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“अब वक्त आ गया है कि हमारा समाज ये समझे कि हो सकता है कि एक पीड़ित मेंटल ट्रॉमा के कारण शायद कई सालों तक कुछ न बोले। लेकिन एक महिला को अपने साथ हुई यौन हिंसा के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के लिए सज़ा नहीं दी जा सकती।”

“कोर्ट इस बात को मानता है कि प्रिया रमानी को अपने साथ हुई यौन हिंसा के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की हिम्मत सालों बाद आई। इस बात को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि अधिकतर यौन हिंसा के मामले बंद दरवाज़ों के पीछे होते हैं और पीड़ित को पता ही नहीं होता कि उनके साथ हो क्या रहा है।”

“संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सबको बराबरी का अधिकार दिया गया है। प्रिया रमानी को पूरा अधिकार है इस बात का कि वह अपनी बात किस प्लैटफॉर्म पर रखना चाहती हैं।”

“प्रतिष्ठा के अधिकार को गरिमा के अधिकार की कीमत पर नहीं बचाया जा सकता।”

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17 फरवरी यानी बीते बुधवार को दिल्ली की अदालत ने यह बातें प्रिया रमानी को आपराधिक मानहानि के मामले से बरी करते हुए कहीं। प्रिया रमानी ने पूर्व केंद्रीय मंत्री एमजे अकबर पर यौन शोषण का आरोप लगाया था जिसके बाद उन पर एमजे अकबर ने उन पर मानहानि का मुकदमा दर्ज किया था। प्रिया रमानी पर यह मामला साल 2018 में दर्ज करवाया था। इस मामले को भारत के #MeToo आंदोलन का एक हाई-प्रोफाइल मामला माना जाता है क्योंकि इसमें तत्तकालीन केंद्रीय मंत्री पर आरोप लगे थे। प्रिया रमानी वह अकेली महिला नहीं थी, जिन्होंने एमजे अकबर पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे। उन पर 20 महिलाओं ने आरोप लगाए थे।

इस मामले में आदर्श स्थिति तब होती जब सर्वाइवर ने आरोपी पर केस किया होता और हम उस केस की जीत का जश्न मना रहे होते। लेकिन यहां हुआ वही जो हमेशा से एक ‘आदर्श पितृसत्तात्मक समाज’ में होता आया है। यहां एमजे अकबर ने ही प्रिया रमानी पर मानहानि का केस किया जो वह पिछले दो सालों से लड़ रही थी। एक पूर्व केंद्रीय मंत्री और उसके 97 वकीलों की फौज के सामने प्रिया रमानी इस बात को साबित करने के लिए लड़ रही थी कि उन पर लगाया गया मानहानि का मुकदमा गलत है। भारत के #Metoo आंदोलन के संदर्भ में प्रिया रमानी की जीत को सबसे बड़ी जीत के रूप में इसे देखा जा रहा है। जहां आरोपी को सज़ा नहीं हुई बल्कि सर्वाइवर मानहानि के मुकदमे से बरी हुई है। इस मुकदमे से बरी हुई प्रिया रमानी के लिए शायद हम ये नहीं कह सकते कि वह बिल्कुल वैसा ही महसूस कर रही होंगी जैसा उन सर्वाइवर्स ने महसूस किया होगा जब कोर्ट रूप में हार्वी वाइंस्टीन को सज़ा सुनाई जा रही थी।

न जाने इस वक्त कितनी ही यौन उत्पीड़न के सर्वाइवर्स के लिए प्रिया रमानी की जीत उनकी निजी जीत ही लग रही होगी। कोर्ट रूम से निकलकर प्रिया ने जब कहा कि यह जीत सबकी जीत है तो इसे न जाने कितनी महिलाओं ने सच माना होगा।

और पढ़ें : हार्वी वाइंस्टीन को मिली सजा ‘#MeToo’ आंदोलन की सबसे बड़ी जीत है !

