‘छेड़खानी’ शब्द कैसे पब्लिक स्पेस में होनेवाली हिंसा को नॉर्मलाइज़ करता है!
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समय के साथ महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा का प्रारूप क्रूर होता जा रहा है। वहीं, पितृसत्ता की गढ़ी मानसिकता में महिलाओं के ख़िलाफ़ होनेवाले अपराध को इतना सामान्य मान लिया जाता है कि न जाने कितनी हिंसा की घटनाओं को हमेशा नज़रअंदाज ही कर दिया जाता है। लिंग आधारित हिंसा का घाव कितना गहरा है उससे हिंसा की गंभीरता तय कर उसे ‘हिंसा’ माना जाता है। जब आप यह लेख पढ़ रहे होंगे तो कहीं न कहीं कोई महिला लैंगिक हिंसा का सामना कर रही होगी।

सड़क पर चलती लड़की को देखकर कोई भद्दी फब्तियां कस देगा, अश्लील इशारें कर देगा, छाती को दबाकर निकल जाए, हो सकता है कमर से निचले हिस्से पर तेजी से मारकर भाग जाए, यह भी हो सकता है कोई बेवजह ही रास्ते में साथ-साथ चलना शुरू कर दे और बात करने की कोशिश करे। यह सारी घटनाएं एक समय पर अलग-अलग जगह महिलाओं के साथ घटने की संभावना है। लेकिन दूसरी और समाज इसे ‘छेड़खानी’ कहकर आगे बढ़ने के लिए भी कह देगा। महिलाओं के ख़िलाफ़ होनेवाली हिंसा को महज ‘छेड़खानी’ तक सीमित रख इसे नज़रअंदाज करने के लिए कहा जाता है। 

गूगल में छेड़खानी टाइप करते ही लैंगिक हिंसा की ख़बरें सामने आने लगती हैं। मीडिया लड़कियों के स्कूल में जाते समय हुए उत्पीड़न की घटनाओं का ब्यौरा देकर पूर्णविराम लगा देता है। छेड़खानी या ईव टीजिंग कहकर प्रशासन भी मामले को हल्के में लेता नज़र आता है। शब्दों की अवधारणा सड़क पर, सार्वजनिक जगहों पर महिलाओं के ख़िलाफ़ होनेवाली हिंसा को गंभीरता से देखने के लिए मना करती है। 

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सड़कों पर होनेवाला उत्पीड़न क्या है?

सार्वजनिक जगहों पर पुरुषों द्वारा महिलाओं के साथ होनेवाली ‘छेड़खानी’ की परिभाषा में वर्बल और नॉन वर्बल, राह चलते अश्लील बातें या इशारे करना, सड़क पर चलते हुए उनके कपड़े खींचना, उनका पीछा करना, घूरना, सिटी बजाना, गाने गाना, भीड़ का फायदा उठाकर लड़कियों के शरीर से अपना प्राइवेट पार्ट लगा देना या चेन खोलकर उसे दिखा देना, धक्का-मुक्की के बीच लड़कियों की छातियां दबाकर बेधड़क निकल जाना आदि शामिल है। इस तरह का व्यवहार कहीं से भी छेड़खानी तो नहीं है। यह सरासर यौन उत्पीड़न के अलग-अलग रूप हैं जिन्हें छेड़खानी का नाम देकर सामान्य माना जाता है।

कविता (बदला हुआ नाम) सड़क पर चलते हुए अनुभवों को हमसे साझा करते हुए बताती हैं कि हमारे देश में हम लड़कियों के लिए सड़कों पर चलाना एक डिफिकल्ट टास्क है। वह कहती हैं, “बचपन में स्कूल के रास्ते में पहली बार मुझे सड़क पर परेशान किया गया था। मैं घबरा गई थी और चुप रही। उसके बाद कॉलेज बाहर के हजारों काम के दौरान कई बार सड़कों पर ‘छेड़खानी’ का सामना किया है। दरअसल हमें बचपन से ये सीख भी दी जाती है कि सड़कों पर तुम्हारे साथ ‘छेड़खानी’ होती है तो चुप रहकर नज़रअंदाज करना है।”

