फिल्म रक्षाबंधन का ट्रेलरः खुद को प्रगतिशीत बताती इंडस्ट्री के लिए क्या रूढ़िवाद भी मुनाफा कमाने का एक फॉर्मूला बन गया है
तस्वीर साभारः Zoom News
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“भाई साहब इस देश के हर घर में एक बेटी बैठी है जिसका दहेज कम पड़ रहा है और बस इस उम्मीद में कि वह छाती ठोककर उसे विदा कर सकें उसका बाप-भाई अपनी हड्डियां गला रहा है।” यह डॉयलाग है अक्षय कुमार की आनेवाली फिल्म रक्षाबंधन का। फिल्म में दहेज और बहन की शादी की जिम्मेदारियों से घिरे भाई के इर्द-गिर्द कहानी बुनी गई है। 

हमारे देश में लड़की के पैदा होते ही उसकी शादी के गीत शुरू हो जाते हैं। भारत में बहुसंख्यक शादियां ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के बनाए नियमों पर होती हैं। लड़की होती है तो बचपन से ही दहेज की चिंता के नाम पर उसकी शादी के लिए पैसे जोड़ना शुरू कर दिया जाता है। लड़के के घरवाले मिलनेवाले दहेज की कल्पनाओं में शादी के इंतजार में लगे रहते हैं। समय के साथ-साथ शादी और दहेज की परंपराओं की रचनाओं का जाल और फैलता जा रहा है। खुद को प्रगतिशीत कहनेवाली फिल्मी दुनिया पर्दे पर जब इस तरह की कहानी लाती है तो फिल्मी गानों और भावनात्मक संवादों के से वह रूढ़िवाद को बढ़ाने का काम करती है।

क्या है फिल्म रक्षाबंधन का ट्रेलर

आनंद एल राय द्वारा निर्देशित अक्षय कुमार और भूमि पेडनेकर की फिल्म रक्षाबंधन का ट्रेलर रीलीज़ हो गया है। फिल्म की कहानी चार बहनों और एक भाई की है। भाई बने अक्षय पर अपनी चारों बहनों की शादी करवाने की ज़िम्मेदारी है। उनके लिए दहेज इकठ्ठा करना है। चारों बहनों को ऐसा दिखाया गया है जो ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के बनाए पैमानों में फिट नहीं बैठती हैं। किसी की लंबाई कम है, किसी का वज़न ज्यादा है, किसी के बाल छोटे हैं। इन ‘कमियों’ के आधार पर सबका दहेज और भी ज्यादा लगेगा। पूरे ट्रेलर में भारत में शादी और उसकी जिम्मेदारी को निभाते एक मजबूर भाई की कहानी बयां की गई है।

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बॉलीवुड की फिल्मों में दकियानूसी सोच

रक्षाबंधन जैसे ट्रेलर को देखकर कहा जा सकता है कि यहां इमोशनल ड्रामे का तड़का लगाकर शादी और दहेज के रूढ़िवादों विचारों को बढ़ावा दिया गया है। हमारे समाज में जहां एक ओर शादी को एक ख़ास ज़रूरी पड़ाव बताया गया है। साथ ही इन शादियों को पितृसत्ता के उन्हीं रचे-बसे नियमों के तहत करना ही मान्य माना गया है जिसमें लड़कियों की शादी एक अहम जिम्मेदारी होती है और इसका भार घर के पुरुष पर होता है। अधिकतर, लड़की की शादी की पूरी जिम्मेदारी पिता या भाई की होती है। शादी के लिए लड़का इन्हीं दोनों को ढूढ़ना होता है। इससे अलग इस प्रक्रिया में लड़के-लड़की को देखना, उसमें कमी निकालना, दहेज के लिए मोल-भाव करना भी शामिल है।

फिल्म की कहानी चार बहनों और एक भाई की है। भाई बने अक्षय पर अपनी चारों बहनों की शादी करवाने की ज़िम्मेदारी है। उनके लिए दहेज इकठ्ठा करना है। चारों बहनों को ऐसा दिखाया गया है जो ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के बनाए पैमानों में फिट नहीं बैठती हैं। किसी की लंबाई कम है, किसी का वज़न ज्यादा है, किसी के बाल छोटे हैं। इन ‘कमियों’ के आधार पर सबका दहेज और भी ज्यादा लगेगा।

जैसी तुम्हारी बहनें हैं दहेज ज्यादा लगेगा”

