भारत में लोकनाट्य की परंपरा सदियों पुरानी है। गांवों में लोकनाटकों के जरिए लोग मनोरंजन के साथ सामाजिक संदेश भी देते थे। ब्रिटिश शासन के दौरान यह परंपरा बदली और 1940 के दशक तक आते-आते स्ट्रीट थिएटर या नुक्कड़ नाटक उभरने लगे। आजादी के आंदोलन के समय थिएटर जागरूकता का एक सस्ता और प्रभावी माध्यम था। इसके जरिए किसानों, मजदूरों और आजादी के संघर्ष से जुड़े मुद्दों को लोगों तक पहुंचाया गया। 1970 के दशक में नारीवाद की दूसरी लहर के साथ नारीवादी थिएटर का विकास हुआ। इस दौर में महिलाएं केवल किरदार नहीं रहीं, बल्कि लेखिका और कलाकार के रूप में सामने आईं। नुक्कड़ नाटकों ने घरेलू हिंसा, बलात्कार, दहेज और लैंगिक भेदभाव जैसे मुद्दों को सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा बनाया। नारीवादी थिएटर ने उन विषयों पर आवाज उठाई, जिन पर पहले खुलकर बात नहीं होती थी। इस तरह थिएटर सामाजिक बदलाव और महिलाओं की आवाज का महत्वपूर्ण माध्यम बन गया।
भारतीय नारीवादी थिएटर की शुरुआत
प्रसिद्ध ब्राज़ीलियाई रंगमंच निर्देशक और नाटककार अगस्तो बोआल ने कहा था, “थिएटर खुद दुनिया को नहीं बदल सकता, लेकिन यह उन लोगों को बदल सकता है जो दुनिया बदलेंगे।” 1970 के दशक में यह बात सच साबित हुई, जब भारत समेत अमेरिका, फ्रांस, ब्राज़ील और ब्रिटेन में नारीवादी थिएटर आंदोलन तेज़ हुए। भारत में नारीवादी रंगमंच ने गली-मोहल्लों और नुक्कड़ों के जरिए अपनी पहचान बनाई। दिल्ली की सड़कों पर नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से महिलाओं के अधिकार, दहेज हिंसा और लैंगिक भेदभाव जैसे मुद्दों को लोगों के सामने रखा गया। 1980 के दशक तक स्ट्रीट थिएटर महिलाओं और हाशिए के समुदायों की आवाज़ का मजबूत माध्यम बन चुका था। साल 1979 में ‘थिएटर यूनियन’ ने ‘ओम स्वाहा’ नाटक प्रस्तुत किया, जो दहेज हत्या के खिलाफ एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप था। इसे दिल्ली की सड़कों पर खेला गया और लोगों को सीधे जागरूक किया गया। इस नाटक का निर्देशन और लेखन अनुराधा कपूर और माया राव ने किया। इसी दौर में सफ़दर हाशमी के संगठन जन नाट्य मंच का नाटक ‘औरत’ भी प्रसिद्ध हुआ। इन नाटकों ने पितृसत्ता को चुनौती दी और रंगमंच को सामाजिक बदलाव का मजबूत माध्यम बनाया।
‘औरत’ नाटक कामकाजी महिलाओं के शोषण पर केंद्रित था। इसमें दिखाया गया कि किस तरह बचपन से ही लड़कियों को पढ़ाई के बजाय घर और बाहर के कामों में लगा दिया जाता है। नाटक की कुछ पंक्तियां इसकी क्रांतिकारी भावना को दिखाती हैं- “एक औरत जिसका बदन तुम्हारे अंतहीन, शर्मनाक और कमरतोड़ काम से टूट चुका है… मैं एक आज़ाद औरत हूं।”
