ज़मीनी सच्चाई: इन बस्तियों में पीरियड्स पर जागरूकता तो क्या, इस पर कभी बात भी नहीं हुई
तस्वीर साभार: रेनू
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“यह तो किसी पौधे का चित्र लग रहा है, जिसमें कुछ फल जैसे लगे हुए हैं। लेकिन ऐसा पौधा अपने देश में नहीं पाया जाता है, दीदी लगता है ये किसी दूसरे देश का पौधा है।” चालीस वर्षीय शीला ने यह बात तब कही जब मैं उसकी बस्ती में युवा महिलाओं के साथ पीरियड्स के मुद्दे पर चर्चा करने के लिए और उन्हें पीरियड्स की प्रक्रिया समझाने के लिए मैंने गर्भाशय और प्रजनन तंत्र का एक पोस्टर दिखाया। शीला के पांच बच्चे हैं। बनारस शहर से क़रीब चालीस किलोमीटर दूर चित्रसेनपुर गाँव की मुसहर बस्ती में रहनेवाली शीला अक्सर सफ़ेद पानी की समस्या से पीड़ित रहती हैं।

वहीं पीरियड चक्र का चित्र देखकर दो बच्चों की पचीस वर्षीय माँ सोनी ने कहा कि, ये किसी कीड़े का चित्र लग रहा है, जो बहुत अजीब है। इससे पहले हम लोगों ने कभी ये नहीं देखा, लगता है ये कोरोना जैसी कोई बीमारी का कीड़ा है। शीला या सोनी ही नहीं बस्ती में पीरियड की चर्चा में भाग ले रही क़रीब सभी बारह-तेरह महिलाओं के जवाब पीरियड्स की प्रक्रिया को दिखाने वाले चित्र को देखकर यही जवाब थे। इसके बाद जब चर्चा आगे बढ़ी और पीरियड के खून पर बात आयी तो सभी ने एक सुर में ज़वाब दिया, “दीदी, ये गंदा खून होता है। अगर ये शरीर से बाहर नहीं निकलेगा तो शरीर में बहुत सारी बीमारी हो जाती है और इसीलिए क्योंकि ये गंदा खून है तो हम लोग इस टाइम पर अपवित्र हो जाते हैं।”

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पीरियड्स पर चर्चा करती महिलाएं

हो सकता है आपको यह लगे कि पीरियड्स को लेकर महिलाओं से ये अनुभव कई साल पुराने होंगे, क्योंकि हम लोगों के अनुसार तो ज़माना बदल चुका है। पहले जब मैं भी पीरियड्स पर ट्रेनिंग ले रही थी तो मुझे भी ऐसा लगता था कि अब काफ़ी कुछ बदल चुका है और सभी महिलाएं बहुत जागरूक हो चुकी हैं और पीरियड्स पर तो अब सभी बात कर रहे हैं। लेकिन जब मैंने खुद फ़ील्ड में जाकर गाँव की महिलाओं और किशोरियों को पीरियड्स पर ट्रेनिंग देने का काम शूरू किया तो यह मालूम हुआ कि ये सब सिर्फ़ वहम है।

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“यह तो किसी पौधे का चित्र लग रहा है, जिसमें कुछ फल जैसे लगे हुए हैं। लेकिन ऐसा पौधा अपने देश में नहीं पाया जाता है, दीदी लगता है ये किसी दूसरे देश का पौधा है।” चालीस वर्षीय शीला ने यह बात तब कही जब मैं उसकी बस्ती में युवा महिलाओं के साथ पीरियड्स के मुद्दे पर चर्चा करने के लिए और उन्हें पीरियड्स की प्रक्रिया समझाने के लिए मैंने गर्भाशय और प्रजनन तंत्र का एक पोस्टर दिखाया।

सच्चाई यही है कि ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी पीरियड्स तो क्या महिला स्वास्थ्य और ख़ासकर प्रजनन स्वास्थ्य को लेकर महिलाओं और किशोरियों में जागरूकता का अभाव है। सरकारी योजनाओं के माध्यम से बेशक स्वास्थ्य कार्यकर्ता महिलाओं तक पहुंच रही हैं, लेकिन सिर्फ़ उनकी गर्भावस्था के दौरान या छोटे बच्चों की माँओं तक। इसका नतीजा यह हो जाता है कि महिलाएं भले बच्चों को जन्म दे देती हैं लेकिन उन्हें पीरियड्स की भूमिका और अपने अपने प्रजनन अंग की जानकारी न के बराबर होती है।

योनि के चित्र को समझने की कोशिश करतीं ग्रामीण महिलाएं

भारत में आज भी जाति व्यवस्था क़ायम है और हर स्तर पर यह प्रभावी ढंग से काम भी करती है। अब अगर बात करें मुसहर महिलाओं की तो सच्चाई यह है कि ग्रामीण स्तर पर किसी भी अन्य जाति के लोग मुसहर बस्ती में नहीं आते हैं। यहां तक कि कई बार गाँव के प्रधान तक को उनके गाँव की मुसहर बस्ती का रास्ता नहीं मालूम नहीं होता है। ऐसे में मुसहर बस्ती में जाकर मुसहर महिलाओं और किशोरियों के साथ बैठक करना और उन्हें जागरूक करने की ज़िम्मेदारी कोई नहीं लेना चाहता। यही वजह है कि मुसहर महिलाएं अपने स्वास्थ्य को लेकर भी जागरूक नहीं हो पाती हैं और चार-पाँच बच्चों को जन्म देने के बाद भी उन्हें गर्भावस्था में पीरियड्स की भूमिका और अपने स्वास्थ्य के बारे में पता नहीं चलता और वे इसे ‘गंदा’ समझकर इस दौरान भेदभाव और कई तरह के अंधविश्वास का पालन करती हैं।

