सोशल मीडिया पर की गई अपमानजनक टिप्पणी भी एससी/एक्टी ऐक्ट के तहत आएगी: केरल हाई कोर्ट
तस्वीर साभार: प्रभात खबर
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केरल हाई कोर्ट ने बीती 26 जुलाई को, अलग-अलग सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदाय के एक सदस्य के खिलाफ अपमानजनक बयान देने के आरोपी एक यूट्यूबर को अग्रिम ज़मानत देने से इनकार कर दिया। हाई कोर्ट ने फैसला देते हुए टिप्पणी की कि डिजिटल युग में, एक व्यक्ति की उपस्थिति में उनकी डिजिटल उपस्थिति भी शामिल है। केरल हाई कोर्ट का यह फैसला ऑनलाइन न्यूज प्लेटफॉर्म ‘ट्रू टीवी’ के प्रबंध निदेशक की अग्रिम ज़मानत याचिका पर सुनवाई के दौरान आया।

क्या है पूरा मामला?

पीड़िता महिला ने अपने नियोक्ता- एक अन्य मीडियाकर्मी के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि वह उसे राज्य की एक महिला मंत्री का मॉर्फ्ड वीडियो बनाने के लिए मजबूर कर रहा था। पीड़िता की शिकायत पर उसके मालिक को गिरफ्तार कर लिया गया है। साथी मीडियाकर्मी की गिरफ्तारी से उत्तेजित याचिकाकर्ता (‘ट्रू टीवी’ के प्रबंध निदेशक) ने अपने ऑनलाइन चैनल के माध्यम से एक इंटरव्यू किया। इंटरव्यू में याचिकाकर्ता को पीड़िता के पति और ससुर का इंटरव्यू करते हुए दिखाया गया है। याचिकाकर्ता के ऑनलाइन मीडिया के माध्यम से प्रसारित इंटरव्यू को यूट्यूब और फेसबुक पर अपलोड किया गया।

पीड़िता ने यह आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता द्वारा दिखाया गया इंटरव्यू पीड़ित को गाली देने और मज़ाक उड़ाने के अलावा, अनुसूचित जनजाति समुदाय के सदस्यों के खिलाफ अपमान, घृणा और दुर्भावना पैदा कर रहा है। पीड़िता ने याचिकाकर्ता के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और आईटी अधिनियम की कुछ जमानती धाराओं के तहत आरोप लगाए। साथ ही महत्वपूर्ण रूप से, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (एससी / एसटी अधिनियम) के तहत धारा 3(1)r,  3(1)s, और 3(1)w(ii) के अंतर्गत गैरज़मानती आरोप भी लगाए।

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  • धारा 3(1) r के अनुसार, कोई भी व्यक्ति जो “सार्वजनिक दृश्य के भीतर किसी भी स्थान पर अनुसूचित जाति के अनुसूचित जाति के सदस्य को अपमानित करने के इरादे से जानबूझकर उनका अपमान करता है या डराता है”
  • 3(1) s किसी भी व्यक्ति से संबंधित है जो “किसी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के किसी भी सदस्य को जाति के नाम से सार्वजनिक रूप से किसी भी स्थान पर गाली देता है; 
  • 3(1) w(ii), किसी के लिए भी जो “अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित महिला के प्रति यौन प्रकृति के शब्दों, कृत्यों या इशारों का उपयोग करता है, यह जानते हुए कि वह एक अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित है।”

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केरल हाई कोर्ट ने बीती 26 जुलाई को, अलग-अलग सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदाय के एक सदस्य के खिलाफ अपमानजनक बयान देने के आरोपी एक यूट्यूबर को अग्रिम ज़मानत देने से इनकार कर दिया। हाई कोर्ट ने फैसला देते हुए टिप्पणी की कि डिजिटल युग में, एक व्यक्ति की उपस्थिति में उनकी डिजिटल उपस्थिति भी शामिल है।

याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि इस केस में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम के तहत अपराध लागू नहीं होते हैं क्योंकि ये अपमान, गालियां आदि न केवल सार्वजनिक दृश्य में, बल्कि पीड़िता की मौजूदगी में भी किए जाने की आवश्यकता होती है। चूंकि पीड़िता इंटरव्यू के दौरान शारीरिक रूप से उपस्थित नहीं थी, इसीलिए एससी / एसटी अधिनियम के तहत अपराध, जो गैरज़मानती हैं, जबकि आईपीसी और आईटी अधिनियम के तहत अन्य आरोप जमानती हैं लागू नहीं होते हैं। 

दूसरी ओर पीड़िता के वकील ने तर्क दिया कि अपराध एक सार्वजनिक मंच पर किए गए थे इसीलिए अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम के तहत अपराध लागू होते हैं। वहीं पब्लिक प्रासीक्यूटर के.ए. नौशाद ने तर्क दिया कि एससी/एसटी अधिनियम के उद्देश्यों को डिजिटल युग में ‘उद्देश्यपूर्ण व्याख्या’ दी जानी चाहिए। न्यायमूर्ति थॉमस ने इस संबंध में पब्लिक प्रासीक्यूटर के तर्क से सहमति जताई क्योंकि ‘डिजिटल युग’ में दर्शकों की संख्या विकसित हुई है। डिजिटल युग में इंटरनेट के माध्यम से लोगों की डिजिटल उपस्थिति ने धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) में ‘सार्वजनिक दृष्टिकोण’ शब्द की अवधारणा, अभिप्राय और अर्थ में बदलाव किया है। जब पीड़िता पहले से ही इंटरनेट पर अपलोड की गई सामग्री तक पहुंचती है, तो वह अधिनियम के दंडात्मक प्रावधानों को लागू करने के उद्देश्य से सीधे और रचनात्मक रूप से उपस्थित हो/मानी जाती है। इस प्रकार, जब अपमानजनक सामग्री इंटरनेट पर अपलोड की जाती है, तो दुर्व्यवहार या अपमान का सामना पीड़िता को हर बार करना पड़ता है जब उस तक वह सामग्री पहुंचती है।

