घर के कामों बीतती औरतों की ज़िंदगी
तस्वीर साभार: The Hindu
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भारतीय समाज में महिलाओं को घर के कामों के ही अनुकूल माना गया है। घर में महिलाओं का मुख्य काम भोजन की व्यवस्था करना और बच्चों के लालन-पालन तक ही सीमित कर दिया गया है। अक्सर ऐसा देखा गया है कि घर में लिए जानेवाले फ़ैसलों में भी महिलाओं की कोई भूमिका नहीं रहती है। बचपन से ही लड़कियों को कहा जाता है कि घर के काम सीख लो ताकि तुम्हें आगे चलकर कोई दिक्कत ना हो। हमारा समाज यही मानता है कि अगर घर के काम लड़कियां नहीं सीखेंगी तो उनकी शादी नहीं होगी। मुझे समझ नहीं आता कि अगर किसी भी महिला को घर के काम नहीं आते होंगे तो क्या उसके जीवन में सिर्फ दिक्कतें ही होंगी और शादी का पैमाना घर के कामों तक ही सीमित क्यों है? लड़कों से तो ऐसा नहीं कहा जाता कि घर के काम सीख लो वरना शादी नहीं होगी।

यह देन है हमारे पितृसत्तात्मक समाज की जिसके मुताबिक घर के काम सिर्फ महिलाएं और लड़कियां ही करेंगी। परिवार को एक महिला ही अच्छे से चला सकती है और खुश रख सकती है। ऐसे बहुत से काम हैं जो सिर्फ महिलाओं के लिए तय कर दिए गए। बिना उनकी मर्ज़ी जाने ये काम उनसे करवाए जाते हैं। हमेशा यही कहा जाता है कि एक लड़की को तो ये सारे काम करने ही पड़ते हैं।

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“हाड़ी ता आधी जिंदगी कमे करदे निकलये, गाय दा दूध कड़ते कडते निकल्ये। क्या करी सकते उन बचा। हाड़ा कम ही आई है।”

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यह जो ऊपर लिखा गया है यह पहाड़ी भाषा है, जिसका मतलब यह है, “हमारी आधी जिंदगी काम करते निकल गई, गाय का दूध निकालते-निकालते निकल गई। क्या कर सकते हैं। हमारा काम ही यही है।” मुझे आज भी याद है जब मैं छोटी थी तब मैंने यह बात अपनी एक आंटी के मुंह से सुना था। उस समय तो मुझे कुछ समझ नहीं आया था पर पता नहीं कैसे अभी तक यह बात आज तक मेरे ज़हन में बैठी हुई है। मैं काफी सालों से हिमाचल में रह रही हूं और मैंने यहां बहुत कुछ देखा है जो मुझे हमेशा परेशान करता है। हमारे पहाड़ों में महिलाओं का जीवन एकदम अलग होता है। उन्हें बाहर की दुनिया का कुछ अता-पता नहीं होता है। अधिकतर औरतें केवल अपने कामों मे व्यस्त रहती हैं। वे खेती, गाय चराना, दूर-दूर से पानी लाना जैसे बहुत से कामों में व्यस्त रहती हैं। महिलाओं को इन कामों के साथ-साथ घर के बाकी काम की जिम्मेदारी भी संभालनी पड़ती है।

बचपन से ही लड़कियों को कहा जाता है कि घर के काम सीख लो ताकि तुम्हें आगे चलकर कोई दिक्कत ना हो। हमारा समाज यही मानता है कि अगर घर के काम लड़कियां नहीं सीखेंगी तो उनकी शादी नहीं होगी। मुझे समझ नहीं आता कि अगर किसी भी महिला को घर के काम नहीं आते होंगे तो क्या उसके जीवन में सिर्फ दिक्कते ही होंगी और शादी का पैमाना घर के कामों तक ही सीमित क्यों है?

आस-पास की ज्यादातर औरतों ने अपनी इस जिंदगी के साथ समझौता कर लिया है। उनको घास लाने के लिए खड़ी चढ़ाई में जाना पड़ता है और बड़ी-बड़ी डालों को अपने सिर या पीठ पर उठाकर लाना होता है। पूरा-पूरा दिन खेतों में काम करना। दूसरों के खाने का ध्यान रखना और अपने खाने का कुछ अता-पता नहीं होना। उनको तो यह भी नहीं पता होता है कि शहरो में क्या चल रहा है, देश में क्या हो रहा है। गांव की औरतों को हमेशा केवल अपने गांव तक ही सीमित रखा जाता है। 

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“अइया उन” 

