जातिगत भेदभाव को चुनौती देती चित्रसेनपुर गाँव की ये महिलाएं
तस्वीर साभार: रेणू
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तस्वीर में घर की चौखट पर बैठी एक महिला, एक छोटी बच्ची के बाल संवार रही है। महिला बेहद दुलार से बच्ची के बाल संवार रही है और देखने में ऐसा लग रहा है कि ये दोनों माँ-बेटी हैं। यह तस्वीर यूं तो देखने में बहुत ही साधारण लग रही है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये बेहद ख़ास तस्वीर है क्योंकि यह तस्वीर जातिगत भेदभाव को बेहद सरल तरीक़े से चुनौती देती है। साथ ही यह महिला एकता की एक प्रभावी तस्वीर है। तो आइए जानते हैं इस तस्वीर के पीछे की बदलाव की कहानी।

इस तस्वीर में दिखनेवाली महिला का नाम पूनम है। पैंतीस वर्षीय पूनम चित्रसेनपुर गाँव की दलित बस्ती की रहनेवाली है। पूनम को सिलाई का काम सीखना बेहद पसंद है, इसलिए वह बस्ती के एक सिलाई केंद्र में सिलाई सीखने जाती है। उसी सिलाई केंद्र में गाँव की मुसहर बस्ती से भी कुछ लड़कियां और युवा महिलाएं सिलाई सीखने आती हैं। आमतौर पर दलित बस्ती के कुछ लोग मुसहर जाति के लोगों के साथ भेदभाव और छुआछूत का व्यवहार करते हैं। इसलिए मुसहर जाति का कोई भी इंसान दलित बस्ती में जाने की हिम्मत नहीं कर पाता था। सालों से इस गाँव में यह भेदभाव ऐसे ही चला आ रहा था।

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सिलाई केंद्र की संचालिका हेमा से जब मैंने बात की तो उन्होंने बताया, “शुरुआत में यह पहल काफ़ी चुनौतीपूर्ण थी। जब इस सिलाई केंद्र में मुसहर बस्ती की महिलाएं और लड़कियां सिलाई सीखने आ रही थी तो हमारी बस्ती की कोई भी महिला और लड़की केंद्र में नहीं आना चाहती थी। मुझे भी आसपास के लोगों ने काफ़ी भला-बुरा कहा। लेकिन मैंने अपना काम ज़ारी रखा और अब धीरे-धीरे मेहनत रंग लाने लगी है।”

हो सकता आपको लगे कि जातिगत भेदभाव तो आज के समय में होता ही नहीं है यह काल्पनिक है। लेकिन अगर आपको जातिगत भेदभाव का वास्तविक रूप देखना है तो एक़ बार ग्रामीण क्षेत्रों में ज़रूर जाइए और देखिए कि कैसे गाँव में सभी बस्तियां जाति के आधार पर अलग-अलग जगहों पर बसाई गई हैं। जब आप उत्तर भारत में मुसहर बस्ती की जगहों को देखेंगे तो पाएंगे कि ये हमेशा गाँव के बाहरी हिस्सों में होती हैं। आज भी इन बस्तियों में रहनेवाले लोग अपनी जाति की वजह से समाज की मुख्यधारा से दूर कर दिए जाते हैं। लेकिन यूपी के चित्रसेनपुर गाँव में काम कर रही है एक समाजसेवी संस्था के माध्यम से इस जातिगत भेदभाव को दूर करने की पहल की गई, जिससे महिलाओं के जातिगत विभेद से दूर कर एकजुट किया जा सके। इसलिए यहां सिलाई केंद्र की शुरुआत की गई जहां दोनों बस्तियों की महिलाएं एक साथ नयी चीजें सीख सकें।

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सिलाई सीखतीं महिलाएं, तस्वीर: रेणू

