She’s Beautiful When She’s Angry' एक ऐसी डॉक्यूमेंट्री जिसने पितृसत्ता पर चोट करते नारीवादी आंदोलनों को फिल्माया
तस्वीर साभार: Al Jazeera
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“What do women want? Dear god! What does she want”

“आखिर स्त्री चाहती क्या है? हे ईश्वर! स्त्री को आखिर क्या चाहिए?” कुछ इस तरह के शब्द हैं दुनिया के महान मनोवैज्ञानिक सिगमंड फ्रायड के स्त्री के प्रति। इस तरह की मानसिकता दुनिया के प्रत्येक समाज में मौजूद है। अक्सर स्त्री के लिए हमने चुटकुले के तौर पर पुरुषों से एक वाक्य सुना होगा कि स्रष्टा-द्रष्टा, ज्ञानी-ध्यानी,ऋषि-महात्मा यहां तक कि देवता भी स्त्री के चरित्र को नहीं समझ सके तो हम किस खेत की मूली हैं। लेकिन वे समझेंगे कैसे क्योंकि कभी उन्होंने स्त्री को उसकी देह के आगे कभी जानना ही नहीं चाहा कि वह सच में क्या चाहती है। कभी किसी स्त्री से इस तरह के वाक्य सुनने को मिले हैं कि पुरुष आखिर चाहते क्या हैं? उन्हें तो ईश्वर भी नहीं समझ सकता तो हम किस खेत के गाजर-मूली हैं? जिस स्त्री ने पितृसत्ता के दायरे से निकल अपना रास्ता ख़ुद चुना उसने इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकाई है क्योंकि पितृसत्ता अपने चंगुल से किसी को आसानी से निकलने नहीं देती।

इसी पितृसत्तात्मक मानसिकता को चुनौती दी अमेरिका में दूसरी लहर के महिला मुक्ति आंदोलन ने जो साल 1966 से साल 1971 के दौरान महिला अधिकारों और लैंगिक समानता के लिए सड़कों पर उतरना पड़ा। हालांकि पहली लहर के नारीवादी आंदोलन ने ‘वोट देने के अधिकार’ से अपनी शुरुआत कर दी थी। इसी दूसरे चरण के महिला मुक्ति आंदोलन पर फिल्ममेकर मेरी डोरे अपनी डॉक्यूमेंट्री ‘She’s Beautiful When She’s Angry‘ (जब वह गुस्से में होती है तो वह खूबसूरत होती है) साल 2014 में बनाई। यह फ़िल्म अमेरिका में दूसरी लहर के रूप में शुरू हुए साल 1966 से साल 1971 तक के महिला मुक्ति आंदोलन की तमाम घटनाओं और उपलब्धियों को बयां करती नज़र आती है। इस फ़िल्म में तीस से अधिक कार्यकर्ताओं की टिप्पणियां शामिल हैं, जिन्होंने महिला आंदोलन को आगे बढ़ाने में मदद की।

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यह फ़िल्म अमेरिकी महिला मुक्ति आंदोलन के दौरान उन विरोध प्रदर्शनों, महिला संगठनों के भाषणों और महत्वपूर्ण घटनाओं की क्लिप को भी दिखाती चलती है, जो वर्तमान में स्त्री और पुरुषों को लैंगिक भेदभाव और अधिकारों के प्रति जागरूक करते हैं। इसमें हमें अमेरिका के अलग-अलग शहरों जैसे ऑस्टिन (टेक्सस), न्यूयॉर्क, शिकागो, अटलांटिक सिटी, वाशिंगटन डीसी, बॉस्टन और सैन फ्रांसिस्को में महिला मुक्ति आंदोलन देखने को मिलते हैं।

फ़िल्म नारीवादियों के विचारों और मुद्दों को साल 2014 और साल 1966-1971 के आंदोलन से जोड़ती चलती है। नारीवादियों का मानना है कि महिला आंदोलनों से पहले महिलाओं की क्या स्थिति थी हम इससे अनजान नहीं हैं। वे तय नहीं कर सकती थीं कि उन्हें क्या पहनना है क्या नहीं क्योंकि उन्हें सुंदर और सुडौल ही दिखना चाहिए था। उन्हें शादी करनी है या नहीं, बच्चे पैदा करना है या नहीं सब पुरुष तय करते थे। उन्हें सिर्फ और सिर्फ ख़ुद को पुरुष की नज़र से गढ़ी हुई स्त्री ही बनना था। जहां उन्हें खूबसूरत और ज्यादा खूबसूरत दिखते रहना था मिस अमेरिका जितनी खूबसूरत। इसी खूबसूरती के चलते महिलाएं अपने शरीर के साथ कितने ही अत्याचार करती रहीं।

