संस्कृतिकिताबें अनुपम सिंह की किताब ‘मैंने गढ़ा है अपना पुरुष’ पूर्व निर्धारित नियमों को उलट देने की खूबसूरत ज़िद!

अनुपम सिंह की किताब ‘मैंने गढ़ा है अपना पुरुष’ पूर्व निर्धारित नियमों को उलट देने की खूबसूरत ज़िद!

स्त्री जब सामाजिक ढांचे के वर्जित प्रदेश में जाती है तो एकबारगी साहित्य की दुनिया भी उसे सकपका कर देखती है कि क्या कह रही है ये स्त्री। लेकिन जिसे कहना है वह कहकर रहती है क्योंकि उसे नहीं न्याय दिखता एक बनी-बनाई व्यवस्था में। अपने लिए उसे उनकी दी हुई आज़ादी बेहद अपर्याप्त लगती है और वह विद्रोह कर बैठती है उस पूरे सामाजिक ताने-बाने से जहां पुरुष पति है अर्थात पालक और पत्नी पालिता। उसे एक गैरबराबरी की दुनिया चाहिए जहां वह अपनी इच्छाओं से जिए, जिसमें भूख प्यास और देह की ही आज़ादी नहीं उसकी अपनी यौनिक इच्छाओं पर सिर्फ औऱ सिर्फ उसका अधिकार हो।

अनुपम किस दुनिया की बात कर रही हैं, एकबारगी लगता है जो स्त्री-पुरुष यौनिक इच्छाओं के समभाव की लेकिन थोड़ा आगे बढ़ने पर अनुपम हमें चौका देती हैं जब वह दो स्त्रियों के प्रेम में होने के अनुभव और उनकी कोमल संवेदना को पूरी गरिमा के साथ एक काव्यात्मक स्वर दे देती हैं। स्त्री यौनिकता की अस्मिता के सवाल पर वह हर तरह से ज़िरह करने को तैयार हैं जहां बहस स्त्री पुरुष या स्त्री का स्त्री से या समलैंगिक संबंध आदि की ही बहस नहीं है बल्कि वह मनुष्य के मनुष्य से सम्बंध और प्रेम पर बात कर रही हैं जहां देह को जरा भी तटस्थ नहीं रख रहीं हैं बल्कि देह पर बात करते हुए वह नयी परिभाषा और नये अर्थ भी दे रहीं हैं। वह सीधे कहती हैं कि आत्मा देह का ही विस्तार है ।

हमारे बीच आत्मा की साझेदारी नहीं
देह का लम्बा चौड़ा पाट है
जहाँ लदे कांटों भरे झरबेर के दो पेड़
देह भी उतना ही जोड़ती है एकदूसरे से जितना कि आत्मा का मिथक
मेरी पाठशाला का प्राथमिक सच ,प्राथमिक ज्ञान
मेरी तुम्हारी यह देह है

एक स्त्री अगर पूर्ण स्वतंत्र होकर अपनी इच्छाएं कहेगी तो क्या होगी उसकी भाषा, क्योंकि जो भाषा बनी है जिसे पितृसत्ता ने गढ़ा होगा वे शब्द नहीं बनाए होंगे जिसमें स्त्री अपनी दैहिक इच्छाओं को ठीक ठीक दर्ज करे। अनुपम ने वहां से आगे चलकर उस इच्छा के लिए अपनी भाषा ईजाद कर ली।

वह प्रेम को एकनिष्ठता से उबार कर कहती हैं किसी दिन पूछोगे तुम मेरे प्रेमी का नाम तो मैं निजी कहकर टाल जाऊंगी..! लेकिन प्रेमियों को लेकर वे यहीं नहीं रुक रही हैं। आगे कहती हैं प्रेमी वही नहीं था जिसने कोई वादा किया और निभाया भी जिसके साथ मैं पाई गई सिविल लाइंस के कॉफी हाउस में, जिसके साथ बहुत सारी कहानियां बनी और शहर की दीवार पर गाली की तरह चस्पां की गई। वह भी था जिसके आगोश में जाड़े की आग बहुत प्रिय लगी जिसने कोई वादा नहीं किया और स्वप्न टूटने से पहले चला गया ..!

