'जाति आधारित-यौन हिंसा और राज्य से दण्ड मुक्ति' दलित महिलाओं के ख़िलाफ़ होनेवाली हिसा का दस्तावेजीकरण
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साल 2020 का हाथरस गैंगरेप हो या 2021 में नौ साल की दलित बच्ची के साथ दिल्ली कैंट में हुआ गैंगरेप हो या दलित महिलाओं के साथ घटता कोई भी हिंसक यौन अपराध हो, महिलाओं की जाति को नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता। लेकिन भारतीय ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक समाज में ये तर्क बहुत आसानी से दे दिए जाते हैं कि महिलाओं के साथ घटने वाली जेंडर आधारित हिंसा में उनकी जाति की कोई भूमिका नहीं होती। हाल ही में ‘जाति आधारित-यौन हिंसा और राज्य से दण्ड मुक्ति(कास्ट बेस्ड सेक्सुअल वायलेंस एंड स्टेट इम्प्यूनिटी) के नाम से सामने आई रिपोर्ट तमाम आंकड़ों के आधार पर इस तर्क को बेबुनियाद घोषित करती है।

इस रिपोर्ट को दलित ह्यूमन राइट्स डिफेंडर्स नेटवर्क (डीएचआरडी नेट), नेशनल काउंसिल फॉर वूमेन लीडर्स (एनसीडब्ल्यूएल) और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) के सदस्यों ने मिलकर संकलित किया है। दलित ह्यूमन राइट्स डिफेंडर्स नेटवर्क (डीएचआरडी नेट) देशभर के अलग-अलग राज्यों से जुड़े हुए सौ से अधिक दलित राइट्स डिफेंडर्स (रक्षक) का समूह है। इनका काम मुख्य रूप से गुजरात, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और कर्नाटक में है। यह संस्था यूनाइटेड नेशंस (यूएन) ड्राफ्ट प्रिंसिपल्स एंड गाइडलाइंस फॉर द इफेक्टिव एलिमिनेशन ऑफ डिस्क्रिमिनेशन पॉलिसी को अमल में लाने के लिए प्रयासरत हैं। नेशनल काउंसिल फॉर वूमेन लीडर्स (एनसीडब्ल्यूएल) समाज में हाशिए पर रखे गए समुदायों की महिलाओं का ह्यूमन राइट्स डिफेंडर्स का समूह है जो इस वक्त देश के सोलह राज्यों में काम कर रहा है, और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) मुंबई, महाराष्ट्र में मौजूद एक प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान है। 

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यह रिपोर्ट दलित महिला मानवाधिकार रक्षक स्वर्गीय शिप्रा देवी को समर्पित हैं जिन्होंने यौन हिंसा के पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बीते 30 मार्च 2022 को नेशनल काउंसिल फॉर वूमेन लीडर्स (NCWL) के फेसबुक पेज पर हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में यह रिपोर्ट लॉन्च की गई है। इस रिपोर्ट में दलित महिलाओं के साथ होनेवाली यौन हिंसा का गहन अध्ययन किया गया है। कुल 13 राज्यों को इस स्टडी के लिए केंद्र में रखा गया है। वे राज्य हैं – बिहार, छत्तीसगढ़, गुजरात, हरियाणा, केरल, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु, राजस्थान, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड।

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इस रिपोर्ट की थीम ‘जाति आधारित यौन हिंसा’ (कास्ट बेस्ड सेक्सुअल वायलेंस) है, जो इन तेरह राज्यों में सात सालों के मध्य (2015 से लेकर 2021) घटी है। साल 2018 से लेकर 2021 के मध्य तक हालिया 32 केस को रिसर्च में अधिक महत्व इस उद्देश्य से दिया गया है ताकि दलित पीड़ित, सर्वाइवर्स की न्यायिक लड़ाई का विश्लेषण किया जा सके।66 पन्नों की ये रिपोर्ट चार भागों में बांटी गई है। पहला, जाति आधारित यौन हिंसा के मामलों का विषयगत विश्लेषण। दूसरा, न्याय तक पहुंचने के लिए प्रणालीगत बाधाएं। तीसरा, पीड़ितों के लिए सहायता सेवाओं की पहुंच और चौथा भाग सुझाव है। 

रिपोर्ट के हवाले से, प्रमुख जाति समूहों के पुरुष और युवा लड़के 18 साल से कम उम्र की दलित लड़कियों को निशाना बना रहे हैं। अध्ययन में शामिल 62 फीसदी मामलों में यह बात सामने आई है।

दलित महिलाएं जाति और जेंडर की वजह से समाज के अनुक्रम में सबसे नीचे रखी जाती हैं इसी वजह से शोषण के सबसे गंभीर रूपों का सामना करती हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, साल 2020 में दलित महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ बलात्कार के 3486 मामले दर्ज़ किए गए जिसका सीधा मतलब है कि देश में हर दिन दलित महिलाओं के साथ होनेवाले रेप के 10 मामले दर्ज किए गए। ध्यान देनेवाली बात यह है कि आंकड़े इससे कई गुना हो सकते हैं क्योंकि कितने ही केस हैं जिन्हें दर्ज़ तक नहीं किया जाता, किसी को ख़बर तक नहीं होती जिसके कारण भी इस रिपोर्ट में विस्तार से दिए गए हैं।

