इंटरसेक्शनलजेंडर भोजन की राजनीति में महिलाओं के श्रम की अनदेखी और सीमित आज़ादी

भोजन की राजनीति में महिलाओं के श्रम की अनदेखी और सीमित आज़ादी

राजनीति में भी भोजन हमेशा एक बड़ा मुद्दा रहा है। कभी इसे जाति की राजनीति से जोड़ा जाता है, तो कभी धर्म से। लेकिन बहुत कम बार यह सवाल उठता है कि हम जो भोजन खा रहे हैं, वह कैसे बन रहा है, किसके लिए बन रहा है और उसे बनाने वाला कौन है।

भोजन किसी भी समाज का अभिन्न हिस्सा रहा है। भोजन की अपनी सभ्यता और संस्कृति होती है, जो मानव समाज की समृद्धि और संरचना को दिखाती है। यह केवल स्वाद या परंपरा का विषय नहीं है, बल्कि आम लोगों की आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक स्थिति से गहराई से जुड़ा हुआ है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सभी लोगों के पास अपने भोजन को चुनने का समान अधिकार है? क्या भोजन का अर्थ केवल पेट भरना है, या उसमें पोषण का होना भी उतना ही ज़रूरी है? भोजन के विकल्प किसी क्षेत्र विशेष के भूगोल से भी प्रभावित होते हैं। ठंडे इलाकों में भोजन का उत्पादन सीमित होने के कारण मांस को भोजन के रूप में अपनाया गया। वहीं, खेती योग्य क्षेत्रों में अनाज और सब्ज़ियों पर आधारित भोजन संस्कृति विकसित हुई। इस तरह, हम भोजन के आधार पर किसी क्षेत्र की संस्कृति, रहन-सहन और जीवनशैली का अनुमान लगा सकते हैं।

राजनीति में भी भोजन हमेशा एक बड़ा मुद्दा रहा है। कभी इसे जाति की राजनीति से जोड़ा जाता है, तो कभी धर्म से। लेकिन बहुत कम बार यह सवाल उठता है कि हम जो भोजन खा रहे हैं, वह कैसे बन रहा है, किसके लिए बन रहा है और उसे बनाने वाला कौन है। भोजन की प्राथमिकता हमेशा उसे खाने वाले के इर्द-गिर्द रही है, न कि उसे बनाने वाले के आस-पास। घर के भीतर भोजन की राजनीति और भी स्पष्ट दिखती है। परिवार का मुखिया अक्सर पुरुष होता है, जिसे यह तय करने की आज़ादी होती है कि क्या बनेगा और क्या खाया जाएगा। महिलाएं लंबे समय से पुरुषों के लिए भोजन बनाती आई हैं, लेकिन फिर भी उन्हें हाशिए पर रखा गया। भोजन की संस्कृति में पुरुषों को सम्मान और स्थान मिला, जबकि महिलाओं का श्रम अदृश्य बना रहा।

महिलाएं लंबे समय से पुरुषों के लिए भोजन बनाती आई हैं, लेकिन फिर भी उन्हें हाशिए पर रखा गया। भोजन की संस्कृति में पुरुषों को सम्मान और स्थान मिला, जबकि महिलाओं का श्रम अदृश्य बना रहा।

अच्छा और गर्म खाना किसके हिस्से  

अच्छा, गर्म और पर्याप्त भोजन अक्सर पुरुषों के हिस्से आया। महिलाओं के हिस्से वह भोजन आया जो अंत में बचा, जो कई बार न तो पर्याप्त होता है और न ही पोषक। यह केवल घरेलू असमानता नहीं, बल्कि गहरी पितृसत्तात्मक सोच का परिणाम है, जहां महिलाओं के स्वास्थ्य और पोषण को प्राथमिकता नहीं दी जाती। यहां यह सवाल भी ज़रूरी है कि भोजन का अर्थ केवल पेट भरना है या उसमें आवश्यक पोषक तत्वों का होना भी उतना ही अहम है। राजनीति में भोजन को अक्सर सिर्फ जाति या धर्म से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन महिलाओं की रसोई कभी किसी राजनीतिक पार्टी का चुनावी मुद्दा नहीं बन पाती।

