वे आठ तरीके, जिन्हें अपनाकर आप विक्टिम ब्लेमिंग के कल्चर के ख़िलाफ़ खड़े हो सकते हैं।
तस्वीर साभारः श्रेया टिंगल फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए
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महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा का एक पूरा इतिहास है। इससे आगे जब भी महिलाएं हिंसा का विरोध करती हैं, उसके खिलाफ आवाज़ उठाती हैं तो उनकी इस लड़ाई में उन पर ही दोष मढ़ दिए जाते हैं। इसे विक्टिम ब्लेमिंग कहा जाता है। महिलाओं के ख़िलाफ़ होनेवाली हिंसा के उन्मूलन में विक्टिम ब्लेमिंग सबसे बड़ी रुकावट है। विक्टिम ब्लेमिंग में आरोपी को पूरी तरह दोष मुक्त करते हुए सर्वाइवर को ही इल्ज़ाम के घेरे में खड़ा कर दिया जाता है।

विक्टिम ब्लेमिंग, पितृसत्ता का ही एक व्यापक रूप है। यह व्यवहार पूरी दुनिया में देखने को मिलता है। हर जगह के समाज में हिंसा के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़नेवाली महिलाओं को ही दोषी करार दे दिया जाता है। उनका सार्वजिनक मंच पर चरित्रहनन किया जाता है। समाज में स्थापित विक्टिम ब्लेमिंग ही एक कारण है जिस वजह से महिलाओं लिए सारे दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं। वहीं, आरोपी उसी तरह अपना जीवन जीता है जैसे पहले जीता आया है, काम करता है और आगे बढ़ जाता है।

आज के इस लेख में हम कुछ ऐसे ही तरीकों के बारे में बात करेंगे जिससे आप विक्टिम ब्लेमिंग के तरीकों की पहचान कर सकें। उसके ख़िलाफ मुखर होकर सर्वाइवर के पक्ष में मज़बूती से खड़े हो सकें। विक्टिम ब्लेमिंग के व्यवहार की पहचान कर समाज में स्थापित हिंसा की संस्कृति को कमज़ोर करने में अपनी भूमिका निभा सकें।

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1- विश्वास से करें शुरुआत 

समाज में महिलाओं के प्रति हिंसा की घटनाओं पर अमूमन खामोशी वाला व्यवहार होता है। यौन हिंसा की घटनाओं को भुला देने और चुप रहने की नसीहत दी जाती है। इसके उलट सर्वाइवर पर ही विश्वास नहीं किया जाता है। जब भी कोई सर्वाइवर आवाज़ उठाने की कोशिश करती है तो उसे दोस्तों और परिवार में सबसे पहले अनसुना किया जाता है। इसलिए जब भी कोई आपसे यह कहे कि उसके साथ हिंसा हुई है या हो रही है तो उसका विश्वास करें। भले ही आरोपी आपका दोस्त और रिश्तेदार ही क्यों न हो। सर्वाइवर पर विश्वास करें और उसे आश्वासन दें कि हम उनके साथ हैं।

2- भाषा पर दें ध्यान 

जैसे ही कोई सर्वाइवर हिंसा के ख़िलाफ लड़ाई लड़ना शुरू करती है तो उसकी आपबीती पर लोगों की प्रतिक्रिया में इस्तेमाल भाषा बहुत ही अभद्र होती है। लैंगिक/यौन हिंसा के मामले में भाषा की गरिमा को बनाए रखने की बहुत आवश्यकता होती है। अक्सर लोगों के बात करने का तरीका भी सर्वाइवर को दोष देने वाला होता है। यौन हिंसा का सामना करनेवाले सर्वाइवर की पहचान उसके साथ हुई हिंसा को बना दिया जाता है। यह व्यवहार सर्वाइवर को हिंसा के केंद्र में रखते हुए आरोपी को बहस से दूर रखने का काम करता है। सुर्खियों में अक्सर हम देखते हैं कि ‘अ’ बलात्कार पीड़िता है जैसी भाषा का इस्तेमाल होता है। इससे अलग हमें ऐसे बोलना चाहिए कि अमुख व्यक्ति ने ‘अ’ के साथ बलात्कार किया था। ऐसी भाषा का इस्तेमाल करना हमेशा याद दिलाता है कि व्यक्ति ने बलात्कार किया है और सर्वाइवर ने उस हिंसा का सामना किया था।

