इंटरसेक्शनलशरीर हमारा समाज योनि और स्तनों को हमेशा इतना सेक्सुअलाइज़ क्यों करता है?

हमारा समाज योनि और स्तनों को हमेशा इतना सेक्सुअलाइज़ क्यों करता है?

स्त्री की देह पर उसका अपना ही अधिकार नहीं है। उसकी देह पर धर्म, परिवार, बाज़ार, मीडिया और क़ानून का कब्जा है। हमारे समाज में स्त्री का शरीर उपनिवेश है और सत्ता, ताकत, राजनीति और अर्थतंत्र इसका इस्तेमाल करते हैं।

हमारे समाज में महिला स्वास्थ्य का मुद्दा हमेशा बैकफुट पर रहता है। महिलाओं का स्वास्थ्य उनके जीवन के हर एक पहलु पर प्रभाव डालता है। लेकिन दशकों तक महिलाओं के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं और मुद्दों को गर्भावस्था और प्रसव में दी जानेवाली मातृ स्वास्थ्य सेवाओं तक ही जोड़कर देखा जाता रहा है। ये सेवाएं जरूरी हैं लेकिन ये केवल महिलाओं को, मां की भूमिका तक ही देख पाती हैं। केवल बच्चे पैदा करने की क्षमता को छोड़कर महिलाओं का स्वास्थ्य तथा उनसे संबंधित दूसरी ज़रूरतों, समस्याओं को कम महत्व दिया जाता है। ख़ास तौर पर जब बात उनके निजी अंगों की होती है। उनके अंगों जैसे स्तन, वजाइना आदि को इतना सेक्सुअलाइज़ किया गया है कि महिलाएं इस पर बात करने से कतराती हैं। इससे जुड़ी समस्याओं के लिए डॉक्टर के पास जाने से कतराती हैं।

स्तनों को सेक्सुअलाइज़ किया जाना

स्तन औरतों के शरीर का ही एक हिस्सा है। अगर कोई पुरुष अपनी शर्टलेस तस्वीर पोस्ट करता है तो इससे किसी को कोई आपत्ति नहीं होती है वहीं जब एक स्त्री अपनी टाॅपलेस तस्वीर पोस्ट करें तो उसे गालियों और अपशब्दों से भर दिया जाता है। स्तन का उद्देश्य क्या है? क्या यह विपरीत लिंग को लुभाने के लिए है? अपने शरीर का प्रदर्शन करने के लिए? स्तनों को हमारे समाज में इतना सेक्सुअलाइज बना दिया गया है कि महिलाएं इससे जुड़ी बीमारियों को लेकर भी खुल कर बात नहीं कर पाती हैं।

स्त्री की देह पर उसका अपना ही अधिकार नहीं है। उसकी देह पर धर्म, परिवार, बाज़ार, मीडिया और क़ानून का कब्जा है। हमारे समाज में स्त्री का शरीर उपनिवेश है और सत्ता, ताकत, राजनीति और अर्थतंत्र इसका इस्तेमाल करते हैं। स्तन, जिसे न केवल भारत बल्कि पश्चिमी देशों में भी स्त्री की सुंदरता और आकर्षण से जोड़कर देखा जाता है। हमारे समाज में महिलाओं के लिए समुद्र तटों पर, फिल्मों में और विज्ञापन आदि में छोटे कपड़े और लो-कट टॉप पहनना, स्तन दिखाना आम बात है। फिल्मों में, विज्ञापनों में स्तन को लोगों को आकर्षित करने के लिए दिखाया जा रहा है।

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स्त्री की देह पर उसका अपना ही अधिकार नहीं है। उसकी देह पर धर्म, परिवार, बाज़ार, मीडिया और क़ानून का कब्जा है। हमारे समाज में स्त्री का शरीर उपनिवेश है और सत्ता, ताकत, राजनीति और अर्थतंत्र इसका इस्तेमाल करते हैं।

स्त्री निर्मिति में सुजाता लिखती हैं, “बाज़ार अपनी तरह से स्त्री देह का इस्तेमाल करता है। किसी ऑटो-एक्सपो में एक कार को घेरे सुन्दरियां मानव नहीं, देह हैं। सौन्दर्य प्रसाधनों के विज्ञापन और फिल्में एक ऐसे संसार में ले जाती हैं, जहां स्त्री की देह ‘टू-बी-लुक्ड-एट-नेस’ यानी खुद को देखे जाते हुए देखने की अभ्यस्तता से ग्रस्त है; यानी जैसा तुम मुझे देखना चाहते हो, मैं वैसी हूं और वैसे देखे जाते हुए मैं प्रसन्न हूं। वहां उस स्त्री में से एक सहज मनुष्य गायब है। वह पुरुष दृष्टि से आत्म- निरीक्षण करती है। वह खुद को देखे जाते हुए देखती है। इससे अनभिज्ञ, अपनी ही देह की असहाय दर्शक हो जाती है।”

