गरीबी, रोज़गार, स्वास्थ्य जैसे मुद्दों को नज़रअंदाज़ कर बाल विवाह जैसी समस्या का कोई समाधान नहीं
तस्वीर साभार: IP Leaders
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चित्रसेनपुर गाँव की रहनेवाली क़रीब बीस वर्षीय रन्नो के तीन बच्चे हैं। उसके सबसे बड़े बेटे की उम्र आठ वर्ष, दूसरे बेटे की उम्र छह वर्ष और तीसरी बेटी की उम्र क़रीब तीन साल है। रन्नो को अपनी उम्र का कोई अंदाज़ा नहीं है। बचपन में ही माता-पिता के गुजरने के बाद उसकी दादी ने उसका लालन-पालन किया। रन्नो ने कभी स्कूल का भी मुंह नहीं देखा। ग़रीबी के चलते कम उम्र में उसकी शादी कर दी गई। आधार कार्ड में उसकी उम्र बीस वर्ष लिख दी गई, जिससे उसे सरकारी योजनाओं का लाभ मिल सके। दो साल पहले रन्नो के पति ने उसे घर से निकाल दिया है। अब वह चित्रसेनपुर गाँव में यानी की अपने मायके में रह रही है। कभी छोटी-मोटी मज़दूरी का काम करके तो कभी भीख मांगकर वह अपने बच्चों का पेट पालने को मजबूर है।

अपने बच्चे के साथ रन्नो, तस्वीर साभार: रेणु

रन्नो की जल्दी शादी को लेकर जब उसकी दादी से हमने बात की उन्होंने बताया, “हम लोग गरीब हैं। कोई रोज़गार नहीं है और न ही रहने को घर है। दो वक्त के खाने के लिए हम लोगों को रोज़ सोचना पड़ता है। गाँव में हम लोगों की स्थिति ख़राब है और बस्ती में पुरुष नशा भी करते हैं। आसपास के बस्ती वाले भी महिलाओं पर बुरी नज़र रखते हैं। अब अगर समय से हम लोगों ने लड़कियों की शादी नहीं की तो लड़कियों के साथ कोई भी ऊंच-नीच होती है तो फिर उनसे कोई शादी के तैयार नहीं होगा। इसलिए हम लोग लड़कियों की शादी जल्दी कर देते हैं।”

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रन्नो, पूजा, सोनी जैसी कई लड़कियां हमारे आस-पास हैं जिनकी शादी कच्ची उम्र में कर दी जाती है। उन्हें हर मौके से दूर कर दिया जाता है। कलम-किताब थामने की उम्र उनके हाथ में चूल्हा-चौका और घर की ज़िम्मेदारी का भार दे दिया जाता है। ज़मीनी सच्चाई यही है कि आज भी अलग-अलग गाँव में ऐसी कई बस्तियां हैं जहां आज भी लड़कियों की शादी उनके बालिग़ होने से पहले कर दी जाती है।

लड़कियों की जल्दी शादी करने के लेकर जब मैंने वहां की कुछ किशोरियों से बात की तो पूजा (बदला हुआ नाम) ने बताया, “हम लोगों के यहां सभी औरतों की शादी जल्दी हो जाती है। जब हम लड़कियां खाना बनाना सीख लेती हैं तो हम लोग की शादी कर देते हैं घरवाले।” इसी बस्ती में रहनेवाली तेईस वर्षीय सोनी बस्ती में बाल विवाह को लेकर बताती हैं कि बस्ती में लड़कियों की शादी कच्ची उम्र में ही कर दी जाती है पर लड़कों की शादी बालिग़ होने पर ही करते हैं। शादी के समय तो लड़कियों को शादी का मतलब भी पता नहीं होता है। आगे वह कहती हैं, “जब मेरी शादी हुई थी मुझे यही बताया गया था कि शादी के बाद तुम्हें रहने को घर मिलेगा और दो वक्त का अच्छा खाना मिलेगा और लोग अच्छे-अच्छे कपड़े भी देंगे पहनने को। खाना, कपड़ा और छत के सपने के लिए ज़्यादातर लड़कियों की शादी की जाती है। इसलिए हंसते हुए लड़कियां शादी के तैयार हो जाती हैं।”