इस आंदोलन के ज़रिए प्रदर्शनकारी महिलाओं ने उनके लिए बनाए गए सौंदर्य प्रसाधनों और सौंदर्य प्रतियोगिताओं जैसे मिस वर्ल्ड और मिस अमेरिका को चुनौती देते हुए ‘ऑल वीमेन आर ब्यूटीफुल’ का नारा दिया। उनका मानना था कि महिलाओं का सबसे अधिक शोषण मिस अमेरिका जैसी सौंदर्य प्रतियोगिताओं में होता है जहां उन्हें केवल ‘सेक्स ऑब्जेक्ट’ के रूप में ही परोसा जाता है।

यह फ़िल्म अमेरिका में दूसरी लहर के रूप में शुरू हुए साल 1966 से 1971 तक के महिला मुक्ति आंदोलन की तमाम घटनाओं और उपलब्धियों को बयां करती नज़र आती है। इस फ़िल्म में तीस से अधिक कार्यकर्ताओं की टिप्पणियां शामिल हैं, जिन्होंने महिला आंदोलन को आगे बढ़ाने में मदद की।

दूसरे चरण के नारीवादी आंदोलन के शुरू होने और बढ़ने का मुख्य कारण था पहले चरण के नारीवादी आंदोलन के वोट देने के अधिकार का महिलाओं की समस्याओं और समाज के पूर्वाग्रह को बदलने में असफल होना। एक कारण यह भी था कि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जो पुरुष युद्ध सेना में शामिल हो गए थे उनकी जगह महिलाओं ने नौकरी करना शुरू किया था लेकिन युद्ध समाप्ति के बाद महिलाओं को हटाकर वापस पुरुषों को नौकरी दी जाने लगी। लेकिन अब महिलाएं उसी घरेलू महिला के तौर पर घर की चारदीवारी में वापस जाने और अपनी थोड़ी बहुत मिली आज़ादी को खोने को तैयार नहीं थीं। इसी ने 1960 के दशक में महिला मुक्ति आंदोलन की दूसरी लहर की शुरुआत की जो लगभग 1980 तक चलता रहा।

यह फ़िल्म आंदोलन के जरिए दिखाती है कि इसका उद्देश्य अच्छी नौकरी या किसी कानून को पा लेने के अलावा समान शिक्षा, समान वेतन, लैंगिक समानता, जन्म नियंत्रण के लिए अबॉर्शन और गर्भनिरोधक गोलियों से होनेवाली स्वास्थ्य सम्बंधी बीमारियों के प्रति महिलाओं को जागरूक करना, स्त्री यौनिकता पर अपनी बात रखना, स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार और यौन शोषण के खिलाफ और तमाम नागरिक अधिकारों को लेकर मुद्दों पर अपनी बात रखना था। इसने आंदोलन को वूमेन लिब्रलाइजेशन (महिला उदारीकरण) के तौर पर आगे बढ़ाया।

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तस्वीर साभार: Netflix USA

प्रदर्शनों पर चर्चा करते हुए आगे फ़िल्म में देखते हैं कि रूथ रोसेन और कई अन्य महिला कार्यकर्ता अपनी विश्वविद्यालय की डिग्री जलाती हुई दिखती हैं। उन्होंने महिलाओं के मुद्दों पर शिक्षा की कमी का विरोध करते हुए “द फ्रीडम ट्रैश कैन” आंदोलन के बीच रखा जिसमें कई महिलाओं ने मैक्सी पैड और ऊंची एड़ी के जूते के साथ-साथ अपनी ब्रा भी जला दी। फ़िल्म दिखाती है कि किस प्रकार नारी मुक्ति आंदोलन के मुद्दों पर पुरुष प्रतिक्रियाएं देते हैं। कोई कहता है, “मुझे नहीं पता कि महिलाएं क्या मांग रहीं हैं, मानो मैं उन्हें देना चाहता हूँ।“ तो कोई अपनी पत्नी से कहता है, “तुम्हें आराम करना चाहिए स्वीटी, क्योंकि जो कुछ भी वे मांग कर रहीं हैं, वह तुम्हारे लिए नहीं है।” पुरुषों द्वारा टेलीविजन स्क्रीन और विरोध मार्चों में महिलाओं को घर में रहने और अति संवेदनशील होने की हिदायतें दी गईं।