अनुपम प्रेम के जाने कितने अनुभव और प्रेमियों की स्मृतियों को अपने वर्तमान प्रेमी से साझा कर रही हैं और एक आस भी रखती हैं कि कभी कोई प्रेमी लौटेगा। प्रेम पर लिखी गई स्त्री कविता में ये एक अद्भुत और बहुत साहस से लिखी गई खूबसूरत कविता है। प्रेम में एक जो बनी-बनाई धारणा है एकनिष्ठ प्रेम की। अनुपम अपनी कविताओं में बड़ी सहजता और सुंदरता से तोड़ देती हैं और प्रेम के असीम विस्तार में विचरण करती हैं।

वह दैहिकता और यौनिकता से जुड़े कुछ निर्भीक और महत्वपूर्ण प्रश्न कर रही हैं जिसमें प्रणय का सुख और देह के देह से मिलने का आनंद ही नहीं अथाह पीड़ाओं की कथा भी है जिसमें घर-परिवार में ही बच्चियों की देह पर कुदृष्टि रखने वाले अपने भी घेरे में खड़े होते हैं। जिनके अपराध को परिवार गम्भीर अपराध नहीं मानता और जाने कितनों का बचपन नष्ट करते रहते हैं।अनुपम उन्हें चिन्हित करके एक बाल पीड़ा की कोमल सतहों को खोलती हैं ।

एक स्त्री अगर पूर्ण स्वतंत्र होकर अपनी इच्छाएं कहेगी तो क्या होगी उसकी भाषा, क्योंकि जो भाषा बनी है जिसे पितृसत्ता ने गढ़ा होगा वे शब्द नहीं बनाए होंगे जिसमें स्त्री अपनी दैहिक इच्छाओं को ठीकठीक दर्ज करे। अनुपम ने वहां से आगे चलकर उस इच्छा के लिए अपनी भाषा ईजाद कर ली और साथी से कह देती हैं कि शर्तों पर टिका है मेरा प्रेम। वह कहती हैं कि मुझसे प्रेम करने के लिए तुम्हें शुरू से शुरू करना होगा। फिर प्रेमी को बताती हैं कि किस तरह स्त्री प्रकृति की सगी है तो अगर वह उससे प्रेम करना चाहता है तो सारी नदियों, मछलियों, कीट पतंगों और जंगल के हरेपन को प्रेम करना होगा। वह एक सामूहिकता की संस्कृति से जोड़ते हुए अपने साथी से कहती हैं तुम्हें मुझसे प्रेम करने के मेरे साथ खेतों में काम करना होगा और रसोई में खड़े रहना होगा। पूर्ण समानता की बात करते हुए वह स्पष्ट कह देती हैं कि बिस्तर पर तुम्हें पुरुष नहीं मेरा प्रेमी होना होगा।

अनुपम प्रेम के जाने कितने अनुभव और प्रेमियों की स्मृतियों को अपने वर्तमान प्रेमी से साझा कर रही हैं और एक आस भी रखती हैं कि कभी कोई प्रेमी लौटेगा। प्रेम पर लिखी गई स्त्री कविता में ये एक अद्भुत और बहुत साहस से लिखी गई खूबसूरत कविता है।

कितने रंग धरती पर प्रकृति ने बिखेरा है ज़ाहिर है कि सब सुंदर हैं लेकिन धरती पर मनुष्यों ने रंगभेद की इतनी गहरी खाई बनाई है कि रंग को लेकर मनुष्यों का समाज बेहद अमानवीय और असमानता का है और रंग का ये भेदभाव क्रूरता की हदों तक जाता दिखता है। एक बच्ची जिसका रंग काला है वह अचरज़ से सोचती है कि धरती पर हजारों चीजें थीं काली और खूबसूरत फिर उसके काले रंग से इतनी घृणा क्यों। उसके रंग को ही देखकर लोगों के मुंह का स्वाद क्यों बिगड़ता है। काले रंग को लेकर उन्होंने कितने चुटकुले और क्रूरता और अपराध के मानक मुहावरे गढ़ लिए हैं। समाज ने उससे महज काले रंग के कारण प्रेम के अधिकार छीन लिए। उनकी दुनिया में काला रंग होना अभिशाप है खूब सारी फिल्में बनी थीं जहां काले रंग की लड़कियों का मजाक बनाया जाता था। अपनी पीड़ा को दर्ज करते हुए अनुपम कहती हैं कि

तस्वीर खिंचाती तो बचपन की कोई बात अनमना कर जाती है
सोचती हूँ कितनी जल्दी निकल जाऊँ दृश्य से
काला कपड़ा तो जिद में पहना हाथ जोड़ लेते पिता बिटिया मत पहना करो काली कमीज़
वैसे तो काजल और बिंदी दो श्रृंगार प्रिय थे
अब लगता है कि काजल भी जिद का ही भरा था
उनको कई बार ये कहते सुना था कि काजल फबता नहीं तुमपर
देवी-देवताओं और सज्जनों ने मिलकर कई बार तोड़ा मुझे
मैं थी उस टूटे पत्ते सी जिसमें जड़ें फूटती हैं ।

एक कविता रंग जहां अपराधी होते हैं, में अनुपम अपनी पीड़ा कहते हुए जाने कितनी लड़कियों की पीड़ा को शब्द दे रही हैं।जहां संवेदना में शून्य समाज बालमन में ही रंगभेद भर देता है और भेदभाव का समाज वहीं से अपना काम करना शुरू कर देता है।

एक किताब जिसका शीर्षक है मैंने गढ़ा है अपना पुरुष ,
मैं उसकी जाँघ पर कुहनी टिकाये सिगार पी रही हूँ
मैंने अपना पतझड़ उसकी टोप में छुपा दिया है
मुझसे सभी नायिकायें रश्क कर रही हैं कि मैने अपना पुरुष कैसे गढ़ा ..!

