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1930 के दशक को याद करते हुए हमारे दिमाग में महात्मा गांधी के आंदोलनों का पूरा इतिहास दौड़ने लगता है। जो दर्ज कर लिया जाए, मुख्यधारा में स्थापित हो जाए वही आनेवाली पीढ़ियों के लिए इतिहास होता है। लेकिन ‘स्थापित इतिहास’ के आसपास भी बहुत कुछ साथ-साथ घट रहा होता है जिसे जानना उतना ही ज़रूरी है जितना कि स्थापित इतिहास को। इसी 1930 में एक सत्याग्रह बाबा साहब भीमराव आबेंडकर ने शुरू किया था। यह सत्याग्रह नासिक के कालाराम मंदिर में दलितों (उस दौर में अछूत का संबोधन इस्तेमाल में था) के प्रवेश को लेकर था। मंदिर में दलितों के प्रवेश के लिए यह एक बड़ा आंदोलन ज़रूर था लेकिन पहला नहीं। इससे पहले 1874 में मद्रास में दलितों ने मीनाक्षी मंदिर में प्रवेश के लिए संघर्ष किया था लेकिन सफलता नहीं मिली थी। साल 1924 में पेरियार ने वेकौम में मंदिर प्रवेश के लिए सत्याग्रह किया था। साल 1928 में अमरावती में अंबादेवी मंदिर में घुसने के लिए सत्याग्रह किया गया था और अक्टूबर 1929 में पुणे में पार्वती मंदिर में घुसने के लिए सत्याग्रह किया गया था। जाति व्यवस्था के सबसे निचले पायदान पर रखे गए दलितों का मंदिर प्रवेश सत्याग्रह सिर्फ मंदिर में घुसने भर का संघर्ष नहीं था। यह समान अधिकार के लिए था, उस अधिकार के लिए था जो एक ही धर्म में होते हुए सवर्णों के पास था लेकिन दलितों के लिए नहीं। 

समान अधिकार की लड़ाई को आगे बढ़ाते हुए 2 मार्च 1930 को नासिक के कालाराम मंदिर में घुसने के लिए बाबा साहब ने सत्याग्रह शुरू किया। इसमें उनके साथ मुख्य तौर पर दादासाहेब गायकवाड, सहस्त्र बुद्धे, देवराव नाइक, डीवी प्रधान, बालासाहेब खरे, स्वामी आनंद, अमृत राव, पीएन राजभोग शामिल थे। इस दौरान 15 हजा़र लोग इस सत्याग्रह में शामिल हुए जिसमें औरतें भी बड़ी संख्या में शामिल थीं। सभा अयोजित करते हुए बाबा साहेब ने कहा था, “आज हम मंदिर में प्रवेश करने वाले हैं। मंदिर में जाने से हमारी सारी समस्याएं ख़त्म नहीं हो जाएंगी। हमारी समस्याएं सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और शैक्षणिक हैं।”

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आगे उन्होंने कहा था, ”कालाराम मंदिर में प्रवेश करना सवर्ण हिन्दुओं के लिए चुनौती से कम नहीं थी। सवर्णों ने हमारी पीढ़ियों के हक़ मारे हैं। हम अपने अधिकारों की मांग कर रहे हैं। क्या सवर्ण हिन्दू हमें एक मनुष्य के तौर पर स्वीकार करेंगे या नहीं? कालाराम मंदिर में आंदोलन से यह साफ़ हो जाएगा।” बाबा साहब ने सभी आंदोलनकारियों से यह साफ़ अनुरोध किया था कि सत्याग्रह अहिंसक रहेगा, हिंसा नहीं होनी चाहिए। सभी आंदोलनकारी चार टुकड़ियों में बंटे और मंदिर के चारों दरवाज़ों की और बढ़े लेकिन सवर्ण हिंदुओं और पुलिस ने पूरे मंदिर को घेर रखा था ताकि कोई दलित मंदिर में प्रवेश न कर सके। इसी मध्य सवर्ण हिंदुओं की ओर से पत्थरबाज़ी शुरू हुई जिसमें कई दलित घायल हुए, एक की मौत भी हुई। बाबा साहब पर लोगों ने छतरी तान दी थी जिसकी वजह से उन्हें बहुत चोटें नहीं आई थीं।

