मोहनदास: कैसे भ्रष्ट व्यवस्था और जातिवादी समाज किसी की पहचान छीन लेते हैं!
तस्वीर साभार: IMDB
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क्या हो अगर आपसे आपका नाम, आपकी पहचान, पद यहां तक कि आपके असली अकादमिक सर्टिफिकेट तक हड़प लिए जाएं और कोई दूसरा व्यक्ति आपकी पहचान के साथ जी रहा हो। आज जब प्रशासनिक दफ्तरों में आपकी शारीरिक मौजूदगी से ज्यादा एक कागज़ ज़्यादा महत्वपूर्ण हो तब बिना अपने सर्टिफिकेट के कैसे आप ‘खुद’ को साबित करेंगे कि आप ही वह व्यक्ति हैं। कैसा महसूस होगा आपको? आपको शायद विश्वास न हो कि ऐसा कैसे हो सकता है? लेकिन मोहनदास फ़िल्म कुछ इसी तरह की घटना को दिखाती है, जहां फ़िल्म की शुरुआत ही अपने नाम और पहचान की लड़ाई से शुरू होती है। “गाड़ दो ज़िंदा गाड़ दो, मगर मेरी पहचान नहीं मिटा सकते। मैं ही मोहनदास रहूंगा। एक नहीं पचास बार कहूंगा, मैं ही मोहनदास हूं।” मोहनदास ब्राह्मणवादी, जातिवादी और भ्रष्ट व्यवस्था द्वारा छीन लिए गए एक व्यक्ति के नाम, पहचान, अपनी अस्मिता को वापिस लेने के संघर्ष के दर्द को दिखाती है।

यह फ़िल्म उदय प्रकाश की कहानी मोहनदास की पटकथा पर आधारित है जो विद्रोही रंगमंच कलाकार, अभिनेता और निर्देशक सफदर हाशमी को समर्पित करते हुए साल 2009 में मजहर कामरान के निर्देशन में बनाई गई थी जिसमें मुख्य कलाकार के रूप में सोनाली कुलकर्णी (मेघना सेनगुप्ता),नकुल वैद्य (मोहनदास), शरबनी मुखर्जी (कस्तूरी), सुशांत सिंह (विशनाथ अवस्थी), आदित्य श्रीवास्तव (हर्षवर्धन) और उत्तम हालदार (अनिल यादव) गोविंद नामदेव (मुक्तिबोध) जैसे कलाकारों ने काम किया है।

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फिल्म की कहानी

कहानी विकास की पहुंच से दूर मध्यप्रदेश के एक छोटे से पूरबन्द्रा गाँव के एक टोकरी-बुनकर के गरीब दलित समुदाय से आने वाले मोहनदास की है जिसका परिवार बांस की टोकरी बेचकर अपना पेट भरता है। मोहनदास बचपन से ही पढ़ने के प्रति मेहनती था और हर कक्षा में प्रथम आता था। वह एक अच्छी नौकरी करके अपने परिवार को अच्छा जीवन और सुविधाएं देना चाहता है। उसकी मेहनत से ही वह पूरे ज़िले में टॉप करता है और उसे ओरियंटल कोलमाइन्स में डिपो मैनेजर के अच्छे ओहदे पर नौकरी मिल जाती है। लेकिन उसे एक हफ्ते में अपॉइंटमेंट लेटर मिल जाने का कहकर उसके सभी असली दस्तावेज़ जमा करवा लिए जाते हैं।

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क्या हो अगर आपसे आपका नाम, आपकी पहचान, पद यहां तक कि आपके असली अकादमिक सर्टिफिकेट तक हड़प लिए जाएं और कोई दूसरा व्यक्ति आपकी पहचान के साथ जी रहा हो। आज जब प्रशासनिक दफ्तरों में आपकी शारीरिक मौजूदगी से ज्यादा एक कागज़ ज़्यादा महत्वपूर्ण हो तब बिना अपने सर्टिफिकेट के कैसे आप ‘खुद’ को साबित करेंगे कि आप ही वह व्यक्ति हैं। कैसा महसूस होगा आपको?