जब हम शीर्षक पर ठहरेंगे तो यह बात ध्यान में आती है कि यह जरूर किसी निर्भीक स्त्री की स्वतंत्र इच्छा का पारावार है। जरूर स्त्री की चेतना में देह की इच्छाओं की प्राथमिकता है नहीं तो वे श्रमशील स्त्रियां मजदूर हैं, कामगार हैं, किसान हैं। उस वर्ग की स्त्रियां जो रोटी-धोती के संधान में उलझी हैं उनके अपने जीवन में इतने तरह के जंजाल हैं जिससे निकलना ही उनका स्वप्न होता है। एक सामान्य सुविधाओं के जीवन की आस में वे श्रम को उसका साधन बनाती हैं। पुरुष उनकी प्राथमिकता नहीं हो पाएगा और वह पुरुष जो उनका प्रेमी होता है दूर कहीं किसी कोने में खड़ा रह-रहकर निहार लेता है अपनी प्रेमिका को। जबकि उनकी प्रेमिकाएं ये भी नहीं कर पातीं उनके निहारने भर का भी साहस बहुत सी नैतिकताओं की भेंट चढ़ चुका होता है।

आर्थिक व सामाजिक जाल में फंसे लोगों के लिए ये कविताएं स्वतंत्रता का एक स्वप्निल संसार रचती हैं। लेकिन जिस समाज में हम रह रहे हैं वहां स्त्री के लिए स्वतंत्रता का ये चरण अभी बहुत दूर है। अभी उसके पास इससे कहीं ज्यादा जरूरी चीजें नहीं उपलब्ध हैं। अभी उनका संघर्ष उनकी आर्थिक स्वतंत्रता और सामाजिक बराबरी को तय नहीं कर पाया। स्त्री यौनिकता से जुड़ी ये बहसें जरूरी हैं लेकिन अभी हम उससे कहीं दूर खड़े हैं। यह एक ऐसी ही बात है कि घर के लिए अभी हमारे पास प्लाट नहीं है और हम डेकोरेशन पर बात कर रहे हैं। एक समाज में स्त्री के लिए कितनी गैरबराबरी है बहुत ही साहस और निर्भीकता से लिखी गई ये अद्भुत कविताएं हैं। इन्हें बार बार हम स्त्रियों को पढ़ना और आत्मसात करना होगा सशक्त होकर अपनी इच्छा और कामनाओं को पहचानना होगा। एक कविता में अनुपम कहती हैं कि –

मैं बालों में फूल खोंस
धरती की बहन बनी फिरती हूँ
मैंने एक गेंदे अपने छोटे भाई
आसमान की तरफ उछाल दी है
हम तीनों की माँ नदी है
बाप का पता नहीं है..

ये कविता अनुपम का हस्ताक्षर है। इसमें सीधे-सीधे वह पितृसत्ता को चुनौती देती हैं या एक तरह से खारिज कर रही हैं उस चिरसत्ता को। वह प्रकृति से सीधे अपने संबंध को जोड़कर बताती हैं कि धरती की बहन बन जाती हैं और आसमान को अपना भाई बता रही हैं। वह भी छोटा भाई जिसकी तरफ वो गेंद उछाल देती हैं और अंत में नदी को माँ बताते हुए सीधे कहती हैं पिता का पता नहीं है। एक चिरस्थायी सत्ता को व जिस सहजता से ख़ारिज कर रही हैं कविता में वह बेहद खूबसूरत और नैसर्गिक सौंदर्य से भरा है। संग्रह में अलग-अलग संवेदना और पीड़ा पर लिखी गई कविताएं है। हम स्त्रियां जो एक ऐसे संसार का स्वप्न देखती हैं जिसमें स्त्री अपनी इच्छाओं को बेबाकी से दर्ज कर रही तो निश्चित ही पढ़कर हैरान और निहाल होंगे एक स्त्री के ढीठपन और पूर्व निर्धारित नियमों को उलट देने की खूबसूरत ज़िद पर।


About the author(s)

रूपम मिश्र

रूपम मिश्र मूल रूप से कवि हैं विभिन्न पत्र , पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित हैं । 7 जून1983 को उत्तरप्रदेश के जौनपुर जिले के एक गाँव तिलहरा( सुजानगंज) में जन्म। प्रारंभिक से लेकर स्नातक तक शिक्षा जौनपुर जिले में पूर्वांचल में ही हुई। प्रतापगढ़ जिले में पट्टी तहसील के बिनैका गाँव में रहनवारी हैं।

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