इंटरसेक्शनलजेंडर जीवन के हर पढ़ाव में ‘एक स्त्री का प्रेम’ में होना कैसा है!

जीवन के हर पढ़ाव में ‘एक स्त्री का प्रेम’ में होना कैसा है!

हर दिन एक अजीब सी व्यथा महसूस करेगी, कि ये जो महसूस हो रहा है, ये क्या है, प्रेम तो नहीं है, क्योंकि प्रेम तो सिर्फ अपने पति से है, फिर ये क्या है, दोस्ती? समाज की आवाजें इनका पीछा नहीं छोड़ती। ये तुमसे तो क्या, खुद से भी कभी इस प्रेम का इज़हार नहीं कर पाएंगी।

एक स्त्री कभी भी केवल स्त्री नहीं होती है, वो सदैव ही समाज के किसी न किसी प्रारूप में बंधी स्त्री होती है और ये प्रारूप उसके प्रेम में होने के भाव को बहुत प्रभावित करते हैं। यदि वो प्रेम में भी होती है, तब भी ये प्रेम एक बाध्य प्रेम होता है, बाध्य मगर आज़ाद। प्रेम पर लिखना, वो भी एक स्त्री के मायने से मेरे लिए सदैव ही कठिन रहा है। बिना किसी आस के, अनायास प्रेम दे चुकी स्त्री का आलम बयान करना किसी भाषा के कुछ चुनिंदा शब्दों के बस में कहां भला? फिर भी, आज तक अपने आस-पास की स्त्रियों को प्रेम में देखकर जो भी महसूस हुआ है उसने मेरे मन को भावों से भर दिया है जिसको बताना ज़रूरी है।

युवा स्त्री और प्रेम का एहसास

पहली नज़र के प्रेम और कभी-कभार तुम्हारे ध्यान के केंद्र के छोटे से तिनके को पकड़ कर अपने अधपके आकर्षण या प्रेम भरे भावों को रख देती है तुम्हारे सामने, कभी शरमाते हुए, तो कभी बहुत ही साहसी लहज़े में। अपना सब तुम्हें देने को राज़ी, तुम्हारी आदतों में बिना सोचे ढलने को तैयार। नए-नए प्रेम के नए-नए रोमांच को महसूस करते हुए वह अपनेआप को खोल देती है और बह जाती है। यह प्रेम देती है, जताती है, खुल कर, हर रूप में, हर छोटे-बड़े इशारे से, हर अल्फाज़ में। हाथों का भिड़ना, तुम्हारी हल्की मुस्कुराहट, वो कनखियों से देखना, ये सब बहुत भाता है उन्हें, पर उनके आकर्षण की असल वजह अपनी साथी के साथ महसूस होने वाली सुरक्षा है। बहुत हल्की उम्मीद को भी मन में लिए वो हर बार इंतजार करती है।

बीस-वर्षीय कवियित्री और लेखिका अकांक्षा प्रेम को निस्वार्थ होने के भाव से जोड़ती हैं। अकांक्षा का कहना है कि उन्होंने एक निस्वार्थ प्रेम का भाव केवल अपने परिवार, माता-पिता और अपनी आस-पास की औरतों के लिए महसूस किया है। लेडी श्री राम कॉलेज से पढ़ी अकांक्षा कहती हैं, “मेरे जीवन की औरतों के प्रति प्रेम और सम्मान और उन्हें हमेशा अपने चरम पर देखने की एक प्रबल इच्छा हमेशा मन में रहती है।” जब उनसे एक हमराही के लिए प्रेम के बारे में पूछ गया तो उन्होंने बताया, “जब आप रोमांटिक प्रेम की बात करती हैं तो वो हल्की-हल्की किसी की अटेंशन (ध्यान) अच्छी लगती है। प्रेम कविताओं की प्रेरणा के लिए एक असल शख्स का होना प्रेम में होने के भाव को व्यक्त करता है।”

तीस-वर्षीय समाजशास्त्र की शिक्षिका नैंसी अपने प्रेम के सफर की बात करते हुए कहती हैं, “मेरे लिए प्रेम के मायने पिछले दस वर्षों में बहुत बदल गए हैं। शिक्षा और उससे मिले एक्सपोजर ने मेरे जैसी बहुत सी आधुनिक युग की औरतों के लिए प्रेम को एक कठिन मोड़ पर ला खड़ा किया है।”

