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महिलाएं हर क्षेत्र में पुरुषों के बराबर काम कर रही हैं। वर्तमान में महिलाएं विज्ञान, कला, खेल, तकनीक आदि हर क्षेत्र में खुद को साबित कर रही हैं। अपनी मेहनत के बल पर वे हर क्षेत्र में अपनी पहचान बना रही हैं। यही नहीं जेंडर, जाति, वर्ग, यौनिकता आदि के आधार पर होनेवाले भेदभाव से जुड़ी तमाम चुनौतियों का सामना करते हुए वर्कफोर्स का हिस्सा बन रही हैं। लेकिन जब बात वेतन की आती है तो महिलाओं को वह बराबरी नहीं मिल पाती है जिसकी वे हकदार हैं। काम का अनुभव, शिक्षा, और उम्र भले ही ज्यादा हो लेकिन वेतन के मामले में उन्हें पुरुष सहकर्मी से हमेशा पीछे रखा जाता है। यह बात संगठित और असंगठित दोंनो ही क्षेत्रों में लागू होती है।

असंगठित क्षेत्र जैसे खेती किसानी, मिल, कंपनियों में बतौर श्रमिक काम करनेवाली महिलाओं से पुरुषों के समान काम तो कराया जाता है लेकिन पारिश्रमिक उनके श्रम के अनुसार कम ही मिलता है। समान काम के बदले समान वेतन का कानूनी अधिकार होने के बावजूद देश में महिलाओं को काम के बदले कम वेतन मिलता है। भारत के संविधान के अनुसार देश में कार्यरत प्रत्येक नागरिक को बिना किसी लिंगभेद के समान वेतन मिलना चाहिए। महिलाओं और पुरुषों को समान कार्य के लिए एकसमान वेतन देने के लिए ‘समान पारिश्रमिक अधिनियम 1976’ पारित किया गया। यह अधिनियम मूलत महिलाओं के लिए नहीं बनाया गया था, लेकिन यह विशेषतौर पर महिलाओं को उनके अधिकार तक पहुंचाने के लिए फायदेमंद है।

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हमारे देश में लिंग आधारित भेदभाव लगभग हर जगह मौजूद है। ऐसे में समान पारिश्रमिक अधिनियम 1976 असमानता को दूर करने में मदद करता है। यह अधिनियम 8 मार्च 1976 में पास हुआ था। इसका मूल उद्देश्य महिला और पुरुष कर्मचारियों को समान काम के लिए समान वेतन देना है। साथ ही कार्यक्षेत्र में महिलाओं के खिलाफ होनेवाले भेदभाव को खत्म करना है। इस अधिनियम के अनुसार राज्य का यह कर्तव्य बनता है कि वह प्रत्येक महिला और पुरुष को एक जैसे काम के लिए एक जैसा मेहनताना दे। साथ ही यह ऐक्ट इस बात का भी आश्वासन देता है कि यदि कोई इसका उल्लघंन करता है तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।

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संवैधानिक कानून के बावजूद देश में महिलाओं को वह हक नहीं मिल पा रहा है जो एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक नागरिक के पास होना चाहिए। इस पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं के ऊपर घर से लेकर बाहर तक के काम का बोझ बना हुआ है लेकिन जब बात काम की कीमत की आती है तो उनकी मेहनत को कानूनी और निजी तौर पर नजरअंदाज कर दिया जाता है।

क्या है समान पारिश्रमिक अधिनियम 1976 ?

समान पारिश्रमिक अधिनियम 1976 पूरे भारत में लागू होता है। केन्द्र और राज्य सरकार के पास इसे विभिन्न योजनाओं में लागू करने की शक्ति है। समान काम के लिए समान मजदूरी यानि समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976 में एक ही तरीके के काम के लिए समान वेतन का प्रावधान है। पारिश्रमिक से तात्पर्य उस आधिकारिक मजदूरी, वेतन और अतिरिक्त उपलब्धियों से है, जो नकद या वस्तु के रूप में हो, वह सब काम करनेवाले को बिना किसी लैंगिक भेदभाव के मुहैया करवाई जाएं।

दूसरी ओर एक ही काम और समान प्रकृति के काम से तात्पर्य ऐसे काम से है जिसमें कौशल, प्रयत्न तथा उत्तरदायित्व एक जैसे हैं जब काम का दायित्व महिला और पुरुष द्वारा किया जाता है। महिला और पुरुष, दोनों के कौशल, कोशिश और जिम्मेदारी में कोई अंतर नहीं होता है।

इस अधिनियम के अनुसार जिस क्षेत्र में महिलाओं को कानूनी रूप से काम करने की अनुमति है उनको उसके लिए समान अवसर मिलें। महिला व पुरुष में नौकरी आवेदन और सेवा शर्तों में कोई भी भेदभाव नहीं किया जाएगा। यह ऐक्ट किसी भी रूप में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति, पूर्व कर्मचारी के आरक्षण को प्रभावित नहीं करता है।

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सलाहकार समिति

महिलाओं को रोज़गार के अधिक से अधिक अवसर प्रदान करने के उद्देश्य को पूरा करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में एक या एक से अधिक सलाहकार समितियों का गठन कर सकती है। सलाहकार समिति में सरकार के द्वारा मनोनीत कम से कम 10 सदस्य होंगे जिसकी आधी संख्या महिलाओं की होगी। समिति का मुख्य कार्य केंद्र सरकार के प्रतिष्ठानों और नियोजनों में महिलाओं के स्थान के संबंध में सलाह देना है। काम के घंटे, शैली और योजनाओं में उनकी भागदारी तय करना है। इस समिति की सिफारिशों के आधार पर समान अवसर प्रदान करने के बाद महिला कामगारों के नियोजन के संबंद्ध में निर्देश दे सकती है। इस अधिनियम के तहत किसी कंपनी द्वारा कोई अपराध किया गया है तो प्रत्येक वयक्ति जो अपराध के समय प्रभारी था और कंपनी के व्यवसाय संचालन हेतु कंपनी के प्रति जवाबदेह था और साथ में कंपनी को उस अपराध के लिए आरोपी माना जाएगा। 

