कभी सोचा है कि औरतों को घर के काम से एक भी छुट्टी क्यों नहीं मिलती है?
तस्वीर साभार: Business Standard
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मैं सप्ताह के छह दिन एक सामाजिक संस्था में काम करती हूं और हर संडे ऑफ़िस के काम से मेरी छुट्टी होती है। इस दिन ऑफ़िस जाने से तो छुट्टी मिलती है, लेकिन घर के काम से कोई छुट्टी नहीं मिलती बल्कि कई बार तो छुट्टी के दिन का घर का काम कई गुना ज़्यादा बढ़ जाता है। छुट्टी के दिन तो सप्ताहभर के कपड़े धोना, साफ़-सफ़ाई का काम करने जैसे कई काम होते हैं। सप्ताह के बाक़ी छह दिन घर के काम को निपटाने के साथ-साथ ऑफ़िस का भी काम संभालना होता है।

मेरे ही गाँव में रहनेवाली अमरावती गृहणी हैं और उनके ऊपर अपने घर के साथ-साथ गाय की देखरेख करने और खेतों के काम का ज़िम्मा होता है। चालीस वर्षीय अमरावती से जब मैंने महिलाओं की छुट्टी को लेकर बात की उन्होंने बताया कि ये सब तो पढ़े-लिखे और मर्दों के चोचले हैं। महिलाओं को तो जन्म होने के बाद से ही काम करने की सीख दी जाती है। घर संभालना, खेत संभालना, परिवार का ध्यान रखना, पर्व-त्योहार मनाना, जैसे सब काम अपने ज़िम्मे होते हैं। अब अगर औरतें एक दिन भी छुट्टी ले लें तो पूरे परिवार में त्राहिमाम मच जाए। जब औरतें दो-चार दिन बीमार भी होती हैं तो पूरा परिवार अस्त-व्यस्त हो जाता है।

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देईपुर गाँव की नेहा कहती हैं, “शादीशुदा महिलाएं हमेशा कहती हैं कि अभी जब तक तुम्हारी शादी नहीं हुई तब तक आराम कर लो, उसके बाद जो घर-परिवार शुरू होगा कि एकदिन की भी फुर्सत नहीं मिलेगी। सच बताऊं तो हमें लगता है कि घर के काम के लिए शादी होने या न होने से कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ता है। आज जब संडे के दिन मैं घर पर रहती हूं तो मुझे कोई आराम नहीं मिलता, बल्कि मुझे मम्मी के काम में हाथ बंटवाने के साथ-साथ खेत के काम पर भी जाना पड़ता है। हां शादी से यह फ़र्क़ ज़रूर पड़ता है कि वहां आप ‘ना’ तो बिल्कुल भी नहीं कर सकते, पर जब आप अपने माता-पिता के घर होते हैं तो थकान होने पर वह आपको समझते हैं। लेकिन काम तो हर हाल में करना होता है।”

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बढ़ते काम के दबाव के बीच महिलाओं को परिवार की रीढ़ का जाने लगता है, जिसमें यह कहा जाता है कि अगर तुम बैठ गई तो पूरे परिवार का क्या होगा। बचपन से मिलने वाली यह सीख महिलाओं को कभी न रुकने वाली और कभी न थकने वाली मशीन का रूप देने लगती है, जिसमें वह कभी भी छुट्टी के बारे में सोच भी नहीं पाती हैं।

कामकाजी महिला, घर संभालने वाली महिला, बिज़नेस करने वाली महिला, शादीशुदा महिला, किसान महिला या सिर्फ़ महिला, इन सबका कोई छुट्टी का दिन नहीं होता है। खासकर ग्रामीण क्षेत्र में या फिर मध्यमवर्गीय परिवार में। महिलाएं चाहे कमाई करने बाहर जाए या न जाए पर घर संभालने का काम हमेशा उनकी ही ज़िम्मेदारी होती है। घर के कामों से उनकी एक भी दिन की छुट्टी नहीं होती है। जब मैं इंटरनेट पर महिलाओं की छुट्टी के बारे में खोजने की कोशिश कर रही थी तो बार-बार महिला दिवस का ज़िक्र सामने आ जा रहा था। बिल्कुल महिला दिवस के माध्यम से महिलाओं के नाम पर एक दिन तो बनाया गया, लेकिन इस दिन हमारे गाँव की औरतें या हमारे घर की औरतें चैन की सांस ले पाती हैं ये कहना मुश्किल है। अगर हम महिलाओं को एक भी दिन की छुट्टी न मिलने की वजह तलाशने की कोशिश करें तो कुछ बातें सामने निकलकर आती हैं।

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“थकना महिला का काम नहीं क्योंकि वो परिवार की रीढ़ है”

