नारीवादी थियेटर
तस्वीर साभार: Fairy God Boss
FII Hindi is now on Telegram

साहित्य की विधाओं में हम नाटक पढ़ते रहे हैं। नाटक करने या खेलने को रंगमंच (थिएटर) कहते हैं। पुरुषों को थिएटर करते हमने देखा-सुना है। लेकिन क्या हमने कभी यह जाना है कि इस थिएटर में महिलाओं का आना कैसे हुआ या उन्होंने अपने लिए अलग थिएटर का निर्माण कैसे किया? इस लेख के माध्यम से विश्व स्तर पर नारीवादी थिएटर को जानने की कोशिश करेंगे। पहला सवाल ही यह है कि आख़िर नारीवादी थिएटर होता क्या है? नारीवादी थियेटर की अपनी अलग-अलग परिभाषाएं हो सकती हैं लेकिन आसान शब्दों में इसे समझें तो यह एक ऐसा थिएटर होता है जिसमें चरित्र, घटनाएं पुरुषों की नज़र से न होकर महिला की नज़र से देखी जाती हैं। सेक्सुअलिटी, महिलाओं की ऑटोनोमी, पर बात करते हुए पहचान की सांस्कृतिक मान्यताओं को चोट करता यह थिएटर इस बाइनरी को भी तोड़ता है कि व्यक्ति या तो सिर्फ़ पुरुष होता है या सिर्फ़ महिला।

नारीवादी थिएटर ने पुरुषों द्वारा स्थापित थिएटर के कॉन्टेंट और विधा को चुनौती दी। महिला को ऑबजेक्ट की तरह नहीं सब्जेक्ट की तरह स्थापित करने की शुरुआत की है। ये थिएटर सिर्फ़ नाटक खेलने भर तक सीमित नहीं रहा बल्कि इसने महिलाओं के सामाजिक, राजनीतिक संघर्षों को दर्शाया। साथ ही पितृसत्तात्त्मक ढांचे को बेनकाब करते हुए हर तरह के शोषण पर नारीवादी नज़रिया अपनी कला के माध्यम से समाज में रखा।

और पढ़ें: ‘फेमिनिस्ट हो! फेमिनिज़म का झंडा उठाती हो!’ आखिर दिक्कत क्या है इस शब्द से

नारीवादी थियेटर की अपनी अलग-अलग परिभाषाएं हो सकती हैं लेकिन आसान शब्दों में इसे समझें तो यह एक ऐसा थिएटर होता है जिसमें चरित्र, घटनाएं पुरुष की नज़र से न होकर महिला की नज़र से देखी जाती हैं। सेक्सुअलिटी, महिलाओं की ऑटोनोमी, पर बात करते हुए पहचान की सांस्कृतिक मान्यताओं को चोट करता यह थिएटर इस बाइनरी को भी तोड़ता है कि व्यक्ति या तो सिर्फ़ पुरुष होता है या सिर्फ़ महिला।

नारीवादी थिएटर की विशेषता

नारीवादी थिएटर नाटक के प्रोडक्शन प्रोसेस, प्लॉट से लेकर एक्टर्स की कास्टिंग, रिहर्सल तक को चैलेंज करते हुए उसमें महिलाओं के नज़रिये को शामिल करने की कोशिश करता है। यह सुनिश्चित किया जाता है कि नाटक जिसके बारे में है जैसे नाटक किसी यहूदी व्यक्ति के बारे में है तो एक्टर्स की कास्टिंग से लेकर, डायरेक्शन में यहूदी को ज़रूर शामिल किया जिससे कि उसकी कहानी वह खुद कह रहा हो और पर्सपेक्टिव बाहरी व्यक्ति द्वारा पेश किया हुआ महसूस न हो।