ट्रेलर में शादी कराने वाली एजेंट प्रति लड़की की शादी कराने के लिए 20 लाख मांगती है, ज्यादा कहने पर वह कहती है, “जैसी तुम्हारी बहनें हैं, कमीशन डबल बनता है।” यह डॉयलाग बताता है कि शादी के बनाए पितृसत्तात्मक नियमों के लिए ‘अनफिट’ लड़कियों के लिए ज्यादा दहेज लगता है। शादी के लिए सुंदर, सुशील, गोरी, लंबी और संस्कारी लड़की की मांग वाले विज्ञापन तो आपने देखे ही होंगे। ट्रेलर में भी शादी के बाजार में ठीक इसी तरह की लड़कियों को योग्य माना गया है। 

जितनी कमी उतना अधिक दहेज

ब्राहम्णवादी पितृसत्ता में अगर कोई लड़की उसके तय मानकों जैसी नहीं है तो उसकी शादी में सबसे ज्यादा परेशानी होती है। समाज में इस परेशानी को दूर करने के लिए अधिक दहेज को हल माना जाता है। अक्सर यह देखने को मिलता है यदि कोई लड़की लंबाई में छोटी है, उसका रंग काला है, लंबाई लड़के से ज्यादा है, वजन ज्यादा है या बेहद दुबली-पतली है तो दहेज के लेद-देन को सही ठहराया जाता है। खासतौर पर लड़कियों की लंबाई, रंग और वजन को बड़ी वजह मानकर दहेज की मांग की जाती है। लड़कीवाले भी इन्हें उसकी कमी मानकर कुछ ऐसी बातें कहते नज़र आते हैं कि हमारी लड़की का रंग थोड़ा गहरा है तो पैसा शादी में ज्यादा लगाना पड़ेगा। जितना लड़की का वजन है उतने नोट शादी में लगा देंगे।

ट्रेलर में शादी कराने वाली एजेंट प्रति लड़की की शादी कराने के लिए 20 लाख मांगती है, ज्यादा कहने पर वह कहती है “जैसी तुम्हारी बहनें हैं, कमीशन डबल बनता है।” यह डॉयलाग बताता है कि शादी के बनाए नियमों के लिए अनफिट लड़कियों के लिए ज्यादा दहेज लगता है।

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बेटियों वाला घर बेचारा होता है

हमारे आसपास के माहौल में यह रवायत बनी हुई है जिस घर में बेटी ज्यादा होती है उस घर को दया भाव की नज़र से देखा जाता है। बेटियों वाला घर है इसे लेकर मज़ाक किया जाता है। लड़कियों के बचपन से ही उनके पिता और भाई को बेचारा बना दिया जाता है। उनपर ‘बेटियों की शादी का बोझ है’ कहकर बात को बार-बार दोहराया जाता है। रक्षाबंधन के ट्रेलर में फिल्म में इसी बिंदु को केंद्र में रखा गया है। बहन की शादियों के लिए भाई परेशान है, मजबूर है और महान भी है क्योंकि जबतक उसकी छोटी बहनों का घर नहीं बस जाता है वह खुद का घर नहीं बसायेगा। बहन-भाई के पवित्र रिश्ते की हैवी इमोशनल डोज में भाई के ऊपर बहनों की शादियों का जबरदस्ती का भार भी दिखाया गया। समाज का रिवाज़ कहकर इस तरह की बातों को सिनेमा के माध्यम से प्रसारित करना गलत है। 

जिसने चोंच दी है, वहीं दाना देगा

लड़कियों की शादी और दहेज की बातों को लेकर यह बात भी कहीं जाती है कि ‘जिसने बेटी दी है उसने नसीब भी दिया है।’ सब अपने नसीब का ही लेकर जाती है। घर के बड़े-बुजुर्गों के लिए ‘नसीब’ से मतलब उनके दहेज से है। यानी जब बेटी धरती पर आई है तो उसके दहेज का इंतजाम भी हो जाएगा। ट्रेलर में ठीक ऐसा ही एक डॉयलाग है, “जिस राम ने चोंच दी है वहीं दाना भी देगा।” चिंता मत कर ऐसे आश्वासन दहेज प्रथा को बढ़ाने का काम करते है। ट्रेलर में साफ-साफ दिखता है कि हर हाल में दहेज का इंतजाम हो जाएगा। लेन-देन की रवायत पहला कारण है कि लड़कियों को एक भार के तौर पर देखा जाता है। उन्हें एक खर्चा समझा जाता है।  

