क्या हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि सभी बच्चे स्कूल वापस लौटें?
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सफ़ीना हुसैन

कोविड-19 के कारण कई बार लगने वाले लॉकडाउन के बाद अब स्कूल धीरे-धीरे दोबारा खुलने लगे हैं। इस समय सबसे ज्यादा कमज़ोर बच्चों, खास कर लड़कियों की जरूरतों पर ध्यान केन्द्रित करने वाली एक बेहतर शिक्षा व्यवस्था के निर्माण की जरूरत है। इससे शिक्षा के अधिकार को सुनिश्चित किया जा सकता है। जब कोविड-19 महामारी भारत में पहुंची तब 12 साल की रेखा के पिता की नौकरी चली गई। परिवार की आय का स्रोत चला गया और उनका घर भी। उन्हें राजस्थान के अपने छोटे से गाँव वाले घर में लौटने पर मजबूर होना पड़ा। यहां रेखा के लिए न तो कोई स्कूल था, न ही मिड-डे मील (मध्याह्न भोजन) में मिलनेवाला खाना और न ही माहवारी की स्वच्छता से जुड़ी कोई चीज। हालांकि, सबसे अधिक चिंता उसके भविष्य से जुड़ी थी। जब एडुकेट गर्ल्स नाम की स्वयंसेवी संस्था के कार्यकर्ता इस परिवार से मिलने पहुंचे और उनसे यह सवाल किया कि वह अपने बच्चों को वापस स्कूल भेजना कब से शुरू कर रहे हैं, तब रेखा के पिता ने कहा, “मैं बहुत मुश्किल से अपने परिवार के लिए खाना जुटा पा रहा हूं। अब मेरी प्राथमिकता मेरे बच्चों के लिए दो वक्त की रोटी जुटाना है।”

गहरी होती त्रासदी के साथ यह भारत के असंख्य परिवारों की सच्चाई बन चुका है और देशभर की स्वयंसेवी संस्थाएं इसकी गवाह रही हैं। महामारी के पहले देश में 4.1 मिलियन से अधिक लड़कियां1 स्कूल नहीं जाती थीं। महामारी के दौरान 15 लाख स्कूल बंद हो गए जिसके कारण प्राथमिक और मध्यमिक स्कूलों में नाम लिखवाने वाले 247 मिलियन बच्चे बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं। अब ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि देश भर में लगभग 11 मिलियन लड़कियां अपनी पढ़ाई छोड़ने की स्थिति में हैं। महामारी की चपेट में आने से पहले भी राजस्थान में प्रत्येक पांच में से एक लड़की अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ देती थी। अब कोविड-19 के कारण 14.9 फ़ीसद बच्चे स्कूल में अपना नामांकन तक नहीं करवा पाए हैं। उत्तर प्रदेश में भी ऐसा ही हाल है, जहां 54 फ़ीसद लड़कियां इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं हैं कि महामारी के बाद वे कभी स्कूल वापस लौट भी पाएंगी या नहीं।

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स्वयंसेवी संस्थाओं को हमारे बच्चों के भविष्य पर इस संकट के स्थायी प्रभाव की आशंका के साथ तत्काल बुनियादी जरूरतों को पूरा करने की सच्चाई के बीच संतुलन बनाना पड़ा था। महामारी और लगातार लगने वाले लॉकडाउन ने साल 2020 में देश के लगभग 230 मिलियन लोगों को और ज्यादा गरीब कर दिया है। नतीजतन, भारत के दूर-दराज के हिस्सों में कई परिवारों को अपने खाने की मात्रा में कमी लानी पड़ी और उन्हें बाल श्रम का सहारा लेना पड़ा। कई युवा लड़कियों को मजबूरन जल्दी शादी करके परिवार के देखभाल करने वाली भूमिकाओं में आना पड़ा जिससे वे हिंसा और तस्करी का सामना करने लगीं।

ऐसे बच्चे जो महामारी के पहले से ही स्कूल जाते थे, उनकी पहचान करने के लिए हमें स्कूलों में मौजूद दस्तावेजों की जांच करनी पड़ेगी। साथ ही यह सुनिश्चित करना होगा कि उन में से बिना किसी अपवाद के सभी बच्चे वापस स्कूल लौट जाएं। उसके बाद, हमें ऐसे नए बच्चों की पहचान करनी होगी जो स्कूल जाने की उम्र में पहुंच चुके हैं और इनके साथ ही ऐसे प्रवासी मजदूरों के बच्चों पर भी ध्यान देना होगा जो छोटे अंतराल के बाद नई जगह विस्थापित होने के कारण स्कूल नहीं जा पाते हैं।

