नरगिसः भारतीय सिनेमा की वो अदाकारा जिनका नाम ही काफी हैं।
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कंधे पर हल थामे, पारंपरिक वेषभूषा में माँ का एक ऐसा किरदार है जो अपने बच्चे को पालती-पोसती है लेकिन ज़रूरत पड़ने पर उसी औलाद को मारने से भी नहीं कतराती है। हम बात कर रहे हैं भारत की पहली ऑस्कर अवॉर्ड के लिए नामित फिल्म ‘मदर इंडिया’ के मुख्य किरदार की भूमिका निभानेवाली अदाकारा नगरिस की। फिल्म ‘मदर इंडिया’ से निकली नरगिस की छवि भारतीय सिनेमा जगत की एक ऐसी छवि बन गई जिसे सिनेमा के चाहने वाले हर पीढ़ी में पसंद करते हैं। अदाकारी, स्टाइल और पर्दे पर हर किरदार को जीवंत करने वाली नरगिस ने भारतीय सिनेमा जगत के योगदान से न केवल देश में बल्कि विदेशों में भी प्रशंसा हासिल की है। 

नरगिस की गिनती भारतीय सिनेमा के इतिहास में प्रतिष्ठित अदाकाराओं में होती है जिन्होंने अपने दमदार अभिनय के कारण करियर में कई उपलब्धियां हासिल की हैं। नरगिस को अधिकतर उनकी फिल्मों की वजह से जाना जाता है। लेकिन एक अभिनेत्री के अलावा वह एक नेता भी थी। वह मानवीय हित और सामाजिक कार्यों में हमेशा आगे रहती थीं।

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नरगिस ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत बाल कलाकार के तौर पर की थी। छह साल की उम्र में उन्होंने 1935 में रिलीज हुई फिल्म ‘तलाश ए हक’ में बाल कलाकार के तौर पर काम किया था। जिसमें क्रेडिट में नरगिस नाम का इस्तेमाल किया गया था।

शुरुआती जीवन

फातिमा राशिद का जन्म 1 जून 1929 में बंगाल प्रेजीडेंसी के कलकत्ता में एक पंजाबी मुस्लिम परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम उत्तमचंद मोहनचंद था जो इस्लाम धर्म अपनाने के बाद अब्दुल राशिद के नाम से जाने गए थे। वह मूलरूप से रावलपिंडी, पाकिस्तान के रहने वाले थे। उनकी माता का नाम जद्दनबाई हुसैन था जो बनारस की रहनेवाली थीं। वह एक हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायिका और भारतीय सिनेमा में काम करने वाली शुरुआती महिलाओं में से एक थी। इनके भाई का नाम अनवर हुसैन था, जो खुद एक फिल्मी कलाकार थे। नरगिस के घर में संगीत और नृत्य कला का माहौल था। उन्होंने अपने घर में ही इसकी पहली ट्रेनिंग मिली थी।

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नरगिस अपनी माँ जद्दनबाई के साथ तस्वीर साभारः dontcallitbollywood

बाल कलाकार के तौर पर की शुरुआत 

नरगिस ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत बाल कलाकार के तौर पर की थी। छह साल की उम्र में उन्होंने 1935 में रिलीज हुई फिल्म ‘तलाश-ए-हक़’ में बाल कलाकार के तौर पर काम किया था जिसमें क्रेडिट में नरगिस नाम का इस्तेमाल किया गया था। इस फिल्म में उनकी माँ ने संगीत देने के साथ-साथ अभिनय भी किया था। इस फिल्म के बाद नरगिस ने एक के बाद एक फिल्मों में काम करना शुरू कर दिया था। 1943 में 14 साल की उम्र में उन्होंने महबूब खान की निर्देशित फिल्म ‘तकदीर’ में काम किया। यह अपने समय की सफल फिल्मों में से एक थी। इस फिल्म में नरगिस के काम की खूब सराहना की गई थी।  

तकदीर के बाद 1945 में उनकी फिल्म ‘हुमायूं’ रिलीज हुई। इस फिल्म में उन्होंने उस समय के बड़े अभिनेता अशोक कुमार के साथ पर्दे पर जोड़ी के तौर पर काम किया था। इस पीरियड ड्रामा फिल्म ने उस समय बड़ी सफलता हासिल की थी। अब नरगिस का नाम उस दौर की स्थापित अभिनेत्रियों में गिना जाने लगा था। वह लगातार एक के बाद एक सफल फिल्मों में काम कर रही थी। 1948 में उनकी ‘मेला’, ‘अनोखा प्यार’ और ‘आग’ जैसी फिल्में रिलीज हुई। फिल्म ‘मेला’ में उन्होंने दिलीप कुमार के साथ काम किया था। यह फिल्म उस साल की सबसे ज्यादा कमाई करनेवाली फिल्मों में से एक थी।

