कैसे छोटे शहरों-कस्बों की लड़कियों की आज़ादी छीन लेता है पितृसत्ता का सर्विलांस
तस्वीर साभार: News 18
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भारतीय समाज औरतों को बचपन से ही देवी की तरह पूजने का दावा करता रहा है। मनुस्मृति में तो यहां तक कहा गया है, ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता’ यानी जिस समाज में नारी को पूजा जाता है वहां देवता विराजते हैं। लेकिन क्या वाकई भारतीय समाज की औरतों की दशा को देखकर ऐसा लगता है? क्या महिलाओं को सम्मान दिया जाता है? क्या औरतों, लड़कियों को अपने मनमुताबिक जीवन जीने की आज़ादी है? क्या लड़कियां खुद के लिए फ़ैसले ले सकती हैं? जब आप इस तरह के तमाम सवालों पर नज़र डालेंगे तो पाएंगे कि इस समाज ने महिलाओं को घर के अंदर नज़रबंद करने या यूं कहे कि जानवरों के जैसे खुटे से बांधने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। हर तरफ़ लड़कियों पर पितृसत्ता का सर्विलांस रहता है। घर से लेकर बाहर तक उनके आस-पास यह सर्विलांस मंडराता रहता है।

छोटे शहरों, कस्बों और गांवों में तो हर एक इंसान अपने आसपड़ोस की लड़कियों के बारे में अपडेट देते हुए गर्व महसूस करता है। लड़कियां कब स्कूल जाती हैं, कब आती हैं, किससे मिलती हैं, किस होटल में जाती हैं, किस रेस्टोरेंट में जाती हैं, किस पार्क में जाती हैं, इस तरह के तमाम शेड्यूल लोग नोट करके रखते हैं। गांव-देहात, छोटे कस्बों की लड़कियां पढ़ने-लिखने या अपने सपने पूरे करने जब बड़े शहरों का रुख़ करती हैं तो यहां भी लोग लड़कियों को आज़ाद नहीं देखना चाहते। अगर देखा जाए तो महानगरों में लड़कियों पर नज़र रखने की लोगों के पास फुर्सत तो नहीं होती लेकिन फिर भी कुछ-कुछ रिश्तेदार उसी में समय निकालकर उस लड़की के परिवार को पल-पल की ख़बर देते रहते हैं।

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जब मैं ग्रेजुएशन की पढ़ाई करने के लिए बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में गई तो हॉस्टल आवंटन की प्रक्रिया में देरी होने के कारण, मुझे बाहर किराये के मकान की तलाश करनी पड़ी थी। मुझे अच्छी तरह से याद है कि जब मैं रूम की तलाश  में निकली तो एक मकान मालिक ने कहा था, “रूम इस शर्त पर दिया जाएगा कि कभी किसी लड़के को रूम पर नहीं लाना होगा और 10 बजे के पहले ही आपको रूप पर वापस लौटना होगा।”

भारतीय पितृसत्तात्मक समाज में जब लड़कियां शहरों की ओर शिक्षा, सुरक्षा और सुविधा की तलाश में जाती हैं तो कई तरह की विषम परिस्थितियों से उन्हें गुजरना पड़ता है। इन विषम परिस्थितियों में से किराये पर मकान लेकर रहना एक विकट समस्या है। कमरा रेंट पर लेने की समस्या को लेकर मैंने कई युवतियों से बात की, साथ ही मैं खुद भी कई तरह के अनुभवों से गुज़री हूं। जब मैं ग्रेजुएशन की पढ़ाई करने के लिए बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में गई तो हॉस्टल आवंटन की प्रक्रिया में देरी होने के कारण, मुझे बाहर किराये के मकान की तलाश करनी पड़ी थी। मुझे अच्छी तरह से याद है कि जब मैं रूम की तलाश में निकली तो एक मकान मालिक ने कहा था, “रूम इस शर्त पर दिया जाएगा कि कभी किसी लड़के को रूम पर नहीं लाना होगा और 10 बजे के पहले ही आपको रूप पर वापस लौटना होगा।”

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कभी-कभी तो मुझे लगता है कि अगर एक लड़की का एक लड़के से मिलना-जुलना अगर इतना ही संदेह भरा है तो हम लड़कों के लिए एक अलग ग्रह क्यों नहीं बसा लेते। मैं जब अपनी दोस्तों के साथ रूम की तलाश में निकली तो तरह-तरह के ऐसे ही कई सवालों का हमने सामना किया। कुछ सवाल तो सभी जगहों पर एक जैसे थे। जैसे पहला प्रश्न मकान मालिक का यही होता है कि यहां लड़के तो नहीं आएंगे न? यदि लड़का आपका भाई है तो इसका सबूत देना पड़ता है और बहस करनी पड़ती है।