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जाति आधारित यौन हिंसा के मामलों का विश्लेषण

रिपोर्ट बताती है कि जाति आधारित यौन हिंसा के मामलों में शामिल अधिकतर अपराधी प्रमुख जातियों से हैं। अध्ययन में शामिल किए गए 50 मामलों में से 36 ऐसे अपराधी हैं जिनकी जाति का विवरण उपलब्ध है। दलित महिलाओं के साथ किया यौन अपराध न कि सिर्फ़ उसका शारीरिक रूप से शोषण करना होता है बल्कि उसके माध्यम से समूचे समुदाय को यह जताना होता है कि उनके संसाधनों से लेकर उनके शरीरों पर सवर्णों का आधिपत्य है, दलित महिलाएं और पुरुष उनके अधीन हैं। रिपोर्ट के हवाले से, प्रमुख जाति समूहों के पुरुष और युवा लड़के 18 साल से कम उम्र की दलित लड़कियों को निशाना बना रहे हैं। अध्ययन में शामिल 62 फीसदी मामलों में ये बात सामने आई है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार साल 2015 से लेकर 2020 के बीच दर्ज महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ़ बलात्कार के मामलों की संख्या में 45% की वृद्धि हुई है।

2020 के लॉकडाउन में जहां पूरा देश तकरीबन ‘बंदी’ की हालत में था तो यौन अपराध की संख्या कम होनी चाहिए थी लेकिन तथाकथित उच्च जाति के पुरुषों ने इस लॉकडाउन को मौके की तरह देखा। परिणामस्वरूप डीएचआरडी नेट (2020) की रिपोर्ट अनुसार देश के 7 राज्यों में यौन हिंसा सहित जाति अत्याचारों की कई कहानियों का दस्तावेजीकरण किया गया है। इस रिपोर्ट में यौन हिंसा के अलग-अलग तरीके सामने आए हैं जैसे कि पीछा करना, यौन हमला, अपहरण और यौन उत्पीड़न, यौन हिंसा के करने के लिए प्रेम का लालच और धमकियां, जाति और धर्म पर आधारित यौन हिंसा, आदि। 

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दलित महिलाओं के साथ किया यौन अपराध न कि सिर्फ़ उसका शारीरिक रूप से शोषण करना होता है बल्कि उसके माध्यम से समूचे समुदाय को यह जताना होता है कि उनके संसाधनों से लेकर उनके शरीरों पर सवर्णों का आधिपत्य है, दलित महिलाएं और पुरुष उनके अधीन हैं।

न्याय तक पहुंचने के लिए प्रणालीगत बाधाएं

अलग-अलग तरह का डेटा संकलित करते हुए तमाम केस को इस रिपोर्ट में शामिल कर हर एक स्टेटमेंट को प्रामाणिकता दी गई है। दलित लड़कियों, महिलाओं के साथ घटनेवाली यौन हिंसा में उन्हें न्याय समय रहते नहीं मिलता और अधिकांशतः तो न्याय मिलता ही नहीं है। न्याय न मिलने के कारणों को रिपोर्ट में वरीयता दी गई है। संस्थागत जातिवाद और पितृसत्ता न्याय न मिलने के मुख्य कारण हैं। न्याय प्रणाली में दलित-बहुजनों का नेतृत्व न होना दलित महिला सर्वाइवर को न्याय न मिल पाने में बहुत अहम भूमिका निभाता है। तथाकथित उच्च जाति के लोगों का प्रणाली में दबदबा रहना, अपराधियों को बचा ले जाता है। न्यायपालिका के संदर्भ में आज़ादी के बाद से अब तक सर्वोच्च अदालत में कुल छह दलित न्यायाधीश नियुक्त हुए हैं जिसमें से केवल एक दलित मुख्य न्यायधीश ने पद संभाला है। हालांकि, उच्च न्यायालय और निचली न्यायपालिका में दलित जज प्रतिनिधित्व पर कोई आंकड़ा अभी तक उपल्ब्ध नहीं है। 

राष्ट्रीय दलित मानवाधिकार द्वारा साल 2006 में चार भारतीय राज्यों में हिंसा के 500 दलित महिलाओं के अनुभवों का “दलित महिला स्पीक आउट” शीर्षक से एक अध्ययन आयोजित किया गया था। 500 में से केवल 3 मामलों में ही दोष सिद्ध हुए यानी हिंसा के कुल मामलों में के एक प्रतिशत से भी कम यानी यौन हिंसा की घटना को दर्ज भी करवाया जाए तो न्याय प्रणाली अपराधी को बचा ले जाती है। 

