केरल हाई कोर्ट
तस्वीर साभार: Medical Dialogues
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हाल ही में केरल हाई कोर्ट ने फैसला दिया कि दो वयस्क पार्टनर्स के बीच सहमति से सेक्स के बाद शादी करने से इनकार करना पुरुष पार्टनर के प्रति बलात्कार के अपराध का गठन करने के लिए काफी नहीं है। शादी से पहले सहमति स सेक्स करना किसी व्यक्ति की स्वायत्तता का एक हिस्सा है। दो सहमति देनेवाले वयस्कों को अपने अलावा किसी और के प्रति जवाबदेह नहीं किया जा सकता है। केरल हाई कोर्ट के फैसले को समझने से पहले यह समझना ज़रूरी है कि बलात्कार के अपराध के केंद्र में ‘सहमति’ एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। सहमति की प्रकृति या उसकी कमी के आधार पर, कानून में बलात्कार की तीन श्रेणियां हैं:

1. बल द्वारा बलात्कार: जहां सर्वाइवर द्वारा सहमति से स्पष्ट रूप से इनकार किया गया हो; या जहां सहमति दबाव या जबरदस्ती के तहत दी गई है; या जहां सर्वाइवर अपनी शारीरिक या मानसिक स्थिति के कारण सहमति देने में असमर्थ थी।

2. वैधानिक बलात्कार: जहां सर्वाइवर छोटी उम्र के कारण सहमति देने की स्थिति में नहीं थी। ऐसे में उसकी दी गई सहमति भी नकारात्मक मानी जाती है। 

3. कपट द्वारा बलात्कार: जहां सर्वाइवर से छल के प्रयोग से सहमति प्राप्त की गई हो।

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हाल ही में केरल हाई कोर्ट ने फैसला दिया कि दो वयस्क पार्टनर्स के बीच सहमति से सेक्स के बाद शादी करने से इनकार करना पुरुष पार्टनर के प्रति बलात्कार के अपराध का गठन करने के लिए काफी नहीं है।

शादी करने का झूठा वादा करके किया गया सेक्स बलात्कार की तीसरी श्रेणी के अंतर्गत आता है और यह उसी का विस्तार है यानी ‘रेप बाई फ्रॉड।’ आईपीसी की धारा 90 से ‘सहमति’ शब्द की परिभाषा का इस्तेमाल करके इसे आईपीसी की धारा 375 के साथ पढ़ा गया है। इस परिभाषा के अनुसार, अगर सहमति तथ्य की गलत धारणा के तहत दी जाती है तो उसका उल्लंघन होता है। सहमति की इस परिभाषा पर भरोसा करते हुए, भारतीय न्यायालयों ने कई बार आईपीसी की धारा 375 के अंतर्गत दिए गए ‘दूसरा’ विवरण में ‘सहमति’ शब्द की व्याख्या की है यानी ‘उसकी सहमति के बिना’ और यह माना कि तथ्य की गलत धारणा के तहत दी गई कोई भी सहमति गलत है और इसलिए ऐसा काम सहमति के बिना किया गया एक काम बन जाता है, जिससे यह ‘बलात्कार’ के अपराध के रूप में चिन्हित किया जाता है।

आईपीसी की धारा 90 सहमति, जिसके संबंध में यह पता हो कि वह डर या भ्रम के अधीन दी गई है। अगर वह सहमति किसी व्यक्ति ने भय के अधीन या तथ्य के भ्रम के अधीन दी हो, और अगर काम करनेवाला व्यक्ति यह जानता हो या उसके पास विश्वास करने का कारण हो कि ऐसे भय या भ्रम के परिणामस्वरूप वह सहमति दी गई थी। साथ ही अगर वह सहमति ऐसे व्यक्ति ने दी हो या चित्तॄविकॄति या मत्तता के कारण उस बात की, जिसके लिए वह अपनी सहमति देता है, प्रकॄति और परिणाम को समझने में असमर्थ हो। 

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दूसरे शब्दों में, तथ्य की गलत धारणा के तहत दी गई सहमति कोई सहमति नहीं है। इस प्रकार, ऐसे मामलों में अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या शादी करने का वादा, जिसे बाद में पूरा नहीं किया जाता है, जिस पर एक महिला द्वारा एक पुरुष के साथ यौन संबंध बनाने की सहमति दी जाती है, क्या ‘तथ्य की गलत व्याख्या’ के तहत आएगा? अगर ऐसा होता है, तो ऐसी सहमति अमान्य है और पुरुष महिला के साथ बलात्कार करने का दोषी है; अगर ऐसा नहीं होता है, तो पुरुष के खिलाफ बलात्कार का अपराध नहीं बनता है। जब सहमति केवल सेक्स प्राप्त करने के लिए झूठे वादे के तहत ली गई थी तो बलात्कार के लिए दोष सिद्धि सरल अंतिम परिणाम है।

सेक्स के लिए ली जानेवाली सहमति अगर धोखाधड़ी से ली गई होती है और इसे बिल्कुल भी सहमति नहीं माना जाता है। अपने वादे को पूरा करने के लिए पुरुष द्वारा सामना किए जाने के बाद उसके इरादों में बेईमानी अक्सर उसके व्यवहार में नज़र आती है। अक्सर आरोपी या तो सीधे तौर पर शादी से इनकार कर देता है या फिर आश्वासन देकर फरार हो जाता है। कई मामलों में गर्भावस्था की जानकारी मिलने के तुरंत बाद महिला को मना करना भी बहुत असामान्य नहीं है।