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ग्रेजुएशन की छात्रा विभा बताती हैं कि उनका मकान मालिक तो यहां तक कहता है कि इतनी दूर अकेले रहने क्यों आई हो? तुम्हें पढ़ाई ही करनी थी तो आस-पास की किसी यूनिवर्सिटी से कर ली होती इतनी दूर पढ़ाई करने आने की ज़रूरत ही क्या थी। साथ ही विभा को यह भी हिदायत दी कि वह भाई के नाम पर किसी लड़के को रूम पर नहीं लाएगी और 10 बजे के बाद कर्फ्यू शुरू हो जाएगा। वहीं, बीएचयू के ग्रेजुएशन की एक और छात्रा श्वेता बताती हैं, “जब मैं रूम देखने गई तो मकान मालकिन ने कहा कि रूम तो मेरे यहां खाली है और ले सकती हो लेकिन किसी लड़के का चक्कर नहीं होना चाहिए और न ही रूम पर किसी लड़के को लाने की इज़ाजत है और 11 बजे से पहले आपको रूम पर वापस लौट जाना है।”

सुरक्षा और इज्ज़त के नाम पर लड़कियों को ताउम्र पाबंदियों में रखा जाता है। लड़कियों को भी संविधान ने बराबरी और आज़ादी से जुड़े सारे हक़ दिए हैं लेकिन ताज़्ज़ुब की बात है कि हमारा पितृसत्तात्मक समाज लड़कियों को इन संवैधानिक अधिकारों से दूर कर खुद को एक बेहतरीन समाज के रूप में पेश करता है।

इतना ही नहीं छोटे शहरों, कस्बों और गांवों में लड़कियां प्रेम करने का सोच भी नहीं सकती हैं। किसी लड़के से मिलना तो जैसे अपराध माना जाता है। यहां लड़कियों के ऊपर पाबंदियों की भरमार है। उन्हें घर से निकलने से पहले 10 बार सोचना पड़ता है। छोटे शहरों, कस्बों और गांव की कुछ गिनी-चुनी नौकरीपेशा महिलाएं जब अपने काम के कारण अगर घर देरी से पहुंचती हैं तो उनके चरित्र पर उंगली उठाई जाती है। मेरे गांव की ही एक घटना है जहां एक लड़की एक लड़के से मिलने होटल गई थी। तभी गांव के किसी सदस्य ने उस युवती के घर फ़ोन लगाकर यह सूचना दे दी और गांव के दो-चार लोगों ने मिलकर होटल पहुंचकर उसकी बेइज्जती की और उसे उसके घर छोड़ आए। व्यस्क लड़कियों से इस तरह का बर्ताव कहां तक उचित है?

एक तरफ इस तरह का बर्ताव करना हमारे पितृसत्तात्मक समाज की संकीर्ण सोच को प्रदर्शित करता है वहीं हम दूसरी तरफ देखते हैं कि 18 की उम्र में एक युवक और युवती इतने सशक्त हो जाते हैं कि संवैधानिक व्यवस्था उन्हें सरकार चुनने के काबिल समझता है। लेकिन ये समाज के रखवाले उन्हें अपने तरीके से जीवन जीने की इजाज़त तक नहीं देते। सुरक्षा और इज्ज़त के नाम पर लड़कियों को ताउम्र पाबंदियों में रखा जाता है। लड़कियों को भी संविधान ने बराबरी और आज़ादी से जुड़े सारे हक़ दिए हैं लेकिन ताज़्ज़ुब की बात है कि हमारा पितृसत्तात्मक समाज लड़कियों को इन संवैधानिक अधिकारों से दूर कर खुद को एक बेहतरीन समाज के रूप में पेश करता है।

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मैंने ग्रेजुएशन की पढ़ाई इतिहास में बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से की है और अभी मैं ‘रूरल डेवलपमेंट' में मास्टर्स कर रहीं हूं।यदि मेरे व्यक्तित्व को देखा जाए तो इसमें कस्बाई खारापन, खट्टा मीठा खुलापन देखने को मिल सकता है।मैं अक्सर नये लोगों से मिलना और उनके संघर्ष के किस्सों का सोशल मैकेनिज्म बनाना पसंद करती हूँ।फिलहाल तो मैं सोशल साइंटिस्ट के गलियारों को समझ रही हूँ और इसी दिशा में कैरीयर की तलाश में हूँ।कविता ,गजल और गाने सुनना, नयी-नयी जगहों पर जाना, बच्चों के साथ खेलना मेरी जिन्दगी में चार चाँद लग जाने जैसे हैं।

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2 COMMENTS

  1. बहुत सही कहा है आपने कस्बों और विशेष कर ग्रामीण इलाकों में कोई परिवर्तन नहीं है ।
    इन क्षेत्रों में अभी भी लकड़ियों के 18 वर्ष होते ही उनके परिजन विवाह कर देते हैं । ना ही शिक्षा में किसी को रुचि है न ही जरिया किसी तरह वे 12 वीं पास करते हैं । उसके उपरांत आस – पास कालेज ना होने के बाद उन्हें पढ़ाई छोड़नी पड़ती है।

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