लेकिन कई महीने बीत जाने के बावजूद उसके पास कोई लेटर नहीं आता। कुछ महीने बाद उसे उसके दोस्त से पता चलता है कि उसके पद पर उसी के नाम से मोहनदास बनकर कोई दूसरा व्यक्ति नौकरी कर रहा है। जब वह छानबीन करता है कि कौन उसके नाम पर नौकरी कर रहा है तो उसे पता चलता है कि वह वही व्यक्ति है जो कक्षा में किसी न किसी विषय में फेल होता था। तथाकथित ऊंची जाति से आने वाला अयोग्य विशनाथ अवस्थी मोहनदास के हिस्से की सुविधाओं को हथिया कर बैठा हुआ है। मोहनदास के विरोध करने पर उसकी बुरी तरह पिटाई कर दी जाती है।जिसके बाद वह एक कमरे में बंद हो जाता है और किसी से बात नहीं करता। “बोल तू कौन है बे? तेरी पहचान है क्या? आज हम सब को बता तेरा नाम है क्या? कोई पहचान नहीं, कोई अरमान नहीं, इस हुकूमत से लडूं, इतना आसान नहीं। इसलिए मौन हूँ मैं। क्या पता कौन हूं मैं?” यह गाना मानो मोहनदास की मन की व्यथा को बता रहा हो।

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पत्रकार मेघना द्वारा मोहनदास से जुड़े सवाल करने पर उसकी माँ उन पर चिल्लाने लगती है, “सब जानत हैं ऊपर-नीचे, सब के सब मिले हुए हैं। कपटी कहीं के कोनों पर से भरोसा उठ गवा।” मोहनदास की मां की निराशा देखी जा सकती है। शिकायती दफ़्तर में उससे उसके मोहनदास होने के प्रमाण मांगे जाते हैं। वे प्रमाण जिन्हें किसी दूसरे व्यक्ति ने हथिया लिया है। मोहनदास कहता है, “मैं बैठा हूं हाड़मांस का आदमी, मगर ये कागज़ कहते हैं कि मैं वह नहीं हूं जो मैं हूं, मैं वह कागज़ कहां से लाऊं जो साबित कर सकें कि मैं मोहनदास बल्द काबादास हूं कि ‘मैं’ ही ‘मैं’ हूं।”

अंत तक आते-आते फ़िल्म में पत्रकार मेघना, वकील हर्षवर्धन और जज मुक्तिबोध के प्रयासों से मोहनदास को न्याय मिलता है और अपराधी जेल में डाल दिए जाते हैं। सबको लगने लगता है कि मोहनदास को उसका नाम, उसकी पहचान, पद सब कुछ वापस मिल जाएगा लेकिन शोषणकारी व्यवस्था अपने चंगुल से इतनी आसानी से किसी को निकलने नहीं देती। फ़िल्म में आगे एक वाक्य आता है- “we wish this was the end, it isn’t. the rest of the story is brief…”

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एक बार फिर वही क्रूर ब्राह्मणवादी व्यवस्था का खेल सबकुछ पलट देता है जहां देखते हैं कि हर्षवर्धन वकील की हत्या कर दी जाती है और मोहनदास से उसका नाम और पद हमेशा के छीन लिए जाते हैं जिसके कारण एक बार फिर मोहनदास हाशिए पर गुम हो जाता है। फ़िल्म का गाना, “अपनी खोई हुई पहचान कहाँ से लाऊं” मोहनदास की स्थिति को बयां करता है।  मोहनदास और उसका परिवार इस न्याय व्यवस्था और धूर्त मक्कारों की जीत के कारण उनकी धमकियों से परेशान होकर गाँव से दूर बियाबान इलाके में एक झोपड़ी में रहने लगता है। मेघना जब ढूंढते-ढूंढते उसके दरवाजे पर पहुंचती है तो वह उसके मुंह पर ये कहकर दरवाजा बंद कर देता है, “आप शायद गलत जगह आई हैं, यहां कोई मोहनदास नहीं रहता है।”

