समाजकानून और नीति अपनी पसंद से जीवनसाथी चुनना अनुच्छेद 21 का एक अहम हिस्साः दिल्ली हाई कोर्ट

अपनी पसंद से जीवनसाथी चुनना अनुच्छेद 21 का एक अहम हिस्साः दिल्ली हाई कोर्ट

भारत में होने वाली हेट्रोसेक्सुअल जोड़ो की शादियां बड़ी संख्या में खानदान, परिवार और माता-पिता की पसंद से होती हैं। खुद की पसंद यानी लव मैरिज करने वाले जोड़ों को घर और बाहर हर जगह संघर्ष करना पड़ता हैं।

पितृसत्तात्मक व्यवस्था में शादी एक अहम हिस्सा है लेकिन अगर शादी परिवार की रज़ामंदी के बगैर या दूसरे समुदाय, जाति या धर्म में होती है तो उस दंपत्ति को कई तरह की परेशानियों, विरोध और हिंसा का सामना करना पड़ता है। यही नहीं, कुछ मामलों में तो लोगों को जान तक गंवानी पड़ती है। परिवार इसमें पहली बाधा होता है, उसके बाद सामाजिक बहिष्कार का डर पैदा किया जाता है। कानून और आम नागरिकों के अधिकारों को सुनिश्चित करने वाली पुलिस भी अक्सर दंपत्ति को सुरक्षा देने में विफल होती है। इस तरह से खुद की पसंद से शादी करनेवाले जोड़ों को कई स्तर पर संघर्ष करना पड़ता है।

हाल ही में दिल्ली हाई कोर्ट ने खुद की पसंद से शादी करने के एक मामले में एक दंपत्ति के साथ उसके परिवार वालों और पुलिस द्वारा किए गए व्यवहार पर टिप्पणी की है। अदालत ने तीन ज़मानत याचिकाओं पर टिप्पणी की है जो महिला के परिवार के सदस्यों ने दायर की थी। इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित ख़बर के अनुसार दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले में महिला की माँ और दादी को ज़मानत देने से मना कर दिया है। सुनवाई के दौरान जज ने कहा कि महिला की माँ और दादी ने कथित तौर पर दंपत्ति पर हुए हमले में हिस्सा लिया था। साथ ही परिवार के अन्य सदस्यों को महिला के पति के प्राइवेट पार्ट को काटने के लिए प्रोत्साहित किया था। तीसरी ज़मानत याचिका महिला की बहन की थी जिसकी घटना में सक्रिय भूमिका न होने पर अदालत ने उसे ज़मानत दे दी।

अदालत ने अपनी पसंद से शादी करने को अनुच्छेद 21 का एक हिस्सा बताया है। अदालत ने कहा है, “कानून के अनुसार शादी में अपनी पसंद का साथी चुनना, पसंद के अधिकार के तहत भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

क्या है पूरा मामला

इस दंपत्ति ने खुद की पसंद से शादी की थी। इसके बाद महिला के परिवारवालों ने उनका विरोध किया और उन्हें जान से मारने की धमकी दी। 22 दिसंबर 2021 में यह दंपत्ति शादी के बाद दिल्ली लौटे तो परिवार इससे नाराज़ हो गया। इसी दौरान परिवार ने उन्हें धमकी दी। वे थाने पहुंचे और उन्होंने सुरक्षा की मांग की। पति-पत्नी ने रजौरी गार्डन पुलिस स्टेशन में सुरक्षा की मांग की थी। पुलिस स्टेशन से लौटते समय महिला के परिवारवाले उन्हें अपने घर ले गए जहां उसके पति को बुरी तरह मारा गया और उनके निजी अंग को कुल्हाड़ी से काट दिया गया। उसके बाद उसे एक नाले में फेंक दिया गया था और उसके भाई ने उसे बचाया। बाद में एम्स के ट्रॉमा सेंटर में भर्ती कराया था। 

