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भारत में स्वास्थ्य देखभाल और अच्छे इलाज तक पहुंच और खर्च उठाना लग्ज़री के समान है जो ख़ासतौर पर एक विशिष्ट वर्ग तक ही सीमित रहा है। चूंकि स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठाना सभी की पहुंच में नहीं है, लाखों भारतीय या तो अपनी स्वास्थ्य समस्याओं को नज़रअंदाज़ करते हैं या इलाज में पूरी जमा पूंजी लगा देते हैं। ऑक्सफैम इंटरनेशनल की एक रिपोर्ट बताती है कि कई आम भारतीयों की उनकी जरूरत मुताबिक स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंच नहीं है। हर साल 63 मिलियन यानि लगभग हर सेकंड में दो लोग स्वास्थ्य देखभाल में हुए खर्च के कारण गरीबी का सामना करते हैं। ऐसे में मानसिक स्वास्थ्य का देखभाल अतिरिक्त खर्च का कारण बन जाता है। साथ ही झिझक, रूढ़िवादी सोच और संसाधनों तक पहुंच न होने के कारण यह आज भी आम स्वास्थ्य समस्याओं की लिस्ट में अपनी जगह नहीं बना पाया है। आज भले देश में कुछ लोग बड़े-बड़े कलाकारों और खिलाड़ियों के मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर सामने आने की तारीफ कर रहे हैं। लेकिन समाज में आम तौर पर यह एक विवादित और छिपाने वाला मुद्दा है। बदलती जीवनशैली और कोरोना महामारी की चपेट में जिस तरह लोगों में, विशेषकर बच्चों, युवाओं में, मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ रही हैं, मानसिक स्वास्थ्य के प्रति सामाजिक रूढ़िवाद को खत्म करने की सरकार की ज़िम्मेदारी और बढ़ जाती है।

मानसिक स्वास्थ्य देखभाल सुविधाएं आम जनता की पहुंच में होने से इससे जुड़े मिथकों का लोगों को प्रभावित करने की आशंका कम होगी। यह ज़रूरी है कि हर तबके और समुदाय को इलाज मुहैया हो। इसलिए सरकार के मानसिक स्वास्थ्य देखभाल के लिए निर्धारित बजट और योजनाओं की एक अहम भूमिका है। इंडियन जर्नल ऑफ साइकेट्री के अनुसार भारत का वार्षिक स्वास्थ्य पर खर्च सकल घरेलू उत्पाद यानि जीडीपी का 1.15 फ़ीसद है। वहीं, मानसिक स्वास्थ्य बजट देश के कुल स्वास्थ्य बजट का 1 प्रतिशत से भी कम है। सरकार ने मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम (एमएचसीए) को साल 2017 में लागू किया था जिसके अनुसार मानसिक बीमारी से पीड़ित लोगों के अधिकारों की रक्षा, बढ़ावा और उन्हें पूरा करने में मदद करता है।

आज शहर से लेकर गांव तक जिस तरह परिवार नियोजन, मोतियाबिंद या पोलियो जैसे समस्याओं के प्रति जागरूकता बढ़ी है, वह मानसिक स्वास्थ्य के प्रति नहीं मिलती। देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा ग्रामीण क्षेत्रों में रहता है जो इलाज के लिए पूरी तरह सरकारी संसाधनों पर निर्भर है।