एक बार फिर मोहनदास मौन हो जाता है और तीन कोशिशों के बावजूद मोहनदास को न्याय नहीं मिलता। वह अपनी पहचान को नकार देता है और कहता है, “मैं तो मोहना भी नहीं, बाप काबा भी नहीं, कस्तूरी क्या है मेरी, पुतली मेरी माँ भी नहीं।” जो मोहनदास फ़िल्म की शुरूआत में चिल्ला कर कहता है कि मैं ही मोहनदास हूं पचास बार कहूंगा मैं ही मोहनदास हूं, वह विरोध इस ब्राह्मणवादी व्यवस्था के द्वारा गुम कर दिया जाता है।

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फ़िल्म में आगे किस तरह मीडिया की सकारात्मक भूमिका को दिखाया गया है। पत्रकार मेघना सेनगुप्ता दिल्ली के एक समाचार चैनल जनमत में काम करती हैं। मेघना एक पत्रकार की जिम्मेदारी को निर्भीकता से निभाती हैं। वह अपनी ज़िम्मेदारी को जानती है और ये भी कि इन विकास की चमकती गलियों में रोज एक अज्ञात घटना घटती है जो कभी सामने नहीं आ पाती। “हर रोज वही खबरें सेंसलेशन खबरें, सियासत की उठापटक, दांवपेंच, सरकारों का बनना गिरना, क्रिकेट, फैशन, सेक्स, हत्या लेकिन कुछ खबरें चुपचाप खामोशी में घटती हैं, कोई आहट नहीं होती और कोई मारा जाता है। धीरे-धीरे आहिस्ता-आहिस्ता हर रोज़ और कहीं आवाज नहीं होती… लगता है इस चेहरे को पहले कहीं देखा है,पर कहाँ? मौत से घिरे सारे चेहरे एक जैसे होते हैं, बिल्कुल एक जैसे।”

जनमत चैनल के प्रमुख के ये कहने पर कि वह मेघना को मध्यप्रदेश के एक छोटे से गांव में एक छोटी-सी कहानी के लिए जाने की इजाजत नहीं दे सकता। एक मोहनदास से उसका नाम और नौकरी ले ली गई, इससे क्या किसी को कोई फ़र्क पड़ता है? लोग जो देखना चाहते हैं हमें उसका भी खयाल रखना है। नहीं दिखाएंगे तो लोग चैनल देखना बंद कर देंगे…ये मुंशी प्रेमचंद का जमाना नहीं है। इसके बावजूद मेघना अपनी सुनते हुए सच्चाई ढूंढने जाती है। वह अपनी मेहनत से मध्यप्रदेश के एक छोटे से गाँव की कहानी को कवर करते हुए लोकतांत्रिक संस्थाओं के हेरफेर के यथार्थ का पर्दाफाश करती हैं। आज जिस तरह से पत्रकार तमाम नेताओं कॉरपोरेट घरानों और मीडिया मालिकों की कठपुतली बन चुके हैं, उन्हें इस फ़िल्म में मौजूद पत्रकार मेघना से एक पत्रकार होने की जिम्मेदारी सीखने की जरूरत है। 

एक बार फिर मोहनदास मौन हो जाता है और तीन कोशिशों के बावजूद मोहनदास को न्याय नहीं मिलता। वह अपनी पहचान को नकार देता है और कहता है, “मैं तो मोहना भी नहीं, बाप काबा भी नहीं, कस्तूरी क्या है मेरी, पुतली मेरी माँ भी नहीं।” जो मोहनदास फ़िल्म की शुरूआत में चिल्ला कर कहता है कि मैं ही मोहनदास हूं पचास बार कहूंगा मैं ही मोहनदास हूं, वह विरोध इस ब्राह्मणवादी व्यवस्था के द्वारा गुम कर दिया जाता है।

गरीब पिछड़े वर्ग के पास उसके श्रम और प्रतिभा के सिवा कुछ नहीं होता लेकिन वह सवर्ण ब्राह्मणवादी व्यवस्था का अहंकार उससे उसकी मेहनत और योग्यता से मिले हक़ को भी छीन लेता है। यहां तक कि उसका नाम, पहचान उसकी अस्मिता सब कुछ और उसे ‘कौन हूं मैं’ के सवाल पर खड़ा कर देता है। “मैं तो ठाकुर भी नहीं, मैं तो पंडित भी नहीं, हूं जो इंसान तो क्या उसकी कीमत ही नहीं।…घास समझो न हमें, उम्दा से गौन हैं हम, बस अभी। मौन हैं हम,बस अभी मौन हैं हम।”