यह रिपोर्ट सामाजिक न्याय का दस्तावेज है जिसे हर उस इंसान को पढ़ने की जरूरत है जिसे लगता है कि जाति जैसी कोई चीज नहीं रही है, सभी महिलाएं एक समान हैं जबकि इस समाज में महिला एक जेंडर के साथ-साथ और भी कई पहचान जैसे जाति, धर्म, रंग आदि से जुड़ी होती हैं।

पितृसत्तात्मक समाज में लड़की की यौनिकता घर की ‘इज़्ज़त’ से जोड़ी जाती है। इसीलिए कई मामलों में बलात्कार, यौनिक हिंसा की घटना को छिपा या दबा लिया जाता है। जहां हिम्मत करते हुए थाने में रिपोर्ट लिखवाने जाया भी जा रहा है तो 44% मामलों में पीड़ित परिजनों को एफआईआर लिखवाने में कठिनाइयों का सामना करते हुए देरी हुई है। पुलिस पर रिपोर्ट लिखवा दी जाए तो भी कार्रवाई नहीं होती, और अगर होती भी है तो देरी से। एक चौथाई से से भी अधिक साल 2020 के अंत तक पुलिस जांच के लिए मामले लंबित हैं।पीड़िता को मेडिकल सुविधाएं नहीं दी जाती, टू फिंगर टेस्ट जो कि अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इस्तेमाल में नहीं लाना चाहिए अभी तक इस्तेमाल में लाया जा रहा है। रिपोर्ट में विस्तार से इस सबको एक-एक केस के साथ लिखा गया है। 

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पीड़ितों के लिए सहायता सेवाओं की पहुंच 

महिलाओं की सुरक्षा बढ़ाने के उद्देश्य से निर्भया फंड की स्थापना की गई थी। लेकिन आवंटित राशि और फंड को जो राशि मिलती है उसमें फर्क है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक जुलाई 2021 तक निर्भया फंड में आवंटित कुल राशि का कुल 46.21 फीसदी ही खर्च हुआ है। 

यौन हिंसा की सर्वाइवर्स को या उनके परिवारों को बलात्कार के अपराध में एससी एसटी एक्ट के तहत मुआवजे पाने का अधिकार है। लेकिन 31 प्रतिशत मामलों में मुआवजा प्राप्त ही नहीं होता है। मानसिक स्वास्थ्य की बातें करता समाज यौन हिंसा से पीड़ित महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य की चिंता मुश्किल ही करता है। इन मामलों में मानसिक स्वास्थ्य की सेवा पीड़िता के लिए एक अभाव बना हुआ है। रिपोर्ट ने इस भाग पर चीजें और विस्तार से लिखी हैं। 

सुझाव 

रिर्पोट का आखिरी भाग सुझाव से संबंधित है जिसमें केंद्र सरकार को, राज्य सरकारों को, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग, राष्ट्रीय महिला आयोग और संबंधित राज्य आयोगों को कई ज़रूरी सुझाव दिए गएं हैं। विभिन्न सुझावों में से दलित महिलाओं को सामान्य महिलाओं से अलग श्रेणी में रखना, उनके संघर्षों को पहचानना बहुत बुनियादी लेकिन ज़रूरी सुझाव है जो समाज में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को आत्मसात करने की जरूरत है। 

हिंसा का न केवल कानून और व्यव्स्था के रूप में बल्कि सामाजिक आर्थिक रूप से संबोधन, व्यापक रणनीति बनाना, शिक्षा बढ़ाने, जागरूक करने के कार्यक्रम लागू करना, मौजूदा कानून, नीतियों का क्रियान्वयन करना, पुलिस प्रतिक्रिया और व्यव्स्था की जवाबदेही, आदि महत्वपूर्ण सुझावों को वरीयता दी गई है। यह रिपोर्ट सामाजिक न्याय का दस्तावेज़ है जिसे हर उस इंसान को पढ़ने की जरूरत है जिसे लगता है कि जाति जैसी कोई चीज नहीं रही है, सभी महिलाएं एक समान हैं जबकि इस समाज में महिला एक जेंडर के साथ-साथ और भी कई पहचान जैसे जाति, धर्म, रंग आदि से जुड़ी होती हैं। हिंसा के रूप कैसे बदलते हैं और कैसे समाज के विशेष वर्ग को शोषित करते हैं और सामाजिक न्यायिक व्यवस्था अपराधी के साथ खड़े होकर उसे बचा ले जाती है, तमाम केस इस रिपोर्ट को प्रमाणिक बनाते हैं। 

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तस्वीर: फेमिनिज़म इन इंडिया

मेरा नाम आशिका शिवाँगी सिंह है, फिलहाल मिरांडा हाउस कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातक कर रही हूँ। मैं उस साहित्य और राजनीति की पक्षधर हूँ जो शोषितों की पक्षधर है। रोज़मर्रा के जीवन में सवाल करना, नई-नई आर्ट सीखना, व्यक्तित्व में लर्निंग-अनलर्निंग के स्पेस को बढ़ाना पसंद है।

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