जेंडर की अलग-अलग परतों को खोलती वी गीता की किताब 'जेंडर'
जेंडर की अलग-अलग परतों को खोलती वी गीता की किताब 'जेंडर'
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“लड़की है पिंक कलर ही पहनने दो”, “लड़के रोते नहीं हैं,” हमने ऐसे वाक्य सुने ही होते हैं जो महिला, पुरुष को किस तरह होना चाहिए, इसे परिभाषित करते हैं। इससे यह विचार गढ़ा जाता है कि समाज में सिर्फ़ दो तरह के ही व्यक्ति होते हैं- महिला और पुरुष। आसान शब्दों में समझें तो महिला और पुरुष को समाज द्वारा निर्धारित किस विशेष तरीके से व्यवहार करना चाहिए को ‘जेंडर’ कहा जाता है। जबकि इन दो आइडेंटिटी से हटकर भी अलग-अलग आइडेंटिटी समाज में शामिल हैं। हालांकि, पितृसत्तात्मक समाज इस चीज़ को स्वीकार नहीं करता। जेंडर कैसे निर्धारित होता है, उसका इतिहास क्या है, जेंडर संबंधी क्या विमर्श हैं, इसी सब पर समझ को और बेहतर करने के लिए नारीवादी लेखिका वी गीता की किताब जेंडर को पढ़ा जाना एक ज़रूरी और सहायक कदम साबित हो सकता है।

वी. गीता की ये किताब मूल रूप से अंग्रेजी में है। इसका पहला संस्करण 2002 में आया था। इस किताब की वरिष्ठ संपादक मैत्रेई कृष्णराज हैं। एक ऐसा दौर जब लोग बिना पढ़े हर मुद्दे पर राय बनाना चाहते हैं, हम किताब के ढांचे से लेकर उसके अंदर कही गई महत्वपूर्ण पक्षों पर इस तरह बात रखेंगे कि आप किताब को पढ़ने के लिए उत्साहित हो। किताब फॉरवर्ड, इंट्रोडक्शन, कंक्लूजन और इंडेक्स के साथ पूरे छह चैप्टर्स में लिखी गई है। पहला पाठ, भगवान ने आपको अलग बनाया, प्रकृति ने हमें अलग बनाया (गॉड मेड यू डिफरेंट, नेचर मेड अस डिफरेंट) है। दूसरा पाठ, सेक्सेस का युद्ध (द वॉर ऑफ़ सेक्सेज) है, तीसरा पाठ, भूमिका निभाना (रोल प्ले) है, चौथा पाठ, पुरुषत्व और स्त्रीत्व: विचार वास्तविक हैं (मैस्कुलिनीटी एंड फेमिनिटी: आइडियाज आर रियल) है, पांचवां पाठ, इतिहास के रूप में जेंडर (जेंडर एज हिस्ट्री) है और आख़िरी पाठ, जेंडर आचरण (जेंडर प्रैक्टिसेज) है।

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1- भगवान ने आपको अलग बनाया, प्रकृति ने हमें अलग बनाया (गॉड मेड यू डिफरेंट, नेचर मेड अस डिफरेंट)

हम यह सुनते ही रहते हैं कि हमें (महिलाओं को) तो भगवान ने बनाया ही ऐसा है कि पुरुषों की सेवा करें, पुरुषों को तो भगवान ने बनाया ही बलवान है। इतिहास से ही क्योंकि महिलाओं और पुरुषों के शारीरिक की बनावट अलग है, उसी बनावट को आधार बनाते हुए महिलाओं को बाकी संबंध में भी अलग और कमज़ोर करार दिया गया। वी. गीता किताब के इस पाठ में केंद्र में यह बात रखती हैं कि कैसे महिला और पुरुष के जेंडर को अलग साबित करने के लिए तीन तरह के विचार तर्कसंगत माने गए। पहला विचार, धार्मिक स्पष्टीकरण का है जिसके अनुसार धर्म ग्रंथों के रचने के वक्त से ही पुरुष और महिला अलग हैं। जैसे ग्रीक कथाओं के अनुसार देव और देवियां दोनों लोगों के लिए पूज्य हैं लेकिन देव यानी पुरुष परफेक्शन के आइडियल के तौर पर देखा जाता है और देवी यानी महिला सेकंडरी मानी जाती हैं।