इसका एक बड़ा कारण पितृसत्तात्मक समाज की वह सोच है, जिसने महिलाओं के हाथ के बने भोजन का स्वाद तो लिया, लेकिन उसे श्रम, काम और सम्मान के रूप में कभी स्वीकार नहीं किया। महिलाओं की रसोई उनके लिए सम्मान, पहचान और स्वतंत्रता का माध्यम नहीं बन पाई। उनका श्रम ‘स्वाभाविक कर्तव्य’ मान लिया गया। जब तक भोजन को जेंडर, श्रम और अधिकार के सवालों से जोड़कर नहीं देखा जाएगा, तब तक भोजन की राजनीति अधूरी ही रहेगी।

महिलाओं के हिस्से वह भोजन आया जो अंत में बचा, जो कई बार न तो पर्याप्त होता है और न ही पोषक। यह केवल घरेलू असमानता नहीं, बल्कि गहरी पितृसत्तात्मक सोच का परिणाम है, जहां महिलाओं के स्वास्थ्य और पोषण को प्राथमिकता नहीं दी जाती।

भोजन के विकल्प और राजनीतिक विमर्श

भारत अपनी समृद्ध और विविध भोजन संस्कृति के लिए जाना जाता है। यहां अलग-अलग क्षेत्रों, जलवायु और समुदायों के अनुसार खाने की अनेक परंपराएँ हैं। इतने विशाल भूगोल वाले देश में भोजन के विकल्पों की कमी नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि ये विकल्प किन लोगों की पहुंच में हैं। आम लोगों की थाली में, खासकर महिलाओं की थाली में, क्या परोसा जा रहा है—यह मुद्दा अक्सर सुर्खियां नहीं बनता। भारतीय समाज में भोजन और रसोई का सीधा संबंध महिलाओं से जोड़ दिया गया है। पितृसत्तात्मक ढांचे में महिलाओं को घर और रसोई तक सीमित कर दिया गया। वे परिवार के सभी सदस्यों की पसंद और ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए भोजन तैयार करती हैं। लेकिन इस मेहनत को न तो काम माना जाता है और न ही इससे महिलाओं को आर्थिक मजबूती मिलती है। समाज इसे महिलाओं की नैतिक ज़िम्मेदारी मान लेता है, न कि श्रम। टाइम यूज़ सर्वे के अनुसार, भारतीय महिलाएं हर दिन औसतन 7.2 घंटे अवैतनिक घरेलू काम में बिताती हैं।

इसके बावजूद उनके पास अपने लिए समय नहीं होता। उल्टा, उन्हें रोज़ अपने काम को लेकर आलोचना झेलनी पड़ती है। यह स्थिति महिलाओं को मानसिक रूप से थका देती है। पुरुषों का आराम से बैठना सामान्य माना जाता है, लेकिन महिला का रसोई में होना एक स्वाभाविक और अपेक्षित दृश्य बना दिया गया है। जब बात भोजन के ज़रिए महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की आती है, तो इस बहस से महिलाएं लगभग गायब रहती हैं। भोजन से जुड़ी आजीविका, होटल, ढाबा, फूड इंडस्ट्री और स्टार्टअप्स में पुरुषों का वर्चस्व बना रहता है। बहुत कम महिलाएं हैं जो भोजन के ज़रिए अपनी पहचान और आर्थिक स्वतंत्रता बना पाई हैं। राजनीति में भी भोजन का इस्तेमाल प्रतीकात्मक रूप से होता है। कई बार नेता किसी दलित या हाशिए के समुदाय के घर खाना खा लेते हैं, ताकि राजनीतिक संदेश दिया जा सके। लेकिन उस समुदाय की महिलाओं को आर्थिक रूप से मज़बूत करने, उनके श्रम को पहचान देने या उनके भोजन ज्ञान को सम्मान देने की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए जाते।

बहुत कम महिलाएं हैं जो भोजन के ज़रिए अपनी पहचान और आर्थिक स्वतंत्रता बना पाई हैं। राजनीति में भी भोजन का इस्तेमाल प्रतीकात्मक रूप से होता है। कई बार नेता किसी दलित या हाशिए के समुदाय के घर खाना खा लेते हैं, ताकि राजनीतिक संदेश दिया जा सके।

