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क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि एक ही सामान के लिए दो लोगों को अलग-अलग कीमत चुकानी पड़ती है? साथ ही किसी सामान का रंग भी उसकी कीमत को प्रभावित कर सकता है? अगर अभी तक आपके पास इन सवालों का जवाब नहीं है और न ही आपने इन अंतरों को महसूस किया है, तो किसी मॉल या ग्रॉसरी स्टोर में जाइए और एक ही कंपनी की दो समान चीज़ों को, जिनमें से एक गाढ़े-मर्दाना रंग की (पुरुषों के लिए) हो और दूसरी हल्के-फेमिनिन रंग की (औरतों के लिए), उनकी कीमतों की तुलना करिए। आप पाएंगे कि उन दोंनो सामानों की कीमत में, जिनमें रंग छोड़कर बाकी सब कुछ समान है, एक ठीक-ठाक अंतर होगा। उदारहण के तौर पर, पॉन्ड्स कम्पनी का एक फेसवॉश जो मर्दों के मुहांसे खत्म करने का दावा करता है, उसके 100 ग्राम के ट्यूब की कीमत 159 रुपए हैं। वहीं औरतों के लिए उसकी क़ीमत 187 रुपए है। एक ही उद्देश्य के लिए कीमत में इतना बड़ा अंतर किसी एक सामान या सेवा में नहीं, बल्कि अधिकतर मामलों में होता है।

सेल्फ-केयर प्रॉडक्ट्स से लेकर बच्चों के खिलौने और कपड़ों तक में यह अंतर देखा जा सकता है। लिंग के आधार पर अलग-अलग कीमतें केवल वस्तुओं की ख़रीद तक सीमित नहीं, बल्कि एक ही तरह की सेवाओं के लिए भी निर्धारित की गई हैं। यह एक बड़ा अंतर है जो भौगोलिक सीमाओं के परे दुनिया भर में लगभग एक जैसा है। पश्चिमी विकसित देशों से लेकर एशियाई देशों तक, हरेक जगह एक ही किस्म की सेवाओं व वस्तुओं के लिए औरतें पुरुषों से अधिक भुगतान करने को बाध्य हैं।यह देखते हुए सीधा सवाल आता है कि आख़िर लगभग समान चीजों की कीमतों में जेंडर बदलने भर से इतना बड़ा अंतर क्यों है, यानी क्या औरत होने भर से आप किसी सामान की अधिक क़ीमत अदा कर रही हैं; इसका जवाब जानने के लिए आइए समझते हैं ‘पिंक टैक्स’ की अवधारणा को।

पिंक टैक्स क्या है ?

पिंक टैक्स असल में कोई सीधा टैक्स नहीं है यानी इसे इनकम टैक्स या वैल्यू एडेड टैक्स की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। कुल मिलाकर यह सरकारों द्वारा निर्धारित  प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष कर की श्रेणी में नहीं आता है। असलियत में, यह एक अदृश्य जेंडर आधारित कीमत भेदभाव ( जेंडर बेस्ड प्राइस डिस्क्रिमिनेशन) है, जो औरतें अपने सामान और सेवाओं के लिए चुकाती हैं। यह तब भी मौजूद रहता है, जब हूबहू एक ही तरह की चीज़ें या सेवाएं ली जा रही हो। उदाहरण के तौर पर, जॉकी का सूती बॉक्सर, जो एक पुरुष के लिए क़रीब 409 रुपए में उपलब्ध हैं, वहीं औरतें इसके लिए 479 चुकाती हैं। उसी प्रकार, बाल कटवाने के लिए भी औरतें पुरुषों से अधिक राशि खर्च करती हैं, भले ही बालों की लंबाई कम क्यों न हो। जैसे जावेद हबीब सैलून,जो हेयर कट-हेयर स्पा और हेड मसाज़ के लिए पुरुषों को 899 चार्ज करता है, वहीं औरतों को इन्हीं चीजों के लिए 1799 की कीमत चुकानी पड़ती है। इस प्रकार, इसे एक तरह से ऐसे देखा जा सकता है कि दुनिया भर की औरतों को औरत होने भर के लिए कीमत अदा करनी पड़ती है। यह स्थिति दुनिया के हर भाग में एक जैसी ही है, भले ही वे अलग राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि वाले हैं। इससे स्पष्ट हो जाता है कि औरतें एक वर्ग के रूप में सामूहिक रूप से शोषित हैं और सदियों से चली आ रही पितृसत्त्ता की जड़ें आज भी मानवीय सभ्यताओं की जड़ों में गहराई से पैठी हुई हैं।

सेल्फ-केयर प्रॉडक्ट्स से लेकर बच्चों के खिलौने और कपड़ों तक में यह अंतर देखा जा सकता है। लिंग के आधार पर अलग-अलग कीमतें केवल वस्तुओं की ख़रीद तक सीमित नहीं, बल्कि एक ही तरह की सेवाओं के लिए भी निर्धारित की गई हैं।