जब सदियों से शोषित हाशिये पर गया वर्ग किसी तरह अपनी मेहनत और योग्यता के बल पर उस ब्राह्मणवादी जातिवादी मानसिकता से लड़ते हुए संसाधनों तक पहुंचने लगा तो इस व्यवस्था ने शोषण के नए तरीके अपना लिए। पहले शिक्षा और रोजगार का अधिकार नहीं था और अब वहां तक पहुंचने के माध्यमों को ख़त्म किया जा रहा है। फ़िल्म में मोहनदास की स्थिति के प्रति प्रशासनिक व्यवस्था और यहां तक कि मोहनदास के अपने ही गाँव वालों की उदासीनता को देखकर मेघना उन तमाम लोगों से प्रश्न करती है कि “बाँस बनाने वाले परिवार से एक लड़का आगे आता है उसके साथ इतना बड़ा फ्रॉड हुआ और आपके गांव ने क्या किया? बस आंखें मूंद ली!”

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ऐसा लग रहा है कि जितने भी लोग ऊंचे ओहदों पर बैठे हैं, कारों में घूम रहे हैं, मौज मस्ती कर रहे हैं सबने कोई ना कोई जालसाजी की है, किसी ना किसी का हक मारा है। क्या सब डुप्लीकेट हैं? यह प्रश्न हमारे देश की भ्रष्ट प्रशासनिक व्यवस्था पर है, जहां मोहनदास इस व्यवस्था का शिकार है तो पत्रकार मेघना, वकील हर्षवर्धन और विद्रोही लेखक और जज मुक्तिबोध भी इस भ्रष्ट क्रूर व्यवस्था से पूरी तरह वाकिफ हैं लेकिन अपनी सीमाओं और कुछ न कर पाने की विडंबनाओं से निराश हैं। इसी निराशा को फ़िल्म में जज जो कि लेखक मुक्तिबोध हैं व्यक्त करते हुए कहते हैं कि “पूरी व्यवस्था ढह चुकी है। ठग, लुटेरे, अपराधी ये सब के सब हमारे लोकतांत्रिक संस्थाओं तक पहुंच चुके हैं। डेमोक्रेसी! ये डेमोक्रेसी नहीं लूटोक्रेसी है, धनतंत्र जिसके पास दौलत उसकी हुकूमत उसकी सरकार।

आज जब बेरोजगारी का स्तर ऊंचाइयों पर है और सबसे अधिक बेरोज़गार शिक्षित वर्ग है तो हमें देखने को मिलेगा कि वर्ग विशेष के लोग ही हर नौकरी के पदों पर बैठे हुए हैं चाहे वह ऊंचे ओहदों की बात हो या सफाई कर्मचारी जैसे पदों की। ऊंचे ओहदों पर किसी पिछड़े वर्ग का हक़ मारकर बैठे हैं तो डी ग्रेड की नौकरी में तथाकथित सवर्ण शर्मा, तिवारी, चौधरी, राजपूत और ठाकुर बैठ तो जाते हैं लेकिन ये अपनी जगह कम पैसे में पिछड़े वर्ग के लोगों से काम करवाते हैं यानी नौकरी का पैसा तो खाएंगे लेकिन काम करने से इनकी जात और इज्ज़त दोनों चली जाएगी। लेकिन अक्सर इन्हीं लोगों (तथाकथित ऊंची जाति) से सुनने को मिलेगा कि आरक्षण लेकर हर जगह बिना मेहनत के पहुंचकर इन लोगों यानी दलित आदिवासियों ने समाज में असमानता फैलाई हुई है।

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मैं दिल्ली से हूँ,  दिल्ली विश्वविद्यालय से  हिंदी साहित्य में एमए किया है। साहित्य और आलोचनाएं पढ़ने के साथ-साथ, कविताएं और लेख लिखना, फिल्में देखना, गाने सुनना और किसी मुद्दे पर अपनी बात रखना बेहद पसंद है। कहने को बहुत कुछ पर लिखने के लिए शब्द नहीं।

 

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