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इच्छा से सेक्स की सहमति देने की नैतिक ज़िम्मेदारी 

बॉम्बे हाई कोर्ट की जस्टिस मृदुला ने ऐसे ही एक मामले में एक पुरुष साथी को बलात्कार के अपराध से बेल देते हुए कहा कि शादी करने के वादे का हर उल्लंघन बलात्कार की श्रेणी में नहीं आ सकता। उन्होंने टिप्पणी की थी कि शुरू में एक लड़का और एक लड़की वास्तव में शादी करना चाहते हैं और एक दूसरे के प्रति अपनी सच्ची भावनाओं के कारण यौन संबंध स्थापित कर सकते हैं। समय बीतने के साथ उन्हें लग सकता है कि वे मानसिक या शारीरिक रूप से संगत नहीं हैं और कोई भी एक उस रिश्ते से हटने का फैसला करता है। ऐसी परिस्थितियों में, कोई भी इन दोनों व्यक्तियों को केवल इसलिए शादी करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता क्योंकि उनके बीच यौन संबंध थे।

कोर्ट ने यह भी कहा था कि इन घटनाओं के प्रति स्वस्थ, वस्तुनिष्ठ और कानूनी दृष्टिकोण अपनाना ज़रूरी है। शादी करने के वादे के साथ यौन गतिविधियों में शामिल होने पर दोनों व्यक्तियों के बीच नैतिक बंधन हो सकता है और यह भी एक तथ्य है कि आखिरकार केवल महिलाएं ही गर्भवती रह सकती हैं और इसलिए, उन्हें पुरुष से अधिक पीड़ा होती है। हालांकि, कानून में इसे किसी भी तरह से बलात्कार के रूप में लेबल नहीं किया जा सकता है।

शारीरिक संबंध के लिए सहमति देनेवाले वयस्क अपनी इच्छा से ऐसा करते हैं फिर चाहे वह लिवइन रिलेशनशिप में एकसाथ एक घर में रह रहे हों या समय-समय पर कहीं मिल रहे हो। एक ज़िम्मेदार व्यस्क को यह समझना चाहिए कि जब वह अपनी इच्छा से संभोग के लिए सहमति देते हैं तो वह विपरीत परिस्थितियां होने के बाद इसके लिए अपने साथी को उत्तरदायी नहीं ठहरा सकते हैं। हालांकि, अगर आपका साथी आपको गाली देता है या आपको धोखा देता है, तो यह ऐसी सहमति के अंतर्गत नहीं आएगा और महिला साथी इसके लिए अन्य कानून के तहत राहत का दावा कर सकती हैं।

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मामलों के वैध और व्यावहारिक मुद्दे भी यह पता लगाने में मदद करते हैं कि क्या आरोपी के इरादे दुर्भावनापूर्ण थे। ऐसे संबंधों में संगतता का मुद्दा सबसे महत्वपूर्ण है। इस चिंता पर हाल ही में तेलंगाना हाई कोर्ट ने सफदर अब्बास जैदी बनाम तेलंगाना राज्य में चर्चा की थी। अदालत ने कहा कि एक पक्ष शारीरिक, भावनात्मक या मनोवैज्ञानिक असंगति के कारण रिश्ते से हटने का विकल्प चुन सकता है। ऐसी परिस्थितियों में, उन्हें सिर्फ इसलिए शादी करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता क्योंकि उनके बीच यौन संबंध थे। जोड़े के बीच शारीरिक या मनोवैज्ञानिक आराम और सुकून की कमी के कारण यौन संबंध भी धीरे-धीरे सूख सकते हैं। ऐसी स्थितियों में, शादी किसी भी पक्ष पर थोपी नहीं जा सकती क्योंकि यह एक व्यक्ति पसंद का मामला है। इसलिए, अदालतों पर यौन संबंधों से इस तरह की वापसी को शादी के झूठे वादे के रूप में नहीं मानने के बारे में सावधान रहने का एक अतिरिक्त बोझ है।

भारत के सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट्स के फ़ैसलों की लंबी कतार के बावजूद, इस बात का कोई सीधा जवाब नहीं है कि क्या पुरुष और महिला द्वारा शादी करने के लिए किए गए वादे के आधार पर किया गया सेक्स बलात्कार की श्रेणी में आता है। इस मुद्दे पर अभी तक कोई ‘स्ट्रेटजैकेट फॉर्मूला’ नहीं है जिसे ऐसे मामलों में लागू किया जा सके। अदालत में आनेवाले सभी मामलों की अपने-अपने तथ्यों के आधार पर जांच की जाती है और उसी आधार पर फैसला भी सुनाया जाता है।

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तस्वीर साभार: Medical Dialogues

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दिल्ली विश्वविद्यालय से लॉ की डिग्री ली फिर जामिया से LLM किया। एक ऐसे मुस्लिम समाज से हूं, जहां लड़कियों की शिक्षा को अधिक महत्त्व नहीं दिया जाता था लेकिन अब लोग बदल रहे हैं। हालांकि, वे शिक्षा तो दिला रहे हैं, मगर सोच वहीं है। कई मामलों में कट्टर पितृसत्तात्मक समाज वाली सोच। बस इसी सोच को बदलने के लिए लॉ किया और महिलाओं और पिछड़े लोगों को उनके अधिकार दिलाने की ठानी। समय-समय पर महिलाओं को उनके अधिकारों से अवगत कराती रहती हूं। स्वतंत्र शोधकर्ता हूं, वकील हूं, समाज-सेवी हूं। सबसे बड़ी बात, मैं एक मुस्लिम हूं।

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