जेल की दीवारों के पीछे महिला कैदियों की दुर्दशा का कड़वा सच
तस्वीर साभार: The Statesman
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हमारे देश में महिलाओं को एक बराबर के नागरिक का दर्जा कभी नहीं दिया गया है। गाहे-बगाहे उन्हें नीचे दिखाने का कोई भी मौक़ा हाथ से नहीं जाने दिया जाता है। जीवन के हर पड़ाव पर महिलाओं को भेदभाव का सामना करना पड़ता है। पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं को पारंपरिक रूप से निचले पायदान पर रखा गया है। ऐसे में जब एक महिला को अपराधी घोषित किया जाता है या जिसे दोषी ठहराया जाता है और सजा दी जाती है, तो उसकी स्थिति अकल्पनीय हो जाती है। वैसे तो भारतीय संविधान ने और भारतीय क़ानून ने महिला क़ैदियों को कई अधिकार दिए हुए हैं लेकिन इन सबके बावजूद वे जेल में बहुत सारी मुश्किलों और परेशानियों का सामना करती हैं।

महिला कैदी जिन समस्याओं का सामना करती हैं, वे अंतहीन हैं और उनकी कई समस्याएं अनसुलझी हैं। पुलिस और जेल अधिकारियों के हाथ में व्यापक शक्तियां हैं, इसके परिणामस्वरूप उनके मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है। भारतीय संविधान और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में निहित प्रावधानों के बावजूद महिला कैदियों के अधिकारों का उल्लंघन बढ़ता जा रहा है। भारत ने समय-समय पर कारागार सुधारों का कार्य किया है, लेकिन न्याय के पुनर्स्थापनात्मक सिद्धांतों और इसके कार्यक्रमों के संदर्भ में लाभ पूर्ण रूप से महिला कैदियों तक नहीं पहुंच पाता। 

भारतीय जेलों में महिला कैदियों की संख्या साल दर साल बढ़ रही है। अधिकांश महिला कैदी 30-50 वर्ष के आयु वर्ग में हैं। भारतीय जेलों में महिलाओं को जिन समस्याओं का सामना करना पड़ता है, उनमें शारीरिक और मानसिक दोनों तरह की समस्याएं शामिल हैं। इन समस्याओं में भीड़भाड़, सफाई और स्वच्छता, खराब स्वास्थ्य स्थिति और पोषण, गर्भावस्था और बच्चों की देखभाल, शिक्षा की कमी और हिंसा शामिल हैं।

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मुफ्त कानूनी मदद का अभाव 

आमतौर पर अधिकतर महिला अपराधी समाज के आर्थिक और सामाजिक रूप से वंचित तबके से आती हैं। ‘महिलाओं का अपराध करना और उनका कारावास में लंबे समय तक रहना, ‘इन दोनों का महिलाओं की गरीबी से गहरा संबंध है। गरीबी के कारण महिलाएं छोटे अपराधों के लिए जुर्माना न देने या ज़मानत की राशि का भुगतान में असमर्थता के कारण सज़ा पूरी होने के बावजूद जेल में रहने को मजबूर हैं। वैसे तो हमारे संविधान में मुफ्त कानूनी सलाह और मदद दोनों का प्रावधान है, परन्तु अभी भी ऐसी बहुत सी महिला क़ैदी हैं जो अभी तक इन सब अधिकारों से दूर हैं।

महिला जेलों में कैदियों के लिए सुविधाएं नदारद

द वायर पर प्रकाशित हुए जान्हवी सेन की एक रिपोर्ट के अनुसार अपराजिता बोस कहती हैं, “45 महिलाओं को एक इतने छोटे कमरे में रखा जाए कि उस कमरे को केवल एक बल्ब और एक पंखे की जरूरत हो, ऐसी योजना कोलकाता में प्रेसीडेंसी सुधार गृह के अधिकारियों ने बनाई। उन्होंने योजना बनाई कि महिलाओं के शरीर को मापें और सोने के लिए उसी आकार का क्षेत्र निर्धारित करें।” भीड़भाड़ भारतीय जेलों की प्रमुख समस्याओं में से एक है। भीड़भाड़ का सीधा संबंध कैदियों के लिए जगह की कमी से है और जेलों में अधिक क़ैदियों के आने से पहले से ही सीमित सुविधाओं पर दबाव और अधिक बढ़ जाता है। यहाँ तक ​​कि जिन जेलों में भीड़भाड़ कोई गंभीर मुद्दा नहीं है, फिर भी वहाँ पर कई मामलों में आवास अपर्याप्त पाया जाता है। NCRB द्वारा जारी की गयी PRISON REPORT के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2020 तक राष्ट्रीय स्तर पर सभी जेलों में कुल अधिभोग (निवास) दर 118.0% थी जबकि पुरुष, महिला और ट्रांस समुदाय से आनेवाले कैदियों के लिए अधिभोग दर क्रमशः 121.3%, 72.2% और 636.4% थी।