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इंडियन जर्नल ऑफ साइकियाट्री के ही अनुसार एमएचसीए को सुचारू ढंग से लागू करने के लिए सरकार पर हर वर्ष अनुमानित 94 हज़ार करोड़ से अधिक की लागत हो सकती है। वहीं, इस साल के स्वास्थ्य बजट पर ध्यान दें, तो स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के लिए कुल 71,269 करोड़ रूपए का प्रस्ताव रखा गया। हालांकि इसमें मानसिक स्वास्थ्य देखभाल के लिए कुल 597 करोड़ रुपए आवंटित किए गए। लेकिन राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (एनएमएचपी) के लिए मानसिक स्वास्थ्य बजट का केवल सात प्रतिशत ही आवंटित किया गया। असल में, इस बजट को मूलतः दो संस्थानों के लिए आवंटित किया गया। एक ओर बेंगलुरु स्थित राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और विज्ञान संस्थान (निम्हैन्स) को 500 करोड़ दिए गए, तो वहीं तेजपुर के लोकप्रिय गोपीनाथ बोरदोलोई क्षेत्रीय मानसिक स्वास्थ्य संस्थान को 57 करोड़ रुपए दिए गए। भारत में पिछले कुछ वर्षों का रिकॉर्ड देखें तो, द हिन्दू के बिज़नस लाइन के अनुसार वित्तीय वर्ष 2019 में, एनएमएचपी के लिए 40 करोड़ का बजट आवंटित किया गया जो वित्तीय वर्ष 2018 के 50 करोड़ से कम था। यह रिपोर्ट बताती है कि वास्तव में हर साल एनएमएचपी पर खर्च की जाने वाली राशि केवल 5 करोड़ रुपए होती है। आज भी देश में मानसिक स्वास्थ्य जरूरतों और मानसिक स्वास्थ्य फंडिंग के बीच व्यापक अंतर बना हुआ है। हालांकि इस साल के स्वास्थ्य बजट में बढ़त की गई, लेकिन मानसिक स्वास्थ्य के लिए सालाना स्वास्थ्य बजट का केवल 0.05 प्रतिशत खर्च किया जाता रहा है।

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हमें व्यापक योजनाओं और संसाधनों की ज़रूरत है। ऐसे में मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवंटित बजट की कमी आने वाले दिनों को और चुनौतीपूर्ण बना सकती है।

भारत में तेजी से बढ़ती मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं  

मेडिकल पत्रिका द लैनसेट ने साल 1990 से 2017 तक भारत के अलग-अलग राज्यों में मानसिक विकारों के बोझ पर एक अध्ययन किया और ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज स्टडी के नाम से रिपोर्ट जारी की। इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत में साल 1990 के बाद से सभी बीमारियों के बोझ में मानसिक विकारों का योगदान लगभग दोगुना हो गया। इस रिपोर्ट के अनुसार साल 2017 में, हर सात भारतीय में से एक अलग-अलग प्रकार के गंभीर मानसिक विकार से प्रभावित पाए गए। देश में साल 2017 तक कुल आबादी का 14.3 फीसद यानि 197.3 मिलियन लोग किसी न किसी प्रकार के मानसिक विकार से पीड़ित पाए गए। यूनिसेफ़ की साल 2021 की द स्टेट ऑफ द वर्ल्ड्स चिल्ड्रन रिपोर्ट भारत की मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं की स्थिति को और स्पष्ट करती है। इस रिपोर्ट मुताबिक देश में 15 से 24 साल के बच्चों में से 14 प्रतिशत यानि हर 7 में से 1 ने अक्सर उदास महसूस किया या चीजों को करने में बहुत कम दिलचस्पी दिखाई।

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अपर्याप्त मानसिक स्वास्थ्य देखभाल व्यवस्था और बढ़ता खर्च 

भारत में मानसिक स्वास्थ्य समस्या को महत्व न देने के पीछे रूढ़िवादी और दक़ियानूसी सोच के साथ-साथ संसाधनों की कमी भी एक प्रमुख कारण है। साथ ही, मानसिक विकारों को आम स्वास्थ्य समस्या के तरह सामान्य बनाने के लिए सरकार की ओर से भरसक प्रयास होते नहीं दिखते। अलग-अलग शोध यह बताते हैं कि लोग मानसिक स्वास्थ्य विकारों के लिए मदद लेने या इलाज करवाने से झिझकते हैं। साल 2019 में इंडियन जर्नल ऑफ साइकियाट्री के अनुसार महामारी से पहले भी भारत में कम से कम 50 मिलियन बच्चे मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से प्रभावित थे। लेकिन इनमें से 80 से 90 प्रतिशत ने कोई मदद नहीं ली। आज शहर से लेकर गांव तक जिस तरह परिवार नियोजन, मोतियाबिंद या पोलियो जैसे समस्याओं के प्रति जागरूकता बढ़ी है, वह मानसिक स्वास्थ्य के प्रति नहीं मिलती। देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा ग्रामीण क्षेत्रों में रहता है जो इलाज के लिए पूरी तरह सरकारी संसाधनों पर निर्भर है।