फ़िल्म यह भी दिखाती है कि दूसरी लहर में अमेरिकी नारी मुक्ति आंदोलन जहां ज़मीनी स्तर पर सड़कों पर पितृसत्ता को टक्कर दे रहा था तो वहीं विभिन्न महिला संगठनों, लेखिकाओं, पत्रकारों, कलाकार, सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षक, दार्शनिक, डॉक्टर, छात्र, घरेलू महिलाएं, कामकाजी महिलाएं अपने-अपने स्तर पर आंदोलन को मजबूत कर रहीं थीं। साहित्य सृजन के स्तर पर नारीवादी साहित्य लिखा जा रहा था, जहां साल 1963 में प्रकाशित बेट्टी फ्रीडान की किताब ‘द फेमिनिन मिस्टिक’ ने नारीवादी आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जिसने महिलाओं को उनके अधिकारों और उनके साथ हो रहे लैंगिक भेदभाव के प्रति जागरूक किया। इसे पढ़ने के बाद कई महिलाओं ने पाया कि जिन क्षेत्रों में वे काम करती हैं वहां उन्हें पुरुषों के मुकाबले अधिक काम करवा कर भी कम वेतन दिया जाता था। कई जगहों पर लिंग के आधार पर महिलाओं को नौकरी के लिए अयोग्य ठहरा दिया गया। यह किताब उन्हें समझने में मदद करती है कि वे किस तरह की महिलाएं हैं और किस तरह उन्हें होने की जरूरत है।

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केट मिलेट की ‘सेक्सुअल पॉलिटिक्स’ (1968) किताब ने महिला आंदोलन की एक वैचारिक पृष्ठभूमि तैयार की। उन्होंने ‘पर्सनल इज़ पॉलिटिकल’ की अवधारणा देते हुए राजनीति की एक नई परिभाषा गढ़ी जिसे लैंगिक राजनीति कहा गया। उनका कहना था कि राजनीति का अर्थ केवल राजनेताओं से नहीं है बल्कि यह ताकत और सत्ता सरंचना है जो पारिवारिक रिश्तों में भी काम करती है, जो समाज में एक वर्ग को श्रेष्ठ तो दूसरे को हीन बनाती है। मेरी डेली और शुलमिथ फायरस्टोन जो अमेरिकन रैडिकल फेमिनिस्ट के तौर पर जानी जाती हैं कि किताब ‘द चर्च एण्ड द सेकण्ड सेक्स (1968) और ‘द डायलेक्टिव ऑफ सेक्स’ (1970) ने भी नारीवादी आंदोलन को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। अमेरिकी नारीवादियों की तरह ही फ्रांस में सिमोन द बोउवर की द सेकंड सेक्स और आस्ट्रेलिया में जर्मन ग्रीयर (बधिया स्त्री) जैसी लेखिकाओं ने नारीवादी आंदोलन को विश्व में नया मुकाम दिया।

फ़िल्म ‘शीज़ ब्यूटीफुल व्हेन शीज़ एंग्री’ में विभिन्न महिला संगठनों ने अमेरिकी महिला मुक्ति आंदोलन को सफलता तक ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जिनमें अपिटी वूमेन यूनाइट संगठन जिसमें महिलाएं विच के रूप में WITCH (women’s international conspiracy from hell!) यानी नरक से महिलाओं की अंतरराष्ट्रीय साजिश! जहां महिलाएं सड़कों पर विच ड्रेसिंग में पुरुषों को हैक्स कास्टिंग यानी कंट्रोल करती नज़र आती हैं। यौन उत्पीड़न के प्रति महिलाओं को जागरूक करने के लिए कार्ला जे ने अन्य लोगों के साथ मिलकर राष्ट्रीय ओगल दिवस (National Ogle Day) की स्थापना की।