भारत में भोजन के विकल्प कैसे किये जाते हैं सीमित

जब हम किसी नए क्षेत्र में जाते हैं, तो अक्सर पूछते हैं कि वहाँ का स्थानीय खाना क्या है। भोजन किसी भी जगह की पहचान और सांस्कृतिक आकर्षण होता है। लेकिन हाल के वर्षों में भारत में भोजन के विकल्पों को सीमित करने की राजनीति तेज़ हुई है। भोजन को व्यक्तिगत पसंद की बजाय धार्मिक और जातिगत पहचान से जोड़ा जाने लगा है। स्कूलों और कॉलेजों के आसपास मांस की दुकानों को हटाने की मांग, बच्चों को मिड-डे मील में मांसाहार देने को लेकर विवाद, और शाकाहार को नैतिक रूप से श्रेष्ठ बताने की कोशिशें—ये सब इसी राजनीति के उदाहरण हैं। यह बदलाव सिर्फ स्वास्थ्य या पर्यावरण के नाम पर नहीं, बल्कि सत्ता और पहचान की राजनीति से भी जुड़ा हुआ है। डीडब्ल्यू में प्रकाशित एक लेख के अनुसार, भारतीय समाज की एक गहरी सच्चाई यह है कि आज भी भोजन व्यक्ति की पसंद नहीं, बल्कि जाति की राजनीति से तय होता है।

किसे क्या खाने की अनुमति है और किसे नहीं यह सवाल सत्ता तय करती है। भोजन सिर्फ पेट भरने का ज़रिया नहीं है। यह श्रम, पहचान, सत्ता और राजनीति से गहराई से जुड़ा है। जब तक भोजन से जुड़े विमर्श में महिलाओं की भूमिका, उनका श्रम और उनकी पसंद को केंद्र में नहीं रखा जाएगा, तब तक यह बहस अधूरी रहेगी। ज़रूरत है कि भोजन को जेंडर और जाति के सवालों के साथ जोड़कर देखा जाए, ताकि भारतीय महिलाओं की अदृश्य मेहनत को वह पहचान और सम्मान मिल सके, जिसकी वे हक़दार हैं।

हाल के वर्षों में शाकाहारी और मांसाहारी को लेकर बहस बहुत तेज़ हो गई है। पहले हमारे घर में लगभग रोज़ मांस बनता था। सब खाते थे। अगर घर का कोई सदस्य नहीं खाता था, तो वह उसकी निजी पसंद होती थी। लेकिन अब घर में कोई मांस नहीं खाता।

जब इस विषय पर पिथौरागढ़ की एक गृहिणी रेखा भट्ट कहती हैं, “हाल के वर्षों में शाकाहारी और मांसाहारी को लेकर बहस बहुत तेज़ हो गई है। पहले हमारे घर में लगभग रोज़ मांस बनता था। सब खाते थे। अगर घर का कोई सदस्य नहीं खाता था, तो वह उसकी निजी पसंद होती थी। लेकिन अब घर में कोई मांस नहीं खाता। मेरा मन तो आज भी करता है, लेकिन मैं नहीं खाती। अब एक तरह का दबाव महसूस होता है। कहा जाता है कि आप हिंदू हैं, तो किसी जीव की हत्या कैसे कर सकते हैं। राजनीति तेज़ होने के बाद हालात बदल गए हैं। अब कोई अगर पूछ ले कि हम क्या खाते हैं, तो शर्म महसूस होती है।” रेखा की यह बात बताती है कि आज भोजन केवल स्वाद या ज़रूरत का सवाल नहीं रह गया है। अब आपकी थाली में क्या है, यह आपकी निजी पसंद नहीं मानी जाती। इसे आपकी पहचान से जोड़ दिया गया है। भोजन को धर्म और विचारधारा के साथ जोड़कर देखा जाने लगा है।

