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कोरोना की दूसरी लहर ने मौत की तबाही फैला दी। गांव-शहर हर जगह बहुत से लोगों ने इलाज के अभाव में अपनी जान गंवा दी। जीते जी तो लोग अभाव में रह ही रहे थे और मरने के बाद भी एक अदद अंतिम संस्कार के लिए भी तरसते रहे। यह देश का सबसे बड़ा राज्य उत्तर-प्रदेश ही है जहां से नदियों में तैरती लाशों की तस्वीरें भी सामने आई। भारत में कोरोना से मरने वालों की संख्या आंकड़ों के मुताबिक साढ़े तीन लाख से अधिक हो गई है। आंकड़ों से इतर धरातल की तस्वीर कुछ और है। ऐसे में इस वायरस के ख़िलाफ़ टीकाकरण ही एक उम्मीद बनता दिख रहा है, बावजूद इसके देश को अबतक एक अदद सही टीका नीति नहीं मिल पाई है। कोविड-19 के दौरान सरकार की लापरवाहियों और केंद्र, राज्य और अदालतों के बीच झूलती टीका नीति ने स्थिति को गंभीर बना दिया।

भारत की कुल आबादी में 48 प्रतिशत महिलाओं की संख्या है। समाज, हमारे घरों में जिस तरह महिला पिछड़ी हुई हैं ठीक उसी तरह कोविड-19 टीकाकरण प्रक्रिया में भी महिलाएं पीछे हैं। अप्रैल में टीकाकरण में तेज़ी के बाद से ही महिला इसमें लगातार पिछड़ रही हैं। देश में अबतक करीब 23 करोड़ से अधिक लोगों को टीका लगा है। इसमें केवल 8 करोड़ महिलाओं को ही टीका लग पाया है। अप्रैल के शुरुआती हफ्ते के दौरान कोविड-19 टीकाकरण में जो लैंगिक अंतर 9 प्रतिशत था मई के अंत तक वह 24 प्रतिशत पर आ गया है। इंडिया टुडे के द्वारा सरकारी डाटा के आंकलन के बाद यह अंतर देखने को मिला। इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत में कोविड मरीज़ों की बढ़ोत्तरी के बाद जिस तरह से टीकाकरण शुरू किया गया उसी के बाद से टीके में भी लैंगिक आधार पर अंतर साफ देखने को मिला। अब तक पुरुषों के मुकाबले बहुत कम महिलाओं को टीका लगा है। सभी राज्य और केन्द्रशासित प्रदेशों में अमूमन एक जैसे हालात बने हुए हैं। लगभग अधिकतर जगह पुरुषों को ज्यादा संख्या में टीके लगे हैं। पंजाब में पुरुषों के मुकाबले 38 प्रतिशत कम महिलाओं को टीका मिला है। छत्तीसगढ़, कर्नाटक, हिमाचल-प्रदेश और केरल की स्थिति बाकी राज्यों के मुकाबले थोड़ी बेहतर है।

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टीकाकरण आंकड़ों में भी पिछड़ती महिलाएं   

सबसे बड़े राज्य उत्तर-प्रदेश की राज्य सरकार द्वारा सर्वाधिक टीककरण की खबरें आ रही है। राज्य की कुल आबादी 19.98 करोड़ में से 9 करोड़ के करीब महिलाओं की संख्या है। उत्तर-प्रदेश में टीका लगवाने में 33 प्रतिशत पुरुषों को महिलाओं से अधिक टीके लगे हैं। कोविन ऐप के 10 जून शाम तक के डेटा के मुताबिक पूरे प्रदेश में 2,19,91,292 लोगों को टीके लगे चुके हैं। जिसमें मात्र 77,90,952 महिलाओं को ही टीका मिल पाया है। राज्य के सभी जिलों में महिला को पुरुषों के मुकाबले कम टीके लगे हैं।

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10 जून शाम तक उत्तर प्रदेश में महिलाओं को लगे टीके का आंकड़ा, तस्वीर- कोविन ऐप

राज्य की राजधानी लखनऊ से लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृह जिले गोरखपुर तक की सूरत एक जैसी है। इन ज़िलों में कोविड-19 से बचाव के लिए लगाए जाने वाले टीके को महिलाएं कम लगवा रही है। बीते गुरुवार शाम तक के आंकड़ों के मुताबिक राज्य राजधानी लखनऊ में अब तब 10,91,176 लोगों को टीका लग चुका है, जिसमें मात्र 3,72,627 महिलाओं को टीका लगा है। मुख्यमंत्री के जिले गोरखपुर में भी टीकाकरण सुस्त चल रहा है, अब तक के कुल 6.15,283 टीकाकरण में से केवल 2,17,877 महिलाओं को टीका लगा है। देखा जाए तो पूरे प्रदेश की जनसंख्या के हिसाब से टीकाकरण अभी बहुत ही कम लोगों को मिला है और इसमें महिलाओं को उससे भी कम मिला है।

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टीके को लेकर अफवाह और डर

कोविड-19 टीकों को लेकर शहरी-ग्रामीण दोनों आबादी में अफवाह और भ्रामक सूचनाएं फैल रही हैं जिसके कारण लोग टीका लेने से बच रहे हैं। टीकाकरण को लेकर लोगों के पास बहुत भ्रामक जानकारियां अलग-अलग माध्यमों से पहुंच रही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों और महिलाओं में तो टीके को लेकर और भी ज्यादा गलतफहमियां हैं। उत्तर-प्रदेश के कई ज़िलों से टीके से बचते लोगों की खबरें आ रही हैं। इटावा के चांदपुर गांव में एक बुजु़र्ग महिला ने उस वक्त खुद को छिपा लिया जब चिकित्सा विभाग के लोग और मौजूदा विधायक उनको कोविड-19 के टीका के बारे में जानकारी देने उनके घर पहुंचे थे। “हम टीका ना लगवाई, बुखार आ जाई और हम मर जाई।” जैसा कहते हुए बुजुर्ग महिला घबराकर एक ड्रम के पीछे छिप गईं। गांव की महिलाओं में खासा डर बना हुआ है। महिलाएं इस विषय में भी अनेक कुतर्कों से घिरी हुई हैं। राजस्थान के भीलवाड़ा जिले से एक महिला का वीडियो वायरल हो रहा है, जो कह रही है कि टीके लगवाने से बच्चे पैदा नहीं होंगे।

