिना स्तन को छूना या दबोचना पॉस्को अधिनियम के तहत यौन उत्पीड़न नहीं कहा जा सकता। ‘यौन उत्पीड़न’ माने जाने के लिए यौन संबंध स्थापित करने के इरादे से ‘स्किन टू स्किन’ कॉन्टैक्ट होना चाहिए। हालांकि, इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले पर रोक लगाई और फैसले को बदल दिया गया। हमारे देश में यौन उत्पीड़न की स्थिति आज ऐसी हो चुकी है कि एक शख्स न जाने कितनी ही बार यौन उत्पीड़न की ऐसी घटनाओं से गुजरा हो जहां उत्पीड़न ‘स्किन टू स्किन’ कॉन्टैक्ट के बिना हुआ है। इसलिए ऐसी घटनाओं को यौन हिंसा के अंतर्गत दर्ज करना जरूरी है ताकि हजारों लोगों को इससे बचाया जा सके।

2. सुप्रीम कोर्ट का बलात्कार आरोपी को सर्वाइवर से ‘शादी’ का प्रस्ताव देना

मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने अभियुक्त सरकारी कर्मचारी को उस महिला से शादी का प्रस्ताव दिया, जिसने व्यक्ति पर नाबालिग अवस्था में बार-बार बलात्कार करने का आरोप लगाया था। यह मामला महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रिक प्रोडक्शन कंपनी में काम कर रहे एक तकनीशियन का था जिस पर पॉक्सो अधिनियम के तहत बलात्कार का आरोप लगा था। मुख्य न्यायाधीश ने मामले की सुनवाई करते हुए आरोपी से कहा कि उसे नाबालिग लड़की के साथ यौन हिंसा और बलात्कार करने से पहले सोचना चाहिए था क्योंकि वह एक ‘सरकारी कर्मचारी’ है। इतने गंभीर अपराध में भी महिला के पक्ष को नज़रअंदाज़ कर आरोपी को महत्व दिया जाना, उस संकीर्ण सोच को दर्शाती है जहां महिला के जीवन का महत्व सिर्फ शादी और बच्चे पैदा करने में होता है।

और पढे़ं : यौन उत्पीड़न पर बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला अपने पीछे कई सवालिया निशान छोड़ता है

Become an FII Member

3. मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का यौन उत्पीड़न के आरोपी को सर्वाइवर से राखी बंधवाने का प्रस्ताव

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने यौन उत्पीड़न के एक आरोपी के जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए आरोपी को सशर्त जमानत दी थी। कोर्ट ने यह शर्त रखी थी कि वह रक्षाबंधन पर सर्वाइवर के घर जाकर उससे राखी बंधवाएगा और रक्षा का वचन देगा। हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि भारत में मौजूदा सामाजिक और कानूनी व्यवस्था में किसी महिला के लिए यौन अपराध के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाना और आपराधिक मामला शुरू करवाना अपनेआप में एक चुनौती है। न्यायालयों से ऐसे फैसले उनके न्याय पाने और जीने दोनों में कठिनाई पैदा कर सकती है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को रद्द कर दिया और न्यायालय को रूढ़िवादी होने से बचने को कहा था।


4. पति द्वारा पत्नी की मर्जी के बिना उसके साथ यौन संबंध बनाना बलात्कार नहीं: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट

पिछले दिनों छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने मैरेटल रेप के मामले में आरोपी को बरी करते हुए यह फैसला सुनाया था। इस मामले में हाई कोर्ट ने कहा कि कानूनी तौर पर विवाहित पत्नी के साथ जबरन या उसकी इच्छा के विरुद्ध यौन संबंध या यौन क्रिया बलात्कार नहीं माना जाएगा। भारत में अब तक मैरिटल रेप को अपराध के रूप में नहीं देखा जाता। महिलाओं से यह उम्मीद रखना कि वे अपने साथी के इच्छा पर यौन संबंध के लिए तैयार रहे, उनके मानवाधिकार का ही नहीं, स्वास्थ्य और प्रजनन अधिकार का भी हनन है।  

और पढे़ं : ‘मैरिटल रेप है तलाक का वैध आधार’ केरल हाईकोर्ट का यह फै़सला क्यों मायने रखता है