कोविड-19 त्रासदी के दौरान, एडुकेट गर्ल्स में हमारे काम ने समुदाय को लेकर अच्छी समझ दी और हमें सीखने के एक तेज रास्ते पर निकलना पड़ा। पिछले 18 महीनों के दौरान, ग्रामीण-स्तर पर लड़कियों की शिक्षा को सुनिश्चित करने की कोशिश करने वाले 15,000 से अधिक सामुदायिक स्वयंसेवी (टीम बालिका) हमारे कैंप विद्या नाम के सामुदायिक प्रशिक्षक पहल से जुड़े। इस कार्यक्रम के तहत ये सदस्य राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के 21 जिलों के 20,000 गांवों में गए और वहां के 2.3 लाख बच्चों के साथ जुड़कर काम किया। भारत की स्कूल से बाहर रहने वाली 40 फ़ीसद लड़कियां इन्हीं इलाकों में रहती हैं। महामारी से मिलने वाली सीख और आगे बढ़ने के लिए आवश्यक प्राथमिक चीजों के बारे में यहां कुछ बातें हैं ताकि कोविड-19 से प्रभावित बच्चे स्कूल वापस लौट सकें।

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इस क्षेत्र को एक ऐसा बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाना होगा जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि एक भी बच्चा पीछे न छूटे

इस महामारी ने देश में पहले से मौजूद असमानता को और बढ़ा दिया और विभिन्न उपसमूहों को असमान रूप से प्रभावित किया है। इसलिए हम लोगों को एक ऐसे नियोजित, बहुआयामी दृष्टिकोण को अपनाने की ज़रूरत है जिससे यह तय किया जा सके कि विभिन्न रूपों में कोविड-19 से प्रभावित बच्चे अपनी स्कूली शिक्षा जारी रख सकें। उदाहरण के लिए, ऐसे बच्चे जो महामारी के पहले से ही स्कूल जाते थे, उनकी पहचान करने के लिए हमें स्कूलों में मौजूद दस्तावेजों की जांच करनी पड़ेगी। साथ ही यह सुनिश्चित करना होगा कि उन में से बिना किसी अपवाद के सभी बच्चे वापस स्कूल लौट जाएं। उसके बाद, हमें ऐसे नए बच्चों की पहचान करनी होगी जो स्कूल जाने की उम्र में पहुंच चुके हैं और इनके साथ ही ऐसे प्रवासी मजदूरों के बच्चों पर भी ध्यान देना होगा जो छोटे अंतराल के बाद नई जगह विस्थापित होने के कारण स्कूल नहीं जा पाते हैं।

हालांकि, यह बहुत मुश्किल है, लेकिन फिर भी हमें एक ऐसी व्यवस्था की जरूरत है जो इन में से हर बच्चे की पहचान करे और उन्हें स्कूल जाने के लिए प्रोत्साहित करे। हमें ऐसे बच्चों पर भी ध्यान देने की जरूरत है जो प्राथमिक से मध्यमिक स्कूलों में जाने की उम्र में पहुंच चुके हैं, क्योंकि ऐसे बच्चों में लड़कियों के पढ़ाई बीच में ही छोड़ देने का दर बहुत ऊंचा होता है। अंत में, हमें ऐसे बच्चों के पहचान की जरूरत है जिन्हें लेकर यह खतरा है कि वे स्थायी रूप से वापस स्कूल नहीं लौट पाएंगे। इनमें कोविड-19 के कारण अनाथ हुए बच्चे और मुख्य धारा में शामिल होने योग्य बड़ी उम्र की लड़कियां शामिल हैं।

उदाहरण के लिए, मार्च 2020 में 14 वर्ष की उम्र पूरा करने वाली लड़कियों को स्कूल वापस नहीं लौटने का खतरा सबसे अधिक है क्योंकि उन्होनें शिक्षा के अधिकार अधिनियम के अनुसार प्रवेश के लिए आयु पात्रता मानदंड को पार कर लिया है। बहुत अधिक संभावना यह है कि उनकी या तो शादियां कर दी गई हैं या उन्हें परिवार की देखभाल करने की भूमिका में ला दिया गया है, जिससे कि वे वापस स्कूल नहीं लौट पाने की स्थिति में आ गई हैं। ऐसे बच्चों के लिए हमें एक वैकल्पिक शिक्षा योजना बनाने की आवश्यकता है।

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नीति निर्माताओं को बच्चों को स्कूल में वापस लाने के लिए प्रोत्साहन के तरीकों को खोजने पर ध्यान देना चाहिए