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महिलाएं अपने गुप्तांगों के बारे में भी जागरूक नहीं

लेकिन ऐसा नहीं कि जागरूकता की कमी सिर्फ़ यही तक हैं, बल्कि कई बार महिलाओं को अपने गुप्तांगों के बारे में जानकारी नहीं होती है। इसका पता मुझे तब चला जब मैं सेवापुरी ब्लॉक के बसुहन गाँव की मुसहर और राजभर बस्ती की महिलाओं के साथ पीरियड्स के मुद्दे पर चर्चा करने गई। वहां मैंने अपनी चर्चा की शुरुआत गुप्तांगों से जुड़ी जानकारी से की और महिलाओं से पहला सवाल यह किया कि हमारी योनि में कितने छेद होते हैं। पैंतीस वर्षीय लक्ष्मीना ने तुरंत ज़वाब दिया-दो। फिर पूजा ने ज़वाब दिया–दो। इसके बाद क़रीब सभी महिलाओं ने ‘दो’ पर हामी भरी। बता दें कि मुसहर बस्ती में रहने वाली लक्ष्मीना सात बच्चों की माँ हैं और हाल ही में उसके बड़े बेटे की शादी भी हो गई है। वहीं राजभर बस्ती में रहने वाली पूजा के तीन बच्चे हैं।

हम लोगों को यह समझना होगा कि पीरियड्स से जुड़ी ये भ्रांतियां एक दिन में नहीं फैलाई गईं बल्कि सदियों से इसके गंदे होने और इस पर बात न करने की सीख दी गई है, जिसे हम सिर्फ़ सेनेटरी पैड बांटकर या रैली निकालकर दूर नहीं कर सकते। इसके लिए हमें लंबे समय तक ज़मीनी स्तर पर काम करने की ज़रूरत है।

यहां इन महिलाओं की जाति और उनके परिवार के बारे में बताने का मतलब यह है कि तमाम बुनियादी अधिकारों से वंचित होते हुए इतने बच्चों को जन्म देने के बावजूद इन महिलाओं को आज तक ये जानकारी नहीं दी गई कि इनके गुप्तांगों में तीन छेद (मूत्राशय, योनि व गुदा मार्ग) होते है और जाति का आशय यह है कि अगर यही सवाल गाँव की किसी तथाकथित ऊंची जाति की महिलाओं से पूछा जाए तो सही ज़वाब मिलने का स्तर बढ़ जाता है। ऐसे में आज हम लाख महिलाओं के सशक्त होने की बात करें पर ज़मीनी सच्चाई यही है कि जब तक हम समाज के वर्ग, जाति आदि के आधार पर हाशिएबद्ध समुदाय की महिलाओं को जब तक उनके स्वास्थ्य व शरीर के बारे में जागरूक नहीं करेंगे, उन तक बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुंचाई जाएंगी तब तक किसी भी तरह का सशक्तिकरण संभव नहीं है।

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अब अगर हमलोग बात करें पीरियड के दौरान प्रबंधन के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले पैड की तो नेशनल फ़ैमली हेल्थ सर्वे 2015-2016 के आंकड़ों के मुताबिक़ 336 मिलियन महिलाएं जिन्हें पीरियड्स होते हैं उनमें मुश्किल से 121 मिलियन (यानी क़रीब 36 प्रतिशत) महिलाएं ही अपने पीरियड प्रबंधन के लिए किसी भी तरह के सैनेटरी पैड का इस्तेमाल करती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों की हाशिएबद्ध समुदाय की महिलाएं ग़रीबी और जागरूकता के अभाव की वजह से आज भी गंदे कपड़े का इस्तेमाल करती हैं।

हर साल 28 मई को पूरी दुनियाभर में माहवारी स्वच्छता दिवस मनाया जाता है। बाज़ार के बढ़ते चलन की वजह से अब गाँव में कई सरकारी और ग़ैर सरकारी संस्थाएं सैनेटरी पैड बांटकर या फिर रैली निकालकर पीरियड्स पर जागरूकता का दावा करती हैं। लेकिन हम लोगों को यह समझना होगा कि पीरियड्स से जुड़ी ये भ्रांतियां एक दिन में नहीं फैलाई गईं बल्कि सदियों से इसके गंदे होने और इस पर बात न करने की सीख दी गई है, जिसे हम सिर्फ़ सेनेटरी पैड बांटकर या रैली निकालकर दूर नहीं कर सकते। इसके लिए हमें लंबे समय तक ज़मीनी स्तर पर काम करने की ज़रूरत है। इसमें हमें ये बाद नहीं भूलनी चाहिए कि अगर हम वास्तव में विकास, समानता और जागरूकता की बात करते हैं तो हम लोगों को समाज की हाशिएबद्ध महिलाओं तक पहुंचना होगा। जातिगत भेदभाव झेल रही गांव की ये बस्तियां आज भी अपने शरीर और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता के अभाव में कई तरह की हिंसा और गंभीर बीमारियों का सामना करती हैं।

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सभी तस्वीरें रेनू द्वारा उपलब्ध करवाई गई हैं।

रेनू वाराणसी ज़िले के रूपापुर गाँव की रहने वाली है। ग्रामीण महिलाओं और किशोरियों के साथ समुदाय स्तर पर रेनू बतौर सामाजिक कार्यकर्ता काम भी करती हैं और अपने अनुभवों व गाँव में हाशिएबद्ध समुदाय से जुड़ी समस्याओं को लेखन के ज़रिए उजागर करना इन्हें बेहद पसंद है।

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