5. नाबालिग के साथ हुए ‘ओरल सेक्स’ की घटना कम गंभीर: इलाहाबाद हाई कोर्ट

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सेशन कोर्ट में दिए गए एक फैसले के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोपी की अपील पर सुनवाई करते हुए अपने फैसले में कहा कि नाबालिग के साथ ओरल सेक्स ‘अग्ग्रावेटेड या गंभीर यौन उत्पीड़न’ या ‘यौन उत्पीड़न’ की श्रेणी में नहीं आता। हाई कोर्ट के अनुसार ओरल सेक्स ‘पेनेट्रेटिव यौन उत्पीड़न’ की श्रेणी में आता है जो पॉक्सो अधिनियम के धारा 4 के तहत दंडनीय है। इसमें आरोपी को 10 साल के बच्चे का यौन शोषण करने का दोषी पाया गया था। सेशन कोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 377 (अप्राकृतिक अपराध), धारा 506 (आपराधिक धमकी के लिए सजा) और पॉस्को एक्ट के तहत धारा 6 (अग्ग्रावेटेड या गंभीर यौन हिंसा) के तहत दोषी ठहराया था। हाई कोर्ट के अनुसार आरोपी ने नाबालिग बच्चे के साथ ओरल सेक्स किया था, जो कि पॉक्सो एक्ट के धारा 4 के तहत आता है। गौरतलब हो कि पॉक्सो अधिनियम के धारा 4 के तहत ‘पेनेट्रेटिव यौन उत्पीड़न’ धारा 6 के ‘एग्रावेटेड या गंभीर पेनेट्रेटिव यौन उत्पीड़न’ से कानूनी तौर पर कमतर अपराध माना जाता है। इसके अलावा, पॉस्को एक्ट के तहत धारा 5 ‘गंभीर पेनेट्रेटिव यौन उत्पीड़न’ के लिए है। बारह साल से कम उम्र के बच्चे के साथ किया गया पेनेट्रेटिव यौन उत्पीड़न धारा 5 के खंड ‘एम’ के तहत आता है। लेकिन घटना के समय सर्वाइवर की उम्र 12 साल से कम होने के बावजूद, न्यायालय ने अपने आदेश में अधिनियम की इस धारा को ध्यान में नहीं रखा।

6. एचआईवी पॉज़िटिव सेक्स वर्कर समाज के लिए खतरा: मुंबई कोर्ट

मुंबई के डिंडोशी सेशन कोर्ट ने हाल ही में मजिस्ट्रेट अदालत के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें एक महिला सेक्स वर्कर को दो साल के लिए जेल में रखने का निर्देश दिया गया था, क्योंकि वह एचआईवी पॉजिटिव थी। मजिस्ट्रेट अदालत के अनुसार ऐसी महिला को छोड़ने से आसानी से यौन संबंध के जरिए से एचआईवी फैल सकता है और इसलिए महिला को मुक्त करना समाज के लिए ‘खतरा’ हो सकता है। डिंडोशी सेशन कोर्ट महिला के अपील पर सुनवाई करते हुए, पिछली अदालत के इस तर्क को सही माना और अपील खारिज कर दी। हालांकि, सेशन कोर्ट ने महिला को हिरासत में रखकर उसकी देखभाल और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकने की बात कही। लेकिन इसमें एचआईवी पॉज़िटिव लोग को खतरा मानने और सेक्स वर्कर को हीन मानने की पूर्वधारणा दिखाई दी। महिला को सिर्फ इस बुनियाद पर जेल में रखना, उसके अधिकारों का हनन है। ऐसे बयान देश के कानून व्यवस्था के थोथी और रूढ़िवादी सोच को जाहिर करती है।

और पढे़ं : इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फ़ैसला : नाबालिग के साथ किया गया ओरल सेक्स ‘कम गंभीर’ कैसे?

7.  घरेलू हिंसा के मामले उन जगहों से दर्ज नहीं किए जा सकते जहां महिला संयोग से गई हो: बॉम्बे हाई कोर्ट

पिछले दिनों बॉम्बे हाई कोर्ट ने घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत शिकायत के एक मामले में सुनवाई करते हुए कहा कि घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत, आकस्मिक दौरे के स्थानों पर यानि जहां महिला केवल कभी-कभी आती-जाती हो, वहां शिकायत दर्ज नहीं की जा सकती। कोर्ट ने कहा कि घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 27 के तहत कार्यवाही उसके अस्थायी या स्थायी निवास के स्थान पर ही शुरू की जानी चाहिए। मजिस्ट्रेट ने अपने आदेश में घरेलू हिंसा अधिनियम के धारा 27 के तहत अधिकार क्षेत्र के अभाव में, घरेलू हिंसा अधिनियम के धारा 12 के तहत एक महिला की तरफ से दायर आवेदन पर विचार नहीं किया था। बॉम्बे हाई कोर्ट ने इसी फैसले को बरकरार रखा। इसका कारण दोनों पक्षों का हैदराबाद के स्थायी निवासी होना बताया गया।