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ग्रीस में जन्मे राजनीतिक फिलोसॉफर एरिस्टोटल तक ने कहा कि महिलाओं में तर्शीलता, बौद्धिकता की कमी होती है। बुद्धिस्ट कथाएं जैसे जातक कथाओं में महिला को बुरा, और पुरुषों द्वारा काबू किए जानेवाली बताया गया है। वहीं, इस्लाम में महिलाओं की शारीरिक पवित्रता का विचार मौजूद है और हिंदू धर्म में तो महिलाएं सिर्फ पुरुषों को हर तरह से सेवा देने के लिए हैं। चैप्टर में यह भी बताया गया है कि किस तरह विज्ञान ने भी महिला और पुरुष को अलग करने के लिए हार्मोन के अलग होने का सहारा लिया है और अपनी बात स्पष्ट करनी चाही है। पाठ के अंत में लोकतांत्रिक समय की बात करते हुए वी. गीता यह बात सामने रखती हैं कि आधुनिक समय के साथ पुरुषत्व और स्त्रीत्व के मानकों में बदलाव आए हैं, 1789 के फ्रांसीसी क्रांति के बाद क्रांतिकारियों ने ये प्रचलित किया कि सभी पुरुष और महिला एक समान हैं और समानता, स्वतंत्रता एवं बंधुत्व का नारा दिया।

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हमें शुरू से सिखाया जाता है कि एक स्त्री कैसा व्यवहार करेगी और एक पुरुष कैसा। हम सभी वे भूमिकाएं निभाते रहते हैं जो समाज ने हमें दी हैं। वी गीता इसी भूमिका निभाने पर बात करती हैं कि कैसे स्कूल, परिवार में लड़के, लड़की का पालन अलग तरह से किया जाता है, उन्हें सामाजिक ढांचे के अनुसार स्त्री, पुरुष के खांचे में बांधा जाता है और उनकी सीमाएं तय की जाती हैं।

2. सेक्सेस का युद्ध (द वॉर ऑफ़ सेक्सेज)

वी. गीता इस भाग में पुरुष और स्त्री के मध्य बनाए गए कैटिगोरिकल डिफरेंस की बात करती हैं जिसके अनुसार पुरुष और स्त्री हमेशा ही अलग रहेंगे। पुरुष, स्त्री को हमेशा अपने से नीचे ही समझेगा और जिसके कारण हम देखते हैं कि समाज में लड़के तो लड़के ही रहेंगे जैसे विचार प्रचलित हैं। इस कैटिगोरिकल डिफरेंस के अनुसार मनुष्य सिर्फ दो प्रकार के होते हैं, स्त्री और पुरुष। इस स्त्री, पुरुष की संरचना विभिन्न तरीकों से की जाती है जैसे पहनावा। लड़का है तो पैंट शर्ट, लड़की है तो फ्रॉक आदि ही पहनेगी। जैसे स्पोर्ट्स में लड़का है तो क्रिकेट, लड़की है तो टेनिस, जैसे यौनिक व्यवहार में भी लड़की हमेशा लड़के की संतुष्टि का ख्याल रखेगी आदि। इसी भाग में आगे वी. गीता महिलाओं के भावों का आज़ादी के समय में योगदान पर बात करते हुए गांधी जी का जिक्र करती हैं कि कैसे उन्होंने महिला को कुछ भाव जैसे त्याग, नम्रता आदि में सीमित किया।

3. भूमिका निभाना (रोल प्ले)

हमें शुरू से सिखाया जाता है कि एक स्त्री कैसा व्यवहार करेगी और एक पुरुष कैसा। हम सभी वे भूमिकाएं निभाते रहते हैं जो समाज ने हमें दी हैं। वी. गीता इसी भूमिका निभाने पर बात करती हैं कि कैसे स्कूल, परिवार में लड़के, लड़की का पालन अलग तरह से किया जाता है। उन्हें सामाजिक ढांचे के अनुसार स्त्री, पुरुष के खांचे में बांधा जाता है और उनकी सीमाएं तय की जाती हैं। इस भूमिका निभाने को चुनौती देने के लिए वी. गीता कुछ सुझाव पेश करती हैं जैसे मीडिया द्वारा समानता का प्रचार, किताबों का दोबारा लेखन इस प्रकार कि उसकी भाषा न्यूट्रल हो ना कि पुरुषत्व से हावी हो, आदि।

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पितृसत्ता ने पुरुषत्व और स्त्रीत्व की परिभाषाएं गढ़ी और ये प्रचलित किया कि मानव जाति में बस ये दो पहचान ही मौजूद हैं। वी गीता इस बात का खंडन करते हुए यह कहती हैं कि प्रत्येक सामाजिक परिस्थिति में और भी तरह की पहचान, जेंडर की पहचान के साथ सम्मलित होती हैं। जैसे भारतीय परिपेक्ष्य में वर्ग, जाति, धर्म आदि पहचान जेंडर की पहचान के साथ शामिल हैं।