इससे आगे रश्मि शर्मा कहती हैं, “सड़कों पर होनेवाली छेड़खानी मन में एक डर ला देती है। मालूम है जब हम घर में किसी को अपने साथ होनेवाली घटना के बारे में बताएंगे तो सबसे पहले हमें ही सुनने को मिलता है। घर से बाहर निकलने के लिए मना कर दिया जाता है। मैं हमेशा से सड़कों पर होने वाली बद्तमीज़ी के ख़िलाफ़ बोलती रही हूं। जब भी कोई मुझे कुछ कहता मैं उल्टा उससे भिड़ बैठती। लेकिन बाद में इग्नोर करना ही मुझे हल लगा। छेड़खानी को हल्का-फुल्का मज़ाक मानकर भूलने की जो बात कही जाती है यह सबसे गलत है। क्यों हम भूल जाएं, क्यों चुप रहे कोई बेवजह आकर हमें परेशान करके चला जाए और हम चुप रहे ऐसे तो नहीं होना चाहिए।”

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सवाल यह है कि किसी को गलत तरीके से छूकर शारीरिक और मानसिक आघात पहुंचाना महज छेड़खानी कैसे हो सकती है। यदि कोई लड़की सड़कों पर होनेवाले ऐसे दुर्व्यवहार की वजह से एक ट्रॉमा से गुजरी है, अपने अधिकारों से वंचित हुई है तो यह हिंसा का एक गहरा रूप है जिसे महज ‘लड़कों का रवैया’ बताकर पुरुषवादी समाज खारिज करता आ रहा है। 

सड़क पर होने वाले उत्पीड़न के बारे में अपने अनुभव बताने वाली इन दोनों सर्वाइवर ने कहा है कि पब्लिक स्पेस में अपनी लैंगिक पहचान की वजह से उन्होंने दुर्व्यवहार का सामना किया है। उनके साथ जबरदस्ती की गई है उनके मन में डर बैठाया गया है। उनके शरीर को गलत तरीके से छूने की कोशिश की गई है। बावजूद इसके अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न को वह छेड़खानी कहकर संबोधित कर रही हैं। 

यह शब्द एक तय ट्रेनिंग की वजह से है जिसमें सड़क पर यौन हिंसा की इन घटनाओं को हल्का-फुल्का कहकर सामान्य बनाया गया है। सवाल यह है कि किसी को गलत तरीके से छूकर शारीरिक और मानसिक आघात पहुंचाना महज छेड़खानी कैसे हो सकती है। यदि कोई लड़की सड़कों पर होनेवाले ऐसे दुर्व्यवहार की वजह से एक ट्रॉमा से गुजरी है, अपने अधिकारों से वंचित हुई है तो यह हिंसा का एक गहरा रूप है जिसे महज ‘लड़कों का रवैया’ बताकर पुरुषवादी समाज खारिज करता आ रहा है। 

पितृसत्ता के व्यवहार की बारीकियों को समझना बहुत ज़रूरी है। इसमें महिलाओं पर हिंसा होती है और उसे सहने के लिए पूरी ट्रेनिंग भी दी जाती है जिसमें कहा जाता है कि छोटी-मोटी बातें तो होती रहती हैं। यही वजह है कि महिलाओं के साथ होनेवाले दुर्व्यहार को अलग-अलग कैटगिरी में बांटा गया है। यदि कोई शारीरिक चोट नहीं आई है, घाव गहरा नहीं है तो यह तो सामान्य सी बात है। सड़क पर चलते हुए यदि कोई मर्द अभद्रता करता है तो यह उसका एक गुण है।  

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पितृसत्ता ने जहां हिंसा करने का अधिकार पुरुषों को दिया है वहीं महिलाओं को उस पर चुप रहने के लिए कहा गया है। इस ट्रेनिंग में उन्हें पुरुषों की गलत हरकतों को सहना है क्योंकि बोलने से महिला की ही इज्ज़त जाएगी। लोग उसे ही उसका दोष देंगे। इसी वजह से यह धारणा रच गई है कि सड़क पर जो होता है वह छोटी बात है, कोई उत्पीड़न नहीं है। नज़रअंदाज करने को एक व्यवहार में शामिल कर दिया गया है। कंडीशनिंग के तहत गलत को गलत साबित करने से खुद सर्वाइवर भी पीछे हटना शुरू कर देती है। 

