भारत में जन स्वास्थ्य का मुद्दा क्यों राजनीतिक और चुनावी मुद्दा नहीं बनता
तस्वीर साभार: Daily Pioneer
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भारत में स्वास्थ्य से जुड़ी सार्वजनिक नीतियां और स्वास्थ्य संबंधी बुनियादी व्यवस्था को सुचारु बनाना, नीति निर्माताओं के बीच चर्चा का विषय रहा है। लेकिन यह शायद ही कभी यह राजनीतिक मुद्दे बना हो या चुनाव के नतीजों को प्रभावित करते हैं। भारत में जन स्वास्थ्य सेवाओं के लिए हमेशा ही व्यापक नीतियां बनती आई हैं। उदाहरण के तौर पर ‘आयुष्मान भारत’ दुनिया की सबसे बड़ी जन-स्वास्थ्य बीमा योजना है। इस योजना में परिवार का आकार, व्यक्ति के लिंग या उम्र के कारण योजना के लाभ में कोई अंतर नहीं होगा।

पिछले कुछ सालों में विशेषकर कोरोना महामारी के दौरान जन स्वास्थ्य सेवाओं की चरमराती हालत इस बात का प्रमाण है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा न ही सुचारु है और न ही हर व्यक्ति की पहुंच में है। देश में आम जनता के बजट के बाहर होते हुए भी बड़ी तादाद में लोग प्राइवेट स्वास्थ्य व्यवस्था पर निर्भर हैं। आश्चर्यजनक रूप से पिछले दो सालों में सीमित संसाधनों और बुनियादी कमी से जूझती सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के बावजूद, केंद्र सरकार ने पिछले साल के मुकाबले इस साल के स्वास्थ्य बजट में कोई खास परिवर्तन नहीं किया। 

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हालांकि, अलग-अलग पार्टियों के चुनावी घोषणापत्र रोज़गार और शिक्षा जैसे मुद्दों पर जोर देती नजर आती हैं, लेकिन कोरोना महामारी से गुज़रने के बावजूद, सार्वजनिक स्वास्थ्य अब तक एक अहम मुद्दा नहीं बन पाया है। यह विडम्बना ही है कि एक ओर महत्वाकांक्षी योजनाएं बनाई जाती हैं, वहीं दूसरी ओर सरकार अच्छे सार्वजनिक स्वास्थ्य तक आम जनता की पहुंच सुनिश्चित नहीं कर पाती है।

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हालांकि अलग-अलग पार्टियों के चुनाव घोषणापत्र रोज़गार और शिक्षा जैसे मुद्दों पर जोर देती नजर आती हैं, लेकिन कोरोना महामारी से गुज़रने के बावजूद, सार्वजनिक स्वास्थ्य अब तक एक अहम मुद्दा नहीं बन पाया है।

इसी महीने शुरू हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के मद्देनजर जहां बीजेपी सरकार ने किसानों के खेतों की सिंचाई के लिए मुफ्त बिजली, गन्ना किसानों का 14 दिनों में सुनिश्चित भुगतान और मेगा फ़ूड पार्क जैसे चीज़ों का वादा किया। वहीं, कांग्रेस ने किसानों के कर्ज माफ़ी के साथ-साथ दस लाख रूपए तक की चिकित्सकीय खर्च का भी वादा किया। लेकिन आम जनता का स्वास्थ्य लाभ उठाने के लिए एक मज़बूत बुनियादी स्वास्थ्य व्यवस्था और उस तक हर किसी की पहुंच का होना ज़रूरी है। कोरोना महामारी और उससे पहले भी ग्रामीण भारत साधारण और मामूली स्वास्थ्य चिकित्सा सुविधाओं से भी वंचित रहा है।

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बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं की कमी और चिकित्सा का अतिरिक्त खर्च

सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटीज़ (सीएसडीएस) और मीडिया संस्थान गांव कनेक्शन ने साल 2020 में कोरोना महामारी के दौरान ग्रामीण भारत के तत्कालीन हालात पर एक रिपोर्ट जारी की। लोकनीति सीएसडीएस की इस रिपोर्ट अनुसार 52 फीसद लोगों ने लाॅकडाउन के दौरान अपने क्षेत्र में गर्भवती महिला की प्रसव पूर्व जांच और टीकाकरण नहीं होने की सूचना दी। लॉकडाउन के दौरान लगभग 53 फीसद लोगों ने अपने या अपने परिवार के सदस्यों का पैसे या संसाधनों की कमी के कारण कई बार या कभी-कभी बिना दवा या चिकित्सा के रहने की सूचना दी।