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इस सत्याग्रह को तकरीबन 91 बरस बीत चुके हैं, संविधान लागू हुए सत्तर वर्ष से ज्यादा का समय बीत चुका है लेकिन बीते 22 सितंबर 2021 को कर्नाटक के एक मंदिर में दो वर्ष का दलित बच्चा मंदिर में घुसा तो पूरे मंदिर को धोया गया और बच्चे के परिवार पर पच्चीस हज़ार का जुर्माना लगाया गया।

एक महीने आंदोलन चलाने के दौरान 9 अप्रैल 1930 की रामनवमी के लिए सवर्ण हिंदुओं और बाबा साहब के नेतृत्व में आंदोलनकारियों के बीच यह समझौता हुआ कि रामनवमी में दलितों द्वारा भी रथ खींचा जाएगा लेकिन रामनवमी के दौरान ब्राह्मणों ने ही रथ गायब कर दिया था ताकि दलित, राम के रथ को छू न सकें। सवर्ण हिंदुओं को रथ गायब करना मंजूर रहा लेकिन दलितों द्वारा रथ का छूना नहीं। जाति व्यवस्था का इससे भी क्रूर चेहरा रहा है और अब तक है। इस सत्याग्रह के परिणाम यह भी रहे कि जहां तक इस सत्याग्रह की खबर फैली, उस हर जगह दलितों का बहिष्कार शुरू किया गया, उन्हें कामों से निकाला गया, पढ़ाई केंद्रों से निकाला गया, उनका राशन पानी रोका गया। तमाम मुश्किलों से गुजरते हुए भी यह सत्याग्रह पांच साल तक चला था। इस दौरान बाबा साहब को राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस में शामिल होने के लिए लंदन जाना पड़ा जिस बीच सत्याग्रह की कमान दादासाहब गायकवाड ने संभाली हुई थी। वेलीवेदा में छपे लेख के अनुसार महात्मा गांधी ने यंग इंडिया में एक लेख में इस सत्याग्रह को लेकर लिखा कि इस मंदिर प्रवेश सत्याग्रह को दलितों को छोड़ देना चाहिए। 

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3 मार्च 1934 को बाबा साहब ने भावराव गायकवाड़ को एक पत्र लिखा था जिसमें उन्होंने इस आंदोलन को वापस लेने की बात की थी। उसी पत्र का एक हिस्सा यह है।

“आनेवाले रामनवमी के दिन नासिक के कालाराम मंदिर में सत्याग्रह शुरू करने वाले दलित वर्गों के औचित्य के बारे में आपने मुझसे बहुत दया से पूछा है। मेरे पास यह कहने की कोई स्थिति नहीं है कि इस तरह का कदम काफी अनुचित होगा और इसे न केवल निलंबित किया जाना चाहिए बल्कि पूरी तरह से रोक दिया जाना चाहिए। यह अजीब और आश्चर्यजनक लग सकता है कि जिसने यह सत्याग्रह पैदा किया वही यह लिख रहा है। लेकिन मैं इस मोर्चे के बदलाव की घोषणा करने से डरता हूं। मैंने मंदिर प्रवेश आंदोलन इसलिए शुरू नहीं किया क्योंकि मैं चाहता था कि दलित वर्ग उन मूर्तियों के उपासक बनें जिनकी उन्हें पूजा करने से रोका गया था या बल्कि क्योंकि मेरा मानना ​​था कि मंदिर में प्रवेश उन्हें समान सदस्य और हिंदू समाज का अभिन्न अंग बना देगा। जहां तक ​​मामले के इस पहलू का संबंध है, मैं दलित वर्गों को सलाह दूंगा कि वे हिंदू समाज का अभिन्न अंग बनने के लिए सहमति देने से पहले हिंदू समाज और हिंदू धर्मशास्त्र को पूरी तरह से बदलने पर जोर दें। मैंने मंदिर में प्रवेश सत्याग्रह केवल इसलिए शुरू किया क्योंकि मुझे लगा कि यह दलित वर्गों को सक्रिय करने और उन्हें उनकी स्थिति के प्रति जागरूक करने का सबसे अच्छा तरीका है। जैसा कि मेरा मानना ​​है कि मैंने वह उद्देश्य हासिल कर लिया है, मंदिर में प्रवेश के लिए मेरा कोई उपयोग नहीं है।  मैं चाहता हूं कि दलित वर्ग अपनी ऊर्जा और संसाधन को राजनीति और शिक्षा पर केंद्रित करें और मुझे उम्मीद है कि वे दोनों के महत्व को समझेंगे।”

