मातृत्व किसी भी महिला के जीवन का एक महत्वपूर्ण और बदलाव लाने वाला अनुभव होता है। लेकिन इसके साथ जिम्मेदारियां भी अचानक बढ़ जाती हैं। घर, काम और बच्चे की देखभाल के बीच कई महिलाओं के पास अपने लिए बहुत कम समय बचता है। आज के डिजिटल दौर में अक्सर दिनभर की थकान के बाद वे कुछ समय के लिए सोशल मीडिया का सहारा लेती हैं। लेकिन अमूमन सोशल मीडिया पर उन्हें “परफेक्ट मां” की ऐसी छवि दिखाई जाती है, जो फिट होती है, ग्लैमरस दिखती है और अपने करियर और परिवार को बहुत अच्छे से संभालती है।
आसान शब्दों में कहें तो वह एक ‘सुपरवूमन’ की तरह नजर आती है, जो हर जिम्मेदारी के साथ अपना ख्याल भी अच्छे से रखती है। इन सब पहलुओं को देखकर कई महिलाओं के मन में एक अनजाना डर या दबाव पैदा होना स्वाभाविक है। वे खुद की तुलना उस ‘परफेक्ट’ छवि से करने लगती हैं, जो असल में शायद होता ही नहीं या एक विशेषाधिकार है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सोशल मीडिया पर दिखाई जाने वाली ‘परफेक्ट मॉम’ की यह छवि सच में प्रेरित करती है, या फिर यह महिलाओं के मन में बेवजह का तनाव और दबाव बढ़ाती है?
मैंने कई ट्विन्स मॉम्स को फॉलो किया है ताकि अपने बच्चों के लिए बेहतर कर सकूं। लेकिन, उन्हें देखकर कई बार लगता है कि वे सब कुछ इतने अच्छे से मैनेज कर रही हैं, तो फिर मैं क्यों नहीं कर पा रही?
सोशल मीडिया और ‘मॉम इन्फ्लुएंसर्स’ की शुरुआत
फोर्ब्स में छपी एक रिपोर्ट बताती है कि ‘मॉम इन्फ्लुएंसर्स’ की शुरुआत ऑनलाइन माँओं के समुदायों से हुई थी। ये समुदाय पहले फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म पर ज्यादा सक्रिय थे। इन समूहों में माँएं आपस में बच्चों की परवरिश पर चर्चा करती थीं, एक-दूसरे को सलाह देती थीं और अलग-अलग प्रोडक्ट्स के बारे में सुझाव साझा करती थीं। जैसे-जैसे इंस्टाग्राम लोकप्रिय हुआ, ये ऑनलाइन समुदाय धीरे-धीरे बदलकर ‘मॉम इन्फ्लुएंसर्स’ में बदल गए। शुरुआत में ये महिलाएं अपने समुदाय में राय देने वाली या ट्रेंड शुरू करने वाली होती थीं, लेकिन बाद में इन्होंने सोशल मीडिया पर एक अलग पहचान बना ली।
आज इंस्टाग्राम और यू-ट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म पर कई ऐसी महिलाएं हैं जो माँ भी हैं और कंटेट क्रिएशन कर रही हैं। कंटेट की इस दुनिया में एक कूल मॉम और मॉम इंफ्लुएंसर की छवि लोकप्रिय होती जा रही है। अमूमन एक कूल मॉम उसे माना जाता है जो अपना करियर, फिटनेस, ब्यूटी, बच्चे की परवरिश, सोशल लाइफ सब कुछ बैलेंस कर रही है। उसका माँ बनना उसे बिल्कुल भी धीमा या अलग-थलग नहीं कर रहा हो। साफ-सुथरा घर, मुस्कुराता बच्चा, पौष्टिक खाना, स्वस्थ शरीर और चेहरे पर बिना थकान की चमक। ऐसे में सोशल मीडिया स्क्रॉल कर रही माँ सोचने लगती है कि क्या वो सही कर रही है और क्या गलत कर रही है।
फोर्ब्स में affable.ai के आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच सालों में दुनिया भर में मॉम इन्फ्लुएंसर्स द्वारा बनाए गए कंटेंट में लगभग 101.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।
मॉम इन्फ्लुएंसर्स की बढ़ती संख्या और चुनौतियां