भारत में भोजन: निजी पसंद या राजनीतिक मुद्दा

भारत में भोजन धीरे-धीरे एक राजनीतिक मुद्दा बनता जा रहा है। त्योहारों तक का राजनीतिकरण किया जा रहा है। नवरात्रि के दौरान अक्सर यह मांग उठती है कि इन दिनों मांस की दुकानें बंद रहनी चाहिए। इसका सीधा असर महिलाओं पर पड़ता है। उन्हें शाकाहारी भोजन बनाने की अतिरिक्त ज़िम्मेदारी उठानी पड़ती है। इन दिनों यह भी देखा जाता है कि नवरात्रि में कई पुरुष बाहर से खाना खा लेते हैं। लेकिन महिलाओं के पास यह विकल्प नहीं होता। न तो सामाजिक नियम इसकी अनुमति देते हैं और न ही उनसे जुड़ी नैतिक अपेक्षाएं। ऐसे में त्योहार महिलाओं के लिए आराम की जगह अतिरिक्त बोझ बन जाते हैं।

बीबीसी हिंदी में प्रकाशित एक रिपोर्ट भारत में खानपान से जुड़ी राजनीति को साफ़ तौर पर सामने लाती है। यह दिखाती है कि कैसे भोजन को एक राजनीतिक हथियार बनाकर लोगों की खाने की आदतों और पसंद को बदला जा रहा है। चिंता तब और बढ़ जाती है, जब इस तरह की हिंसा की खबरें देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से सामने आती हैं। ऐसा ही एक मामला जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) से सामने आया जब रामनवमी के दिन मांसाहार परोसे जाने को लेकर वहां हिंसा हुई। जेएनयू, जो अपनी उदार सोच और विविधता के लिए जाना जाता है, वहां इस तरह की घटना यह सोचने पर मजबूर करती है कि कैसे एक खास विचारधारा दूसरों के भोजन के विकल्प को नियंत्रित करना चाहती है। यह किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए खतरनाक संकेत है।

सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस के.एस. पुट्टास्वामी (सेवानिवृत्त) बनाम भारत संघ मामले में साफ़ कहा है कि निजता का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार है। यह फैसला व्यक्ति की स्वायत्तता और गरिमा को केंद्र में रखता है। इसके बावजूद, आज देखा जा रहा है कि लोगों को स्वतंत्र रूप से जीने और चुनाव करने से रोका जा रहा है।

क्या भोजन पर नियंत्रण निजता पर हमला नहीं है

अगर राजनीति किसी व्यक्ति के निजी जीवन में इस तरह दखल देती है, तो यह उसकी निजता और स्वतंत्रता का सीधा उल्लंघन है। सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस के.एस. पुट्टास्वामी (सेवानिवृत्त) बनाम भारत संघ मामले में साफ़ कहा है कि निजता का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार है। यह फैसला व्यक्ति की स्वायत्तता और गरिमा को केंद्र में रखता है। इसके बावजूद, आज देखा जा रहा है कि लोगों को स्वतंत्र रूप से जीने और चुनाव करने से रोका जा रहा है। उनकी पसंद को सामाजिक नैतिकता और धर्म के नाम पर नियंत्रित किया जा रहा है। इसका असर केवल व्यवहार पर नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक स्तर पर भी पड़ता है।

हम क्या खाते हैं, यह मूल रूप से स्वास्थ्य का सवाल होना चाहिए। यह देखा जाना चाहिए कि हमारी थाली का खाना हमारे शरीर की ज़रूरतों को पूरा कर रहा है या नहीं। लेकिन आज इसे धर्म और जाति से जोड़कर देखा जा रहा है। यह एक संस्कृति को दूसरी संस्कृति पर थोपने जैसा है। हर रोज़ महिलाएं सब्ज़ी मंडी में भोजन के लिए संघर्ष करती दिखती हैं। लेकिन वह खाना अक्सर उनके लिए प्राथमिकता नहीं बन पाता। बहुत सी महिलाएँ परिवार की देखभाल में इतनी व्यस्त होती हैं कि अपने खानपान का ध्यान ही नहीं रख पातीं। भारत में भोजन के विकल्पों की कोई कमी नहीं है। इसके बावजूद, इन्हें सीमित किया जा रहा है और लोगों के मन में डर पैदा किया जा रहा है। यह डर न केवल लोगों को मानसिक रूप से प्रभावित करता है, बल्कि स्वतंत्र रूप से सोचने और जीने की क्षमता को भी कमजोर करता है।

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