यह तय है कि दलितों के जीवन का, संघर्ष का एक मात्र लक्ष्य मंदिर के प्रांगण में बैठना नहीं है लेकिन जो धर्म, जो लोग अपने फायदे के वक्त दलितों को हिंदू साबित करने में लगे रहते हैं, उनके मंदिर, भगवान, धर्मशास्त्र इन्हीं दलितों के छूने पर ‘अपवित्र’ हो जाते हैं।

यह पत्र जैसे ही भाऊराव गायकवाड़ को मिला उन्होंने सत्याग्रह को ख़त्म करने का इशारा किया। आखिरकार मंदिर में दलितों को प्रवेश नहीं मिला। आज़ादी के बाद संविधान लागू होने के बाद दलितों को इस मंदिर में प्रवेश मिला। बाबा साहब इस सत्याग्रह से दलितों को उनकी स्थिति से परिचित करवाना चाहते थे कि उनका जाति व्यवस्था में क्या स्थान है और कैसे हिंदू धर्म में, सवर्ण हिंदुओं में सुधार की गुंजाइश नहीं है इसीलिए न सिर्फ सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक बल्कि धार्मिक बदलाव की बात भी बाबा साहेब ने दलितों के उत्थान के लिए अहम मानी। इस सत्याग्रह को तकरीबन 91 बरस बीत चुके हैं, संविधान लागू हुए सत्तर वर्ष से ज्यादा का समय बीत चुका है लेकिन बीते 22 सितंबर 2021 को कर्नाटक के एक मंदिर में दलित बच्चा मंदिर में घुसा तो पूरे मंदिर को धोया गया और बच्चे के परिवार पर पच्चीस हज़ार का जुर्माना लगाया गया। यह सिर्फ़ एक घटना नहीं है, गूगल करने पर मंदिर में घुसने के लिए हत्याएं तक की गईं हैं। 

यह तय है कि दलितों के जीवन का, संघर्ष का एक मात्र लक्ष्य मंदिर के प्रांगण में बैठना नहीं है लेकिन जो धर्म, जो लोग अपने फायदे के वक्त दलितों को हिंदू साबित करने में लगे रहते हैं, उनके मंदिर, भगवान, धर्मशास्त्र इन्हीं दलितों के छूने पर ‘अपवित्र’ हो जाते हैं। उन्हें ठीक सवर्ण हिंदुओं जैसे अधिकार प्राप्त नहीं है। इस सत्याग्रह का नतीजा यह भी रहा कि जब दलितों को हिंदू फोल्ड में अपना स्थान समझ आया है तब वे मंदिर जैसी संस्थान से कहीं हद तक दूर हुए हैं, शिक्षा पर ज़ोर दिया है। इससे एक आंकलन यह भी निकलता है कि किसी भी सत्याग्रह, आंदोलन का होना ‘बेकार’ नहीं जाता है, वह आंदोलनकारियों की मानसिकता में बड़े बदलाव कर रहा होता है, आस-पास बिछे पूरे तंत्र को चुनौती दे रहा होता है। जैसे कालाराम मंदिर प्रवेश सत्याग्रह न सिर्फ मंदिर में घुसने भर के लिए था बल्कि सवर्ण हिंदुओं को चुनौती भी थी और अंग्रेजों को भी यह दिखाना था कि संगठित लोग अपने अधिकारों की लड़ाई बड़े पैमाने पर हमेशा लड़ सकते हैं। 

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तस्वीर साभार: Veliveda

स्रोत:
बीबीसी हिंदी
Ambedkar Inspire
Veliveda

मेरा नाम आशिका शिवाँगी सिंह है, फिलहाल मिरांडा हाउस कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातक कर रही हूँ। मैं उस साहित्य और राजनीति की पक्षधर हूँ जो शोषितों की पक्षधर है। रोज़मर्रा के जीवन में सवाल करना, नई-नई आर्ट सीखना, व्यक्तित्व में लर्निंग-अनलर्निंग के स्पेस को बढ़ाना पसंद है।

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