एक मध्यांतर उम्र की स्त्री का प्रेम में होना

प्रेम कर चुकी, प्रेम समझ चुकी, प्रेम दे चुकी, प्रेम पा कर ठुकरा चुकी स्त्री। ये बंधी नहीं है, बस अब तुम्हारे लिए खुलेगी नहीं। शायद बहुत प्रयासों के बाद इसकी दीवारों को तोड़ सको तुम, मगर अब इसे प्रेम के ज़रिए खोल पाना नामुमकिन है। इतनी बार चोट खाने के बाद ये अपने कदम बहुत संभाल कर रखती है, अब वो पहली नज़र वाला प्रेम इसे नहीं लुभाता। अगर तुम पहली नजर में पसंद आ भी गए, तो ये समझा लेगी खुद को। ये जानेगी तुम्हें, शायद परखेगी भी और प्रेम जताना तो दूर, अपने प्रेम के एहसास की भनक तुम्हें लगने भी नहीं देगी। सावधानी के तौर पर तुम्हें तुम से पहले छोड़ भी देगी। फिर भी प्रेम अगर हुआ, तो बहुत प्रेम देगी तुम्हें, ये जानते हुए कि जोखिम है, उस राह को चुनेगी। खुद टूट कर भी तुम्हें जोड़ देगी। हर बार की तरह वो इंतजार करेगी, इस बार खुद से भी अंजान बन कर।

तस्वीर साभारः फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए रितिका बनर्जी

तीस-वर्षीय समाजशास्त्र की शिक्षिका नैंसी अपने प्रेम के सफर की बात करते हुए कहती हैं, “मेरे लिए प्रेम के मायने पिछले दस वर्षों में बहुत बदल गए हैं। शिक्षा और उससे मिले एक्सपोजर ने मेरे जैसी बहुत सी आधुनिक युग की औरतों के लिए प्रेम को एक कठिन मोड़ पर ला खड़ा किया है। एक आधुनिक औरत के पास प्रेम में होने के एहसास के लिए कोई निर्धारित टेम्पलेट (नमूना) नहीं है, जिसका हम अनुसरण कर सकें। इसके अलावा एक आधुनिक औरत पर इस एहसास को समझने के अलावा एक उदाहरण प्रस्तुत करने का या एक नमूना स्थापित करने का भार भी है। यह बात एक आधुनिक आदमी पर भी लागू होती है।” 

जीवन के आखिरी पड़ाव वृद्धावस्था में स्त्री का प्रेम

अपना प्रेम-रहित जीवन खुद को प्रेम के छलावे में रख काट चुकी ये स्त्री इतनी बंधी है कि तुम्हें अपने जीवन में कदम रखने ही नहीं देती। बस दूर से निहारती है तुम्हें और तुम्हारे जीवन के हर पहलू को। ना ये इन भावों को कोई नाम देने की कोशिश करती है, ना ये इसे प्रभावित ही करते हैं। ये भाव हैं बस, मन के किसी कोने में, बहुत ही क्षणिक समय के लिए। समाज की आवाज़ इनकी खुद की आवाज़ में तब्दील हो चुकी है, और खुद से लड़ कर ये कई दफा हार भी चुकी हैं। इतनी बार कि अब न इनमें लड़ने का साहस है, न कोई ठोस वजह ही। इनका प्रेम अनकहा है, खुद से भी।

लेडी श्री राम कॉलेज से पढ़ी अकांक्षा कहती हैं, “मेरे जीवन की औरतों के प्रति प्रेम और सम्मान और उन्हें हमेशा अपने चरम पर देखने की एक प्रबल इच्छा हमेशा मन में रहती है।”

विवाह संबंधों में स्त्री का प्रेम

जीवन भर एक ही आदमी से प्रेम करने, प्रेम जो एक समझौता है, के बाद, ये शायद प्रेम का मूल अर्थ भूल चुकी है। इसके जीवन पर तुम्हारा हल्का सा स्पर्श काफी है इन्हें प्रेम के जादुई एहसास से वाक़िफ कराने के लिए। बस तुमसे मिलना, वही घर-बार से छुट्टी की तरह है इनके लिए। ये इतनी बंधी और इतनी मजबूर है कि अपने प्रेम को स्वीकार कभी करेगी ही नहीं, अनभिज्ञ रखेगी खुद को, लड़ेगी खुद से, शायद तुम्हें दूर भी कर दे। हर दिन एक अजीब सी व्यथा महसूस करेगी कि ये जो महसूस हो रहा है, ये क्या है, प्रेम तो नहीं है, क्योंकि प्रेम तो सिर्फ अपने पति से है, फिर ये क्या है, दोस्ती? समाज की आवाजें इनका पीछा नहीं छोड़ती, ये तुमसे तो क्या, खुद से भी कभी इस प्रेम का इज़हार नहीं कर पाएगी। भागेगी ये, तुमसे दूर, प्रेम से दूर, खुद से दूर, और फिर भी इंतजार करेगी, इंतज़ार साहस का, प्रेम में होने की स्वीकृति के साहस का। 

शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाली अदिति बताती है कि कैसे प्रेम की परिभाषा उनके लिए जीवन भर बदलती रही है। वह कहती हैं, “विवाह से पहले, विवाह तक, और विवाह के बाद, हर बार मेरे लिए प्रेम ने एक नया रूप लिया है। हम सभी बहुत सी टॉक्सिक प्रेम संबंधों में रह चुके हैं, जब हमें लगता है कि हम अथाह प्रेम में है। हालांकि, धीरे-धीरे और ख़ासकर विवाह के बाद, आप समझ जाते हैं कि प्रेम साझेदारी और टीमवर्क के स्तंभों पर खड़ा है। जब मैं विवाह के बाद काम के सिलसिले में बंगलौर आई तो मेरे पति में मुझे एक दोस्त वाला सहारा मिला जिसकी मुझे उस वक्त आवश्यकता थी और यही मेरे लिए प्रेम है।”

विधवा स्त्री के नज़रिये में प्रेम

तस्वीर साभारः फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए श्रिया टिंगल

अपने प्रेमी की मृत्यु का शोक मनाती, खुद को पूरे संसार से बंद कर चुकी, ये स्त्री प्रेम से रूष्ट है। तुम्हारा इनके जीवन में होना, इनका तुम्हारे प्रेम में होना, ये बाधा है इनके विलाप में। ये प्रेम में होने के भाव को अब सुखद नहीं मानती, अपने प्रेमी की याद, तुम्हारे हल्के-हल्के कदम और इनका तुम्हारे लिए बढ़ता प्रेम विचलित करते हैं इन्हें। सजा मानती है ये प्रेम में होने को। समाज इन्हें ये मानने ही नहीं देता कि प्रेम केवल एक बार नहीं, बहुत बार हो सकता है, और हर बार नए प्रेम की पिछले प्रेम से तुलना आवश्यक नहीं है। इनका प्रेम तपस्या है, पीड़ादायक है, और केवल इंतजार है। विरह की लौ में जलता इनका मन प्रेम में होने के भाव को अपनाने से मना कर देता है, और ये ठुकराया हुआ भाव इसकी आंखों से बह जाता है।

अदिति बताती है कि कैसे प्रेम की परिभाषा उनके लिए जीवन भर बदलती रही है। वह कहती हैं, “विवाह से पहले, विवाह तक, और विवाह के बाद, हर बार मेरे लिए प्रेम ने एक नया रूप लिया है। हम सभी बहुत सी टॉक्सिक (विषाक्त-समान) प्रेम संबंधों में रह चुके हैं जब हमें लगता है कि हम अथाह प्रेम में है।”

एक सेक्सवर्कर और प्रेम

बिना प्रेम में पड़े, बिना प्रेम पाए, अपनेआप को हर दिन किसी नए व्यक्ति को सौंप देने वाली इस स्त्री से बेहतर प्रेम को कोई नहीं समझता। प्रेम में होने पर भी सबसे पहले ये अपने जिस्म को तुम्हारे आगे कर देगी। इनके प्रेम को समझने और इनके अंदर झांकने का एकमात्र माध्यम है इसकी आंखें। उसकी आंखें आईना है उनके मन का और आंखों से ये अपने प्रेम का इज़हार करती हैं। ये तुम्हारे आर-पार देख सकती है, तुम्हारी रूह को तोड़ सकती है। तुम्हारे प्रेम की कामना कर सकती है, मगर ये केवल दूर से तुम्हें प्रेम दिए जाती है। ये प्रेम को समझती है, इन्हें तुम्हारा इंतजार नहीं है। बस प्रेम में होना बहुत है इनके लिए, तुम्हारी चाह नहीं है इन्हें। प्रेम में होना एक खूबसूरत एहसास है, और एक स्त्री इसे बहुत ही गहराई के साथ महसूस करती है, क्योंकि एक स्त्री चाहे कितना ही खुद को बांध ले, रोक ले, समझा ले, सतर्क कर ले, बंद कर ले, प्रेम के लिए जो साहस चाहिए वो तो उनकी प्रकृति है।


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