‘औरत’ नाटक कामकाजी महिलाओं के शोषण पर केंद्रित था। इसमें दिखाया गया कि किस तरह बचपन से ही लड़कियों को पढ़ाई के बजाय घर और बाहर के कामों में लगा दिया जाता है। नाटक की कुछ पंक्तियां इसकी क्रांतिकारी भावना को दिखाती हैं- “एक औरत जिसका बदन तुम्हारे अंतहीन, शर्मनाक और कमरतोड़ काम से टूट चुका है… मैं एक आज़ाद औरत हूं।” इन पंक्तियों से साफ होता है कि उस समय ये नाटक आंदोलनों की आग की तरह उभर रहे थे। इस नाटक में माला हाशमी, रीता गांगुली और बृजेश शर्मा जैसे कलाकार शामिल थे। यह नाटक आज भी उतना ही प्रासंगिक है। औरत में गाया जाने वाला गीत “पढ़ना-लिखना सीखो ओ मेहनत करने वालों” नुक्कड़ों पर सुनाई देता है। इसके बाद स्ट्रीट थिएटर का सिलसिला रुका नहीं। यह भाषाओं, बोलियों और राज्यों की सीमाओं को पार करते हुए पूरे देश में फैलता गया और समाज में जागरूकता लाने का सशक्त माध्यम बन गया।
वे नाट्य समूह जो नारीवादी थिएटर का हिस्सा रहे
नारीवादी नुक्कड़ रंगमंच के विस्तार में विभिन्न रंगमंच संगठनों की बड़ी भूमिका रही। इन समूहों ने पुरुष प्रधान मुद्दों से हटकर महिलाओं से जुड़े सवालों को केंद्र में रखा। यही वह समय था जब “व्यक्तिगत ही राजनीतिक है” और “हल्ला बोल” जैसे नारे चर्चा में थे। कई सामाजिक संगठनों और नारीवादी समूहों ने मिलकर नुक्कड़ नाटक करना शुरू किया। आइए जानते हैं उन प्रमुख नाट्य समूहों के बारे में, जिन्होंने नारीवादी स्ट्रीट थिएटर को आगे बढ़ाया। जन नाट्य मंच भारत के प्रभावशाली नुक्कड़ नाट्य समूहों में से एक रहा है। इसने समय-समय पर समाज के विभिन्न वर्गों के संघर्षों को मंच के माध्यम से प्रस्तुत किया। इस समूह की पहचान सफ़दर हाशमी और माला हाशमी से जुड़ी है। इसी संगठन के माध्यम से “औरत” जैसे महत्वपूर्ण नाटक का मंचन हुआ। इसके अलावा “राजा का बाजा” जैसे नाटक भी सत्ता और पितृसत्ता के विरोध में प्रस्तुत किए गए। जन नाट्य मंच ने महिलाओं, मजदूरों और आम लोगों के मुद्दों को सड़कों पर लाकर चर्चा का विषय बनाया।
दहेज हत्याओं पर आधारित प्रसिद्ध नाटक “ओम स्वाहा” इसी समूह की देन था। स्त्री संघर्ष पूरी तरह से नाट्य समूह नहीं था, बल्कि नारीवादी कार्यकर्ताओं का एक संगठन था। इसने थिएटर को अपने संघर्ष का माध्यम बनाया और पितृसत्ता के खिलाफ आवाज उठाई।
थिएटर यूनियन दिल्ली में शुरू हुआ यह समूह विशेष रूप से दहेज हत्या के विरोध में सक्रिय हुआ। इसने उन गली-मोहल्लों में जाकर नाटक किए, जहां दहेज उत्पीड़न और हत्याओं की घटनाएं हुई थीं। इस समूह से जुड़ी प्रमुख हस्तियों में सुधान्वा देशपांडे, अनुराधा कपूर और माया राव शामिल थे। दहेज हत्याओं पर आधारित प्रसिद्ध नाटक “ओम स्वाहा” इसी समूह की देन था। स्त्री संघर्ष पूरी तरह से नाट्य समूह नहीं था, बल्कि नारीवादी कार्यकर्ताओं का एक संगठन था। इसने थिएटर को अपने संघर्ष का माध्यम बनाया और पितृसत्ता के खिलाफ आवाज उठाई। “नारी मुक्ति” जैसे नाटक इसी समूह से जुड़े रहे, जिनमें महिलाओं की गुलामी और सामाजिक बंधनों को दिखाया गया। इसके संस्थापकों में कुमारी जयवर्धने जैसी नारीवादी विचारकों का नाम लिया जाता है। इस समूह ने महिलाओं के अधिकारों को सामाजिक आंदोलन से जोड़ा।
