जलवायु परिवर्तन की वजह से बढ़ती गर्मी मानसिक स्वास्थ्य को करती है प्रभावितः रिपोर्ट
तस्वीर साभारः BBC
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पहले मार्च और फिर अप्रैल 2022 भारतीय मौसम विभाग ने अब तक के सबसे गर्म महीने के तौर पर दर्ज किए। मौसम विभाग ने 122 सालों में अप्रैल को तीसरा सबसे गर्म महीना बताया। 1901 के बाद से दर्ज होते रिकॉर्ड में साल 2022 में भीषण गर्मी पड़ रही है। उत्तर पश्चिमी और मध्य भारत में हीट वेव्स की वजह से तापमान 47 डिग्री तक दर्ज किया गया। वर्तमान में जलवायु परिवर्तन इस समय की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। बढ़ता तापमान, तेज़ गर्म हवाएं और इनसे बिगड़ता मानव स्वास्थ्य एक विकराल समस्या का रूप लेता दिख रहा है।

हाल ही हीट वेव्स से जुड़े एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि हीट वेव्स की वजह से मनुष्य के शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है। द कन्वर्सेशन डॉटकाम में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक़ हाल के अध्ययनों से पता चलता है कि किसी भी स्थान के सामान्य तामपान के 5 प्रतिशत बढ़ने से या उससे अधिक होने से अस्पताल के आपातकालीन कक्ष में कम से कम 10 प्रतिशत मरीजों की बढ़ोत्तरी होती है। मानसिक स्वास्थ्य की खराब स्थिति वाले लोगों में बढ़ता तापमान लक्षणों को और बदतर बना सकता है। गर्मी के साथ-साथ बाढ़ और आग जैसी अन्य मौसम की घटनाओं के कारण डिप्रेशन से पीड़ित लोगों में इससे जुड़े लक्षणों में बढ़त देखी गई। साथ ही एंग्जायटी से पीड़ित लोगों के भी लक्षण में वृद्धि देखी गई। 

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जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप आर्द्रता और तापमान दोंनो बदल रहे हैं। इस वजह से बाईपोलर डिसआर्डर वाले लोगों की परेशानियां बढ़ती हैं। बीमारी की यह स्थिति बड़े नुकसान का कारण बन सकती है।

यही नहीं, हर रोज़ बढ़ते तापमान का आत्महत्या से होनेवाली मौत और उसके प्रयासों की घटनाओं में भी एक संबंध है। अनुमान के तौर पर मासिक औसत तापमान में प्रत्येक 1 डिग्री सेल्सियस तापमान की वृद्धि होने पर मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित मौतों में 2.2 प्रतिशत वृद्धि हुई है। आर्द्रता (ह्यूमिडटि) की वजह से होनेवाली गर्मी के कारण भी आत्महत्या से होनेवाली मौत की घटनाएं तेजी से होती हैं।

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जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप आर्द्रता और तापमान दोंनो बदल रहे हैं। इस वजह से बाईपोलर डिसआर्डर वाले लोगों की परेशानियां बढ़ती हैं। बीमारी की यह स्थिति बड़े नुकसान का कारण बन सकती है। इस वजह से रोगी को मनोरोग (साइकोसिस) और सुसाइड के विचारों की वजह से उसे अस्पताल में भर्ती होना पड़ सकता है। गर्मी की समस्या की वजह से इलाज में भी रुकावट पैदा होती है। मानसिक बीमारी के इलाज के लिए इस्तेमाल की जाने वाली महत्वपूर्ण दवाओं का प्रभाव गर्मी की वजह से कम हो सकती है। वहीं कुछ दवाएं गर्मी से संबंधित मौत के जोखिम को बढ़ाती हैं। 

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गर्मी की वजह से आक्रामक व्यवहार में बढ़ोतरी

गर्मी मानसिक स्वास्थ्य और बिना मानसिक स्वास्थ्य की समस्या से गुज़र रहे सभी लोगों की सोचने और तर्क करने की क्षमता को प्रभावित कर सकती है। रिसर्च से पता चलता है कि कठिन कामों को तैयार करने और हल करनेवाले व्यक्ति के दिमाग गर्मी के तनाव से प्रभावित होते हैं। बॉस्टन में छात्रों के एक अध्ययन में पाया गया कि हीटवेव के दौरान बिना एयर कंडीशनिंग वाले कमरों में रह रहे लोगों ने परीक्षणों में उनके साथियों की तुलना में 13 प्रतिशत खराब प्रदर्शन किया।

गर्मी की वजह से लोग सही से सोच नहीं पाते हैं, इससे वे इस बात से निराश हो जाएंगे तो उनमें आक्रामकता का कारण बन सकता है। इस वजह से अत्याधिक गर्मी और हिंसक अपराध की वृद्धि को जोड़ने का यह सबूत है। तापमान में एक या दो डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होने पर हमलों में 3-5 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है। वैश्विक स्तर पर 2090 तक हर तरह के अपराध में 5 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी के लिए जलवायु परिवर्तन जिम्मेदार हो सकता है।

गर्मी की समस्या की वजह से इलाज में भी बाधा उत्पन्न होती है। मानसिक बीमारी के इलाज के लिए इस्तेमाल की जाने वाली महत्वपूर्ण दवाओं का प्रभाव गर्मी की वजह से कम हो सकती है। वहीं कुछ दवाएं गर्मी से संबंधित मौत के जोखिम को बढ़ाती हैं। 

