उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव: 'उन्नति, संकल्प और वचन' के साथ-साथ इन योजनाओं को हाशियेबद्ध समाज तक पहुंचाने की भी हो बात
तस्वीर साभार: मुहीम : 'एक सार्थक प्रयास'
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बनारस शहर से क़रीब तीस किलोमीटर दूर बसुहन मुसहर बस्ती की कमला देवी (बदला हुआ नाम) को पहली बार आंगनवाड़ी केंद्र से पोषताहार मिला। ऐसा नहीं है कि ये कोई नयी योजना के वजह से हुआ, बल्कि यह संभव तब हो पाया जब इन लोगों ने ख़ुद सरकारी योजनाओं तक मुसहर महिलाओं की भागीदारी तय करने की पहल की।

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव शुरू हो रहे हैं। सभी उम्मीदवार और राजनीतिक पार्टियां अपने लंबे-चौड़े घोषणापत्र के साथ जनता के साथ तमाम वादे कर रहे हैं। बड़ी-बड़ी संख्या के इतने अरब, इतने करोड़ की योजनाओं की घोषणा हो रही हैं, जिसकी संख्या की कल्पना भी हम लोगों की सोच से परे है। पर सवाल यह है कि इन तमाम वादों और योजनाओं के साथ इसे सरोकार तक लाने की गारंटी कौन दे रहा है।

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समाज की यह कड़वी सच्चाई है कि समाज के हाशिएबद्ध समुदाय के नाम पर आज भी सिर्फ़ राजनीतिक वादे किए जाते हैं पर उन तक किसी भी योजना को पहुंचाने का इरादा तो क्या इसकी कल्पना भी ज़रूरी नहीं समझी जाती है। इस साल उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में देश-प्रदेश की बड़ी राजनीतिक पार्टियां हिस्सा ले रही है। कांग्रेस पार्टी ने ‘उन्नति विधान- जन घोषणा पत्र’ के नाम से अपना घोषणा पत्र जारी किया है, वहीं भाजपा ने ‘संकल्प पत्र’ तो सपा पार्टी ने ‘वचन पत्र’ के नाम से अपना-अपना घोषणा पत्र जारी किया है।

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चुनाव में मतदाता जागरूकता के मुद्दे पर जब मैंने चित्रसेनपुर की दलित बस्ती में महिलाओं के साथ चुनाव पर चर्चा की और उन्हें सभी पार्टियों के घोषणापत्र के बारे में बताया तो उनका सभी का एक ही ज़वाब था कि घोषणा पत्र की नहीं लोगों तक इसकी पहुंच की बात होनी चाहिए। ज़मीनी हक़ीक़त यही है कि जनता अब बड़े-बड़े वादों को लेकर अभ्यस्त हो गई है, लेकिन उनकी अपनी ज़रूरतों और मुद्दों पर कोई काम तो दूर उन पर चर्चा की कोई गुंजाइश भी उन्हें दिखाई नहीं देती है।

समाज की यह कड़वी सच्चाई है कि समाज के हाशिएबद्ध समुदाय के नाम पर आज भी सिर्फ़ राजनीतिक वादे किए जाते हैं पर उन तक किसी भी योजना को पहुंचाने का इरादा तो क्या इसकी कल्पना भी ज़रूरी नहीं समझी जाती है।

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चित्रसेनपुर गाँव में तीस वर्षीय शीला (बदला हुआ नाम) कहती हैं, ‘मुझे चूल्हे के धुएं से सांस लेने में दिक़्क़त होती है। इसलिए मौजूदा सरकार की उज्ज्वला योजना से हमलोगों को गैस सिलेंडर का कनेक्शन क़र्ज़ करके हम लोगों ने ले लिया। सरकार ने इस योजना का खूब बड़ा-बड़ा बैनर पोस्टर लगाकर इसका प्रचार किया। लेकिन कनेक्शन लेने के बाद गैस का दाम इतना ज़्यादा बढ़ाया गया कि दोबारा सिलेंडर भरवाने की हिम्मत ही नहीं हुई। हम जैसे मज़दूर परिवार को सप्ताह में तीन दिन भी सब्ज़ी ख़रीदकर खाना मुश्किल होता है, उसमें इतनी महंगी गैस कहां से भरवाएंगे।’ सांस की बीमारियों से जूझती महिलाओं को सुविधा के नाम पर गैस सिलेंडर तो दिया पर उसे भरवाने के लिए महिलाओं को सक्षम करने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए।