कोर्ट ने कहा कि “इंटरनेट के आने से पहले, एक बंद क्षेत्र के भीतर दिए गए भाषण को केवल उसी जगह के अंदर मौजूद लोगों द्वारा ही सुना या देखा जा सकता था। हालांकि, इंटरनेट के आने के बाद, अपलोड की गई सामग्री कोई भी कभी भी देख या सुन सकता है, जैसे कि वे इसे शारीरिक रूप से देख या सुन रहे हों, न केवल उस समय जब इसे प्रसारित किया गया था, बल्कि तब भी जब प्रोग्राम एक्सेस किया जाता है। हर बार जब कोई व्यक्ति अपलोड किए गए कार्यक्रम की सामग्री तक पहुंचता है, तो वह सामग्री के प्रसारण या प्रसारण में प्रत्यक्ष या रचनात्मक रूप से उपस्थित होता है।

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अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम (1989)

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 के अनुसार, अस्पृश्यता और इसी तरह की सभी प्रथाओं की मनाही है। संविधान निर्माताओं ने संविधान में यह अनुच्छेद अनुसूचित जाति और जनजातियों के अधिकारों की रक्षा के लिए संविधान में शामिल किया था। भारत सदियों से वर्गों में बंटा हुआ था। इसी दिशा में 1955 में अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम पारित किया गया था। हालांकि, उस समय की सरकार को 1955 के अधिनियम में बदलाव करने के लिए मजबूर किया गया और 1955 के अधिनियम में कमियों और खामियों के कारण नागरिक अधिकार अधिनियम, 1955 (1976 में संशोधित) पारित किया गया था। इसके बावजूद अनुसूचित जातियों और जनजातियों के खिलाफ अन्याय कम नहीं हुआ। अनुसूचित जातियों और जनजातियों के खिलाफ लगातार जारी हिंसा के कारण संसद ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम (1989) और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) नियम (1995) पारित किया ताकि उनके साथ होनेवाले अमानवीय व्यवहार और हिंसा का मुकाबला किया जा सके।

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (अधिनियम) ने अनुसूचित जातियों और जनजातियों के खिलाफ व्यापक अपराधों को रोकने में एक अहम भूमिका निभाई है। ये विशेष अदालतें (अधिनियम के तहत स्थापित) पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा करने और राहत प्राप्त करने में उनकी सहायता करने के लिए काम करती हैं। समय-समय पर हमें तथाकथित उच्च जाति के लोगों द्वारा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के साथ अन्याय और हिंसा करने की ख़बरें मिलती रहती हैं। ऐसे में न्याय के लिए पुलिस और न्यायालय ही इनका एक मात्र सहारा बचते हैं।

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कोर्ट ने कहा कि “इंटरनेट के आने से पहले, एक बंद क्षेत्र के भीतर दिए गए भाषण को केवल उसी जगह के अंदर मौजूद लोगों द्वारा ही सुना या देखा जा सकता था। हालांकि, इंटरनेट के आने के बाद, अपलोड की गई सामग्री कोई भी कभी भी देख या सुन सकता है, जैसे कि वे इसे शारीरिक रूप से देख या सुन रहे हों, न केवल उस समय जब इसे प्रसारित किया गया था, बल्कि तब भी जब प्रोग्राम एक्सेस किया जाता है।

सोशल मीडिया आज ज़मीन पर होनेवाली हिंसा को भड़काने में भी अहम भूमिका निभा रहा है। उदाहरण के लिए मई 2017 में, फेसबुक पर अफवाहों और भड़काऊ पोस्टों के कारण सहारनपुर में हिंसा भड़क उठी। इसी तरह 2017 में कर्नाटक में, फेसबुक पर नफरत भरे संदेशों को व्हाट्सएप के माध्यम से भी प्रसारित किया गया, जिसने लक्षित समुदायों के खिलाफ हिंसा में योगदान दिया।

3 जुलाई 2017 को, दिल्ली हाई कोर्ट ने एक मामले में फैसला सुनाया था कि अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति (एससी/एसटी) समुदाय के सदस्यों के खिलाफ फेसबुक पर जातिवादी अपमान पोस्ट करना अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत दंडनीय है। अदालत ने फैसला सुनते हुए एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि सोशल मीडिया ‘सार्वजनिक दृष्टिकोण’ के भीतर एक स्थान है और इसलिए, एससी/एसटी समुदाय के विशिष्ट व्यक्तियों के खिलाफ फेसबुक वॉल पर पोस्ट किए गए अपमान पर आपराधिक प्रतिबंध लग सकते हैं। यह मामला इस बात पर प्रकाश डालता है कि कैसे सोशल मीडिया लगातार अभद्र भाषा सामग्री पोस्ट करने का एक मंच बनता जा रहा है।

हम लोगों को यह समझना चाहिए कि भारतीय संविधान के तहत बोलने की स्वतंत्रता एक मौलिक अधिकार है, लेकिन साथ ही यह अधिकार पूर्ण नहीं है और सार्वजनिक व्यवस्था के रखरखाव जैसे उचित प्रतिबंधों के अधीन है। इसके अलावा, किसी व्यक्ति की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग किसी विशेष समुदाय के सदस्यों की भावनाओं को आहत करने के लिए नहीं होना चाहिए।

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तस्वीर साभार: प्रभात खबर

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