भारत में जलवायु परिवर्तन और मानसिक स्वास्थ्य

डाउन टू अर्थ में प्रकाशित लेख के अनुसार गर्मी का मानसिक स्वास्थ्य के मामलों पर असर पड़ रहा है। इसका असर सेंट्रल इंस्ट्यूट ऑफ साइकाइट्रिक (सीआईपी) रांची में नोटिस किया गया है। इसी साल मार्च में गर्मी के बाद सीआईपी ने 10-20 प्रतिशत की फुटफॉल बढ़ोतरी दर्ज की है। यह ट्रेंड आमतौर पर अप्रैल में शुरू होता है और जून के अंत कर चलता है। 

इस साल मार्च में बाइपोलर डिसऑर्डर की मैनिक स्टेज के मामले अस्पताल में भर्ती होने की सबसे आम वजह थी। इसमें चिड़चिड़ापन, आक्रामकता और एक्साइटमेंट कुछ सामान्य लक्षण हैं। दूसरी ओर मानसिक स्वास्थ्य पर उच्च तापमान का हमेशा सीधा असर नहीं पड़ता है। लिथियम एक मूड स्थिर करने वाला एजेंट है जो बड़े पैमाने पर बाइपोलर मरीजों में एडमिनिस्ट्रेटिड होता है। यह पसीना बढ़ाता है और शरीर में अधिक मात्रा में पानी की ज़रूरत पड़ती है।

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दुनिया में मानसिक स्वास्थ्य के लिए जलवायु संकट बन रहा है चुनौती

इससे आगे द इंटरगर्वमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज की इसी वर्ष मार्च 2022 की रिपोर्ट भी इस बात की तस्दीक करती है कि जलवायु परिवर्तन मनुष्य के मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर डाल रहा है। यह रिपोर्ट जलवायु परिवर्तन के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष  प्रभावों को नोट करती है। रिपोर्ट के मुताबिक गर्मी से मानसिक स्वास्थ्य के बुरे परिणामों में सुसाइड, मेंटल डिसऑर्डर, एंग्जायटी, डिप्रेशन, स्ट्रेस और साइकिऐट्रिक हॉस्पिटल में मरीजों की संख्या ज्यादा होती है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि कनाडा में हीट और लोगों के बदलते व्यवहार में संबंध पाया गया। रिपोर्ट में अमेरिका से जुड़ी स्टडी का हवाला देते हुए कहा गया है कि वहां के औसत तापमान 16 से 30 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ने पर मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानी में 0.5 प्रतिशत वृद्धि देखी गई। पांच सालों में एक डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ने की वजह से सुसाइड के केसों में वृद्धि हुई। 

दुनियाभर में जलवायु सकंट और स्वास्थ्य की कड़ी आपस में जुड़ी हुई है। लगातार पृथ्वी की बिगड़ती आबोहवा इंसान के प्राणों के लिए एक बड़ा खतरा है। एक अनुमान के मुताबिक 2030 से 2050 जलवायु परिवर्तन की वजह से हर साल लगभग 250,000 अतिरिक्त मृत्यु हो सकती है जिसमें गर्मी की वजह से उत्पन्न तनाव भी शामिल है। एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार 25 से 50 प्रतिशत लोगों में अत्याधिक मौसम संबधी आपदाओं की वजह से उनका मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है। प्राकृतिक आपदाओं के बाद 54 प्रतिशत व्यस्क और 45 प्रतिशत बच्चों में डिप्रेशन का अनुभव किया गया है।

मनुष्य की वजह से होने वाले जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप आर्द्रता और तापमान दोंनो बदल रहे हैं। इस वजह से बाईपोलर डिसआर्डर वाले लोगों में उनकी बीमारियों से जुड़ी परेशानियां बढ़ती है। बीमारी की यह स्थिति बड़े नुकसान का कारण बन सकती है।

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वैश्विक स्तर पर जारी होती रिपोर्ट्स से लगातार ये बात सामने आ रही है कि जलवायु संकट से मनुष्य का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है। हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी कहा है कि जलवायु परिवर्तन, मानसिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बना रहा है। संगठन ने देशों से जलवायु संकट में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को शामिल करने को कहा है। 2021 के डब्ल्यूएचओ के एक सर्वे में पाया कि 95 देशों में से केवल नौ देशों के नैशनल हेल्थ और क्लाइमेंट चेंज प्लान में मेंटल हेल्थ और साइकोसोशल सपोर्ट शामिल है।

इंसानी हरकतों से उत्पन्न जलवायु परिवर्तन का पृथ्वी और इंसान दोंनो की सेहत पर बुरा असर पड़ रहा है। इससे उभरी स्थितियां हमारे सामने हैं। जलवायु परिवर्तन को नकारना अब कोई विकल्प नहीं है। इस विषय की गंभीरता को पर्यावरण संरक्षण के बड़े-बड़े सम्मेलनों से आगे निकलकर सोचना होगा। नेतृत्व और लोगों इसके लिए अधिक संवेदनशील होना बहुत आवश्यक है। धरती और मानव जीवन को बचाने के लिए अभी भी सही कदम उठा लिए जाते हैं तो स्थिति को कुछ हद तक काबू में किया जा सकता है। 

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तस्वीर साभारः BBC

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