महिलाओ को अक्सर इस सीख के साथ बड़ा किया जाता है कि तुम्हें काम करते हुए थकना नहीं है। जितनी तेज़ी से उम्र नहीं बढ़ती उससे कई गुना तेज़ी से आज भी हमलोगों के गाँव में लड़कियों के सिर पर काम का बोझ बढ़ा दिया जाता है। बढ़ते काम के दबाव के बीच महिलाओं को परिवार की रीढ़ का जाने लगता है, जिसमें यह कहा जाता है कि अगर तुम बैठ गई तो पूरे परिवार का क्या होगा। बचपन से मिलने वाली यह सीख महिलाओं को कभी न रुकने वाली और कभी न थकने वाली मशीन का रूप देने लगती है, जिसमें वह कभी भी छुट्टी के बारे में सोच भी नहीं पाती हैं।

घर में जेंडर आधारित भेदभाव की व्यवस्था

मुझे याद है कि जब भी समुदाय में महिलाओं और किशोरियों के साथ मैं जेंडर आधारित भेदभाव पर बात करती हूं तो मेरा पहला सवाल यही होता है कि आपके घर में पुरुष कब खाना बनाते हैं। नब्बे प्रतिशत ज़वाब यही आता है कि जब घर में महिलाएं बीमार हो या कहीं बाहर गई हो। इसके अलावा कभी भी वे खाना नहीं बनाते। इससे हम अंदाज़ा लगा सकते हैं कि हमारे घरों में जेंडर आधारित भेदभाव को काम के बंटवारे में कैसे लागू किया गया है, जिसके चलते पुरुष कभी भी घर के काम या रसोई की तरफ़ मुंह भी नहीं फेरते। महिलाएं ज़रूर आर्थिक तंगी होने पर घर के काम के साथ-साथ बाहर का काम करने लगती हैं। अपने परिवार में जेंडर आधारित ये भेदभाव भी महिलाओं को इस बात के बारे में सोचने से भी रोकता है कि वे अपने लिए एक दिन भी आराम के लिए निकाल सकती हैं। अगर उनके घर में पुरुष सहयोगी होते तो शायद वे भी अपने लिए आराम के कुछ पल निकाल पातीं।

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पितृसत्तात्मक सोच इसका मुख्य कारण है, क्योंकि ये हमेशा पुरुष को महिलाओं से बेहतर मानती है, इसलिए आराम करने और अपने लिए समय निकालने का संसाधन या ये कहे कि ख़ास विशेषाधिकार इस पूरी व्यवस्था ने पुरुषों को दिया है।

तीज-त्योहार की पूरी ज़िम्मेदारी महिलाओं के हिस्से

साप्ताहिक छुट्टी के बाद जो भी बड़े त्योहार होते हैं उसमें छुट्टी की बात आती है। कामकाजी महिलाओं को अपने ऑफ़िस से छुट्टी मिलती है, लेकिन तीज-त्योहार के मौक़े पर सभी महिलाओं के ऊपर काम का बोझ कई गुना बढ़ जाता है। उन्हें ही हर त्योहार में पकवान बनाने से लेकर पूजा-पाठ की सारी रस्म और रीति निभानी होती है। इस दिन घर में पुरुष और बच्चों की छुट्टी होती है और इसके साथ त्योहार पर उनकी ख़ास फ़रमाइश भी, जिसे पूरा करते-करते महिलाओं का पूरा दिन सिर्फ़ काम में बीत जाता है।

ये कुछ ऐसी वजहें जो महिलाओं को एक भी छुट्टी का दिन नहीं देती है। इन सबके बीच पितृसत्तात्मक सोच इसका मुख्य कारण है, क्योंकि ये हमेशा पुरुष को महिलाओं से बेहतर मानती है, इसलिए आराम करने और अपने लिए समय निकालने का संसाधन या ये कहे कि ख़ास विशेषाधिकार इस पूरी व्यवस्था ने पुरुषों को दिया है। इसकी एक वजह ये भी लगती है कि क्योंकि पुरुष सिर्फ़ वही काम करते हैं जिनके उनको पैसे मिलते हैं। इसलिए उनकी मेहनत की अहमियत होती है और उनके लिए आराम ज़रूरी समझा जाता है। लेकिन महिलाओं के घर के काम जिसकी कोई क़ीमत नहीं मिलती है, इसलिए इस काम से कोई छुट्टी नहीं सोची जाती है। ये कुछ ऐसे पहलू हैं, जिन पर हमें सोचना चाहिए, क्योंकि अपने लिए एक भी दिन आराम का न निकाल पाना कहीं न कहीं हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है और सप्ताह में छुट्टी तो हर इंसान का अधिकार भी है। सोचिएगा कभी जब आपको अपनी छुट्टी से फुर्सत मिले तो।

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रेनू वाराणसी ज़िले के रूपापुर गाँव की रहने वाली है। ग्रामीण महिलाओं और किशोरियों के साथ समुदाय स्तर पर रेनू बतौर सामाजिक कार्यकर्ता काम भी करती हैं और अपने अनुभवों व गाँव में हाशिएबद्ध समुदाय से जुड़ी समस्याओं को लेखन के ज़रिए उजागर करना इन्हें बेहद पसंद है।

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