इसके अलावा सुसान ग्रिफिन ने ‘शेमलेस हसी’ कविता प्रकाशन कंपनी की शुरुआत की और महिला पत्रिकाओं ‘इट्स इज़ नॉट मी बेब’ और सेल 16 सहित महिला मुक्ति आंदोलन को आगे बढ़ाया जिसमें कई नारीवादी राजनीतिक कॉमिक्स शामिल थे। वहीं, समलैंगिकता के मुददों को समाज और आंदोलन में रखने के लिए ‘लैवेंडर मेनस’ नामक संगठन ने भूमिका निभाई।

जर्मन ग्रीयर अपने नारीवादी लेखनी के माध्यम से फ्रायड के स्त्री आखिर चाहती क्या है के प्रश्न का उत्तर देती नज़र आती हैं। वे कहती हैं-“आज़ादी, वे आज़ादी चाह सकती हैं। आज़ादी, आंखों में आंखें डालकर देखते इंसान की बजाय देखी जा रही चीज़ होने से। संकोच से आज़ादी…आज़ादी तकलीफ़ देह कपड़ों से जिनका पहना जाना मर्दों को गुदगुदाने के लिए जरूरी है। उन जूतों से आज़ादी जो हमें छोटे कदम लेने पर मजबूर करते हैं।”

फिल्म में आगे महिलाओं को प्रजनन स्वास्थ्य शिक्षा और शारिरिक सरंचना के प्रति जागरूक करने के लिए ‘बोस्टन वीमेंस हेल्थ बुक कलेक्टिव’ प्रजनन स्वास्थ्य संगठन की स्थापना की गई। उन्होंने कैम्ब्रिज, प्रकाशित मेसाचुसेट्स में ‘मेसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी’ में छात्रों को हस्तमैथुन,रजोनिवृत्ति, मासिक धर्म, गर्भावस्था, पोषण और महिलाओं के स्वास्थ्य जैसे विषयों पर महिलाओं के लिए अनौपचारिक शिक्षा पाठ्यक्रम पढ़ाया। साल 1969 में इस संगठन ने सामूहिक रूप से महिलाओं के स्वास्थ्य के मुददों के बारे में पुरस्कार विजेता पुस्तक-‘आवर बॉडीज आवरसेल्फ’ को प्रकाशित किया जिसकी 40वीं वर्षगांठ में दुनियाभर की महिलाओं ने एक मंच पर अपने विचार साझा किए जहां उन्होंने बताया कि कैसे इस पुस्तक और महिला मुक्ति आंदोलन ने महिलाओं को उनके शरीर और स्वास्थ्य को समझने में जागरूक किया। 

वहीं, आगे फ़िल्म महिला मुक्ति आंदोलन में बलात्कार और यौन हिंसा के मुददों पर चर्चा करती है जहां रोज़ेन डनबर महिलाओं को आत्मरक्षा प्रशिक्षण देने के साथ ही ‘टेक बैक द नाइट’ जैसे अभियानों से महिलाओं को अंधेरे के बाद कि सुरक्षा के बारे में जागरूक करने के लिए उन्होंने सड़कों पर रात में मार्च प्रदर्शन किए। इनके अलावा ब्लैक वूमेन लिबरेशन, लेस्बियन लिबरेशन फ्रंट वूमेन, रैडिकल वूमेन लिबरेशन, द शिकागो वुमेन्स लिबरेशन रॉक बैंड जैसे संगठनों और वियतनाम युद्ध के दौरान शांति आंदोलन ने कई अलग-अलग तरह के लोगों को आपस में आंदोलन समूह के रूप में इकट्ठा किया।

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आगे फ़िल्म 1969 और 1970 के दशक की शुरूआत में अमेरिका में अबॉर्शन के मुद्दे पर ध्यान केंद्रित करती है, जहां अबॉर्शन पर 1973 के वैध कानून बनने से पहले अवैध अबॉर्शन की वजह से हर साल हजारों महिलाओं को अस्पतालों में भर्ती कराया जाता था। हर साल पाँच हजार से अधिक की मौत हो जाती थी। साथ ही ये महिला संगठन जन्म नियंत्रण के लिए उच्च खुराक वाली एस्ट्रोजन गर्भनिरोधक गोलियों से स्वास्थ्य पर होने वाले गम्भीर परिणामों पर चर्चा करती दिखाई देती हैं जहां वे इन गर्भनिरोधक गोलियों के अधिक सेवन से बाल झड़ने और कैंसर जैसी गम्भीर समस्याओं का मुद्दा उठाती हैं। इसी के परिणामस्वरूप FDA ने बाद में इन गर्भनिरोधक गोलियों के दुष्प्रभावों और सम्भावित स्वास्थ्य परिणामों का विवरण शामिल करने का निर्णय लिया।

