हिंसा को नज़रअंदाज़ कर कैसे मीडिया और सिनेमा ने गढ़ी ‘जिल्टेड लवर’ की छवि
हिंसा को नज़रअंदाज़ कर कैसे मीडिया और सिनेमा ने गढ़ी ‘जिल्टेड लवर’ की छवि
FII Hindi is now on Telegram

वो सिर्फ मेरी है, ये मेरी बंदी हैं, वो किसी और से शादी करे ऐसा हो नहीं सकता, अगर मैं प्यार कर सकता हूं तो मार भी सकता हूं, मेरी नहीं हुई तो किसी की नहीं होने दूंगा” ये बातें हमने कई बार सुनी है। महज ‘ना’ करने पर लड़की के ऊपर तेजाब फेंकना, उस पर जानलेवा हमला करना, मानसिक, शारीरिक रूप से उसे नुकसान पहुंचाना। हमारे सामाजिक परिवेश में इस तरह की घटनाओं को अंजाम देने वाले को सरफिरा आशिक यानि जिल्टेड लवर कहा जाता है। इस जिल्टेड लवर की आड़ में होनेवाली हिंसा को नॉर्मलाइज़ किया जाता है। जोर-जबरदस्ती से मौत तक पहुंची ऐसी घटनाओं में केवल नाम, जगह और हिंसा के रूप बदलते रहते हैं। एकतरफा प्यार, लड़की की ना और हिंसा करते जिल्टेड लवर आखिर कौन हैं? आइए विस्तार से जानते हैं इस लेख के माध्यम से।

जिल्टेड लवर कौन हैं

अक्सर एकतरफा प्यार की कहानियों में बात न मानने पर या किसी भी रिलेशनशिप में यदि लड़का-लड़की साथ है और अलग होने पर कोई एक साथी इस बात को स्वीकार न करें और अपनापन, हक जताने के साथ-साथ डरा-धमकाकर मारने की बातें करे तो यह व्यवहार जिल्टेड लवर के तहत आता है। नाराज़गी और गुस्से में यह भावना बहुत ज्यादा बढ़ जाती है और अपराध करने से भी पीछे नहीं हटता है।

जिल्टेड लवर की भावना आने और अपराध करने के पीछे के कारणों की व्याख्या करते हुए पेट्रिअट् डॉटकॉम में प्रकाशित एक लेख के अनुसार इस भावना को पनपने के पीछे सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक कारणों को मुख्य माना है। लेख के अनुसार यदि कोई इंसान सामाजिक स्तर पर तिस्कार या अपमान का सामना करता है और इसके बाद वह किसी के लिए विशेष स्नेह, प्यार की भावनाएं रखता है तो यह एहसास उसके लिए बहुत संतुष्टि वाला होता है। वहीं, जब उनकी प्यार की भावनाओं का स्वीकार नहीं किया जाता है तो उससे बात सहन नहीं होती है और वह गुस्से में अपराध तक कर देता है। मानसिक स्थिति पर गहरा प्रभाव पड़ने की वजह से लोग मरने-मारने के लिए तैयार हो जाते हैं। दरअसल, इनमें से कई अपराधी, अपराध करने के तुरंत बाद खुदकुशी तक कर लेते हैं।

और पढ़ेंः हिंसक मर्दानगी और रूढ़िवादी सोच का मिश्रण परोसती है फिल्म ‘पुष्पा’

Become an FII Member

जिल्टेड लवर यानी बदला लेनेवाला

प्यार, स्नेह के नाम पर हिंसा की वारदातों की ख़बरें आए दिन सुनने को मिलती रहती है। एसिड अटैक, गोली मारकर चले जाना, लड़की के घर जाकर गोली चला देना, शादी में दूल्हे को गोली मार देना जैसी घटनाओं का एक बड़ा कारण ‘जिल्टेड लवर’ ही होता है। लड़की के ‘ना’ कहने पर उससे बदला लेने के लिए उस पर हमला किया जाता है। उसे नुकसान पहुंचाने के लिए हिंसा में एसिड अटैक की वारदात को सबसे पहले अंजाम देने की कोशिश की जाती है।