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एक के बाद एक सफल फिल्मों का दौर

साल 1949 में रिलीज हुई महबूब खान की ‘अंदाज’ उनके करियर का बिग ब्रेक साबित हुई। इस फिल्म में उन्होंने दिलीप कुमार और राज कपूर जैसे कलाकारों के साथ काम किया। यह फिल्म एक बड़ी हिट हुई थी। इस फिल्म के बाद उन्होंने राजकूपर के साथ कई फिल्मों में लगातार काम किया। दस साल में उन्होंने राजकूपर के साथ सोलह फिल्मों में काम किया जिनमें से नौ आर. के. फिल्म के बैनर तले राजकपूर द्वारा बनाई गई थी। 

तस्वीर साभारः Indiatimes.com

‘अंदाज’ और ‘बरसात’ जैसी फिल्मों के बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और एक के बाद एक सफल फिल्मों का हिस्सा बनती रहीं। इसमें 1950 में दिलीप कुमार के साथ ‘बाबुल’ है। साल 1951 में रिलीज ‘आवारा’, 1953 में ‘आह’, 1955 में ‘श्री 420’, 1956 में ‘जागते रहो’ और ‘चोरी-चोरी’ जैसी फिल्मों में काम किया। ‘जागते रहो’ उनकी राज कपूर के साथ आखिरी फिल्म थी। फिल्म ‘आवारा’ में उनके काम ने न केवल भारत में बल्कि सोवियत यूनियन में भी प्रसिद्धि दिलाई थी। उन दिनों भारत की फिल्में रसियन में डब होकर दिखाई जाती थी। ‘आवारा’ सोवियत यूनियन में भारत की उस दौर की सबसे सफल फिल्मों में से एक मानी जाती है। 

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मदर इंडिया बनी भारत की सबसे ख़ास फिल्म

फिल्म मदर इंडिया का पोस्टर तस्वीर साभारः IMDb

साल 1957 में महबूब खान द्वारा निर्देशित फिल्म ‘मदर इंडिया’ रिलीज हुई। इस फिल्म ने भारतीय सिनेमा को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहचान दिलाई। यह भारत की पहली ऑस्कर नॉमिनेटिड फिल्म थी। नरगिस इस फिल्म में मुख्य किरदार में थी। फिल्म के लिए उन्होंने ‘फिल्म फेयर बेस्ट एक्ट्रेस अवार्ड’ अपने नाम किया था। मदर इंडिया में उनका दमदार अभिनय भारतीय सिनेमा के इतिहास में मील का पत्थर है जिसे सिने प्रेमियों के द्वारा वर्तमान में भी प्रंशसा मिलती है। इसके बाद उन्होंने फिल्म ‘घर-संसार’, ‘लाजवंती’, ‘नया दौर’, ‘सुजाता’ और ‘अदालत’ जैसी फिल्मों में काम किया। 

साल 1958 में नरगिस ने फिल्म अभिनेता सुनील दत्त के साथ शादी कर ली थी। शादी के बाद अपने परिवार को संभालने के लिए उन्होंने फिल्मों से कुछ समय के लिए ब्रेक लिया था। इन दोंनो की तीन संतान हैं। इनकी दो बेटी नम्रता दत्त और प्रिया दत्त के अलावा बेटे संजय दत्त हैं। शादी के बाद उन्होंने बहुत चुनिंदा फिल्मों में काम किया था। इसमें 1964 में सुनील दत्त द्वारा निर्मित ‘यादें’ एक थी। 1967 में रिलीज हुई ‘रात और दिन’ उनके फिल्मी करियर की आखिरी फिल्म थी। इस फिल्म के लिए उन्होंने कई पुरस्कार हासिल किए थे।

तस्वीर साभारः Twitter

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राजनीतिक पारी और विवाद

अभिनय जगत में दमदार पारी निभाने के बाद वह राजनीति में आई। तीन अप्रैल 1980 राष्ट्रपति के द्वारा उन्हें राज्यसभा के सदस्य के लिए नामांकित किया गया। यहां नरगिस ने अपनी पहले ही भाषण के कारण विवाद में घिर गई थी। सियासत डॉट.काम में छपे लेख के अनुसार नरगिस ने राज्यसभा में दिए भाषण में सत्यजीत रे को भारत की गरीबी का सौदागर करार दिया था जिसकी वजह से वह विवाद में आ गई थी। उन्होंने सत्यजीत रे द्वारा निर्देशित फिल्म ‘अप्पू ट्रायलाजी’ के ऊपर तर्क दिया था कि इस फिल्म में बंगाल के एक क्षेत्र को चित्रित किया है न केवल पूरे बंगाल को। यह फिल्म पूरे भारत की गरीबी का प्रतिनिधित्व नहीं करती है। 