4. पुरुषत्व और स्त्रीत्व: विचार वास्तविक हैं (मैस्कुलिनीटी एंड फेमिनिटी: आइडियाज आर रियल)

पितृसत्ता ने पुरुषत्व और स्त्रीत्व की परिभाषाएं गढ़ी और ये प्रचलित किया कि मानव जाति में बस ये दो पहचान ही मौजूद हैं। वी. गीता इस बात का खंडन करते हुए यह कहती हैं कि प्रत्येक सामाजिक परिस्थिति में और भी तरह की पहचान, जेंडर की पहचान के साथ सम्मलित होती हैं। जैसे भारतीय परिपेक्ष्य में वर्ग, जाति, धर्म आदि पहचान जेंडर की पहचान के साथ शामिल हैं। लेखिका इस भाग में कैटिगोरिजेशन की सीमाओं की बात करते हुए कहती हैं कि महिलाओं को न सिर्फ़ उनकी लेबर बल्कि बतौर लेबरर भी बांट दिया है। कास्ट कैटिगोराइज की बात करते हुए वी. गीता कहती हैं कि कैसे एक दलित पुरुष, सवर्ण पुरुष से अलग होता है और कैसे एक दलित स्त्री, दलित पुरुष और सवर्ण स्त्री, पुरुष, से अलग होती है।

5. इतिहास के रूप में जेंडर (जेंडर एज हिस्ट्री)

यह भाग इस बात की खोज परख करता है कि पुरुषत्व और स्त्रीत्व की ऐतिहासिक स्पष्टताएं क्या हैं। ये दोनों मानक किस तरह अस्तित्व में आए। इसके लिए वी. गीता मार्क्सवाद से शुरुआत करती हैं जिसमें एंगल्स अपने काम ओरिजिन ऑफ फैमिली में जेंडर का मार्क्सवादी सिद्धांत देते हैं और किस तरह प्राइवेट प्रॉपर्टी के उदय के साथ महिलाओं का शोषण शुरू हुआ पर बात करते हैं। प्रोडक्शन और रिप्रोडक्शन में महिलाएं किस तरह पुरुषों द्वारा इस्तेमाल की गई हैं को गहराई से जानने की कोशिश करते हैं। वी. गीता भारतीय परिपेक्ष में प्रोडक्शन की यूनिट जाति को मानती हैं। चैप्टर में अन्य तरह की थियरी का मुआयना करते हुए कार्नी हॉर्नी, कार्ल जंग से लेकर सिमोन द बोवुआ, अल्फ्रेड एडलर की थियरी से पुरुषत्व और स्त्रीत्व का इतिहास जानने की कोशिश करती हैं। पाठ के अगले भाग में भारतीय परिपेक्ष्य में ब्राह्मणवादी पितृसत्ता पर उमा चक्रवर्ती के विचार, पेरियार, फुले, डॉक्टर आंबेडकर के विचारों को विस्तार से उल्लेखित करती हैं।

6. जेंडर आचरण (जेंडर प्रैक्टिसेज)

किताब के आखिरी भाग में वी गीता जेंडर का आचरण किन प्रकारों से होता है, पर बात रखती हैं। जैसे महिलाएं या पुरुष कैसे दिखें, वह सिर्फ पुरुष की नज़र से समाज में मौजूद है। इसीलिए महिलाएं अपने दिखने को लेकर पुरुष के नजरिए से काम करती हैं, उनका चेहरा कैसे दिखे से लेकर शरीर की बनावट तक पुरुष की नज़र से तय होती है। वहीं पुरुष होने के लिए हिम्मत, पौरुष का प्रदर्शन काफ़ी होता है। पाठ के अंत तक आते आते वी. गीता रोमांस, शादी और महिला के मदरहुड पर लिखती हैं कि किस तरह शादी का विचार एकतरफा है और महिलाओं के लिए मां बनना समाज के अनुसार उनका एकमात्र लक्ष्य। वी. गीता अपनी किताब में जो लिखती हैं वह ऐसा मालूम होता है कि जैसे ये सब बातें हम सुनते आए हैं लेकिन किताब के रूप में जब यही बातें व्यवस्थित तौर पर, तर्क के साथ पढ़ी जाती हैं तब हम इस बात के लिए प्रेरित होते हैं कि हमें जेंडर की बाउंड्री किस तरह तोड़नी है ताकि हम एक समतामूलक समाज की संरचना कर पाएं।

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