महिला की दादी, माँ और बहन पर परिवार के अन्य लोगों पर हिंसा की घटना में शामिल होने का आरोप था। इसके बाद, महिला के चाचा ने कुल्हाड़ी से उसके पति के प्राइवेट पार्ट पर हमला कर दिया था। इस मामले में माँ और दादी की ज़मानत याचिका खारिज करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है, “अपराध की गंभीरता को देखते हुए, जिस तरह से हमला किया गया और घटना में उनकी भूमिका को देखते हुए ज़मानत का कोई आधार नहीं बनता है।” यही नहीं इस मामले में अदालत ने पुलिस की भूमिका की आलोचना करते हुए कहा था कि यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि पुलिस इस जोड़े को सुरक्षा मुहैया नहीं करवा सकी। पुलिस को जिस तरह की कार्रवाई करनी चाहिए थी वह नहीं की गई। लव मैरिज के मामलों में पुलिस की कार्रवाई को लेकर भी कई बार आलोचनाएं हो चुकी हैं। पूर्व में ऐसे कई केस सामने आ चुके हैं जहां पुलिस के सहयोग न देने की बात सामने आई है।

लाइव लॉ के मुताबिक़ जस्टिस अनूप कुमार ने कहा कि ऐसे मामलों में जहां जोड़ों ने कानूनी रूप से अपनी मर्जी से शादी की है, पुलिस से कानून के अनुसार तेज़ी और संवेदनशीलता से काम करने की उम्मीद की जाती है। पुलिस को ऐसे मामलों में दंपत्ति की सुरक्षा के लिए ज़रूरी कदम उठाने चाहिए, अगर वे किसी अन्य और अपने परिवार के सदस्यों से दुश्मनी और असुरक्षा का भाव महसूस करते हैं।

अदालत ने इस पूरे मामले में पुलिस की भूमिका की आलोचना की है। अदालन ने कहा है, ”यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि पुलिस स्टेशन ने उनकी शिकायत करने के बावजूद आवश्यक कदम नहीं उठाए। इस संबंध में संबंधित पुलिस अधिकारियों का आचरण निंदनीय है और इस पर गौर करने की आवश्यक कार्रवाई करने की ज़रूरत है। पुलिस की ओर से ऐसी किसी भी चूक को स्वीकार नहीं किया जा सकता है।”

अदालत ने इस मामले में पसंद से शादी करने को अनुच्छेद 21 का एक हिस्सा भी कहा है। अदालत ने कहा है, “कानून के अनुसार शादी में अपनी पसंद का साथी चुनना पसंद के अधिकार के तहत भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 का महत्वपूर्ण हिस्सा है। विश्वास के आधार पर किसी भी व्यक्ति के जीवनसाथी चुनने की स्वतंत्रता पर कोई असर नहीं पड़ता है और यह यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सार है।“

खुद की पसंद से शादी करना कितना है मुश्किल

भारत में होनेवाली हेट्रोसेक्सुअल जोड़ों की शादियां बड़ी संख्या में खानदान, परिवार और माता-पिता की पसंद से होती हैं। खुद की पसंद यानी लव मैरिज करने वाले जोड़ों को घर और बाहर हर जगह संघर्ष करना पड़ता हैं। बीबीसी न्यूज़ में प्रकाशित लेख के मुताबिक भारत में होनेवाली 93 फीसदी शादियां अरेंज होती हैं। केवल 3 फीसदी लव मैरिज होती है और केवल 2 फीसदी शादियां लव कम अरैंज के टाइटल से संपन्न होती हैं। यह आंकड़ा दिखाता है कि भारत में रिश्तों को तय करने में परिवार बड़ी भूमिका निभाते हैं। अगर कोई इससे से अलग जाकर शादी करता है तो उसके लिए उसे बहुत संघर्ष करना पड़ता है। 

महज पसंद से शादी करने पर परिवार की तथाकथित शान के नाम पर ऑनर किलिंग की घटनाएं पूरे देश में घटित होती हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित लेख में 2014 और 2016 में 288 केस ऑनर किलिंग के दर्ज किए गए थे। 2020 में महामारी के बाद ऑनर किलिंग का आधिकारिक आंकड़ा 25 ही जारी किया गया था। भारत में इस सच को भी नहीं नकारा जा सकता है कि नाम और सम्मान के नाम पर होने वाली ऑनर किलिंग के केस बड़ी संख्या में दर्ज भी नहीं होते हैं। ऑउटलुक के एक लेख में एक एनजीओ के संदर्भ से कहा गया है कि नवंबर 2019 में पिछले पांच सालों में अकेले तमिलनाडु में 195 ऑनर किलिंग के केस दर्ज हुए।


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