अलारिपु की स्थापना रंगकर्मी और निर्देशिका त्रिपुरारी शर्मा ने की थी। वे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की पूर्व प्रोफेसर और कार्यवाहक निदेशक भी रह चुकी थीं। अलारिपु का उद्देश्य मुख्यधारा के रंगमंच से हटकर स्त्रियों, बच्चों और श्रमिकों के मुद्दों को सामने लाना था। यह समूह नाटक करने से पहले ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यशालाएं आयोजित करता था। नाटकों की स्क्रिप्ट अक्सर वही महिलाएं लिखती थीं, जो उन समस्याओं का हिस्सा रही थीं। यानी वे सर्वाइवर ही कलाकार और लेखिका भी बनती थीं। अलारिपु ने “शरीर की राजनीति” जैसे विषयों पर महत्वपूर्ण काम किया। इसके माध्यम से महिलाओं को उनके शरीर, प्रजनन स्वास्थ्य और कानूनी अधिकारों के प्रति जागरूक किया गया। “काठ की गाड़ी” नाटक समाज के कुष्ठ रोगियों के प्रति नजरिए को दर्शाने वाला महत्वपूर्ण प्रस्तुतीकरण था।
1990 के दशक में अस्मिता थिएटर समूह ने नारीवादी मुद्दों को जोश और स्पष्टता के साथ प्रस्तुत किया। इस समूह की स्थापना अरविंद गौड़ ने की। यौन हिंसा के खिलाफ “दस्तक” जैसे नाटक और स्वदेश दीपक द्वारा लिखित प्रसिद्ध नाटक “कोर्ट मार्शल” का मंचन इसी समूह ने किया।
निशांत नाट्य मंच ने उत्तर भारत के ग्रामीण और शहरी इलाकों में जाति और लिंग के संबंधों पर गंभीर काम किया। इस समूह के संस्थापक शम्सुल इस्लाम थे। “दहेज” और “कलम की तलवार” जैसे नाटक इसी मंच से प्रस्तुत किए गए। इस समूह ने खास तौर पर महिलाओं की शिक्षा और अधिकारों पर काम किया। निशांत नाट्य मंच ने स्त्री मुद्दों को अंतरसंबंधी नारीवाद के नजरिए से उठाया। यानी महिलाओं के संघर्षों को केवल लिंग के आधार पर नहीं, बल्कि उनकी आर्थिक, धार्मिक, जातीय और सामाजिक स्थितियों को ध्यान में रखकर समझा और प्रस्तुत किया।
1990 के दशक में अस्मिता थिएटर समूह ने नारीवादी मुद्दों को जोश और स्पष्टता के साथ प्रस्तुत किया। इस समूह की स्थापना अरविंद गौड़ ने की। यौन हिंसा के खिलाफ “दस्तक” जैसे नाटक और स्वदेश दीपक द्वारा लिखित प्रसिद्ध नाटक “कोर्ट मार्शल” का मंचन इसी समूह ने किया। इन नाटकों में समाज और संस्थाओं के भीतर मौजूद भेदभाव और महिलाओं के प्रति कठोर रवैये को उजागर किया गया। वहीं इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन की स्थापना साल 1943 में हुई थी, जब देश द्वितीय विश्वयुद्ध और बंगाल अकाल जैसी परिस्थितियों से जूझ रहा था। इस संगठन ने कला और संस्कृति के माध्यम से जनता की आवाज बनने का काम किया। इस पर वामपंथी और प्रगतिशील विचारों का प्रभाव था। शुरुआत में इसके मुद्दे वर्ग आधारित थे, लेकिन नारीवाद की दूसरी लहर के बाद इसने महिलाओं से जुड़े विषयों पर भी नाटक करना शुरू किया। इस संगठन ने लखनऊ और पटना जैसे क्षेत्रों में सक्रिय काम किया। इसने संगीत और नाटक के माध्यम से महिलाओं के कामकाजी अधिकारों और सामाजिक न्याय के सवालों को सामने रखा। “सावधान! हम आ रहे हैं” जैसे नाटक इसका उदाहरण हैं।