भारत जैसे देश में महिलाओं में खुद के स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह रवैया होता है। स्तनों को इतना सेक्सुअलाइज किए जाने की वजह से इस पर बात नहीं कर पाना, सलाह न लेने की आदत और जागरूकता की कमी के कारण उन्हें कई गंभीर बीमारियों का सामना करना पड़ता है। उदाहरण के तौर पर स्तन कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से बचने के लिए जागरूकता होना और इस सब पर खुलकर बातें करना बहुत ज़रूरी है। रिसर्च और आंकड़े बताते हैं कि ज्यादातर स्तन कैंसर के मामलों में महिलाओं के इस बात का एहसास ही देर से होता है कि उन्हें किसी खतरनाक बीमारी ने जकड़ रखा है।

यहां हम फ़िल्म डायरेक्टर और पटकथा लेखक ताहिरा कश्यप का उदाहरण ले सकते हैं, जिन्होंने ब्रेस्ट कैंसर होने का पता चलने पर अपने पति अभिनेता आयुष्मान खुराना से तलाक लेने का फैसला कर लिया था लेकिन आयुष्मान ने उनका साथ नहीं छोड़ा और वे ब्रेस्ट कैंसर को हराकर फिर से मुख्यधारा में लौटी। रिकवरी के बाद उन्होंने इंस्टाग्राम पोस्ट में इस बारे में खुलकर लिखा और साथ ही टॉपलेस फ़ोटो शेयर करते हुए सर्जरी से हुए निशान को खूबसूरत बताया।

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कुछ दिन पहले अमेरिका में एक लड़की ने अपने अंडरवियर का एक विडियो शेयर किया। इस अंडरवियर का बीच के भाग का रंग उड़ा हुआ था। इस लड़की ने इस विडियो में सवाल किया कि क्या आपको ये देखकर डर नहीं लगता कि वजाइना इतनी ‘ऐसिडिक’ है कि अंडरवियर का रंग उड़ गया। इस वीडियो को देखने के बाद हजारों लड़कियों ने कमेंट किया कि उनके साथ भी बिल्कुल ऐसा ही होता है। लेकिन उन्हें पता नहीं था कि ये नाॅर्मल है।

वजाइना को शेम और सेक्सुअलाइज करना

हमारे समाज में वजाइना या योनि पर खुल कर बात नहीं होती है। इसको इतना सेक्सुअलाइज कर दिया गया है कि लोगों को इसके बारे में बात करने में असहजता महसूस होती है। इस अंग को सीधे तौर पर शर्म और टैबू से जोड़ दिया गया है। इसके कारण वजाइना से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं के बारे में भी न ही हम किसी को बता पाते हैं और न इसके बारे में हमें ज्यादा जानकारी होती है। इससे जुड़ी शर्म और सेक्सुअलाइजेशन के कारण हम अपनी समस्याओं को नज़रअंदाज़ कर देते हैं।

कुछ दिन पहले अमेरिका में एक लड़की ने अपने अंडरवियर का एक विडियो शेयर किया। इस अंडरवियर का बीच के भाग का रंग उड़ा हुआ था। इस लड़की ने इस विडियो में सवाल किया कि क्या आपको ये देखकर डर नहीं लगता कि वजाइना इतनी ‘ऐसिडिक’ है कि अंडरवियर का रंग उड़ गया। इस वीडियो को देखने के बाद हजारों लड़कियों ने कमेंट किया कि उनके साथ भी बिल्कुल ऐसा ही होता है। लेकिन उन्हें पता नहीं था कि ये नाॅर्मल है। उन लोगों ने लिखा कि उन्हें इतनी शर्म आती थी कि उन्होंने अब तक किसी से ये तक नहीं पूछा कि क्या यह नाॅर्मल है या नहीं?

सोचिए ये हाल प्रगतिशील और खुले विचारों का देश माने जानेवाले अमेरिका का है, जहां हमें लगता है हर चीज़ पर खुलकर बातें होती हैं। देश कोई भी हो भारत या अमेरिका, जब बात महिलाओं के सेहत को लेकर आती है तो खुलकर बातें कहीं नहीं होती हैं। यह बहुत ज़रूरी है कि हम इन सब मुद्दों पर बातें करें। स्तन और वजाइना को इतना सेक्सुअलाइज न करें कि इसपर लोग बात करने में असहज महसूस करें और उन्हें कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़े। लोगों को इससे संबंधित जानकारी से अवगत कराएं और ऐसी घिसी-पिटी पितृसत्तात्मक और रूढ़ीवादी धारणा को तोड़ें। ये धारणाएं न सिर्फ महिलाओं को अपने शरीर के प्रति असहज करती हैं बल्कि उन्हें मूलभूत स्वास्थ्य सुविधाओं से भी दूर करती हैं।

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तस्वीर : श्रेया टिंगल फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

About the author(s)

Saumya

मेरा नाम सौम्या है। मैं मूलतः बिहार से हूँ। भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) से हिन्दी पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद अब मीडिया में काम कर रही हूँ। नारीवाद को ज़मीनी स्तर पर समझने में मेरी हमेशा से रुचि रही है, खासतौर पर भारतीय नारीवाद को। भारतीय समाज में मौजूद रूढ़िवादिता, धर्म, जाति और वर्ग आधारित भेदभाव, लैंगिक असमानता आदि को गहराई से समझना और उन पर काम करना चाहती हूँ। यहाँ दर्ज लेख इस तरफ उठाया गया एक कदम है। खाली समय में फूल-पत्ती चुनना, चाँद-तारे निहारना पसंद है।

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