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कोरोना महामारी ने पूरी दुनिया को बुरी तरह से प्रभावित किया है। स्वास्थ्य, रोज़गार से लेकर हर क्षेत्र इस महामारी से प्रभावित हुआ है। लेकिन इसके साथ-साथ इसने सामाजिक बुराइयों को भी खूब बढ़ाया है, जिनमें से कुछ तो हम तमाम सर्वे और रिपोर्ट्स में घरेलू हिंसा, बाल विवाह आदि के बढ़ते केस के रूप में देख पा रहे हैं लेकिन कुछ ऐसी भी बुराइयां है जिन्होंने कोरोना काल में वीभत्स रूप लेना शुरू कर दिया है। लेकिन इस पर न तो ज़्यादा बात हो रही है और न चर्चा क्योंकि इस पर कोई सर्वे रिपोर्ट नहीं बनी। तो आइए जानते है एक ऐसी ही समस्या के बारे में जिसने एक ग्राम पंचायत की महिलाओं को पहली बार सड़कों पर लाया है। बनारस से दूर गहरपुर ग्राम पंचायत में मैं बीते कई महीनों से किशोरियों और महिलाओं के नेतृत्व विकास और जागरूकता के क्षेत्र में काम कर रही हूं। जैसे-जैसे मेरे काम के दिन बीतते गए, महिलाओं और किशोरियों से लगाव बढ़ता गया और उन्होंने अपनी समस्याओं को साझा करना शुरू किया। एक दिन कोटिला गांव की पूजा (बदला हुआ नाम) ने मुझे रात के वक्त फ़ोन किया, वह घबराई हुई थी। उसने कहा ‘दीदी! हमलोगों के गांव में एक पति अपनी पत्नी को बुरी तरह मारकर उसके सारे गहने और पैसे लेकर भाग गया।‘ अगले दिन जब मैं वहां गई तो पता चला कि उस महिला का पति लॉकडाउन से पहले सूरत में काम करता था और कोरोना काल में उसका रोज़गार छिन गया। इसके बाद वह गांव वापस आ गया और उसे बुरी तरह जुआ खेलने और शराब का लग गई। आज उसे पत्नी के पैसे और गहने लेकर भागे तीन महीने हो गए। चार बच्चों को लेकर वो महिला अकेली है, पति ने जुए की लत के कारण अपने खेत भी बेच दिए।

ये किसी एक घर की बात नहीं बल्कि इस ग्राम पंचायत में बड़ी संख्या में लॉकडाउन के दौरान बेरोज़गार होकर पुरुष अपने गांव वापस आए और जुआ के खेल ने इस कदर गति पकड़ी कि अब जुआ खेलना, शराब पीना, घरेलू हिंसा और यौन उत्पीड़न की घटनाएं आम हो गई हैं। जहां एक तरफ़ गांव में ये सामाजिक समस्याएं बढ़ने लगी वहीं, दूसरी तरफ़ हम लोगों ने अपनी संस्था के माध्यम से महिलाओं और किशोरियों के नेतृत्व विकास का काम तेज किया और हम लोगों की मेहनत रंग लाई। गांव की लड़कियों और महिलाओं से जब एक मीटिंग ये पूछा गया कि आपके गांव में कौन-सी समस्या है, जिसपर काम करने की तत्काल ज़रूरत है तो महिलाओं और लड़कियों ने एक सुर में कहा, “दीदी, जुआ की समस्या बहुत ज़्यादा है। हम लोग चाहते है कि ये बंद हो।” हो सकता है आपको यह मामूली बात लगे, लेकिन वो जगह जहां अस्सी प्रतिशत से ज़्यादा लड़कियों ने पढ़ाई छोड़ दी।, ग्रामीण मज़दूर परिवारों से आने वाली इन लड़कियों और महिलाओं का इतना सोचना अपने आप में बड़ी बात है।

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अभी ये लड़ाई बहुत लंबी होगी, क्योंकि ये उस सामाजिक बुराई से जुड़ा है जिसका ताल्लुक़ धर्म, जाति और पैसों से है। जिन घरों के चूल्हे जुआ में जीते पैसों से चलते है वे सभी जुआ का विरोध करने वाली महिलाओं के ख़िलाफ़ हैं।