पुरुष, महिला और ट्रांस समुदाय के लोगों लिए राष्ट्रीय स्तर पर केंद्रीय जेलों में अधिभोग दर वर्ष 2020 के अंत में क्रमशः 114.5%, 91.7% और 375.0% थी, जिसमें कुल अधिभोग दर 113.6% थी। सभी प्रकार की जेलों में पुरुष के लिए जिला जेलों में अधिभोग दर उच्चतम (139.1%) थी, जबकि महिलाओं के लिए अधिभोग दर (94.9%) थी। राष्ट्रीय स्तर पर ज़िला जेलों में कुल अधिभोग दर भी सभी प्रकार की जेलों में सबसे अधिक (136.5%) थी। उप-जेलों में, पुरुष (110.6%) के लिए अधिभोग दर महिला (30.1%) की तुलना में बहुत अधिक थी। राष्ट्रीय स्तर पर उप-जेलों में कुल अधिभोग दर 102.9% थी। महिला जेलों में अधिभोग दर (50.1%) थी और खुली जेलों में कुल अधिभोग दर 49.5% थी। जेल में भीड़भाड़ के कारण कैदियों को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है- सफाई, देखभाल, स्वच्छता, सोने की उचित जगह आदि।

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पीरियड्स स्वच्छता 

पीरियड्स स्वच्छता एक बड़ी समस्या और समय की ज़रूरत है क्योंकि इसके के बिना महिलाओं को कई बीमारियां हो जाती हैं। जेल की हालत ये है कि अंदर मौजूद क़ैदियों को सीमित सेनेटरी नैपकिन वितरित किए जाते हैं। द वायर को ही एक क़ैदी ने बताया कि अधिक पैड्स की ज़रूरत पड़ने पर उन्हें कॉटन और ‘गौज बैंडेज’ दे दी जाती है जिससे क़ैदी अपने लिए पैड्स खुद तैयार करती हैं। गंदगी के निपटान के लिए, टॉयलेट में केवल एक बैग था, और इसे हर दिन ठीक से साफ नहीं किया जाता था।

आमतौर पर अधिकतर महिला अपराधी समाज के आर्थिक और सामाजिक रूप से वंचित तबके से आती हैं। ‘महिलाओं का अपराध करना और उनका कारावास में लंबे समय तक रहना’ – इन दोनों का महिलाओं की गरीबी से गहरा संबंध है। गरीबी के कारण महिलाएं छोटे अपराधों के लिए जुर्माना न देने या ज़मानत की राशि का भुगतान में असमर्थता के कारण सज़ा पूरी होने के बावजूद जेल में रहने को मजबूर हैं।

केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की साल 2018 की एक रिपोर्ट में इस समस्या का उल्लेख किया गया है और कहा गया है कि कुछ जेलों में महिलाओं से सैनिटरी नैपकिन के लिए कथित तौर पर पैसे लिए जाते हैं या ज़रूरत के बावजूद उन्हें केवल एक महीने में पैड्स एक निर्धारित संख्या में दिए जाते हैं। इसके कारण महिलाएं कपड़ा, राख, पुराने गद्दे के टुकड़े, समाचार पत्र जैसी चीज़ों का सहारा लेती हैं’।

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इलाज का अभाव

भारतीय जेलों में पर्याप्त चिकित्सा सुविधाओं का अभाव है। महिला कैदियों के लिए जिन्हें स्त्री रोग विशेषज्ञों और अन्य विशेषज्ञों के साथ नियमित परामर्श की ज़रूरत होती है, यह एक जटिल समस्या है। साल 2016 के मैनुअल में कहा गया है कि प्रत्येक महिला जेल में कम से कम एक महिला स्त्री रोग विशेषज्ञ के साथ चिकित्सा सुविधाएं होनी चाहिए, लेकिन कई जिलों में अभी तक इसे लागू नहीं किया गया है।

केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की 2018 की एक रिपोर्ट में इस समस्या का उल्लेख किया गया है और कहा गया है, “संबंधित राज्य नियमावली में निर्धारित नियमों के बावजूद, कैदियों का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य अक्सर पीड़ित होता है। कई मामलों में, अस्पतालों में महिला वार्ड और महिला चिकित्सा अधिकारी विशेष रूप से स्त्री रोग विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं हैं।”