इंडियन जर्नल ऑफ साइकियाट्री के ही अनुसार, अगर रोगी निकटतम सरकारी स्वास्थ्य केंद्र के ओपीडी में इलाज करवाता है, तो इसकी लागत अनुमानित सौ रूपए प्रति रोगी प्रति महीने होगी। वहीं, निजी अस्पतालों में यह लागत कम से कम 10 से 15 गुना तक बढ़ सकती है। नैशनल मेंटल हेल्थ सर्वे के अनुसार एल्कोहल यूस दिसोर्डर के देखभाल और इलाज के लिए औसतन 2250 रुपए, सिज़ोफ्रेनिया और अन्य मानसिक विकार के लिए 1000 रुपए, अवसाद संबंधित विकारों के लिए 1500 और न्यूरोसिस और एपिलेप्सी के लिए 1500 रुपए लगते हैं। साफ तौर पर आम जनता का मानसिक स्वास्थ्य देखभाल के लिए यह खर्च उठा पाना मुमकिन नहीं। इसलिए हमें व्यापक योजनाओं और संसाधनों की ज़रूरत है। ऐसे में मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवंटित बजट की कमी आने वाले दिनों को और चुनौतीपूर्ण बना सकती है। एमएचसीए, 2017 की धारा 31(3) कहती है कि सरकार को इस अधिनियम के लागू होने के 10 सालों के भीतर प्रति लाख जनसंख्या पर मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों की संख्या की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत मानकों को पूरा करने के प्रयास करने चाहिए। लेकिन आज भी देश में मानसिक स्वास्थ्य चिकित्सकों की भारी कमी है।

मानसिक स्वास्थ्य को महत्व न देना अपनेआप में एक समस्या है और कोविड-19 ने हालात को और खराब कर दिया है। कोरोना महामारी के दौरान दुनियाभर में लोगों की साधारण इलाज या तो पूरी तरह रुक गई या बाधित हुई। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डबल्यूएचओ) के पिछले साल 130 देशों पर किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार कोरोना महामारी के दौरान लोगों के मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं में गंभीर बाधाएं आई। इन देशों में कमजोर वर्ग के 60 प्रतिशत से अधिक लोगों ने अपने मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं में व्यवधान की सूचना दी। इसमें 72 फ़ीसद बच्चे और किशोर, 70 प्रतिशत वृद्ध और वयस्क और 61 प्रतिशत प्रसवपूर्व या प्रसवोत्तर सेवाओं की आवश्यकता वाली महिलाएं शामिल थी। आज मानसिक स्वास्थ्य खर्च करना जरूरी ही नहीं अनिवार्य हो चुका है। देश के सामाजिक और आर्थिक हालात में सुधार के लिए लोगों के मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होना आवश्यक है।

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तस्वीर साभार: The Economic Times

कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से हिंदी में बी ए और पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद बतौर पत्रकार और शिक्षिका मैंने लम्बे समय तक काम किया है। बिहार और बंगाल के विभिन्न क्षेत्र में पले-बढ़े होने के कारण सामाजिक रूढ़िवाद, धार्मिक कट्टरपन्त, अंधविश्वास, लैंगिक और शैक्षिक असमानता जैसे कई मुद्दों को बारीकी से जान पायी हूँ। समावेशी नारीवादी विचारधारा की समर्थक, लैंगिक एवं शैक्षिक समानता ऐसे मुद्दें हैं जिनके लिए मैं निरंतर प्रयासरत हूँ।

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