तवायफ़ और भारतीय सिनेमा 
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तवायफ़, नाच-गाना और कोठा ये सब भारतीय सिनेमा की कहानियों में दिखाया जानेवाला एक अहम हिस्सा रहा है। ‘नज़ाकत, खूबसूरती, संगीत, बैठक, शराब’ के साथ तवायफ़ों की छवि को सिनेमा में पेश किया जाता आ रहा है। समाज में तवायफ़ों की छवि स्थापित करने में सिनेमा ने एक बड़ी भूमिका निभाई है। तवायफ़ शब्द को कभी इस तथाकथित सभ्य समाज ने अच्छा नहीं माना जाता है। तवायफ़ों की छवि को नकारात्मक बनाने में भी सिनेमा का बड़ा हाथ है। फिल्म इंडस्ट्री में तवायफ़ के काम करने की शुरुआत कैसे हुई, फिल्में कैसे उनकी आय का एक ज़रिया बनीं हम इस लेख के माध्यम से जानने की कोशिश करेंगे।

शुरुआत में सामाजिक तौर पर फिल्म जगत को पेशे के रूप में एक अच्छा काम नहीं माना जाता था। विशेषतौर पर महिलाओं के लिए तो बिल्कुल भी सही नहीं देखा जाता था। शुरुआत में फिल्मों में महिलाओं का काम करना मना था। पुरुष ही महिला बनकर उनके किरदार निभाते थे। उस दौर में जब महिलाओं ने सिनेमा में काम करना शुरू किया तो सबसे पहले तवायफ़ों ने फिल्मों में काम करना शुरू किया था। 

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तवायफ़, एक अवधी शब्द है। अवध के शाही दरबार में 18वीं और 19वीं शताब्दी में एक अच्छी नाचने-गाने वाली वेश्या के लिए इस्तेमाल होता था। 19वीं शताब्दी से पहले यह कला और संस्कृति का मुख्य केंद्र हुआ करती थीं। शाही दरबारों में ये अपनी कला को प्रदर्शित करती थीं। इनका मुख्य काम संगीत और नृत्य से जुड़ा हुआ था। कथक, दादरी और ठुमरी की विरासत तवायफ़ों से ही मिली है। हालांकि, 1920 के समय में जैसे औपनिवेशिक विचार और रीति-रिवाज मजबूत होने शुरू हुए तवायफ़ों ने अपना काम खोना शुरू कर दिया। वे लंबे समय तक शाही घरानों में गाना गाकर और नाचकर अपनी जीविका कमाने में अक्षम होती जा रही थी। इस कारण उन्होंने दूसरे पेशों में काम करना शुरू कर दिया था। 

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तवायफ़ कही जानेवाली अधिकतर महिलाएं बॉम्बे (मुंबई) चली गई। उन्होंने अपना ठिकाना नयी-नयी स्थापित फिल्म इंडस्ट्री के पास बनाया। वे अपने साथ कथक, मुज़रा, गायन में दादरी और ठुमरी से अलग उर्दू में कविताएं भी ले गई थी। कला के इन सभी रूपों को तुरंत ही फिल्म इंडस्ट्री ने अपना लिया। यही वह समय था जब उन्होंने फिल्मों में काम करना भी शुरू कर दिया था। विस्थापित तवायफों का फिल्म इंडस्ट्री नया घर बन गई थी। वे अभिनेत्री, निर्माता और निर्देशक के रूप में काम करने लगीं। इससे पहले बोलती और बिना आवाज़ की फिल्मों में केवल पुरुष ही काम कर रहे थे।

‘नज़ाकत, खूबसूरती, संगीत, बैठक, शराब’ के साथ तवायफ़ों की छवि को सिनेमा में पेश किया जाता आ रहा है। समाज में तवायफ़ों की छवि स्थापित करने में सिनेमा ने एक बड़ी भूमिका निभाई है। तवायफ़ शब्द को कभी इस तथाकथित सभ्य समाज ने अच्छा नहीं माना जाता है। तवायफ़ों की छवि को नकारात्मक बनाने में भी सिनेमा का बड़ा हाथ है।

जद्दनबाई, फिल्म इंडस्ट्री में काम करने वाली शुरूआती महिलाओं में से एक नाम हैं। जद्दनबाई पहली महिला थीं जिन्होंने इंडस्ट्री स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने ‘संगीत मूवीटोन’ के नाम से अपना प्रोडक्शन हाउस स्थापित किया था। वह फिल्मों के लिए संगीतकार, निर्माता और निर्देशक का काम किया करती थीं।

जद्दनबाई, तस्वीर साभार: Cinestaan

जानी-मानी अभिनेत्री नर्गिस इनकी ही बेटी थीं। उन्होंने अपनी बेटी को भी नृत्य की शिक्षा दी थी। जद्दनबाई जैसी कई महिलाओं ने फिल्म इंडस्ट्री में अपने पुरुष सहयोगियों के साथ मिलकर निर्देशन, निर्माता, लेखन, गायक और गीतकार के तौर पर काम किया।  