विक्टिम ब्लेमिंग, पितृसत्ता का ही एक व्यापक रूप है। यह व्यवहार पूरी दुनिया में देखने को मिलता है। हर जगह के समाज में हिंसा के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़नेवाली महिलाओं को ही दोषी करार दे दिया जाता है। उनका सार्वजिनक मंच पर चरित्रहनन किया जाता है। समाज में स्थापित विक्टिम ब्लेमिंग ही एक कारण है जिस वजह से महिलाओं लिए सारे दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं। वहीं, आरोपी उसी तरह अपना जीवन जीता है जैसे पहले जीता आया है, काम करता है और आगे बढ़ जाता है।

3- हिंसा की संस्कृति को बढ़ावा देनेवाली बातों का विरोध करें

समाज में महिलाओं के प्रति हिंसा के व्यवहार को इतना सामान्य बना दिया जाता है कि उसको एक संवेदशील विषय की तरह देखने का नज़रिया पूरी तरह गायब होता है। ठीक ऐसे ही बलात्कार पर बने चुटकुले के माध्यम से सर्वाइवर के दोषपूर्ण व्यवहार को सामान्य बना दिया जाता है। बलात्कार के ऊपर बने चुटकुलों में परिहास और मनोरंजन का साधन बनाकर बलात्कार और यौन हिंसा की घटनाओं के प्रति लोगों में कम संवेदनशीलता वाला नज़रिया बन जाता है। जब भी आप बलात्कार और यौन हिंसा की घटनाओं पर हंसी-मज़ाक की बातें सुने तो तुरंत उसका विरोध करें। यह बताएं कि हिंसा की घटनाओं पर ऐसी बातें आपको असहज करती है और क्यों असहज करती है, इसकी व्याख्या करें। मजाक बनाने वाले लोग को तुरंत रोका जाए और उसे इन बातों की गंभीरता के बारे में सोचने के लिए कहे।

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4- सहमति को समझें

किसी भी रिश्ते में यौन सहमति के महत्व को पहचानना और उसको स्वीकारना यौन हिंसा की घटनाओं और बलात्कार को रोकने में अहम भूमिका निभा सकता है। समाज में मौजूदा धारणा ‘लड़कियों की ना में भी हां होती हैं’ और ‘लड़के तो लड़के होते हैं’ जैसी बातें सहमति के कॉन्सेप्ट को नकारने वाली बातें हैं। सहमति क्या है और यह क्यों ज़रूरी है इसके बारे में ज़ागरूकता की भारी कमी है। इसका एक परिणाम यह भी है कि बहुत से लोग सहमति को तरीके को ऐसे भी मानते हैं कि जब सर्वाइवर हिंसा रोकने या अपराधी को रोकने में नाकामयाब होती है तो लोग मान लेते हैं कि यह उसकी सहमति थी। यह सीधे तौर पर सर्वाइवर को दोष देना है। सहमति के बारे में जाने और बताएं कि कैसे सहमति हिंसा की घटना से गायब है। हिंसा के समय जान बचाने के लिए यौन हिंसा का सामना करना सर्वाइवर का अपराधी को सहमति देना नहीं है बल्कि अपनी जान बचाना होता है।  

5- अगली पीढ़ी को शिक्षित करें

कोई भी बच्चा विक्टिम ब्लेमिंग के व्यवहार के साथ पैदा नहीं होता है वह जो भी सीखता है समाज से ही सीखता है। अपने आस-पास के माहौल से बच्चे इस तरह का व्यवहार सीखते हैं। बेहतर है उन्हें वह व्यवहार सिखाया जाए जिसमें लैंगिक समानता निहित हो। बच्चों को लैंगिक समानता, सहमति, शरीर की स्वायत्ता, लड़कियों और महिलाओं के अधिकारों और हिंसा के बारे में सजग करें। सहमति के कल्चर को बढ़ावा देने की दिशा में काम करें। उनसे खुलकर बात करने के माहौल को स्थापित करें।