उनका कहना था कि सत्यजीत रे की फिल्में पश्चिम में सफल होने का कारण है क्योंकि वहां के लोग भारत को खराब स्थिति में देखना चाहते हैं। वह उनकी आलोचना करने से भी नहीं घबराई उन्होंने कहा था, “वह केवल रे है न कि सूरज।” उनका कहना था कि यदि वह अपनी फिल्मों में भारत की गरीबी दिखा रहे हैं तो उन्हें बदलते भारत की तस्वीर भी दिखानी चाहिए। सत्यजीत रे की फिल्मों में भारत की गरीबी के चित्रण को लेकर दिए उनके बयानों पर फिल्म जगत के कई कलाकार उनके विरोध में सामने आए। उनके माता-पिता को निशाना बनाकर उन्हें कोठेवाली तक कहा गया।

तस्वीर साभारः Economictimes

सांस्कृतिक मंडली का किया गठन

फिल्मी योगदान के अलावा वह जन सरोकार के काम में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती थीं। ‘द क्विंट’ के मुताबिक उन्होंने सुनील दत्त के साथ मिलकर अजंता आर्ट कल्चर मंडली का गठन किया था जिसमें उस समय के बहुत से अभिनेता और गायक जुड़े हुए थे। यह मंडली भारतीय सैनिकों के मनोरंजन के लिए भारत के दूर क्षेत्रों में प्रस्तुति देती थी। इस मंडली ने 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद ढ़ाका में कार्यक्रम किया था। नरगिस ‘स्पास्टिक्स सोसाइटी ऑफ इंडिया’ की पहली संरक्षक भी थीं। 

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नरगिस ने अपने फिल्मी करियर में कई उपलब्धियां हासिल की हैं। जिसके लिए उन्होंने समय-समय पर प्रंशसा और सम्मान भी मिला। ‘मदर इंडिया’ में निभायी भूमिका के लिए उन्होंने पूरी दुनिया में वाहवाही बंटोरी थी। 1958 में ‘मदर इंडिया’ के लिए सर्वश्रेष्ट अभिनेभी के लिए फिल्म फेयर मिला। इसी साल भारत सरकार की ओर से उन्हें ‘पदम श्री’ से सम्मानित किया गया था।

उपलब्धियां और पुरस्कार

‘मदर इंडिया’ में निभाई भूमिका के लिए उन्होंने पूरी दुनिया में वाहवाही बंटोरी थी। 1958 में ‘मदर इंडिया’ के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए फिल्मफेयर मिला। इसी साल भारत सरकार की ओर से उन्हें ‘पदमश्री’ से सम्मानित किया गया था। वह भारत की पहली अभिनेत्री थीं जिन्हें यह सम्मान मिला था। 1958 में ही ‘मदर इंडिया’ के लिए ‘कॉर्लोवी वेरी इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल’ में बेस्ट एक्ट्रेस अवॉर्ड अपने नाम किया। 1968 में ‘रात और दिन’ के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित हुईं। 2001 में ‘स्टारडस्ट’ फिल्म मैगजीन की ओर से बेस्ट आर्टिस्ट ऑफ मिलेनियम अवार्ड मिला था। 

यही नहीं नरगिस दत्त की याद में मुंबई के ब्रांदा इलाके में एक सड़क का नाम है। नरगिस के सम्मान में भारतीय डाक ने 30 दिसंबर 1993 में एक डाक टिकट जारी किया था। इसके अलावा उनके 86वें जन्मदिन पर 1 जून 2015 में गूगल ने उनके काम को सेलिब्रेट करते हुए डूडल बनाया था। हिंदी फिल्मों में उनके योगदान के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों ने उनकी उपलब्धि पर राष्ट्रीय एकता पर सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म के लिए नरगिस दत्त पुरस्कार की स्थापना कर उन्हें सम्मानित किया। मात्र 51 साल की उम्र में नरगिस की मौत कैंसर की वजह से हुई थी। 2 मई 1981 में वह मुंबई के ब्रीज कैंडी हॉस्पिटल में कोमा में चली गई थी। 3 मई को उन्होंने हमेशा के लिए इस दुनिया को अलविदा कह दिया था।

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तस्वीर साभारः Times Of India

मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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