Become an FII Member

महिलाओं द्वारा जिये गए अनुभवों को नाटक का हिस्सा बनाया जाता है। पुरुषों द्वारा निर्मित थिएटर में जहां सब कुछ उनकी पहचान, नज़र तक सीमित होता है, वहीं महिलाओं ने अपना थिएटर समावेशी बनाया है, क्लास, रेस, प्रकृति आदि पहचान को साथ लेकर चलते हुए नाटकों के निर्माण किए हैं। सफरेज थिएटर से लेकर एलजीबीटीक्यू+ थिएटर इसके जीते-जागते उदाहरण हैं। नारीवादी थिएटर का इतिहास नारीवादी थिएटर नारीवादी आंदोलन की दूसरी लहर के दौरान अमरीका, इंग्लैंड में पनपने लगा था। यह वह दौर था जब महिलाएं गर्भनिरोधक, कामकाजी जगहों पर समान अधिकार, अवसर के अधिकार आदि के लिए आंदोलन कर रही थी। ये आंदोलन परफॉर्मेटिव थे। महिलाओं का गुस्सा समाज द्वारा असामनता को अपनाए जाने पर, महिलाओं को दबाए जाने पर था। इस थिएटर आंदोलन की शुरुआती लीडर्स में माइकलीन वेंडर, मार्था बोइसिंग और केरिल चर्चिल और महत्वपूर्ण महिला थिएटर ग्रुप शामिल हैं जिसमें यूनाइटेड किंगडम में 1974 में बना वूमेंस थियेटर ग्रुप जो 1990 में फिनिक्स थियेटर कंपनी के नाम से जाना गया, स्प्लिट ब्रूचेस आदि हैं।

तस्वीर साभार:  This Stage

नारीवादी नाटक लेखिकाओं से लेकर, नारीवादी निर्देशक, कलाकारों की वजह से नारीवादी थिएटर अपने अस्तित्व में तब आ पाया जब ये सब व्यक्ति एकसाथ मिले। वूमेन थिएटर ग्रुप ने इस थिएटर के फैलाव में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। ये एक ऐसा ग्रुप था जो पूरी तरह नारीवादी आंदोलन का परिणाम था। विक्टोरिया और अल्फ्रेड म्यूजियम के अनुसार वीमेन थिएटर ग्रुप का लक्ष्य महिलाओं को हर तरह के रोल जैसे निर्देशक, स्टेज मैनेजर, लेखक, निर्माता देना था जिससे कि वह अपने संघर्षों को दर्शाए और समान अधिकारों के लिए आवाज़ उठाएं। इस ग्रुप का यह विश्वास था कि इसने 1990 तक इतनी अच्छी प्रोग्रेस कर ली है कि ब्रिटिश सोसाइटी की मुख्यधारा में महिला रिप्रेजेंटेशन देखा जा सकता है। माइकलीन वेंडर उन लेखिकाओं में शामिल थीं जिन्होंने वूमेन थिएटर ग्रुप के स्थापन में अहम भूमिका निभाई थी। उनके अनुसार वूमेन थिएटर ग्रुप ने बहुत ऐसे थिएट्रिकल प्रोडक्शन किए थे जिसमें आइडेंटिटी, सेक्सुअलिटी और अब्यूज जैसे मुद्दे शामिल थे।

और पढ़ें: पोस्ट कोलोनियल फेमिनिज़म: क्या दुनिया की सभी महिलाओं को एक होमोज़िनस समुदाय की तरह देखा जा सकता है ?

महिलाओं द्वारा जिये गए अनुभवों को नाटक का हिस्सा बनाया जाता है। पुरुषों द्वारा निर्मित थिएटर में जहां सब कुछ उनकी पहचान, नज़र तक सीमित होता है, वहीं महिलाओं ने अपना थिएटर समावेशी बनाया है, क्लास, रेस, प्रकृति आदि पहचान को साथ लेकर चलते हुए नाटकों के निर्माण किए हैं।