इतनी छोटी बात नहीं है

यदि कोई सर्वाइवर सड़क पर अपने ख़िलाफ़ होनीवाली हिंसा का जवाब देती है तो भीड़ इसे बहुत हल्के में लेती है। यहां भीड़ द्वारा किसी तरह की हिंसा को करने के लिए नहीं कहा जा रहा है। लेकिन जब भी पब्लिक स्पेस में अभद्रता पर कोई सर्वाइवर उसका जवाब देने को कोशिश करती है तो सबसे पहले उसे ही चुप रहने को कहते है। ‘अब लड़कियां सहने वाली नहीं रही हैं, ‘क्यों बेवजह ड्रामा कर रही हो’, ‘ज्यादा परेशानी है तो सड़कों पर मत निकला करो’ ये कुछ ऐसी प्रतिक्रियाएं हैं जो भीड़ से सुनने को मिलती हैं। यह समाज किसी की छाती पर तेजी से हाथ मारने को मामूली बात कह देता है, दुपट्टा खींचने को मज़ाक कह देता है। सर्वाइवर के विरोध करने पर उसका ही मज़ाक बनाता नज़र आता है, हंसते हुए आगे बढ़ जाता है या फिर चुप्पी साध लेता है जैसे उन्होंने कुछ देखा नहीं है। 

हिंसा पर लोगों की चुप्पी पर अपने अनुभव के बारे में बताते हुए श्वेता (बदला हुआ नाम) कहती हैं, “सड़कों पर होनेवाला यौन शौषण हम लड़कियों के लिए एक डेली रूटीन बन जाता है। एक बार मैं ऑटो से कोचिंग से अपने घर जा रही थी। बाज़ार में भीड़ होने की वजह से में ऑटो रुके होने के कारण सड़क चलते एक लड़के ने गुज़रते हुए मेरे गाल पर चिकोटी काट ली। मैं एकदम से शॉक हो गई। भीड़ और तेजी से निकलने की वजह से पता नहीं चल सका कौन था। लेकिन ऑटो में कोचिंग के कुछ स्टूडेंट्स और औरतें बैठी थीं। उन्होंने कुछ बोला नहीं। ऊपर से वे हंसने लगे। इससे मेरा गुस्सा और बढ़ गया। मैंने कहा आप कुछ कर नहीं सकते तो हंस कैसे सकते हैं। यह सड़क पर होनेवाली हिंसा का नॉर्मलाइजेशन है जिसमें पब्लिक ‘जाने भी दो’ वाली भाषा बोलती है यह बहुत ख़तरनाक है।”

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यदि कोई सर्वाइवर सड़क पर अपने ख़िलाफ़ होनीवाली हिंसा का जवाब देती है तो भीड़ इसे बहुत हल्के में लेती है। यहां भीड़ द्वारा किसी तरह की हिंसा को करने के लिए नहीं कहा जा रहा है। लेकिन जब भी पब्लिक स्पेस में अभद्रता पर कोई सर्वाइवर उसका जवाब देने को कोशिश करती है तो सबसे पहले उसे ही चुप रहने को कहते है। ‘अब लड़कियां सहने वाली नहीं रही हैं, ‘क्यों बेवजह ड्रामा कर रही हो’, ‘ज्यादा परेशानी है तो सड़कों पर मत निकला करो’ ये कुछ ऐसी प्रतिक्रियाएं हैं जो भीड़ से सुनने को मिलती हैं।

भीड़ की प्रतिक्रिया क्यों मायने रखती है

सड़क पर होनेवाली हिंसा को रोकने के लिए वहां मौजूद लोगों की प्रतिक्रिया बहुत मायने रखती है। हमारे देश में सार्वजनिक जगहों पर होनेवाली यौन हिंसा की घटनाओं को सामान्य बनाने का महत्वपूर्ण कारण लोगों की निष्क्रिय प्रतिक्रिया है। सर्वाइवर के साथ लोग भी जब विरोध कर आरोपी को चेतावनी देंगे तो इससे उसके हौसले पस्त होंगे। साथ ही भीड़ का पॉजिटिव रिएक्शन सर्वाइवर को एक हिम्मत देने का काम करेगा और हिंसा के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने में मदद करेगा। 