6- मीडिया की आलोचना करें

विक्टिम ब्लेमिंग की संस्कृति को बनाने रखने में बहुत बड़ा योगदान मीडिया का है। मीडिया जिस तरह यौन हिंसा की घटनाओं की रिपोर्टिंग करता है उसमें विक्टिम ब्लेमिंग शामिल होती है। वह सर्वाइवर को ही घटना का आरोपी बना देता है। मीडिया हिंसा की घटना को सनसनीखेज़ बनाकर आरोपी से पूरा ध्यान हटा देता है। आप मीडिया की इस तरह की रिपोर्टिंग की आलोचना करें, संपादक को पत्र लिखे और इसके संदर्भ में याचिका डालें। मौजूदा बनाए नैरेटिव को खत्म करने की पहल करें। सोशल मीडिया पर मुख़र होकर विक्टिम ब्लेमिंग को पहचानकर उनकी रिपोर्टिंग तरीकों का विरोध करें। आलोचना के माध्यम से मौजूदा भेदभाव आधारित तरीकों को बदलने का प्रयास किया जा सकता है।

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7- बहिष्कार भी है एक तरीका

यह स्पष्ट है कि विक्टिम ब्लेमिंग हमारे व्यवहार और समाज में निहित है। पॉप कल्चर इसको पूरी तरह से बढ़ावा देने का काम करता है। फिल्म, विज्ञापन, संगीत, सीरियल, कॉमेडी और किताबों के ज़रिये बलात्कार को सुविधाजनक साजिश के तौर पर दिखाने का भी काम किया जाता है। आरोपी के प्रति सहानुभूति तक दिखाई जाती है। बहुत सी लोकप्रिय फिल्मों और सीरियल में यौन हिंसा की घटना को समान्य तक बना दिया जाता है। यही नहीं विज्ञापन में विक्टिम ब्लेमिंग होने वाली चित्रों को शामिल किया जाता है। ऐसे में इसका सामाधान बहिष्कार है। यौन हिंसा के कल्चर को बढ़ावा देनेवाली और विक्टिम ब्लेमिंग करने वाली ऐसी फिल्मों, कलाकारों और कंपनियों का विरोध किया जाएं। उनके उत्पादों को बहिष्कार किया जाए और लोगों में भी इस बात को प्रचारित किया जाएं की इनके काम में यह कमी है।  

8- हमेशा सर्वाइवर का सहयोग करें

सर्वाइवर को दोष देने में आप न चाहते हुए भी आरोपी के पक्ष में खड़े हो जाते हैं। सर्वाइवर को समर्थन देने लिए उसके पक्ष में कदम बढ़ाएं और समाज में हिंसा के समर्थन वाले कल्चर को खत्म करने के लिए कदम उठाएं। सर्वाइवर को शर्मिदा करने और विक्टिम ब्लेमिंग की घटना का विरोध करें। कानूनी कार्रवाई के लिए उसे प्रोत्साहित करें। हमेशा अदालती कार्रवाई के दौरान उसके पक्ष में मौजूद रहें। 

ये कुछ तरीके हैं जिन्हें अपनाकर आप विक्टिम ब्लेमिंग को पहचानकर उसमें शामिल होने से बच सकते हैं। महिलाओं के ख़िलाफ होने वाली हिंसा पर चुप्पी और उल्टा उस पर ही आरोप लगाना एक स्थापित व्यवहार है जिसे बदलने के लिए खुद से पहल करने की सबसे पहले आवश्यकता है। सर्वाइवर के पक्ष में खड़े होकर, उसके विरोध में होने वाले माहौल में शामिल न होकर ही यौन हिंसा की घटनाओं और विक्टिम ब्लेमिंग करने वाले माहौल में परिवर्तन लाया जा सकता है।  

और पढ़ेंः विक्टिम ब्लेमिंग की झलक अब हमारे अदालतों की टिप्पणी में भी


तस्वीर साभारः श्रेया टिंगल फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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