जब भी हम विकास की या अधिकार की बात करते है तो रोटी, कपड़ा, मकान और शिक्षा और विकास के अवसर, ये सभी किसी भी इंसान के लिए बुनियादी होते हैं। हर पांच साल में सरकार बदलती है, नेताओं के चेहरे बदलते हैं पर अगर बात करें गांव स्तर पर बदलाव की तो वहां की सूरत न के बराबर बदलती दिखाई पड़ती है। केवल बड़ी संख्या के साथ रुपयों का एलान फ़लानी योजना के लिए है, सिर्फ़ यही आमज़न तक पहुंच पाता है पर इसका लाभ कितने लोगों तक पहुंचता है इसकी ख़बर को नहीं लेता। इन सबके बीच जब बात आती है महिलाओं की तो इन योजनाओं के न के बराबर के लाभ दिखाई पड़ते है।

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में सभी पार्टियों ने अपना घोषणापत्र तो घोषित कर दिया है, सभी ने अपना पांच साल का मास्टर प्लान बता दिया है और इन सभी में सभी वर्ग को ध्यान में रखा गया है, जिसमें महिलाएं भी प्रमुख हैं। कोई स्कूटी देने की बात कर रहा है तो कोई छात्रवृत्ति की, इन सभी वादों-इरादों के रंग अनेक हैं पर कोरोना महामारी में सदियों पीछे गई महिलाओं को फिर से मुख्यधारा से जोड़ने की दिशा में किसी भी पार्टी की कोई विशेष योजना नहीं है। कोरोनाकाल में आर्थिक तंगी से स्कूल ड्रॉप आउट लड़कियों के कोई योजना नहीं है। वे बेरोजगार महिलाएं जिन्होंने कोरोना की वजह से अपना रोज़गार खो दिया उनके लिए किसी योजना तो क्या उसका ज़िक्र भी नहीं किया गया।

भोजन, मकान और शिक्षा और विकास के अवसर, ये सभी किसी भी इंसान के लिए बुनियादी होते हैं। हर पांच साल में सरकार बदलती है, नेताओं के चेहरे बदलते हैं पर अगर बात करें गांव स्तर पर बदलाव की तो वहां की सूरत न के बराबर बदलती दिखाई पड़ती है।

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ये सभी वो बुनियादी मुद्दे है, जिन पर बात करना ज़रूरी नहीं समझा जाता है। महिलाओं के नाम से हज़ारों योजनाएं शुरू होती हैं पर मुसहर समुदाय की इन महिलाओं को उसी महिलाओं के नाम पर चलाई जाने वाली सरकारी योजना का लाभ तब मिलता है, जब कोई संस्था उसकी पैरोकारी करती है। ध्यान देने वाली बात ये है कि ये महिलाएं सिर्फ़ इसलिए इन तमाम योजनाओं के पीछे रह जाती हैं क्योंकि ये समाज की सबसे शोषित तबकों में से एक है, जिसकी वजह से आर्थिक पायदान पर भी इन्हें सबसे नीचे रखा गया है।

सरकार बनने से पहले सभी बातें, वादे-इरादे घोषणापत्र पर होती हैं और सरकार बन जाने के बाद ये अरबों की योजनाओं का रूप लेते हैं और तीसरे चरण में ये सरोकार तक जुड़ते-जुड़ते ग़ायब हो जाते हैं, जिससे स्थिति यथास्थिति रहती है। पांच साल बाद फिर से उन्हीं मुद्दों पर राजनीतिकि घोषणापत्र तैयार किया जाता है। इसलिए ज़रूरी है कि अब घोषणापत्र से साथ इसे समाज के अंतिम इंसान तक पहुंचाने की ज़िम्मेदारी पर भी बात हो।

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तस्वीर साभार : मुहीम : ‘एक सार्थक प्रयास’

रेनू वाराणसी ज़िले के रूपापुर गाँव की रहने वाली है। ग्रामीण महिलाओं और किशोरियों के साथ समुदाय स्तर पर रेनू बतौर सामाजिक कार्यकर्ता काम भी करती हैं और अपने अनुभवों व गाँव में हाशिएबद्ध समुदाय से जुड़ी समस्याओं को लेखन के ज़रिए उजागर करना इन्हें बेहद पसंद है।

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