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फिल्मों की कई विधाओं में तवायफ़ों ने सीधे-सीधे काम करना शुरू कर दिया था। इसमें संगीत का क्षेत्र सबसे बड़ा था। ये महिलाएं संगीत के नये-नये रूप सामने ला रही थीं। मलका जान और गौहर जान ने 1902 में भारत में सबसे पहले किसी गाने को रिकॉर्ड किया था। जद्दनबाई ने 1937 में ‘मोती का हार’ नाम का गाना एक फिल्म के लिए बनाया था। इस लिस्ट में सुल्ताना बिब्बो ( हफीज़ा बेगम, दिल्ली की प्रसिद्ध तवायफ़ की बेटी), जहांनारा कज्जन (लखनऊ तवायफ़ सुग्गन बाई की बेटी) जैसे नाम शामिल हैं।

जल्द ही तवायफों की संगीत संस्कृति को फिल्मों में दिखाने का चलन चल पड़ा। संगीतकारों ने कोठों के संगीत को बनाना शुरू कर दिया। उदाहरण के लिए प्रसिद्ध ‘मोहे पनघट पे नंदलाल छेड़ गयो रे’ गाना तवायफ़ों से लिया गया है। यह गाना 1960 में रिलीज हुई फिल्म ‘मुगल-ए-आज़म’ का हिस्सा बना। बहुत से संगीतकार हिंदी फिल्म के संगीत में सीधे-सीधे प्रसिद्ध तवायफ़ों के गानों को इस्तेमाल कर रहे थे जो उनकी महफिलों में गाए जाते थें। वर्तमान में भी म्यूजिक इंडस्ट्री में यह रवायत चल रही है।

साथ ही मशहूर फिल्म पाकीजा फिल्म का ‘इन्हीं लोगों ने’, ‘आज जाने की जिद न करो’, ‘हमरी अटरिया’ जैसे हिट गानों को सभी पंसद करते हैं। ये सभी गाने मूल रूप से तवायफ़ों के है। धीरे-धीरे तवायफ़ के संगीत के योगदान को भुला दिया गया। जो तवायफ़ें प्लेबैक सिंगर के तौर पर काम करती थीं उन्हें रेडियो स्टेशन में बैक एंट्रेस करने के लिए कहा गया। 

पाकीज़ा में मीना कुमारी, तस्वीर साभार: Facebook

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उसके बाद पाकीजा फिल्म का ‘इन्हीं लोगों ने’, ‘आज जाने की जिद न करो’, ‘हमरी अटरिया’ जैसे हिट गानों को सभी पंसद करते हैं। ये सभी गाने मूल रूप से तवायफ़ों के है। धीरे-धीरे तवायफ़ के संगीत के योगदान को भुला दिया गया।

यही नहीं अविवाहित तवायफ़ को एयर टाइम देने तक से मना कर दिया। जिन महिलाओं ने अपना काम आर्टिस्ट के तौर पर करना शुरू किया था उनके काम को नजरअंदाज करना शुरू कर दिया। इंडस्ट्री में अब उनके हिस्से फिल्मों में केवल उनके किरदार को इस्तेमाल करने तक सीमित कर दिया गया। लेकिन हिंदी सिनेमा में तवायफ़ों के संगीत और नृत्य को हर दौर में समय के साथ तालमेल करके इस्तेमाल किया जा रहा है।

फिल्मों में तवायफ़ के किरदार

साल 1959 में रिलीज हुई फिल्म बैंक मैनेजर, बेनजीर(1964), संघर्ष (1968), तवायफ़ और सलमा (1985) में तवायफ़ों के किरदार देखने को मिलें। धीरे-धीरे फिल्मों की रूपरेखा बदल गई थी। फिल्में हीरो प्रधान बन रही थी। फिल्मों में हीरोइन के किरदारों को भी बदल दिया गया था। बावजूद इन सबके फिल्मों में लगातार तवायफ़ के किरदार देखने को मिलते रहे। लगभग हर प्रमुख अभिनेत्री ने कम से कम एक बार तवायफ़ का रोल निभाया है। पाकीज़ा और उमराव जान के अवाला साधना (1958), चित्रलेखा (1964), ममता (1966) और खिलौना (1970) कुछ प्रमुख हिट रहीं।

नए दौर के सिनेमा में तवायफ़ के किरदार को बदल दिया गया है। हीरी-हीरोइन से अलग तवायफ़ या कोठेवाली महिला की एक नकारात्मक छवि भी दिखाई जा रही है। तवायफ़ के किरदार को कहानी में विलेन के तौर पर भी इस्तेमाल तक किया जाने लगा। फिल्म ‘देवदास’ में माधुरी दीक्षित ने तवायफ़ का किरदार निभाया। माधुरी दीक्षित के रोल ने मीना कुमार के ‘पाकीजा’ के बाद बड़ी प्रशंसा हासिल की। इसके अलावा फिल्म ‘मंडी’ के जरिये पर्दे पर तवायफ़ की कहानी भी कही गई। पर्दें पर रेखा, शबाना आज़मी, स्मिता पाटिल, तब्बू, ऐश्वर्या राय, विद्या बालन और करीना कपूर तवायफ़ के रूप देखी जा चुकी हैं। 

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तस्वीर साभारः You Tube

स्रोतः

Wikipedia

The Hindu

The World Of Apu

Indian Express

मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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