मॉम इन्फ्लुएंसर्स की शुरुआत इस इच्छा से हुई थी कि वे एक-दूसरे से जुड़ सकें, सहारा पा सकें और मातृत्व के जटिल अनुभवों को आपस में साझा कर सकें। फोर्ब्स में affable.ai के आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच सालों में दुनिया भर में मॉम इन्फ्लुएंसर्स द्वारा बनाए गए कंटेंट में लगभग 101.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। सोचीर्स नाम की क्रिएटिव डिजिटल एजेंसी के सीईओ और को-फाउंडर मेहुल गुप्ता के मुताबिक, इस प्लेटफॉर्म ने इंस्टाग्राम पर 84,975 इन्फ्लुएंसर प्रोफाइल का विश्लेषण किया। इसमें पाया गया कि भारत में 4,371 मॉम इन्फ्लुएंसर्स सक्रिय हैं, जिन्होंने सिर्फ साल 2022 में ही 12,000 से ज्यादा कंटेंट बनाए।
हालांकि, मॉम इन्फ्लुएंसर बनना आसान नहीं है और इसमें कई चुनौतियां होती हैं। कई बार यह बहुत थकाने वाला भी हो जाता है। जैसे, ऐसे बच्चे को संभालना जो फोटो या वीडियो के लिए मुस्कुराना नहीं चाहता, घर के बाकी कामों की और बीमार या बुजुर्गों की चिंता करना, स्कूल में बच्चों की मीटिंग में शामिल होना, या फिर जन्मदिन और पारिवारिक कार्यक्रमों में जाना। ये सब जिम्मेदारियां एक साथ निभानी पड़ती हैं। इसलिए, जबकि इन पोस्ट्स का उद्देश्य बहुत बार प्रोत्साहन और सहभागिता होता है, ये इसमें सफल नहीं होते। हर महिला के लिए माँ बनने का अनुभव बहुत अलग होता है।
मेरी 10 साल की बेटी अक्सर मुझे फोन पर ऐसी मम्मियों की फोटो और वीडियो दिखाती है, जिन्हें वह ‘परफेक्ट’ मानती है। वह मुझसे कहती है कि मम्मी, आप भी ऐसे कपड़े पहनिए और ऐसे रहिए।
हर महिला की शारीरिक, मानसिक और आर्थिक परिस्थितियां अलग होती हैं। ऐसे में एक माँ की दूसरी माँ से तुलना करना उसके अनुभव और संघर्ष को नजरअंदाज करना है। स्क्रीन पर दिखने वाली सजी-धजी दुनिया कई बार वास्तविकता से कोसों दूर होती है। इस विषय पर चंडीगढ़ की रहने वाली जुड़वा बच्चों की माँ दीपिका शर्मा बताती हैं, “मैंने दो साल पहले अपनी फिजियोथेरेपी की नौकरी छोड़ दी थी। कभी-कभी मुझे सांस लेने तक का समय नहीं मिलता। जब बच्चे सो जाते हैं, तब मैं फोन चला लेती हूं। मैंने कई ट्विन्स मॉम्स को फॉलो किया है ताकि अपने बच्चों के लिए बेहतर कर सकूं। लेकिन, उन्हें देखकर कई बार लगता है कि वे सब कुछ इतने अच्छे से मैनेज कर रही हैं, तो फिर मैं क्यों नहीं कर पा रही?”
बच्चों के लिए सही-गलत का नया ट्रेंड और माँओं का तनाव
पिछले कुछ सालों में पैरेंटिंग से जुड़ी सलाहों का दबाव माँओं पर बढ़ गया है। हर दिन नए वीडियो और पोस्ट ये बताने में लगे रहते हैं कि बच्चे को क्या खिलाना चाहिए या पहनाना चाहिए, कितना स्क्रीन टाइम सही है। अगर ऐसा नहीं किया तो बच्चे की सेहत या विकास पर असर पड़ेगा। ऐसे में एक माँ जो बच्चे के जन्म के बाद खुद की देखभाल पर भी ध्यान नहीं दे पा रही, और ज्यादा तनाव में आ जाती है। मातृत्व कई बार ऐसा जिम्मेदारी बन जाता है जिसमें महिलाओं को यह साबित करना पड़ता है कि वे अपने बच्चे के लिए हर सही फैसला ले रही हैं।
इससे होने वाला मदर गिल्ट और बढ़ जाता है। कुछ महिलाओं के पास घरेलू मदद और आर्थिक संसाधन होते हैं जबकि कुछ को सब कुछ अकेले संभालना पड़ता है। ऐसे में सोशल मीडिया पर बनी ‘राइट-रॉन्ग’ की लिस्ट माँओं के लिए मदद की बजाय दबाव का कारण बन जाती है। इस विषय पर हरियाणा के करनाल की रहने वाली एक बेटी की माँ शिल्पा अरोड़ा बताती हैं, “मेरी 10 साल की बेटी अक्सर मुझे फोन पर ऐसी मम्मियों की फोटो और वीडियो दिखाती है, जिन्हें वह ‘परफेक्ट’ मानती है। वह मुझसे कहती है कि मम्मी, आप भी ऐसे कपड़े पहनिए और ऐसे रहिए। उसकी बातें सुनकर मैं कई बार अनजाने में खुद की तुलना इन अन्य माँओं से करने लगती हूं।”