एक स्टडी के अनुसार लड़कियों और महिलाओं के ख़िलाफ़ होनेवाली ऐसिट अटैक की घटनाओं की मुख्य वजह उनका शादी से मना करना और यौन संबंध बनाने से इनकार कर देना है। ना के बदले में उन पर तेजाब फेंकना, महिलाओं और लड़कियों के शरीर को कंट्रोल करना है। भारत में ऐसिड अटैक के 78 प्रतिशत केस इन्हीं वजह से घटित होते हैं। इंडिया टुडे में प्रकाशित लेख के मुताबिक 2014 से 2018 तक 1,483 ऐसिड अटैक की घटनाएं हुई। यूनिसेफ के अनुसार 18 साल से कम उम्र की लड़कियों के शादी और यौन संबंध बनाने से ना करने पर उन्हें सबसे ज्यादा ऐसिड अटैक की हिंसा का सामना करना पड़ता है। 

प्यार, स्नेह के नाम पर हिंसा की वारदातों की ख़बरें आए दिन सुनने को मिलती रहती है। एसिड अटैक, गोली मारकर चले जाना, लड़की के घर जाकर गोली चला देना, शादी में दूल्हे को गोली मार देना जैसी घटनाओं का एक बड़ा कारण जिल्टेड लवर ही होता है। लड़की की ‘ना’ कहने पर उससे बदला लेने के लिए उस पर हमला किया जाता है।

हिंसा की घटनाओं को कैसे दिखाता है हमारा मीडिया

दूसरी ओर इस तरह की घटनाओं को घटित होने के बाद ख़बर के तौर पर जिस तरह से पेश किया जाता है वह बहुत प्रॉब्लमैटिक है। मीडिया जिल्टेड लवर की स्टोरी को सनसनी की तरह परोसता नज़र आता है। अखबारों और वेबसाइट्स पर प्रेमी-प्रेमिका और सरफिरा आशिक शब्दों का इस्तेमाल सबसे ज्यादा किया जाता है। लैंगिक हिंसा की घटनाओं में मीडिया की भाषा में संवेदनशीलता पूरी तरह से गायब रहती है। जिल्टेड लवर की कहानी को मसाला लगाकर पेश करता है। मीडिया अपनी पूरी पेशकश में महिलाओं के साथ होनेवाली हिंसा के पक्ष को पीछे धकेल देता है। मीडिया ऐसी घटनाओं को नॉर्मलाइज़ करता दिखता है। इस तरह की घटनाओं की कवरेज में मीडिया अपने पितृसत्तात्मक पूर्वाग्रह भी छिपा नहीं पाता है और लड़की के चरित्र पर सवाल उठाने से भी पीछे नहीं रहता। 

और पढ़ेंः क्लिकबेट्स के बाज़ार में महिला-विरोधी कॉन्टेंट परोसता मीडिया

फिल्म तेरे नाम का एक सीन, तस्वीर साभार: iDiva

सिनेमा ने जिल्टेड लवर की छवि को कितना सेलिब्रेट किया

वहीं, बात जब सिनेमा की करें तो वह भी जिल्टेड लवर पर आधारित किरदारों को रचने में पीछे नहीं है। हिंदी फिल्मों में कहानियों और गाने के माध्यम से जिल्टेड लवर एक टॉक्सिक रिलेशनशिप को प्रमोट करने का काम करता है। एकतरफा प्यार की कहानियों के प्लॉट को बॉलीवुड में दशकों से दिखाया जा रहा है। साल कोई भी हो फिल्मों में यह ट्रेंड हमेशा मौजूद रहता है। हीरो का हीरोइन का पीछा करना, गाने गाना पर्दे पर सदाबहार रहा है। बॉलीवुड के नामी एक्टर इन किरदारों को निभाते नज़र आते हैं। सलमान खान से लेकर शाहिद कपूर तक जिल्टेड लवर के रोल में दिख चुके हैं। 