8. बालिग लड़की के साथ सहमति से सेक्स करना कोई अपराध नहीं, लेकिन अनैतिक और भारतीय मानदंडों के खिलाफ: इलाहाबाद हाई कोर्ट

पिछले दिनों इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक बलात्कार आरोपी के दायर जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए यह बयान जारी की। आरोपी पर अन्य सह-आरोपियों के साथ अपनी प्रेमिका के साथ सामूहिक बलात्कार करने का आरोप था। न्यायालय के मुताबिक न सिर्फ महिला के साथ यौन संबंध बनाना भारतीय संस्कृति के खिलाफ था, बल्कि महिला के प्रतिष्ठा को बचाना भी आरोपी का कर्तव्य था। यह दुर्भाग्य ही है कि खुद कानून व्यवस्था बलात्कार आरोपी को ही महिला का ‘सेवियर’ मान रही है। साथ ही, बलात्कार जैसे अपराध को महिला के प्रतिष्ठा से जोड़ना, उसी पितृसत्ता की उपज है, जो महिला के इज्जत का मूल्यांकन उसकी वर्जिनिटी या उसकी सेक्स लाइफ से करता है। भले मानवता के तर्क पर, इस बात की निंदा हो सकती है कि बतौर प्रेमी आरोपी ने महिला के साथ इस घटना के होने के समय कुछ नहीं किया। लेकिन यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि वह खुद इस सामूहिक बलात्कार में शामिल था। किसी के साथ प्रेम संबंध होने से ही, उसके साथ शारीरिक संबंध बनाने का लाइसेन्स नहीं मिलता। हर संबंध में हर बार दोनों ही पक्षों की ‘सहमति’ होना आवश्यक है, जिसे कोर्ट ने पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया।       

और पढे़ं : क्या अब न्यायालय नियम-कानून से परे नैतिकता के आधार पर देंगे न्याय?

9. शादी के बाद शाखा/ सिंदूर नहीं पहनने का मतलब महिला को शादी मंजूर नहीं: गुवाहाटी हाई कोर्ट

गुवाहाटी हाईकोर्ट ने तलाक के एक केस की सुनवाई करते हुए कहा कि अगर पत्नी ‘शाखा और सिंदूर’ पहनने से मना करती है तो इसका मतलब है कि उसे शादी मंजूर नहीं है। कोर्ट ने इस दलील पर याचिका दायर करने वाले युवक को तलाक की मंजूरी दे दी।

10. ससुराल वालों का बहू से ताना मार कर बात करना सामान्य है: मुंबई सेशन कोर्ट

पिछले दिनों मुंबई सेशन कोर्ट ने एक बुजुर्ग दंपत्ति के खिलाफ अपने बहु से बुरा व्यवहार करने के आरोप को खारिज कर दिया। कोर्ट के मुताबिक ससुराल वालों का बहु से ताने मार कर बात करना भारतीय समाज में सामान्य और वैवाहिक जीवन का हिस्सा है। इसलिए उस दंपत्ति के खिलाफ शिकायत दर्ज नहीं की जा सकती।

और पढे़ं : बलात्कार का आरोपी, ‘प्रतिभाशाली’ और ‘भविष्य की संपत्ति’ कैसे है?


कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से हिंदी में बी ए और पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद बतौर पत्रकार और शिक्षिका मैंने लम्बे समय तक काम किया है। बिहार और बंगाल के विभिन्न क्षेत्र में पले-बढ़े होने के कारण सामाजिक रूढ़िवाद, धार्मिक कट्टरपन्त, अंधविश्वास, लैंगिक और शैक्षिक असमानता जैसे कई मुद्दों को बारीकी से जान पायी हूँ। समावेशी नारीवादी विचारधारा की समर्थक, लैंगिक एवं शैक्षिक समानता ऐसे मुद्दें हैं जिनके लिए मैं निरंतर प्रयासरत हूँ।

Follow FII channels on Youtube and Telegram for latest updates.

नारीवादी मीडिया को ज़रूरत है नारीवादी साथियों की

हमारा प्रीमियम कॉन्टेंट और ख़ास ऑफर्स पाएं और हमारा साथ दें ताकि हम एक स्वतंत्र संस्थान के तौर पर अपना काम जारी रख सकें।

फेमिनिज़म इन इंडिया के सदस्य बनें

अपना प्लान चुनें

Leave a Reply