उदाहरण के तौर पर 1975 में ‘माय मदर सेज आई नेवर शुड‘ नाटक शामिल है जिसमें यह दर्शाया गया था कि कैसे टीएनएजर्स का यौन शोषण किया जाता है। वहीं नाटक, ‘आउट ऑन द कोस्टा डेल’, 1997 में ‘द ट्रिको विंडस्क्रीन वाइपर फैक्ट्री,’ लंदन में किया गया था। इसमें महिलाओं के लिए समान वेतन का मुद्दा केंद्र में था। यूनाइटेड किंगडम में ही एक और महत्वपूर्ण महिला थिएटर ग्रुप का गठन हुआ जिसका नाम था, ‘मोनस्ट्रस रेजीमेंट,’ जो वूमेन थिएटर ग्रुप से अधिक प्रगतिशील और रेडिकल था। इनका महिलाओं की आज़ादी का विचार अधिक मजबूत था। इस ग्रुप की एक फाउंडिंग सदस्य का कथन था, “If I have to play another tart with a heart of gold in a PVC skirt, I’m going to throw up.” इस ग्रुप की विचारधारा नारीवादी और मार्क्सवादी थी। युनाइटेड किंगडम में सेंसरशिप कानून हटने के बाद इन्हें फंडिंग मिली और दो बेहतरीन ओरिजिनल और प्रभावशाली थिएटर प्रोडक्शन इस ग्रुप ने किए जिसमें पहला- “स्कम: डेथ, डिस्ट्रक्शन एंड डर्टी वॉशिंग”, जो एक लॉन्ड्री के बैकग्राऊंड के साथ रखकर सेक्सुअल और सोशल पॉलिटिक्स को दर्शाता है और “विनेगर टॉम” शामिल था।

इंग्लैंड से होकर ये फेमिनिस्ट थिएटर मूवमेंट अलग-अलग पश्चिमी देशों में पंहुचा और नये वीमेन थिएटर ग्रुप वहां पनपे। जैसे यूनाइटेड स्टेट्स का पहला वीमेन थिएटर ग्रुप जो 1976 में बना स्पाइडर वुमन थिएटर है। कई थिएटर ग्रुप जैसे मैनहैटन शेक्सपीयर प्रोजेक्ट, ला लूना प्रोडक्शंस जैसे संगठन अपने नाटकों से उन महिलाओं की मदद के लिए फंड इकट्ठा करते हैं जिनके साथ किसी भी तरह का शोषण हुआ है। कनाडा का सबसे पुराना फेमिनिस्ट थिएटर ग्रुप टोरंटो आधारित ‘नाइटवुड थिएटर‘ है, जिसका गठन 1979 में हुआ। भारत में नुक्कड़ नाटक एक प्रसिद्ध थिएटर कला है। 1980 के दशक तक आते-आते महिलाएं इसमें भाग लेने लगीं जिसमें ‘जन नाट्य मंच’ जिसने सफदर हाशमी के निर्देशन में ‘औरत’ नाटक का मंचन किया था।

और पढ़ें: नारीवादी आंदोलनों में नारीवादी संगीत की भूमिका

नारीवादी थिएटर आंदोलन अपने आप में इतना समावेशी था कि वह नारीवाद के भी अलग-अलग रूपों को खुद में समेटे थे, लिबरल, कल्चरल से लेकर मार्क्सिस्ट, ईको फेमिनिज़म तक इस आंदोलन का हिस्सा था, हर क्लास की महिला इन नाटकों में देखी जा सकती थी।

थिएटर में कोई नाटक भी जब फेमिनिस्ट होगा तब उसका लेखन नारीवादी होगा, इस लिहाज से एक नाटककार की भूमिका, नारीवादी थिएटर के लिए अहम है। इस थिएटर मूवमेंट के दौरान कई नारीवादी नाटककार हुईं जैसे केरील चर्चिल, सुसान ग्लासपेल, एडिथ वार्टन। केरिल चर्चिल के तीन सबसे प्रसिद्ध काम महिलाओं के समाज में रहते हुए अलग-अलग संघर्षों को दर्शाते हैं। इन कामों में क्लाउड 9 (1999), टॉप गर्ल्स (1902) और द स्क्राइकर (1994) हैं। कैसे नाटक नारीवादी था, इसे समझने के लिए द स्क्राइकर को देखें तो ये एक ऐसा नाटक था जिसमें परियों का सहारा लेते हुए ये दिखाया गया कि कैसे पितृसत्ता पृथ्वी को हानि कर रही है, इस लेखन को इकोफेमिनिज्म से जोड़ा जा सकता है कि कैसे एक परी जो प्रकृति को चिन्हित कर रही है, पितृसत्ता उसका शोषण करती है।