सर्वाइवर पर इसका क्या असर पड़ता है

लिंग आधारित यौन हिंसा सर्वाइवर के उत्थान और लैंगिक समानता की दिशा में बहुत बड़ी बाधा है। महिलाओं की सामाजिक स्थिति को कमजोर करने की वजह है। इससे सर्वाइवर का निजी विकास भी रुकता है। हिंसा उसकी गतिशीलता को सबसे ज्यादा प्रभावित करती है। वह खुद भी बाहर जाने से कतराती है। हिंसा की बात का ज़िक्र करते ही उसके बाहर जाने पर रोक लगाई जाती है। यह रोक विक्टिम ब्लेमिंग से शुरू होती है। 

दीक्षा (बदला हुआ नाम) का कहना है, “सड़क पर होनेवाला यौन उत्पीड़न लड़कियों पर गहरा असर ड़ालता है। ना चाहकर भी एक डर खुद अंदर आता है। हमें मालूम होता है कि विरोध करने पर सिर्फ हमारा ही मज़ाक बनना है। एक बार अपने घर के पास वाली सड़क पर चलते समय पीछे से एक बाइक सवार तेजी से मुझे मार कर चला गया। उस वक्त मैं अकेली नहीं थी, मेरा परिवार मेरे साथ था। आज भी जब मैं सड़क पर चल रही होती हूं तो वह घटना मुझे हमेशा याद आती है। दोबारा ऐसा कुछ न हो मैं रॉग साइड चलती हूं ताकि सामने से कौन आ रहा है ये पता चलता रहे।”

जेंडर के आधार पर होने वाली हिंसा सर्वाइवर के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करती है। उसकी आवाजाही में रुकावट बनती है जिससे उसके सामने आनेवाले विकल्पों को बंद कर दिया जाता है। इसकी कीमत आर्थिक रूप से अक्षम होकर चुकानी पड़ती है। सार्वजनिक जगहों पर लैंगिक हिंसा की घटनाएं होना समाज-परिवार का उसको नकारना और चुप रहने की प्रवृति सर्वाइवर में खुद के प्रति हीन और दयनीय भावना पनपती है जो उसके आत्मविश्वास को कम करने का काम करती है।  

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सड़कों पर होनेवाले यौन उत्पीड़न को लेकर क्या है सजा 

किसी भी इंसान के साथ हिंसा की घटना और दुर्व्यवहार उसके मौलिक अधिकार, ‘जीने के अधिकार’ का हनन है। महिलाओं के ख़िलाफ़ होनेवाली हिंसा उसके जीवन को प्रभावित करती है। सड़कों पर होनेवाले यौन उत्पीड़न के लिए सीधा कोई कानून नहीं है। भारतीय दंड संहिता की कई धाराओं की व्याख्या में यह शामिल है। आईपीसी की धारा 294 के तहत पब्लिक स्पेस में तेज आवाज़ में गाना गाने पर इस धारा के तहत मुकदमा दर्ज होता है। धारा 354 के अनुसार यदि कोई व्यक्ति पब्लिक स्पेस में किसी महिला के अपमान का कारण बनता है, उसे शारीरिक चोट पहुंचाता है तो उसे अधिक से अधिक पांच साल की सजा हो सकती है। यदि कोई किसी महिला के साथ भद्दे इशारे, अश्लील बातें कर उसका अपमान करता पाया जाता है तो उसे लिए आईपीसी की धारा 509 के तहत कार्रवाई की जाती है। 

किसी भी तरह की लैंगिक हिंसा का कोई आकार नहीं होता है जिसे नापकर नज़रअंदाज और भुला दिया जाए। चुप्पी हमेशा अपराध को बढ़ावा देती है। हिंसा के रूप को छोटा कहना उसको डिफेंड करना है। सर्वाइवर के साथ के लिए समाज और प्रशासन को अपने मौजूदा रवैये को बदलना होगा जिससे सड़कों पर होनेवाली हिंसा को खत्म किया जा सके। सबके लिए एक समावेशी माहौल तैयार किया जा सके। 

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तस्वीर साभारः Deccan Herald

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मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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