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इतिहास

पिंक टैक्स कोई नई परिघटना नहीं है। पिछले बीस सालों से अमेरिका के अलग-अलग राज्य जेंडर के आधार पर तय कीमतों की सूचियां निकालते रहे हैं। हालांकि, 2010 में पहली बार ‘कन्ज़्यूमर रिपोर्ट’ के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर पर हुए शोध में मालूम हुआ कि एक ही तरह के उत्पाद के लिए औरतें तक़रीबन 50 प्रतिशत अधिक का भुगतान करती हैं। यह मुद्दा और अधिक पुख़्ते तौर पर तब उठा, जब साल 2015 में न्यूयॉर्क के कंज़्यूमर डिपार्टमेंट ने एक रिपोर्ट ज़ारी कर बताया कि उस दौरान देश में 91 ब्रांड्स के लगभग 794 तुलनात्मक वस्तुओं में जेंडर के आधार पर क़ीमत में अंतर मौजूद था। इस रिपोर्ट में पांच अलग तरह के उद्योगों जैसे सेल्फ़-केयर उत्पाद, पारिवारिक स्वास्थ्य संबंधी वस्तुओं और वरिष्ठ नागरिकों की स्वास्थ्य संबंधी वस्तुओं का अध्ययन किया गया था। इसमें 35 उत्पाद श्रेणियां घेरे में आईं, जिनमें शैम्पू और बॉडीवॉश इत्यादि शामिल थे। साथ ही, जिन पांच उद्योगों का अध्ययन किया गया था,उन सब में हरेक द्वारा महिलाओं के लिए बनाए गए उत्पादों की कीमत अधिक थी। 

इसके बाद शोधकर्ताओं ने खिलौनों और अन्य सहायक उपकरणों की श्रेणी में 106 वस्तुओं का अध्ययन किया और पाया कि बच्चियों के लिए बने खिलौनों की कीमत लड़कों के खिलौने के बरक्स औसतन सात प्रतिशत अधिक है। इन सब में भी, सबसे अधिक अंतर सेल्फ़-केयर उत्पादों के मूल्य में था। शैंपू और कंडीशनर, रेज़र, बॉडीवॉश जैसी चीज़ें जिनका रंग छोड़कर बाकी सब लगभग समान था, उनमें एक ठीक-ठाक अंतर देखने को मिला। आप देखें तो आज भी यह अंतर बना हुआ है। पुरुषों के परफ़्यूम, जूते, पर्स, फेशवॉश और क्रीम महिलाओं की तुलना में सस्ते मिलते हैं। न्यूयॉर्क के कन्ज़्यूमर रिपोर्ट में यह पाया गया कि अकेले सेल्फ़-केयर प्रॉडक्ट्स के मामले में औरतें औसतन 13 प्रतिशत का क़ीमत-विभेद झेलती हैं।

हालांकि ऐसा नहीं है कि पितृसत्त्ता अदृश्य रहकर शोषण करती रहती है और उसका प्रतिकार नहीं होता। समय-समय पर औरतों द्वारा इस भेदभावपूर्ण स्टेटस-को का विरोध किया गया है। साल 1995 में तत्कालीन विधानसभा की सदस्य जैकी स्पीयर ने ऐसा बिल पारित किया जिससे बाल कटाने जैसी सेवाओं में लिंग के आधार पर कीमत भेदभाव बंद हो जाए। अब स्पीयर अमरीकी कांग्रेस की सदस्य हैं और इस भूमिका में उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर उपिंक टैक्स को हटाने संबंधी कानून दोबारा पेश किया है। अगर यह कानून पास हो जाता है तो उपभोक्ताओं के पास यह अधिकार होगा कि वे कानूनी रूप से कीमत के आधार पर भेदभाव करने वाले व्यापारी-उत्पादक के ख़िलाफ़ केस सकते हैं।

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पिंक टैक्स के बावजूद भी क्यों बिक रहे हैं उत्पाद

इस बारे में बात करते हुए न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ़ लॉ के ब्रेनन स्कूल ऑफ़ जस्टिस की उपाध्यक्ष और वक़ील जेनिफ़र वेइस-वुल्फ़ कहती हैं कि निजी कंपनियों के लिए यह एक तरह से अधिक आय पैदा करने का माध्यम है। अधिक पैसा बनाने के लिए वे उत्पादों को इस तरह पेश करते हैं, जिससे जनसंख्या के एक भाग का ध्यान खींचा जा सके। आपने ज़रूर ही टीवी पर उन विज्ञापनों को देखा होगा जो किसी भी उत्पाद को दिखाते हुए कहते हैं, ‘इन्हें ख़ासकर महिलाओं की ‘कोमल त्वचा’- ‘मुलायम हाथों’ या ‘त्वचा ऐसी कि छुए बिना रहा न जाए’ के लिए बनाया गया है।’  इस प्रकार ये विज्ञापन वांट (WANT) यानी चाह को नीड (NEED) यानी ज़रूरत बनाकर पेश करते हैं। इसे समझने के लिए हमें यह समझना होगा कि कॉरपोरेट या पूंजीवाद दरअसल समाज की पारंपरिक अवधारणाओं से निर्मित सामाजिक वातावरण को अपना बाज़ार बनाता है और वह यह दावा करता है कि वह लोगों को ‘लिबरेट’ यानी आज़ाद कर रहा है लेकिन वह पहले से चली आ रही अवधारणाओं में अपना फ़ायदा देख उन्हें अलग तरीक़े से मज़बूत ही कर रहा होता है।