वहीं सुसान ग्लास्पेल, नाटक ‘ट्राइफल्स’ के सहारे एक मर्डर मिस्ट्री को भौतिकवादी नारीवादी लेंस से प्रस्तुत करती हैं कि कैसे दो महिलाएं एक मर्डर मिस्ट्री को सिर्फ़ इस आधार पर हल कर लेती हैं क्योंकि वे अपने आसपास के लोगों से जुड़ी हुई थीं। एडिथ वार्टन का उपन्यास, ‘द हाउस ऑफ़ मर्थ‘, जिसे बाद में नाटक में बदला गया, महिला केंद्रित नाटक है। नाटक की मुख्य पात्र लिली बार्ट है, नाटक का सार ये है कि कैसे एक महिला इस बीच में पिसती है कि वो होना कुछ और चाहती है लेकिन समाज उसे कुछ और बनने के लिए फोर्स करता है।

नारीवादी थिएटर आंदोलन अपने आप में इतना समावेशी था कि वह नारीवाद के भी अलग-अलग रूपों को खुद में समेटे था, लिबरल, कल्चरल से लेकर मार्क्सिस्ट, ईको फेमिनिज़म तक इस आंदोलन का हिस्सा था। हर क्लास की महिला इन नाटकों में देखी जा सकती थी। आज के समय में भी ये ग्रुप सक्रिय हैं। इस पर बात करते हुए यह जानना भी अहम है कि अभी तक भी भारत में महिलाएं थिएटर में बहुत संख्या में क्यों नहीं हैं। फेमिनिज़म इन इंडिया में छपे लेख के अनुसार टुनटुन मुखर्जी इस पर लिखते हैं, “महिलाओं को शिक्षा से वंचित करना, प्रिंट संस्कृति में पुरुष विशिष्टता, ‘अश्लीलता’ और ‘अवमूल्यन’ मौखिक संस्कृति (आमतौर पर महिला डोमेन), अलगाव की प्रवृत्ति निजी और सार्वजनिक स्थान सभी ने महिलाओं को कुछ शैलियों तक सीमित रखने और दूसरों में उनकी उपस्थिति को प्रतिबंधित या मिटाने का काम किया है।”

और पढ़ें: फेमिनिस्ट आर्ट मूवमेंट: कैसे महिलाओं ने आर्ट को नारीवादी रूप दिया


तस्वीर साभार: Fairy God Boss

स्रोत:

Feminist Theatre: A Practical Application

Howl Round

IPL

+ posts

मैं उस साहित्य और राजनीति की पक्षधर हूँ जो शोषितों की पक्षधर है। रोज़मर्रा के जीवन में सवाल करना, नई-नई आर्ट सीखना, व्यक्तित्व में लर्निंग-अनलर्निंग के स्पेस को बढ़ाना पसंद है और फिलफाल स्वतंत्र लेखन में सक्रिय हूं।

Follow FII channels on Youtube and Telegram for latest updates.

नारीवादी मीडिया को ज़रूरत है नारीवादी साथियों की

हमारा प्रीमियम कॉन्टेंट और ख़ास ऑफर्स पाएं और हमारा साथ दें ताकि हम एक स्वतंत्र संस्थान के तौर पर अपना काम जारी रख सकें।

फेमिनिज़म इन इंडिया के सदस्य बनें

अपना प्लान चुनें

Leave a Reply