सिलाई केंद्र की संचालिका हेमा से जब मैंने बात की तो उन्होंने बताया, “शुरुआत में यह पहल काफ़ी चुनौतीपूर्ण थी। जब इस सिलाई केंद्र में मुसहर बस्ती की महिलाएं और लड़कियां सिलाई सीखने आ रही थी तो हमारी बस्ती की कोई भी महिला और लड़की केंद्र में नहीं आना चाहती थी। मुझे भी आसपास के लोगों ने काफ़ी भला-बुरा कहा। लेकिन मैंने अपना काम ज़ारी रखा और अब धीरे-धीरे मेहनत रंग लाने लगी है।” हेमा आगे बताती हैं कि जब दलित बस्ती की भी महिलाओं ने केंद्र पर आना शुरू किया तो उन्हें एक साथ बैठने और सिलाई सीखने में बहुत संकोच होता था पर अब हर दिन मुसहर और दलित बस्ती की महिलाएं सिलाई सीखने आती हैं और एक साथ सिलाई सीखती हैं।

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इन्हीं महिलाओं में से एक है पूनम। जब मैंने पूनम से उनके अनुभव को लेकर बात की तो उन्होंने बताया, “मुझे हमेशा से सिलाई का काम सीखना था, लेकिन कभी मौक़ा नहीं मिला था। अपने घर पास जब यह मौक़ा बना भी तो वहां मुसहर जाति की महिलाओं का आना एक चुनौती से कम नहीं था। बचपन से ही हम लोगों की परवरिश इस सीख से साथ की गई थी कि मुसहर अछूत जाति है, इसलिए उनसे हम लोगों को हमेशा दूर रहना चाहिए। मैं इसपर विश्वास नहीं करती थी, पर मैं झूठ नहीं कहूंगी कि मैं हिचक ज़रूर महसूस करती थी। इसलिए कभी भी इस जातिगत भेदभाव को तोड़ने की हिम्मत नहीं हुई। वहीं, ससुरालवाले इस विचार के समर्थक थे, इसलिए मुझे सिलाई केंद्र में आने तक के लिए उन्हें बहुत मनाना पड़ा। इसके बाद, जब मैं यहां आने लगी तो मुसहर महिलाओं और लड़कियों से बात करके ऐसा लगा कि हम लोगों में कोई अंतर नहीं है। हम सब एक जैसे हैं। ये जाति का फ़र्क़ तो समाज ने बना दिया है।”

पूनम, मुसहर बस्ती की बच्ची किरन के बारे में बताती है, “किरन बहुत ही होशियार बच्ची है। उसे कला और सिलाई का काम बहुत पसंद है। मुझे ये बच्चियां बेहद प्यारी लगती हैं, एकदम अपनी बच्ची जैसी। किरन को बालों में चोटी करना बहुत पसंद है, लेकिन उसे चोटी करने नहीं आता है। मैं अक्सर उसके बाल की चोटी बना देती हूं। इसलिए जब भी वह सिलाई सीखने आती है तो अब मेरे पास आ जाती है और अपने बाल बनवाने के लिए।”

किरण की चोटी बनाती पूनम, तस्वीर- रेणू

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हम जब भी जाति व्यवस्था को चुनौती देने की बात करते हैं तो अक्सर सिर्फ़ आंदोलन की ही कल्पना कर पाते हैं। लेकिन सामाजिक बदलाव के लिए जातिगत भेदभाव को चुनौती देना एक लंबी प्रक्रिया है, क्योंकि यह पितृसत्ता का वह मज़बूत साधन है, जिसने सदियों के हमारे समाज और जीवन में अपनी पैठ जमाई है। इसके लिए विचार और व्यवहार दोंनो स्तर पर काम करने की ज़रूरत है।

महिलाओं के संदर्भ में आज भी जाति व्यवस्था एक दोहरी मार जैसा ही है, क्योंकि ये महिलाओं के संघर्ष को दोहरा करने और उन्हें आपस में बांटने में अहम भूमिका निभाता है। इसलिए ज़रूरी है कि जब हम जेंडर आधारित हिंसा, भेदभाव और पितृसत्ता के ख़िलाफ़ जब पहल करने की कोशिश करते हैं तो इसके लिए महिलाओं का एक समझ और विचारधारा के साथ एकजुट होना ज़रूरी हो जाता है। चित्रसेनपुर गाँव की हेमा, पूनम और किरन जैसी महिलाएँ और बच्चियाँ इस जातिगत भेदभाव को चुनौती देने के लिए एक मज़बूत पहल कर रही है, जिनके बारे में हमें ज़रूर जानना चाहिए।

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तस्वीर साभार: रेणू

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