जब बाबा साहब आंबेडकर ने की थी समान काम और समान वेतन की मांग

भारतीय संविधान के निर्माता बाबा साहब आंबेडकर भारत के पहले व्यक्ति थें जिन्होंने समान काम के लिए समान वेतन की बात सबसे पहले उठाई। डॉ आंबेडकर ने श्रम मंत्री के रूप में वायसराय कार्यकारी परिषद में औघोघिक श्रमिकों को बिना किसी लैंगिक भेदभाव के समान काम के लिए समान वेतन की बात की थी। जब डॉ आंबेडकर भारतीय संविधान का मसौदा तैयार कर रहे थे, तो उन्होंने राज्य के नीति निर्देशक सिंद्धातों के भाग-4 में महिला और पुरुषों दोनों को समान काम के लिए समान वेतन के लिए अनुच्छेद 39(d) के लिए प्रमुख प्रावधान दिया।

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जो महिलाएं घर से बाहर जाकर काम करती हैं उन पर प्रोफेशनल और निजी जिम्मेदारियों का दबाव इतना अधिक रहता है कि एक वक्त बाद वे काम को छोड़ना ही बेहतर मानती हैं।

भारत में लगातार महिलाएं पुरुषों से कम वेतन पा रही हैं

तमाम नीति निर्माताओं के निरंतर प्रयासों के बावजूद भारतीय समाज में लैंगिक समानता अभी भी एक सपने के समान है। पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं को हमेशा कमतर माना जाता है। भले ही आज महिलाएं अपनी योग्यता और क्षमता के बल पर प्रत्येक क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बना रही हैं लेकिन तमाम रिपोर्ट और आंकड़े यह दर्शाते हैं कि भारत कैसे लगातार लैंगिक असमानता में धंसता जा रहा है। वेबसाइट द लाइव मिंट में छपी खबर के अनुसार इकॉनमिक फोरम के द्वारा जारी ग्लोबल जेंडर गैप 2021 रिपोर्ट में 156 देशों में से 140वें स्थान पर है। दक्षिण एशियाई देशों में भारत का प्रदर्शन बहुत खराब रहा है। साल 2020 में भारत 153 देशों में 112वें स्थान पर था।

रिपोर्ट के अनुसार भारत में महिलाएं आर्थिक तौर पहले से कमजोर हुई है। 2020 के मुकाबले आर्थिक क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी में 3 फ़ीसद की कमी देखी गई है। वहीं साल 2020 के मुकाबले इस वर्ष महिलाओं के श्रम भागीदारी में भी कमी देखी गई है। इससे महिलाओं की अनुमानित आय में कमी देखी गई है, जो पहले से ही पुरुषों की आय का पांचवा हिस्सा है।

कानून होने के बाद क्यों नहीं बदल रही स्थिति

लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण की दिशा में समान काम और समान वेतन एक महत्वपूर्ण कदम है। इस तरह के कानून श्रमिकों के बीच वेतन के अंतर को दूर करने और कार्यस्थल पर समान भुगतान को बढ़ावा देने का प्रयास तो करते ही है, साथ ही कार्यस्थल पर लैंगिक असमानता को भी दूर करने का काम करते है। भारत में संवैधानिक प्रावधान होने के बावजूद भी कार्यस्थल पर महिलाओं की कमी और उनको मिलने वाले वेतम में अंतर देखने को मिलता है। भारत में सामाजिक-सांस्कृतिक तौर पर आज भी महिलाओं का घर से बाहर काम करना गलत माना जाता है। परिवारों में स्थापित पितृसत्ता के कारण अधिकांश लड़कियां अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाती हैं। घर से बाहर निकलकर औपचारिक कार्यक्षेत्र में काम करने से उन्हें रोका जाता है।

महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा की संस्कृति भी महिलाओं को घर से बाहर काम करने की संख्या को कम करती है। इसके अलावा जो महिलाएं घर से बाहर जाकर काम करती हैं उन पर प्रोफेशनल और निजी जिम्मेदारियों का दबाव इतना अधिक रहता है कि एक वक्त बाद वे काम को छोड़ना ही बेहतर मानती हैं। दूसरी ओर महिलाओं के द्वारा किए गए घर के काम को कम महत्व दिया जाता है। घर के काम का अवैतनिक होने के कारण इन कामों में वेतन अंतर भी बढ़ जाता है। घरेलू श्रमिक के तौर पर काम करनेवाली महिलाओं को उनके काम के अनुसार बहुत कम वेतन दिया जाता है।    

संवैधानिक कानून के बावजूद देश में महिलाओं को वह हक नहीं मिल पा रहा है जो एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक नागरिक के पास होना चाहिए। इस पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं के ऊपर घर से लेकर बाहर तक के काम का बोझ बना हुआ है लेकिन जब बात काम की कीमत की आती है तो उनकी मेहनत को कानूनी और निजी तौर पर नजरअंदाज कर दिया जाता है। महिलाओं के साथ इस तरह की असमानता भारत महिलाओं के जीवन स्तर को बेहतर बनाने के मार्ग में एक बाधा है जिसको हटाना बहुत आवश्यक है।  

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तस्वीर साभार : Business Standard

मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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