इतना ही नहीं, इन महिलाओं और लड़कियों ने संस्था के माध्यम से अपने ग्राम पंचायत में जुआ के ख़िलाफ़ काम जारी रखने की योजना भी बनाई और इसी धनतेरस के त्योहार के दिन सभी ने मिलकर पंद्रह किलोमीटर की लंबी दूरी वाली रैली का आयोजन किया। इस साल इस गांव की महिलाओं और लड़कियों के लिए ये दिवाली बहुत ख़ास थी। गांव की एक महिला ने रैली के समापन पर बोला कि “यह पहली बार है जब हम औरतें त्योहार के दिन अपने घर से बाहर हैं। हम लोग हमेशा से दिवाली पर जुआ खेलने की परंपरा वाली कहानी सुनकर आज के दिन चुप बैठ जाती थी और हम लोगों के घर के आदमी जुआ खेलते थे। जुआ के साथ शराब भी होती है और उस एकदिन से जुआ की लत इतनी बढ़ी कि आज हम लोगों के गांव में कई घर बिक गए। ग़रीबी के चलते कई लड़कियों की पढ़ाई छुड़वाकर शादी करवा दी गई।”

रैली में शामिल महिलाएं और किशोरियां

धनतेरस के दिन महिलाओं और लड़कियों ने अपनी रैली के बाद जुआ को बंद करवाने के लिए अपने गांव के ग्राम प्रधान और पुलिस के सामने अपनी बुनियादी मांगों का ज्ञापन भी सौंपा। इसके बाद, सभी गांव के पुरुषों ने इन महिलाओं और लड़कियों का विरोध करना शुरू कर दिया। ये विरोध तो होना ही था क्योंकि औरतें पहली बार अपने घर की दहलीज़ पार करके पंचायत भवन पहुंचीं और पुरुषों की बुरी लतों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई। पर अभी ये लड़ाई बहुत लंबी होगी, क्योंकि ये उस सामाजिक बुराई से जुड़ा है जिसका ताल्लुक़ धर्म, जाति और पैसों से है। जिन घरों के चूल्हे जुआ में जीते पैसों से चलते है वे सभी जुआ का विरोध करने वाली महिलाओं के ख़िलाफ़ हैं।

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हम लोग जब भी महिला नेतृत्व की बात करते है तो हमेशा किसी चुनाव में महिलाओं की भागीदारी से ही उनके नेतृत्व को आंकते हैं। पर नेतृत्व की उस ऊंचाई पर बहुत कम ही महिलाएं पहुंच पाती हैं और कई बार जब वे वहां पहुंचती हैं तो उनके हाथ में फैसला लेने की ताकत नहीं होती। ऐसा इसलिए भी होता है कि जब ज़मीनी स्तर पर महिलाएं अपने अधिकारों के बारे में बोलने और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए आगे बढ़ती हैं तो उनके संघर्ष की बातें कहीं लिखी नहीं जाती, जिससे एक समय के बाद उनकी कोशिश को समाज भूलने लगता हैं।

हम लोग जिस देश और जिस समाज में रहते है वहां धर्म का बोलबाला है। वह धर्म जिसने त्योहार के नाम से महिलाओं को पूजा, व्रत और चूल्हे-चौके में समेट दिया और पुरुषों को जुआ खेलने जैसे सामाजिक बुराइयों को बढ़ावा देने में झोंक दिया है। इतना ही नहीं, धर्म के नामपर महिलाओं की शिक्षा और उनके विकास के हर अवसर से उन्हें दूर करके उनकी ज़िंदगी चूल्हे-चौके में झोंककर उसे ही उसकी नियति समझा दिया है। इसका नतीजा ये होता है कि आज भी गांव में महिलाओं और लड़कियों को उनके अपने विकास के बारे में जागरूक करना और इस दिशा में पहला कदम बढ़वाना एक बड़ी चुनौती है। कई बार लंबे समय तक प्रयास किया भी जाए तो महिलाओं की सक्रियता सिर्फ़ तभी तक रहती है जब तक हमलोग उन्हें इंजन की तरह ऊर्जा और दिशा देते हैं।

ध्यान रखिएगा कि यहां मेरे, धर्म’ शब्द का मतलब हिंदू-मुस्लिम-सिख से नहीं बल्कि समाज के बनाए गये जेंडर के ढांचे के तहत तैयार किए गए काम, अवसर और सता का है, जिसमें महिलाओं को बोलने और सोचने से दूर किया जाता है और पुरुषों को सभी निर्णय की शक्ति देकर समाज की बुराइयों को बढ़ावा देने का मौक़ा दिया जाता है, लेकिन इन सबके बाद जब इस तरह ग्राम पंचायत की महिलाओं और लड़कियों की एकता किसी सामाजिक बुराई के ख़िलाफ़ एकजुट होती है तो मन में बदलाव की उम्मीद जगती है। मेरा मानना है कि वास्तव में समाज में तभी बदलाव आएगा जब हमलोग हर पर्व-त्योहार से जुड़ी बुराइयों के ख़िलाफ़ भी आवाज़ उठाए क्योंकि कई बार किसी एक दिन की बुरी आदत एक कुरीति को बढ़ाती है।

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(सभी तस्वीरें वंदना द्वारा उपलब्ध करवाई गई हैं.)

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