रिपोर्ट के अनुसार किसान सम्मान निधि योजना के अंतर्गत 51.9 फीसद लोगों ने हर चार महीने में 2000 रूपए न मिलने की सूचना दी। इसके अलावा, 75 फीसद से अधिक लोगों ने लॉकडाउन से पहले भी कुल घरेलू आय से अपनी आवश्यकताओं को पूरा करना अत्यंत कठिन, काफी या कुछ हद तक कठिन बताया। लॉकडाउन में दिहाड़ी मजदूर, किसान या श्रमिकों का रोजगार पूरी तरह बंद या धीमा पड़ चुका था। आय में एकाएक कमी के कारण लोगों के रहन-सहन, खान-पान और स्वास्थ्य देखभाल बुरी तरह प्रभावित हुआ था। ग्रामीण भारत में आज भी लोग मूलतः सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर ज्यादा निर्भर हैं। सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की कमी के कारण इलाज का अतिरिक्त खर्च निम्न या मध्यम आय वाले परिवारों के लिए एक अतिरिक्त बोझ हो जाने के समान है।   

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स्वास्थ्य का मुद्दा लोगों के लिए कितना महत्वपूर्ण है

द इंडियन एक्सप्रेस में लोकनीति-सीएसडीएस के साल 2019 के अध्ययन के आधार पर छपी ख़बर बताती है कि लोग सरकार से उम्मीद करते हैं कि वह बुनियादी स्वास्थ्य देखभाल प्रदान करने की ज्यादा से ज्यादा जिम्मेदारी लें। वहीं, साल 2019 में ऑल इंडिया पोस्ट पोल एनईएस के सर्वेक्षण में यह पाया गया कि ज्यादातर लोग अस्पताल या स्वास्थ्य व्यवस्था को चुनाव के लिए सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा नहीं मानते हैं। इसलिए निश्चित रूप से यह नहीं कहा जा सकता कि लोग स्वास्थ्य के मुद्दे को लेकर पूरी तरह बेफिक्र हैं या अनजान हैं। स्वास्थ्य के मुद्दे को जरुरी न मानने के पीछे भारतीय मीडिया और राजनीतिज्ञों की प्रभावशाली भूमिका भी रही है।

चुनाव के पहले टीवी पर हम अक्सर सरकारी नीतियों पर बहसें देखते हैं। कई बार इनमें आम जनता की राय भी ली जाती है। लेकिन इन सब में कभी भी सार्वजनिक स्वास्थ्य का मुद्दा प्रमुख जगह नहीं बना पाता। भारत में स्वास्थ्य सुविधा हमेशा से ही बहुत महंगी रही है। आबादी की तुलना में सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की कमी होने के कारण लोग प्राइवेट अस्पतालों में जाने पर मजबूर होते हैं। इससे न सिर्फ इन अस्पतालों की संख्या बढ़ी है, बल्कि इन केंद्रों का मरीजों और उनके परिवार के प्रति मनमाना रवैया भी अपने चरम पर है। कोरोना महामारी के दौरान, सरकार के बीच-बचाव के बावजूद, लोग अपने प्रियजनों के इलाज में लाखों रूपए का भुगतान करने पर मजबूर हो गए थे।  

क्या महत्वाकांक्षी योजनाओं से सस्ता और सुचारु स्वास्थ्य व्यवस्था का होगा हल

आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं की बात करें, तो, द वायर में छपी रिपोर्ट अनुसार जन स्वास्थ्य अधिकारों के लिए काम करने वाली ग्लोबल पीपल्स हेल्थ मूवमेंट की भारतीय शाखा जन स्वास्थ्य अभियान (जेएसए) इसे पूरी तरह नकारने का बयान जारी कर चुकी है। जेएसए के मुताबिक आयुष्मान भारत में लगने वाली रकम सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार और स्थायी सार्वजनिक संपत्ति के निर्माण में खर्च करके बेहतर उपयोग किया सकता है। जेएसए शिक्षा और खाने के अधिकार के समान; सभी के स्वास्थ्य के अधिकार की मांग करता है।