सोशल मीडिया पर दिखाई जाने वाली जिंदगी अक्सर सिर्फ कुछ सेकंड या मिनट के वीडियो और तस्वीरों तक ही सीमित रहती है। इनमें मुस्कुराता बच्चा, सजा-धजा घर और ऊर्जा से भरी माँ दिखाई देती है। आम तौर पर यह पूरी दिनचर्या या असली जीवन नहीं दिखाती।
मातृत्व, मानसिक स्वास्थ्य और माँओं में अपराधबोध
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, भारत में हर तीन से पाँच में से एक महिला गर्भावस्था के दौरान और बच्चे के जन्म के बाद मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करती हैं। इसके अलावा, घरेलू काम का बोझ भी महिलाओं पर बहुत होता है। भारत के सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, महिलाएं प्रतिदिन औसतन 299 मिनट अवैतनिक घरेलू काम में लगाती हैं, जबकि पुरुष केवल 97 मिनट। जब महिलाएं विभिन्न शारीरिक, भावनात्मक और मानसिक परेशानियों से जूझ रही होती हैं, तब सोशल मीडिया पर मॉम इन्फ्लुएंसर्स या परफेक्ट मॉम का चलन उनके लिए नुकसानदेह हो सकता है।
सोशल मीडिया पर दिखाई जाने वाली जिंदगी अक्सर सिर्फ कुछ सेकंड या मिनट के वीडियो और तस्वीरों तक ही सीमित रहती है। इनमें मुस्कुराता बच्चा, सजा-धजा घर और ऊर्जा से भरी माँ दिखाई देती है। आम तौर पर यह पूरी दिनचर्या या असली जीवन नहीं दिखाती। अक्सर कैमरे के पीछे घरेलू मदद, नैनी, हाउसहेल्प या परिवार के अन्य सदस्य भी मदद करते हैं, जो वीडियो में दिखाई नहीं देते। इससे कुछ महिलाएं अनजाने में खुद की तुलना इन परफेक्ट छवियों से करने लगती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार यह खासकर नई माँओं में अपराधबोध और आत्म-संदेह की भावना बढ़ा सकता है, जब वे हार्मोनल बदलाव, नींद की कमी और थकान से गुजर रही होती हैं। हालांकि, सोशल मीडिया केवल नकारात्मक प्रभाव वाला नहीं है। यह जानकारी और भावनात्मक समर्थन का एक महत्वपूर्ण माध्यम भी बन चुका है।
इंस्टाग्राम और फेसबुक पर कई कम्युनिटी और सपोर्ट ग्रुप सक्रिय हैं, जहां महिलाएं गर्भावस्था, मातृत्व और मानसिक स्वास्थ्य के अनुभव साझा करती हैं। ये डिजिटल समुदाय कई महिलाओं के लिए एक अनौपचारिक सपोर्ट सिस्टम की तरह काम करते हैं।
इंस्टाग्राम और फेसबुक पर कई कम्युनिटी और सपोर्ट ग्रुप सक्रिय हैं, जहां महिलाएं गर्भावस्था, मातृत्व और मानसिक स्वास्थ्य के अनुभव साझा करती हैं। ये डिजिटल समुदाय कई महिलाओं के लिए एक अनौपचारिक सपोर्ट सिस्टम की तरह काम करते हैं। यहां वे अपने अनुभव साझा कर सकती हैं और अन्य माता-पिताओं से जुड़ सकती हैं, जिससे उन्हें समझ आता है कि वे जिन चुनौतियों का सामना कर रही हैं, वे असामान्य नहीं हैं।
असल में मातृत्व कोई प्रतियोगिता नहीं है, जिसे जीतना जरूरी हो। हर महिला का अनुभव और उसकी यात्रा अलग होती है। सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली परफेक्ट माँ की छवियों को पूरी वास्तविकता मानना सही नहीं है। मातृत्व के अनुभव हर मां के लिए अलग होते हैं और किसी एक छवि से उसे परिभाषित नहीं किया जा सकता। मॉम इन्फ्लुएंसर्स प्रेरणा भी बन सकती है, लेकिन अक्सर अनजाने में तनाव और अपराधबोध भी पैदा करती है। असली जीवन की चुनौतियों, शारीरिक और मानसिक मेहनत को नजरअंदाज किए बिना, मातृत्व को अपनी गति और परिस्थिति के अनुसार जीना ही सबसे जरूरी है।