लेकिन राहत इस बात की है कि दो साल बाद ही सही लेकिन कोर्ट ने ये तो माना कि अपने साथ हुई यौन हिंसा के ख़िलाफ़ आवाज़ चाहे कभी भी उठाई जाए लेकिन इस बात के लिए हम सर्वाइवर को दोषी नहीं मान सकते। यह संदेश है उस भारतीय पितृसत्तात्मक समाज को जो विक्टिम ब्लेमिंग में माहिर है। भारत में #MeToo की जब शुरुआत हुई और धीरे-धीरे महिलाओं ने अलग-अलग सोशल मीडिया पर अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न के बारे में बोलना शुरु किया था। उस वक्त लगभग सबसे एक ही सवाल पूछा गया था, “इतने सालों बाद बोलकर क्या मिलेगा, जब उत्पीड़न हुआ था तब क्यों नहीं बोली।” #BelieveTheSurvivor की थ्योरी पूरी तरह फेल होती नज़र आ रही थी। आरोपियों से सवाल करने की जगह सारी ऊंगलियां सर्वाइवर्स की ओर घूम गई थी। लगभग हर सोशल मीडिया पोस्ट के नीचे एक ही सवाल नज़र आ रहा था। ऐसे सवालों के कारण न जानी कितनी महिलाओं ने अपने फेसबुक पोस्ट ‘ओनली मी’ कर लिए होंगे और ट्वीट्स मिटा दिए होंगे। सर्वाइवर से सवाल पूछने वाले अधिक चिंतित इस बात को लेकर दिखे कि वह सर्वाइवर सालों पहले अपने साथ हुए उत्पीड़न को साबित कैसे करेगी। सर्वाइवर्स के ऊपर सलाहों की बौछार कर दी गई कि सोशल मीडिया पर लिखने से कुछ हासिल नहीं होगा। उन्हें पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज करवानी चाहिए। सुनने में तो ये सभी बातें बेहद सटीक लगती हैं। लेकिन ऐसी सलाह देने वालों को एक बार भी इस बारे में भी सोचना चाहिए कि एक सर्वाइवर को मानहानि के मामले से बरी होने के लिए दो सालों तक लड़ना पड़ा।

न जाने इस वक्त कितनी ही यौन उत्पीड़न के सर्वाइवर्स के लिए प्रिया रमानी की जीत उनकी निजी जीत ही लग रही होगी। कोर्ट रूम से निकलकर प्रिया ने जब कहा कि यह जीत सबकी जीत है तो इसे न जाने कितनी महिलाओं ने सच माना होगा। न जाने कितनी महिलाएं अभी मन ही मन प्रिया रमानी का शुक्रिया अदा कर रही होंगी कि इस बात के लिए कि वह डटी रहीं। न जाने कितनी महिलाओं को अपने आरोपी के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करने की हिम्मत मिल चुकी होगी। कहीं कोई सर्वाइवर यह भी सोच रही होगी कि अगर इस देश में एक पूर्व केंद्रीय मंत्री हार सकता है तो वह भी अपने सर्वाइवर से लड़ सकती है। सनद रहे, कोर्ट ने खुद ही कहा है किसी की प्रतिष्ठा, सर्वाइवर की गरिमा से बड़ी नहीं हो सकती। कहीं, इस सिस्टम से हारकर बैठी किसी सर्वाइवर को शायद फिर से हिम्मत मिली होगी अपने उत्पीड़क के ख़िलाफ़ दोबारा उठ जाने की।

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हम उस राजनीतिक माहौल में जी रहे हैं जहां पिछले कुछ सालों से लगातार अदालतों के फै़सलों ने हमें निराश किया है। हमने वह वक्त भी देखा है जहां कठुआ में बलात्कारियों के समर्थन में रैलियां निकाली गई। वहीं बीते साल सितंबर में उत्तर प्रदेश के हाथरस में इंसाफ़ तो दूर पीड़िता का अंतिम संस्कार भी क्रूर प्रशासन और सत्ता के साये में हुआ। ऐसे में तमाम आलोचनाओं के बीच प्रिया रमानी की यह जीत एक उम्मीद की किरण ज़रूर है उन महिलाओं के लिए जिन्हें लगता है कि अपने साथ हुए उत्पीड़न के ख़िलाफ़ सालों बाद आवाज़ उठाने का कोई मतलब नहीं बनता। यह फ़ैसला उम्मीद देता है उन सर्वाइवर्स को जिन्हें लगता है कि उनके आरोपी तो बहुत ताकतवर और रसूख़ वाले हैं तो उनसे वे कैसे लड़ेंगी। अगर हमारी अदालतें संवेदनशील बनी रहें तो, न्याय तक पहुंच सबके लिए बराबर हो, ऐसे में सर्वाइवर्स को अदालत का दरवाज़ा खटखटाने के लिए किसी सलाह की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।

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तस्वीर साभार : Rediff.com

Ritika is a reporter at the core. She knows what it means to be a woman reporter, within the organization and outside. This young enthusiast has been awarded the prestigious Laadli Media Awards and Breakthrough Reframe Media Awards for her gender-sensitive writing. Ritika is biased.

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