मेरे पड़ोस मे एक आंटी रहती हैं। उनका नाम सरता है। वह दिनभर मुझे काम में ही व्यस्त नज़र आती हैं। मैं जब भी उन्हें देखती हूं तो वह या तो मुझे खेतों मे काम करती हुई दिखती हैं या गोबर ले जाती हुई या अपनी दुकान में बैठी हुई। पहले मुझे यह लगता था कि यह तो ज्यादा काम है ही नहीं पर जब मैं बड़ी हुई तो तब उस काम की अहमियत समझ आई। अपने घर में काम करनेवाली वह अकेली औरत हैं। वह सुबह-सुबह उठकर गाय का दूध निकालने जाती, उसके बाद पानी भरने। पानी भरने के बाद अपने घर के आंगन मे झाड़ू करती हैं। यह छोटे-छोटे काम करते-करते रोशनी हो जाती है। फिर वह अपनी दुकान खोलती हैं और फिर से घर के कामों लग जातीं। घर का काम करते-करते गाय और दुकान दोंनो की ज़िम्मेदारी उनकी ही है। ये सब काम करने के बाद उन्हें खेतों में भी काम करने जाना होता है। हर वक्त उनके घर के मर्द बस उन्हें यही आवाज़ लगाते रहते हैं -“अइया उन।”

जब मैंने उनसे पूछा कि वह आराम कब करती हैं तो उन्होंने हंसकर अपनी भाषा मे कहा, “आराम करने दा कोई टाइम नी ओंडा, काम ही इतना ओंदा ता काल्लू आराम करना। तू तान जांदी है मैं नी ओंगी एक दिन भी करे ता बड़ी मुस्किल ओनी। मैं नी करना कम ता कुनी करना बचा।” यानी आराम करने का कोई टाइम नहीं होता, तू तो जानती ही है मैं नहीं रहूंगी एक दिन तो घर में बहुत मुश्किल होगी। मैंने नहीं करना तो किसने करना काम। जब वह ये बोल रही थी तो उनके चेहरे मे हंसी थी पर अंदर से वह खुश नहीं थीं यह साफ़ नज़र आ रहा था।

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मेरी मां भी केवल 12वीं तक की अपनी शिक्षा पूरी कर पाई थीं और 18 साल की उम्र में ही उनकी शादी हो गई थी। उसके बाद 20 साल की उम्र में उनका पहला बच्चा हो गया था और 2 साल के बाद उनका दूसरा बच्चा भी हो गया। इस तरह वह केवल घर के कामों में ही सीमित रह गई थीं। न ही वह अपनी पढ़ाई पूरी कर पाईं और न ही अपनी ख्वाहिशों को अपने तरीके से जी पाईं। मुझे आज भी अच्छे से याद है कि जब मेरी मां ने कमाना शुरू किया तो उनको आस-पास के लोग बहुत ताना देते थे। उन लोगों के मन में हमेशा यही रहता था कि अकेली औरत कैसे दो बच्चों को पाल रही है और कैसी नौकरी कर रही है।

पहाड़ों में रहनेवाली औरतों के बारे में जब भी बात की जाती है तो हमेशा उनकी मेहनत का ज़िक्र किया जाता है। बस यही कहा जाता है कि पहाड़ी औरतें कितना काम करती हैं। लेकिन जब हमारे गांव की औरतें काम से परेशान हो जाती हैं तो उनके मुंह से एक ही बात निकलती है- “काश हम भी पढ़े होते तो आज ये दिन नहीं देखने पड़ते।” इस घर के कामों में लगनेवाली इस मेहनती छवि के पीछे न जाने कितनी औरतों के सपने अधूरे रह गए। हमारे गांव में जब शहरी औरतें आती हैं तो उनको देखकर मेरी गांव की महिलाएं सोचती हैं कि शहरी औरतें कितने अच्छे से अपनी जिंदगी जी रही हैं, गाड़ी में घूम रही हैं, अपनी मर्ज़ी के कपड़े पहन रही हैं।” उनकी इन बातों से पता चलता है कि उनके भी कितने सपने हैं, जो पूरे नहीं हुए। मेरी नानी, दादी, माँ, आस-पास की न जाने कितनी औरतों की जिंदगी घर के कामों और बच्चों को संभालते-संभालते निकल गई। जब भी मैं उनसे पूछती हूं कि उनका सपना क्या था को कोई कहता है उन्हें टीचर बनना था, किसी को पुलिस में जाना था पर सबकी ज़िंदगी अब बस घर के कामों में ही बीतती जा रही है।

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तस्वीर साभार: The Hindu

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