दरअसल, हमारे समाज में अभिनेताओं को रोल मॉडल के तौर पर माना जाता है, उन्हें फॉलो किया जाता है। फिल्मों में वे जो कुछ करते हैं उसे आसानी से समाज में अपना लिया जाता है। इस तरह स्क्रीन पर हीरोइन के प्यार में कलाई काटते हीरो, लड़की का पीछा करने, उससे प्यार करने के फरमान सुना देनेवाली बातों को बहुत सामान्य व्यवहार की तरह दिखाया जाता है। पर्दे पर हीरो के व्यवहार को आदर्श माननेवाले लोग उसके सही-गलत के पक्ष को न देखकर केवल हीरो के अंदाज को याद रखते हुए उसे फॉलो भी कर लेते हैं।

साल 1993 में आई फिल्म ‘डर’ इसी तरह के प्लॉट पर बनी है जिसमें फिल्म की हीरोइन जूही चावला का एक शख्स पीछा करना शुरू कर देता है। जिल्टेड लवर की भूमिका में इस फिल्म में शाहरूख खान नज़र आए थे। 2003 मे रिलीज हुई ‘तेरे नाम’ में एकतरफा प्यार की कहानी कही गई है। सलमान खान फिल्म में हीरोइन का पीछा करते नज़र आते हैं। अधिकतर हिंदी फिल्मों में लड़के के प्यार करने और उसके मनवाने के जतन को बहुत ग्लोरिफाई किया जाता है। 

फिल्म डर का एक सीन, तस्वीर साभार: DailyO

और पढ़ेंः बात बॉलीवुड के आइटम सॉन्ग में मेल गेज़ की

साल 2013 में आई फिल्म ‘रांझणा’ इसी कड़ी में अगला नाम है जिसमें हीरो, हीरोइन के एकतरफा प्यार में अपनी कलाई काट देता है। इससे आगे जब लड़की शादी दूसरी जगह हो रही होती है तो उसे तोड़ता है। इन सारी कहानियों में प्यार की कहानियों में पुरुषों के द्वारा की गई हिंसा को सामान्य करने की कोशिश की गई है। इसी कड़ी में अगला नाम फिल्म ‘कबीर सिंह’ का आता है। साल 2019 में बॉलीवुड में एकतरफा प्यार, जबरदस्ती और टॉक्सिक रिलेशनशिप को पर्दे पर उतारा गया। इसमें हीरो जिल्टेड लवर की भूमिका में शाहिद कपूर अपनी पार्टनर को ऑर्डर देता, उससे ऊंची आवाज़ में बात करता है, उसके कपड़ों, उसके तौर-तरीके को कंट्रोल करता और उसकी सुरक्षा के नाम पर औरों से मार-पिटाई तक करता नज़र आता है। आखिर में हैप्पी एंड के तौर पर हीरो-हीरोइन को मिलता भी नज़र आता है। बॉलीवुड, बॉक्स ऑफिस की सक्सेस और दर्शकों की पसंद को बताते हुए इस तरह के किरदारों को गढ़ने की पैरवी करता दिखता है। 

सिनेमा और मीडिया बहुत ही आसानी से जिल्टेड लवर के नाम पर होनेवाली लैंगिक हिंसा की घटनाओं का ज़िक्र बहुत सहजता से करता दिखता है। मीडिया के लिए जहां ये सनसनी वाली ख़बर होती है जिसमें सर्वाइवर के प्रति कोई सहानुभूति नहीं होती है। वहीं, फिल्मों में एकतरफा प्यार की कहानियों को रोमांटिसाइज़ किया जाता है। बॉलीवुड की कहानियों ने एक जुनूनी प्रेमी के रोल को बहुत सामान्य बना दिया है। ‘लड़की की हाँ में भी ना है’ जैसी बातों को समाज में प्रचलित करने का काम किया गया है। 

और पढ़ेंः संवेदनशीलता भूलकर, जेंडर से जुड़ी खबरों को सनसनीखेज़ बनाता मीडिया


+ posts

मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

Follow FII channels on Youtube and Telegram for latest updates.

नारीवादी मीडिया को ज़रूरत है नारीवादी साथियों की

हमारा प्रीमियम कॉन्टेंट और ख़ास ऑफर्स पाएं और हमारा साथ दें ताकि हम एक स्वतंत्र संस्थान के तौर पर अपना काम जारी रख सकें।

फेमिनिज़म इन इंडिया के सदस्य बनें

अपना प्लान चुनें

Leave a Reply