नुक्कड़ नाटक की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि यह एकतरफा संवाद नहीं था। इसे कोई भी व्यक्ति कहीं भी कर सकता था। बस अड्डे पर, फैक्ट्री के गेट पर, मोहल्ले की गलियों में या गांव के बरगद के नीचे। दर्शक केवल देखने वाले नहीं रहते थे, कई बार वे भी नाटक का हिस्सा बन जाते थे।
नारीवादी थिएटर की लोकप्रियता और पहुंच के कारण
नारीवादी नुक्कड़ नाटकों ने भारत में अपनी खास जगह इसलिए बनाई क्योंकि इन्होंने कला को बंद सभागारों से निकालकर आम लोगों के बीच पहुंचा दिया। इन नाटकों के लिए किसी महंगे टिकट की जरूरत नहीं होती थी। कलाकार सीधे जनता के बीच जाकर उनकी ही समस्याओं और संघर्षों को नाटक के माध्यम से सामने रखते थे। इससे लोगों को लगता था कि यह उनकी अपनी कहानी है। नुक्कड़ नाटक की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि यह एकतरफा संवाद नहीं था। इसे कोई भी व्यक्ति कहीं भी कर सकता था। बस अड्डे पर, फैक्ट्री के गेट पर, मोहल्ले की गलियों में या गांव के बरगद के नीचे। दर्शक केवल देखने वाले नहीं रहते थे, कई बार वे भी नाटक का हिस्सा बन जाते थे। इससे कलाकार और जनता के बीच सीधा जुड़ाव बनता था। इन नाटकों की भाषा भी सरल और बोलचाल की होती थी। संवाद और गीत आम बोली में होते थे, ताकि हर वर्ग के लोग उन्हें समझ सकें। ढोलक की थाप पर गाए जाने वाले गीत अनपढ़, मेहनतकश वर्ग और कामकाजी लोगों तक आसानी से पहुंचते थे। नुक्कड़ नाटक हमेशा समाज की वर्तमान समस्याओं और रूढ़ियों पर आधारित होते थे। इसलिए नारीवादी स्ट्रीट थिएटर को समाज सुधार का माध्यम भी कहा जाता है।
भारत में नारीवादी नुक्कड़ रंगमंच की शुरुआत ने महिलाओं के मुद्दों को सार्वजनिक मंच दिया। समय के साथ यह और अधिक लोकप्रिय होता गया। धीरे-धीरे यह और समावेशी बना और अलग-अलग वर्गों के साथ-साथ होमोसेक्शूएलिटी और लैंगिक अल्पसंख्यक समुदाय के मुद्दों को भी शामिल करने लगा। साल 1998 में महेश दत्तानी का लिखा गया नाटक “ऑन अ मुग्गी नाइट इन मुंबई” भारत का पहला अंग्रेजी नाटक माना जाता है, जिसमें होमोसेक्शुअल रिश्तों पर खुलकर बात की गई। उनके ही नाटक “सेवन स्टेप्स अराउंड द फायर” में लैंगिक अल्पसंख्यक समुदाय के जीवन और उनके साथ होने वाली हिंसा को दिखाया गया। आज के समय में भी नारीवादी थिएटर की लोकप्रियता बनी हुई है। डिजिटल माध्यमों के आने से इसकी पहुंच और आसान हो गई है। आज भी कई स्त्रीवादी रंगमंच समूह समावेशिता के साथ शोषित और वंचित लोगों के मुद्दों को समाज के सामने ला रहे हैं।