महिलाओं का खुद का कोई जीवन नहीं होता है। जीवन के हर पड़ाव पर उसके फैसले एक मर्द को लेने है। ट्रेलर में भूमि पेडनेकर के किरदार की बात करने पर यही झलक मिलती है। एक ओर उसका प्यार अपनी माँ को दिए वचन और जिम्मेदारी के लिए उससे शादी नहीं कर रहा है दूसरी ओर उसका पिता छह महीने के भीतर दूसरे लड़के से दहेज के साथ उसकी शादी करने के लिए तैयार है यानी दोनों स्थिति में भूमि के किरदार को मर्दों के लिए फैसले के अनुसार जीवन जीना है। 

दहेज के लिए किडनी बेच दूंगा 

हर घंटे इस महान देश में कहीं न कहीं एक महिला दहेज के लिए प्रताड़ित हो रही होती है। वहीं, सिनेमा में संस्कृति और भाई-बहन के अनमोल रिश्ते की दुहाई देकर भाई अपनी किडनी बेचकर बहन की शादी कराने के डॉयलाग से पर्दे पर वाहवाही बटोरी जा रही है। सिनेमा के भावनाओं के खेल से अलग परंपराओं और इज्ज़त के नाम पर भारतीय समाज में दहेज के लिए उधार लिया जाता है, ज़मीन बेची जाती है, घर-ज़मीन गिरवी रखी जाती है। अपनी क्षमता से ज्यादा बेटी की शादी में खर्च कर दिया जाता है। वहीं, दहेज की थोड़ी सी भी कमी होने पर शादी वाले दिन तक बारात वापिस ले जाने की धमकी दी जाती है और दहेज के लिए होती हत्याओं में पिता अपनी बेटी तक को गवां देता है। जमीनी हकीकत यह है कि दहेज जैसे अपराध की सड़न में भारतीय समाज धंस चुका है और सिनेमा इस सड़न को दिखाकर मुनाफा कमाकर बॉक्स ऑफिस पर हिट साबित होना चाहता है। 

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शादी करके लड़कियों को उनके घर भेज दो

इस ट्रेलर देख बिल्कुल कहा जा सकता है कि इसमें पितृसत्तात्मक समाज के उन रूढ़िवादी विचारों को बढ़ावा दिया गया है जिनमें महिलाओं का खुद का कोई जीवन नहीं होता है। जीवन के हर पड़ाव पर उसके फैसले एक मर्द को लेने है। ट्रेलर में भूमि पेडनेकर के किरदार की बात करने पर यही झलक मिलती है। एक ओर उसका प्यार अपनी माँ को दिए वचन और जिम्मेदारी के लिए उससे शादी नहीं कर रहा है दूसरी ओर उसका पिता छह महीने के भीतर दूसरे लड़के से दहेज के साथ उसकी शादी करने के लिए तैयार है यानी दोनों स्थिति में भूमि के किरदार को मर्दों के लिए फैसले के अनुसार जीवन जीना है। 

भारतीय सिनेमा जगत खुद को कितना ही प्रगतिशील कहता है लेकिन फिल्मों के लिए मुद्दा आज भी यहां ‘शादी ओर उसके रिवाज़’ है। फैमिली ड्रामा, म्यूजिक और नाच-गाने के साथ भव्य दिखती शादी फिल्मी जगत के लिए महज तीन घंटे की फिल्म हो लेकिन यह रूढ़िवादी सोच असल में समाज को खोखला कर रही है। फिल्मों का यह ट्रेंड अदृश्य दिखने वाले लैंगिक भेदभाव को बढ़ाने का काम करती है। जिसमें बेटी की शादी को अपना कर्तव्य कहकर उसके जीवन की स्वायत्ता को खत्म किया जाता है।  

दूसरी ओर चुटीले अंदाज में बॉडी शेमिंग और पुत्र-प्राप्ति वाले डॉयलाग पर सिनेमा हॉल में सीटी बज सकती है, कुछ लोग हंस भी सकते हैं लेकिन फिल्म कहकर कुप्रथा को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता है। दहेज एक कॉमेडी का विषय नहीं है, जिसे फिल्म के ट्रेलर में असंवेदशीलता से दिखाया गया है। अंत फिल्म के ट्रेलर से आगे उम्मीद है कि कहानी में इस अपराध का शायद सिम्बॉलिक तौर पर ही विरोध कर एक ऐसा संदेश दिया गया हो जो हमें ट्रेलर में नज़र नहीं आया है।

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तस्वीर साभारः Zoom News

मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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