यह प्रक्रिया पूंजीवाद के अस्तित्व के लिए नैसर्गिक है, जैसे दुनियाभर के पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं की खूबसूरती को कुछ पैमानों में बांधा गया है। मसलन औरत का गोरा होना, उनके शरीर का पतला होना, होंठ का लाल होना इत्यादि। ये पैमाने दरअसल पुरुषों की ही दृष्टि से महिलाओं की देह को देखकर बनाए गए हैं। समाज यह मानता है कि स्त्री का अस्तित्व पुरुषों के साथ ही संबद्ध है, ऐसे में स्त्री का ‘अच्छा दिखना’ उससे संबंधित पुरुष की छवि के अच्छे होने के लिए ज़रूरी हो जाता है। यह सुनिश्चित हो सके, इसके लिए बाज़ार में कई तरह के उत्पाद मौजूद हैं। ऐसे में, उस पैमाने में फ़िट बैठने के लिए औरतें इन उत्पादों का उपभोग करने के लिए बाध्य हो जाती हैं। यह बाध्यता विज्ञापनों द्वारा सशक्त की जाती है। उदाहरण के लिए, ‘लिप्टन ग्रीन टी’ का विज्ञापन ले लीजिए, आप देखेंगे कि कितनी चतुराई से कारपोरेट यहां मुख्यधारा के स्वीकार्य एजेंडे को स्थापित कर देता है।

हम एक ऐसी दुनिया में जी रहे हैं, जहां आर्थिक होड़ अपने चरम पर है। आज के संघर्षशील और व्यक्ति केंद्रित समय में भी औरतें पूरी व्यवस्था में कोने में खड़ी की गई हैं। एक ही कंपनी में, एक ही भूमिका में दो कर्मियों के साथ अलग-अलग व्यवहार किया जाता है और यह भेदभाव होता है, लिंग के आधार पर। लिंग के आधार पर मौजूद इस भेदभाव के कारण ही अपने पुरुष सहकर्मी के बराबर काम करने वाली महिला को पुरुष से कम वेतन मिलता है। ऐसे में, एक ओर तो पूंजीवाद संचालित कॉरपोरेट औरतों को उनकी सेवाओं के बदले कम आय दे रहा है। वहीं उन्हें सामाजिक मानकों के अधीन भी कर रहा है। कॉरपोरेट को ऐसी कर्मी चाहिए, जो ‘स्मार्ट’ दिखे, लोगों का ध्यान खींच सके यानी महिलाओं के लिए सुंदर और स्मार्ट होने का पैमाना कॉरपोरेट पहले से तय कर रहा है, ऐसे में वस्तुओं की अधिक कीमतें चुकाकर औरतें इस पूरी व्यवस्था से दोहरे स्तर पर शोषित हैं।

इसके साथ ही, एक और बात जो समझना चाहिए कि चूंकि ये पैमाने समाज द्वारा सामूहिक स्तर पर तय किए गए हैं, इसलिए मुख्यधारा में प्रचलित सुंदरता का पैमाना केवल शहरी या कामकाजी औरतों को ही नहीं बल्कि ग्रामीण व पिछड़ी पृष्ठभूमि से आने वाली औरतों को भी प्रभावित कर रहा है। वे भी दूसरों के हिसाब से ‘सुंदर’ होना चाहती हैं, इसलिए उनकी ‘मूलभूत ज़रूरत की वस्तुओं में कहीं न कहीं कॉस्मेटिक्स भी घुस चुके हैं और इस तरह बड़ी चालांकी से कॉरपोरेट अपनी साज़िश में सफ़ल होता दिख रहा है।

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तस्वीर साभार : BBC

गायत्री हिंदू कॉलेज से इतिहास विषय में ऑनर्स की पढ़ाई कर रही हैं। मूलत: उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र के एक छोटे से गांव से दिल्ली जाने वाली पहली महिला के रूप में उनके पास सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य से जुड़े बहुत सारे अनुभव हैं, जो इंटरसेक्शनल नारीवाद की ओर उनके झुकाव के प्रमुख कारक हैं। उनकी दिलचस्पी के विषयों में नारीवाद को गांवों तक पहुंचाना और ग्रामीण मुद्दों को मुख्यधारा में ले आना शामिल हैं।

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