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रन्नो, पूजा, सोनी जैसी कई लड़कियां हमारे आस-पास हैं जिनकी शादी कच्ची उम्र में कर दी जाती है। उन्हें हर मौके से दूर कर दिया जाता है। कलम-किताब थामने की उम्र उनके हाथ में चूल्हा-चौका और घर की ज़िम्मेदारी का भार दे दिया जाता है। ज़मीनी सच्चाई यही है कि आज भी अलग-अलग गाँव में ऐसी कई बस्तियां हैं जहां आज भी लड़कियों की शादी उनके बालिग़ होने से पहले कर दी जाती है।

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बदलते समय के साथ हमारे ग्रामीण इलाके में बाल-विवाह को सही बताने के लिए सरकार की योजनाओं में रास्ते तलाशते लोगों ने आधार कार्ड को इसका अहम ज़रिया बनाया है, जिसमें अक्सर उम्र को ऊपर-नीचे करके लिखा जाता है, जिससे काग़ज़ी तौर पर बाल-विवाह को प्रमाणित करना मुश्किल हो जाता है। कम उम्र बच्चों को जन्म देने से पैदा होनेवाले कमज़ोर बच्चों से लेकर कुपोषित और अल्पविकसित माताओं के आंकड़े जब सामने आते हैं तब तक बहुत देरी हो चुकी होती है।

नैशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के मुताबिक उत्तर प्रदेश में हर पांच में से एक लड़की की शादी छोटी उम्र में ही कर दी जाती है। बाल-विवाह बचपन को ख़त्म कर देता है ये बच्चों को शिक्षा और विकास के हर अवसर से दूर कर देता है। कम उम्र में शादी बच्चों के मानसिक, शारीरिक और सामाजिक स्थिति को अंदर ही अंदर खोखला करने का काम करती है।

बाल विवाह एक सामाजिक कुप्रथा है, जिसपर रोक लगाने के लिए सन् 1929 में बाल विवाह पर रोक संबंधित क़ानून पारित किया गया था। इसमें शादी के लिए लड़कियों की उम्र कम से कम 18 साल और लड़कों की उम्र 21 साल तय की गई। इसके बाद हाल ही में, केंद्र सरकार ने प‍िछले द‍िनों ‘बाल विवाह निषेध संशोधन बिल’ संसद में पेश किया है। इसमें महिलाओं की शादी की उम्र 18 साल से बढ़ाकर 21 साल करने का प्रस्ताव है। साल 1929 में पास हुए विधेयक से लेकर आज के संशोधन के प्रस्ताव के बीच में अगर हम लोग ग्रामीण क्षेत्रों की बात करें तो वास्तविकता यही है कि सालों पहले बना क़ानून भी अब तक बाल-विवाह पर लगाम नहीं लगा पाया है। ऐसे में लड़कियों की शादी की उम्र को बढ़ाना कितना प्रभावी कदम होगा इसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

शिक्षा, रोज़गार, विकास, समानता और अधिकार जैसे शब्दों को सरोकार में लाने के दौर की कड़वी सच्चाई है, जिसे हम न चाहते हुए भी नकार नहीं सकते हैं। इसके लिए ज़रूरी है कि बाल-विवाह जैसी कुरीति पर लगाम लगाने के लिए ग्रामीण स्तर पर प्रयास किए जाए और उन पर रोक लगाई जाए, क्योंकि बाल-विवाह एक बच्चे की नहीं बल्कि एक पूरी पुश्त की ज़िंदगी को प्रभावित कर देता है।

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तस्वीर साभार: IP Leaders

रेनू वाराणसी ज़िले के रूपापुर गाँव की रहने वाली है। ग्रामीण महिलाओं और किशोरियों के साथ समुदाय स्तर पर रेनू बतौर सामाजिक कार्यकर्ता काम भी करती हैं और अपने अनुभवों व गाँव में हाशिएबद्ध समुदाय से जुड़ी समस्याओं को लेखन के ज़रिए उजागर करना इन्हें बेहद पसंद है।

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