फ़िल्म में आगे हम देखते हैं कि 26 अगस्त 1970 को न्यूयॉर्क शहर के स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी के आसपास किस तरह सेक्सवाद का विरोध करने और महिला मुक्ति आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए 50,000 महिलाओं का समूह हड़ताल करते हुए दिखाई देता है। जहां सार्वजनिक प्रदर्शन में महिलाओं ने स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी के तले बड़े बैनर लटकाए, जिन पर लिखा था, “विश्व की महिलाएं एकजुट हो।” इस विरोध की तस्वीरें और फुटेज  दुनियाभर में फैल गए और बैनर की छवियां उस महीने की टाइम पत्रिका में छपी थी।

1970 में स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी के सामने हुआ प्रदर्शन, तस्वीर साभार: Jack Manning/The New York Times

यह फ़िल्म इक्कीसवीं सदी में महिलाओं के मुददों पर समाप्त होती है जहां साक्षात्कारकर्ता बताते हैं कि आंदोलन के बाद काफी बदलाव आए जहां स्त्री-पुरुषों ने एक साथ माता-पिता की जिम्मेदारियों को साझा किया। महिलाओं को करियर को आगे बढ़ाने की स्वतंत्रता मिली। इंटरनेट पर प्रजनन संबंधी जानकारी की पहुंच अंतहीन थी। हालांकि, अबॉर्शन की समस्या की लड़ाई लगातार अब भी जारी है। फ़िल्म साक्षात्कार और फुटेज की एक श्रृंखला के साथ कई चीजों का विवरण देती चलती है जो उस समय महिलाओं के लिए दुर्गम थी। फ़िल्म ‘शीज़ ब्यूटीफुल व्हेन शीज़ एंग्री’ ने दिसम्बर 2014 में न्यूयॉर्क शहर में शुरुआत की और शिकागो, वाशिंगटन डीसी और पूरे कैलिफोर्निया सहित देशभर में प्रदर्शित की गई। फ़िल्म निर्माताओं ने कई रेडियो और टॉक शो साक्षात्कारों में भी भाग लिया। साथ ही यह फ़िल्म विभिन्न कॉलेजों में प्रदर्शित की गई। कनाडा,आस्ट्रेलिया, तुर्की, दक्षिण कोरिया, आयरलैंड और स्पेन जैसे अन्य देशों के फ़िल्म समारोहों में भी इसे शामिल किया गया। 2018 तक यह फ़िल्म नेटफ्लिक्स पर सबसे ज्यादा देखी जाने वाली फिल्मों में शामिल हो चुकी थी।

आखिर में ‘शीज़ ब्यूटीफुल व्हेन शीज़ एंग्री’ फ़िल्म में महिला मुक्ति आंदोलन की सफलता को इसी से समझा जा सकता है कि किस तरह आगे जर्मन ग्रीयर अपने नारीवादी लेखनी के माध्यम से फ्रायड के स्त्री आखिर चाहती क्या है के प्रश्न का उत्तर देती नज़र आती हैं। वे कहती हैं-“आज़ादी, वे आज़ादी चाह सकती हैं। आज़ादी, आंखों में आंखें डालकर देखते इंसान की बजाय देखी जा रही चीज़ होने से। संकोच से आज़ादी…आज़ादी तकलीफ़ देह कपड़ों से जिनका पहना जाना मर्दों को गुदगुदाने के लिए जरूरी है। उन जूतों से आज़ादी जो हमें छोटे कदम लेने पर मजबूर करते हैं।”

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तस्वीर साभार: Al Jazeera

मैं दिल्ली से हूँ,  दिल्ली विश्वविद्यालय से  हिंदी साहित्य में एमए किया है। साहित्य और आलोचनाएं पढ़ने के साथ-साथ, कविताएं और लेख लिखना, फिल्में देखना, गाने सुनना और किसी मुद्दे पर अपनी बात रखना बेहद पसंद है। कहने को बहुत कुछ पर लिखने के लिए शब्द नहीं।

 

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