ख़राब खाना 

कई बार जेलों में दिया जाने वाला खाना खाने योग्य नहीं होता। क़ैदी आमतौर पर फलों, सब्जियों और प्रोटीन की न्यूनतम दैनिक सुझाई गई मात्रा को भी प्राप्त नहीं करते हैं। इसके अतिरिक्त, इनको परोसे जाने वाले भोजन से उनके बीमार होने की संभावना अधिक होती है। भोजन अक्सर पौष्टिक रूप से अपर्याप्त और असुरक्षित रूप से तैयार किया जाता है, और आम जनता के विपरीत, जिन लोगों को कैद में रखा जाता है, उनके पास उस भोजन के बारे में बहुत कम या कोई विकल्प नहीं होता है जो वे खाते हैं। जेल मेनू के अलावा, व्यक्तियों के पास एकमात्र अन्य विकल्प जेल कैंटीन है, जो नाश्ते के भोजन और पेय की पेशकश के मामले में एक सुविधा स्टोर के समान है। पौष्टिक भोजन तक पहुंच के बिना, जिन लोगों को कैद में रखा जाता है, उन्हें मधुमेह और हृदय रोग जैसी पुरानी बीमारियों के विकसित होने या उनकी मौजूदा स्वास्थ्य स्थितियों को बदतर बनाने का जोखिम होता है।

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भारतीय क़ानून महिलाओं को गरिमा के साथ जीवन व्यतीत करने का अधिकार देता है फिर चाहे वह जेल में ही क्यों न हो लेकिन जेल की चार दीवारी के पीछे कौन सी गरिमा कुचली जा रही है इसका पता केवल तब चलता है जबकि झेलनेवाला खुद मुंह खोलता है।  

जेल के बंदियों में असमानता

भारत में यह सामान्य सी बात है कि अधिकारी सभी कैदियों के साथ समान व्यवहार नहीं करते हैं। कई सालों में ऐसी कई रिपोर्टें आई हैं कि जिन कैदियों के पास पैसा और/या राजनीतिक दबदबा है उनके साथ जेल में अन्य क़ैदियों की तुलना में बेहतर व्यवहार किया जाता है। इसके आलावा भी महिला जेलों में महिलाओं के संभावित जेल के अनुभव में वर्ग, जाति, धर्म और राष्ट्रीयता का बड़ा प्रभाव है।

भारतीय जेलों में ज्यादातर महिलायें गरीब पृष्ठभूमि की हैं। अमीर पृष्ठभूमि की एक महिला, चाहे जो भी आधार हो, आम तौर पर जेल में सभी विशेषाधिकारों का लाभ उठाती है। इसका एक उदाहरण राज्यसभा सदस्य के. कनिमोझी जिनको हाई प्रोफाइल 2जी स्पेक्ट्रम मामले में शामिल होने के आधार पर तिहाड़ जेल भेजा गया था। उसने अदालत में गुहार लगाई कि उसे जमानत मिलनी चाहिए क्योंकि वह एक महिला और एक माँ हैं और उन्हें 28 नवंबर, 2011 को जमानत दी गई थी। छह महीने से अधिक की न्यायिक हिरासत में, उन्हें महिला वर्ग में एक अलग सेल दिया गया था, जो सुसज्जित था। उसमें बिस्तर, टेलीविजन जैसी सुविधाएं शामिल थीं।

नियम पुस्तिकाओं में सब कुछ अच्छी तरह लिखा हुआ है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब इसे सहन करने वाला व्यक्ति बोलता है या कोई और अपने अधिकारों के लिए खड़ा होता है। जेल नियम के अनुसार महिला सेल को पुरुष सेल से कुछ दूरी पर और अलग होना चाहिए लेकिन भारतीय जेलों की दयनीय स्थिति यह है कि अधिकतर महिला कैदियों को पुरुषों की जेलों के भीतर छोटे-छोटे सेल में रखा जाता है। इन सब दिक्कतों के आलावा भी और भी बहुत सी परेशानियां और दिक्कतें हैं जो कि महिला क़ैदियों को झेलनी पड़ती हैं। भारतीय क़ानून महिलाओं को गरिमा के साथ जीवन व्यतीत करने का अधिकार देता है फिर चाहे वह जेल में ही क्यों न हो लेकिन जेल की चार दीवारी के पीछे कौन सी गरिमा कुचली जा रही है इसका पता केवल तब चलता है जबकि झेलनेवाला खुद मुंह खोलता है।  

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तस्वीर साभार: The Statesman

दिल्ली विश्वविद्यालय से लॉ की डिग्री ली फिर जामिया से LLM किया। एक ऐसे मुस्लिम समाज से हूं, जहां लड़कियों की शिक्षा को अधिक महत्त्व नहीं दिया जाता था लेकिन अब लोग बदल रहे हैं। हालांकि, वे शिक्षा तो दिला रहे हैं, मगर सोच वहीं है। कई मामलों में कट्टर पितृसत्तात्मक समाज वाली सोच। बस इसी सोच को बदलने के लिए लॉ किया और महिलाओं और पिछड़े लोगों को उनके अधिकार दिलाने की ठानी। समय-समय पर महिलाओं को उनके अधिकारों से अवगत कराती रहती हूं। स्वतंत्र शोधकर्ता हूं, वकील हूं, समाज-सेवी हूं। सबसे बड़ी बात, मैं एक मुस्लिम हूं।

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