पिछले दिनों मीडिया में आई खबर बताती है कि लगभग 50 से 60 मिलियन भारतीय स्वास्थ्य संबंधी खर्च उठाने में असमर्थ होने के कारण गरीबी का सामना करते हैं। भारत में स्वास्थ्य देखभाल पर होने वाला अतिरिक्त खर्च (आउट ऑफ़ पॉकेट) अन्य देशों के तुलना में सबसे अधिक है। हालांकि, भारत सरकार की जन औषधि योजना (जेएएस) निजी दवा उद्योग की दवाओं के अनुचित कीमत लिए जाने के खिलाफ एक जोरदार प्रयास है। लेकिन आम जनता में इन केंद्रों के बारे में जागरूकता की भारी कमी, राज्य सरकारों का मुफ्त दवाओं के वितरण प्रणाली और दवाओं के आपूर्ति में देरी और कमी के कारण लोग निजी दवा दुकानों पर ज्यादा निर्भर हैं। साथ ही, डॉक्टरों के जेनेरिक दवाओं के नामों की सलाह न दिए जाने से जेएएस से लोग लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। 

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पिछले दिनों मीडिया में आई खबर बताती है कि लगभग 50 से 60 मिलियन भारतीय स्वास्थ्य संबंधी खर्च उठाने में असमर्थ होने के कारण गरीबी का सामना करते हैं। भारत में स्वास्थ्य देखभाल पर होने वाला अतिरिक्त खर्च (आउट ऑफ़ पॉकेट) अन्य देशों के तुलना में सबसे अधिक है।

कैसा है हमारे देश का स्वास्थ्य बजट

इस साल के कुल स्वास्थ्य बजट में पिछले साल के मुकाबले लगभग 16 फीसद की वृद्धि देखी गई। लेकिन यह सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का महज 0.35 फीसद है। नेशनल हेल्थ प्रोफ़ाइल 2020 के अनुसार सरकार का स्वास्थ्य पर किया गया खर्च सकल घरेलू उत्पाद के मौजूदा 1.15 फीसद से बढ़ाकर साल 2025 तक 2.5 फीसद करने की योजना है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) निम्न और मध्यम आय वाले देशों में  प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के लिए जीडीपी के 0.2 से 10 फीसद तक की लागत अनुमानित करती है। साथ ही, डब्ल्यूएचओ हर तरह के आय वाले देशों को प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल के लिए अपने जीडीपी का 1 अतिरिक्त फीसद आवंटित करने का सुझाव देती है।

भारत जैसे बड़े देश में कई जन स्वास्थ्य योजनाएं होने के बावजूद, आज भी सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं तक आम जनता की या तो पहुंच नहीं है या खराब चिकित्सा के डर से लोग निजी स्वास्थ्य देखभाल की ओर रुख़ करते हैं। अच्छे चिकित्सा के लिए अपने आय से ज्यादा खर्च करने की स्थिति में बीमा करवाना अनिवार्य हो जाता है। देश में आज बड़ी-बड़ी योजनाओं के बदले एक सुचारु, स्थिर और व्यवस्थित स्वास्थ्य व्यवस्था की जरुरत है, जिसमें सस्ते और अच्छे स्वास्थ्य तक सबकी बराबर पहुंच हो। 

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तस्वीर साभार: Daily Pioneer

कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से हिंदी में बी ए और पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद बतौर पत्रकार और शिक्षिका मैंने लम्बे समय तक काम किया है। बिहार और बंगाल के विभिन्न क्षेत्र में पले-बढ़े होने के कारण सामाजिक रूढ़िवाद, धार्मिक कट्टरपन्त, अंधविश्वास, लैंगिक और शैक्षिक असमानता जैसे कई मुद्दों को बारीकी से जान पायी हूँ। समावेशी नारीवादी विचारधारा की समर्थक, लैंगिक एवं शैक्षिक समानता ऐसे मुद्दें हैं जिनके लिए मैं निरंतर प्रयासरत हूँ।

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