चूंकि हम लोग एक महामारी से उबरे हैं इसलिए नीतियों और नीति निर्माताओं को अपनी सोच और रणनीति के केंद्र में सबसे कमजोर समुदायों को रखने की आवश्यकता है। यह विशेष रूप से लड़कियों के लिए सच है क्योंकि वे अब लिंग आधारित हिंसा, कम उम्र में शादी, जबरन मजदूरी, तस्करी आदि का बड़े पैमाने पर सामना करती हैं। इसलिए शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य, और एजेंसी निर्माण में परिवर्तन बहुत महत्वपूर्ण है। लड़कियों के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण पर ध्यान केन्द्रित करना और स्कूलों में स्वास्थ्य देखभाल और स्वच्छता सुविधाओं के प्रावधान इस रणनीति के मूल घटक हो सकते हैं। सभी लड़कियों के लिए शिक्षा को अनिवार्य बनाने के लिए नीति-निर्माण के स्तर पर तत्काल हस्तक्षेप की भी आवश्यकता है।

चूंकि हम लोग एक महामारी से उबरे हैं इसलिए नीतियों और नीति निर्माताओं को अपनी सोच और रणनीति के केंद्र में सबसे कमजोर समुदायों को रखने की आवश्यकता है। यह विशेष रूप से लड़कियों के लिए सच है क्योंकि वे अब लिंग आधारित हिंसा, कम उम्र में शादी, जबरन मजदूरी, तस्करी आदि का बड़े पैमाने पर सामना करती हैं।

सबसे महत्वपूर्ण यह है कि विभिन्न थिंक टैंक, शोधकर्ता और नीतिनिर्माता अपना ध्यान और प्रोत्साहन ऐसी सहायता योजनाओं पर केन्द्रित करें जिससे कि हाशिये पर जी रहे समुदाय के लोगों का ध्यान वापस शिक्षा की तरफ जाए। उदाहरण के लिए, रेखा जैसी कम आय वाले घरों से आने वाले बच्चों को समायोजित करने की क्षमता के आधार पर स्कूलों को प्रोत्साहित और पुरस्कृत किया जा सकता है। सरकारें स्नातक तक लड़कियों के लिए मुफ्त शिक्षा की योजना पर विचार कर सकती हैं। कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों जैसे सरकारी वित्त पोषित आवासीय स्कूलों की सीटें बढ़ाई जा सकती हैं; और ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों को समायोजित करने और आवंटित करने की योजनाएं बनाई जा सकती हैं जहां प्रवासी बच्चे वापस लौट आए हैं। ऐसा करने से विस्तारित आबादी के लिए पर्याप्त भोजन की व्यवस्था को सुनिश्चित किया जा सकता है।

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बेहतर वापसी की तैयारी

एक बेहतर शिक्षा व्यवस्था के निर्माण के लिए हमारा लक्ष्य उन बच्चों को वापस शिक्षा दिलाने का होना चाहिए जो महामारी के दौरान शिक्षा से चूक गए हैं। हमें व्यवस्था के पुनर्निर्माण और सुधार को इस रूप में लाने पर ध्यान देने की जरूरत है जिसमें सभी बच्चों की जरूरतों के लिए जगह हो ताकि कोई भी पीछे न छूट जाए। हमारी कोशिशों में निम्नलिखित चीजें शामिल होनी चाहिए:

  • घर-घर जाकर किए गए सर्वेक्षण से कमियों की पहचान करना और बच्चों के वर्तमान आर्थिक और शैक्षिक स्थिति का आंकलन करना।
  • पढ़ाई छोड़नेवाले संभावित बच्चों सहित अन्य सभी बच्चों की कक्षाओं में उपस्थिति को बढ़ाने के उद्देश्य से अभिभावकों को प्रोत्साहित करने के लिए उनसे सीधे तौर पर और लगातार बातचीत पर ध्यान देना।
  • छोटी उम्र में होनेवाली शादियों को रोकने में मदद के लिए समुदाय-आधारित संस्थानों और पंचायती राज संस्थानों से बातचीत का आयोजन करना। नागरिक समाज संगठनों और स्वयंसेवी संस्थानों को उन समुदायों से बातचीत के कई सत्र आयोजित करने की भी आवश्यकता है जिनके साथ वे काम करते हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कम उम्र में विवाह, बच्चों की तस्करी और बाल श्रम की समस्याओं की पहचान हो और उस पर रोक लगाई जा सके।
  • मध्याह्न-भोजन जैसी सहायता मुहैया करना ताकि स्कूल भेजने से परिवार पर आने वाले अतिरिक्त खर्च का वहन किया जा सके और साथ ही मौलिक सुरक्षा और स्वच्छता किट उपलब्ध करवाना। इससे खास कर सबसे कमजोर वर्ग के बच्चों के पुनर्नामांकन की दर में सहायता मिल सकती है। 
  • ऐसे पाठ्यक्रम तैयार करना जिससे बच्चों को छूटी हुई पढ़ाई को फिर से समझने और पढ़ने में मदद मिल सके, ताकि शिक्षा में आए इस अंतर से उनके भविष्य की पढ़ाई पर किसी तरह का प्रभाव न पड़े। इसे आयु-उपयुक्त शिक्षण कार्यक्रम के आधार पर तैयार किया जाना चाहिए क्योंकि स्कूल वापस आने वाले बच्चों में विभिन्न उम्र के बच्चे शामिल होते हैं। नया पाठ्यक्रम बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को भी ध्यान में रख कर बनाया जाना चाहिए क्योंकि महामारी के दौरान वे पूरी तरह से सीखने और अपने दोस्तों से बातचीत करने की प्रक्रिया से महरूम रहे हैं।
  • स्कूल प्रबंधन समितियों और स्थानीय सरकार के सक्रिय समर्थन से लड़कियों को वापस स्कूल ले जाने के उद्देश्य के लिए अभियान चलाया जाना चाहिए। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कोविड-19 के कारण आए आर्थिक दबाव के कारण इस साल लड़कियों के स्कूल छोड़ने की संभावना अधिक है।

समावेशी वित्तपोषण सर्वोपरि होगा

हमें इस तथ्य की पहचान करने की जरूरत है कि शिक्षा के लिए वर्तमान राष्ट्रीय और वैश्विक वित्तपोषण पर्याप्त नहीं है। असंख्य विचारकों के अनुमान के अनुसार वित्तपोषण में आने वाली कमी प्रति वर्ष लगभग 75 बिलियन अमरीकी डॉलर है। यह प्रत्येक बच्चे को सुनिश्चित रूप से मिलने वाली शिक्षा के रास्ते में एक कमी है।

महामारी के दौरान सरकारी और गैर-सरकारी दोनों ही स्तरों पर वित्तपोषण की कई सारी गतिविधियां देखने को मिली। इन वित्तपोषण गतिविधियों में से ज़्यादातर सीधे राहत पहुंचने के तरीकों पर केन्द्रित थी। महामारी की शुरुआत में, इसका मुख्य ध्यान लोगों तक रोज़मर्रा की जरूरी चीजें पहुंचाना और शिक्षा के लिए डिजिटल सुविधाओं के इंतजाम पर था, लेकिन इसकी प्रकृति समावेशी नहीं थी। दूसरी लहर में, इसका ध्यान चिकित्सीय आपदा स्थितियों जैसे ऑक्सिजन सिलिंडरों और वेंटिलेटरों की आपूर्ति पर चला गया था। इन चीजों पर भारी मात्रा में गैर-आनुपातिक खर्च होने के कारण सबसे अधिक हाशिये पर रहने वाले लोगों के लिए शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे उपेक्षित हो गए।

अब, हमें इसके लिए कमर कसने की जरूरत है क्योंकि हम एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था बनाना चाहते हैं जो भविष्य में मिलने वाले आघातों का सामना कर सके और यह सुनिश्चित कर सके कि एक भी बच्चा पीछे नहीं छूटेगा। हमें वैश्विक और घरेलू दानकर्ताओं को इस बात का भरोसा दिलाना होगा कि हमें और अधिक पैसों की आवश्यकता है। हालांकि, इसके साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि यह वित्तपोषण समावेशी हो और ऐसी योजनाओं पर केन्द्रित हो जो सबसे कमज़ोर बच्चों के लिए उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा को सुनिश्चित करे। और सबसे कमजोर समुदायों के लिए शिक्षा और संसाधन तक पहुँचने की कमी से जुड़ी समस्याओं में गहरे उतरकर देखने के साथ ही अब समय आ गया है कि हम एक साथ मिलकर जमीनी स्तर पर इन समस्याओं को सुलझाएँ और लड़कियों की भलाई के काम को प्राथमिकता दें।

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तस्वीर साभार : BBC/Getty Images

फुटनोट:

मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार, 2017। इक्विटि के साथ प्रभावशीलता: कैमफेड के कार्यक्रम के माध्यम से हाशिये पर रहने वाली लड़कियों के लिए शिक्षा – समान पहुँच और शिक्षा के लिए शोध, 2018।

यह लेख मूल रूप से IDR हिंदी पर प्रकाशित हुआ था, जिसे सफ़ीना हुसैन ने लिखा है। इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

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