अज्ञानता के कारण अफवाहों को मानने में महिलाओं की संख्या ज्यादा है। टीके के कारण बच्चा न पैदा होने जैसा डर महिलाओं में फैलाना पित्तृसत्ता का ही रूप है। महामारी के दौरान महिलाओं के स्वास्थ्य को दरकिनार कर उसको केवल बच्चे पैदा करने तक ही सीमित रख पुरुष प्रधान सोच उसे कोरोना के टीके से वंचित रख रही है। समाज में क्या एक महिला का अस्तित्व केवल संतान पैदा करना और घर की दहलीज तक ही है। घर पर रहने वाली महिलाओं के पास सूचना और समझ का विकल्प अधिकतर घर के पुरुष ही होते हैं। अधिकतर महिलाएं खुद से कम और घर के पुरुष सदस्यों की बातों के आधार पर अपनी राय ज्यादा बनाती हैं। महामारी से बचाव के लिए टीका लगवाना, कब लगवाना है जैसे ज़रूरी फैसले भी वेह खुद न लेकर परिवार, खासतौर पर पुरुष सदस्यों की सहमति पर छोड़ रही हैं।  

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48 वर्षीय प्रतिभा टीका लगवाने को लेकर असमंजस में हैं। उन्होंने टीककाकरण के बाद तबियत खराब होने की बहुत बातें सुनी हैं। टीका लगने के बाद बुखार न आ जाए इसलिए उनका बेटा उनको अभी टीका लेने से मना कर रहा है। उनके परिवार के अनुसार जब अधिक लोग टीका लगवा लेगें उनको भी तब लगवा देंगे। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के एक गांव की रहने वाली शशिकला की उम्र 54 वर्ष है। उन्होंने टीका नहीं लगवाया है। उनका कहना है, “टीके के बाद बुखार होता है और बहुत से लोग मर भी रहे हैं। हम घर में रहते हैं और बाहर जाना होता ही नहीं है। जब सब लगवा लेंगे उसके बाद लगवाएंगे।” हाल में ही अपनी मास्टर्स की पढ़ाई पूरी करने वाली रश्मि का टीके को लेकर कहना है, “मुझे तो अपने देश के वैक्सीन ट्रायल को लेकर ही बहुत से सवाल हैं। फुल वैक्सीन डोज लेने बाद भी कोविड पॉजिटिव होकर बहुत लोगों की मौतें हुई हैं। ऐसा लगता है यह टीके भी केवल कुछ वक्त के लिए ही असरदार हैं।”  

कोविड-19 के टीके को लेकर बहुत तरह की भ्रांतियां फैली हैं, जिसकी वजह से लोगों में एक हिचकिचाहट बन रही है। महिलाओं के अंदर इस तरह के डर ज्यादा देखने को मिल रहे हैं। आमतौर पर घरों में महिलाओं के स्वास्थ्य को ज्यादा महत्व नहीं दिया है। स्वास्थ्य से जुड़ी उनकी परेशानी को नजरअंदाज कर उन्हें काम करने को कह दिया जाता है या फिर कुछ घरेलू नुस्खे अपनाकर खुद इलाज कर देने की नसीहत दी जाती है। ऐसे में महामारी से बचाव और उसके बारे में सही जानकारी का महिलाओं के पास पूरा अभाव है।

टीकाकरण में बढ़ोत्तरी के लिए बनाया पिंक बूथ

उत्तर-प्रदेश की सरकार ने महिलाओं को टीका लगाने के लिए पिंक बूथ अभियान की शुरुआत की है। इस अभियान का मकसद ज्यादा से ज्यादा संख्या में राज्य की महिला आबादी को टीका लगाना है। महिलाओं को कोविड का टीका बिना किसी परेशानी के लगे, इसके लिए राज्य के सभी 75 जिलों में पिंक बूथ बनाए गए है। इन बूथों पर 18 वर्ष से ऊपर की कोई भी महिला जाकर टीका लगवा सकती हैं। अलग से टीकाकरण की सुविधा महिलाओं की झिझक को खत्म करने को लेकर बनाया गया है। महिलाओं में ज्यादा से ज्यादा टीका लगाने के लिए यह कदम सराहनीय है लेकिन गांव-देहात में अभी भी टीके को लेकर ज्यादा असमंजस बना हुआ है। अलग से टीकाकरण की सुविधा ग्रामीण क्षेत्र की सूरत कितनी बदल पाता है यह भी देखना होगा या फिर हमेशा की तरह योजनाओं का अधिकतर लाभ शहरी वर्ग तक ही सीमित होकर रह जाएगा। महामारी के इस दौर में महिलाएं दोहरी मार सहन कर रही ंहै। हमारे घर-परिवारों में पहले से ही औरतें हाशिये का जीवन जीने को मजबूर हैं। उनके स्वास्थ्य के प्रति लाहपरवाही सामान्य है। ऐसे में महिलाओं तक अधिक संख्या में टीका पहुंचाने की योजनाओं का होना बेहद ज़रूरी है।

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तस्वीर साभारः Krishna Das for Reuters

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