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भारत में साल 2019 में प्रतिदिन औसतन 87 बलात्कार के मामले दर्ज किए गए। नैशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो की साल 2020 की रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि कैसे भारत में हर 16 मिनट में एक महिला का बलात्कार होता है, हर 30 घंटे में एक महिला के साथ सामूहिक बलात्कार कर उसकी हत्या कर दी जाती है। हर दो घंटे में एक महिला के साथ रेप की कोशिश की जाती है। 

मर्द यौन हिंसा क्यों करते हैं? यह एक ऐसा सवाल है जो शायद हर महिला के मन में पैदा होना एक आम बात है कि आखिर क्यों महिलाओं को यौन हिंसा का सामना करना पड़ता है। इसी सवाल का जवाब ढूंढते हुए तारा कौशल, जो कि एक लेखिका होने के साथ-साथ एक मीडिया की सलाहकार है और भारत में होने वाले लैंगिक भेदभाव के ख़िलाफ़ हमेशा अपनी आवाज़ उठाती आ रही हैं। उन्होंने साल 2020 में प्रकाशित हुई ‘Why men rape’ नाम की किताब लिखी है। यह किताब तारा की नौ पुरुषों के साथ की गई अंडरकवर जांच को दर्शाती है। तारा कौशल ने उन पुरुषों के साथ एक-एक सप्ताह बिताया, जिन्होंने कथित तौर पर बलात्कार किया था, लेकिन विभिन्न कारणों से उन्हें दोषी नहीं ठहराया गया। उन्होंने उनके घरों में जाकर उनसे, उनके परिवारों और दोस्तों से बातचीत की और बलात्कार करने के पीछे के उद्देश्यों को समझने की कोशिश की।

उन्होंने उन नौ पुरुषों से उनके बारे में जानने की कोशिश की कि आखिर क्यों उन्होंने बलात्कार किया। ये सभी पुरुष समाज के अलग-अलग परिवेश से आते थे। जैसे कि एक डॉक्टर जिसने अपनी बारह साल की मरीज का बलात्कार किया, एक बेरोज़गार व्यक्ति जो उस लड़की का खून करना चाहता था जिससे वह प्यार करता था, एक जवान लड़का जो एक गैंगरैप में शामिल था आदि पुरुष इसमें शामिल थे। इस किताब में यह बहुत अच्छे से दर्शाया गया है कि बलात्कार सभी पृष्ठभूमि से आनेवाले पुरुष करते हैं, लेकिन इन सबके बीच जो एक चीज़ सामान्य है वह है पितृसत्ता और इन्हें ‘ना’ सुनना पसंद नहीं है। इस किताब के मुताबिक बहुत से विषयों में तो यह भी देखा गया कि उन्हें पता ही नहीं होता कि आखिर बलात्कार क्या है? वह महिलाओं के विरोध करने पर की गई हिंसा को बलात्कार नहीं बल्कि सामान्य सेक्स के रूप में देखते हैं क्योंकि वे बड़े होते हैं इसी सोच के साथ कि महिलाएं हमेशा विरोध करती हैं लेकिन इसे गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए।

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इस किताब में तारा लिखती हैं कि भारतीय पुरुष अपने परिवार के लिए वफादार है। यह ‘मां-बहन’ की अवधारणा का निरंतर समर्थन करते हैं क्योंकि इस ढांचे के बाहर, पुरुष महिलाओं का सम्मान करने में असमर्थ हैं। इस किताब में वैवाहिक बलात्कार की भी बात की गई है और बताया गया है कि कैसे लड़कों को मर्दानगी की अवधारणा के साथ बड़ा किया जाता है जो उनसे एक हिंसक और प्रतिस्पर्धी यौन और सामाजिक उपस्थिति की मांग करता है। नैशनल कोलिशन अगेंस्ट डोमेस्टिक वॉयलेंस के आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया में हर 10 विवाहित महिलाओं में से कम से कम एक को वैवाहिक बलात्कार का अनुभव होगा। जबकि वैवाहिक बलात्कार को न हमारे देश में कानून अपराध माना जाता है और शायद ही इसके ख़िलाफ़ कोई मामला दर्ज दिया जाता है। कौशल उस सोच का भी जिक्र करती हैं, जो लड़कों को ‘मर्द बनने की सलाह’ देती है और उनके कोमल बचपन को कुचलकर रख देती है। 

 

इस किताब के मुताबिक बहुत से विषयों में तो यह भी देखा गया कि उन्हें पता ही नहीं होता की आखिर बलात्कार क्या है? वह महिलाओं के विरोध करने पर की गई हिंसा को बलात्कार नहीं बल्कि सामान्य सेक्स के रूप में देखते हैं क्योंकि वे बड़े होते हैं इसी सोच के साथ कि महिलाएं हमेशा विरोध करती हैं लेकिन इसे गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए।

वही किताब में भारतीय सिनेमा पर भी बात की गई है कि कैसे बॉलीवुड, ऑनलाइऩ स्ट्रीमिंग प्लैटफॉर्म्स, टिकटॉक आदि, लोगों को खासकर पुरुषों के दिमाग में एक सच्चे प्यार और मर्दानगी की तस्वीर बना देते हैं। दूसरी तरफ अगर पॉर्नोग्रफी की बात की जाए तो किताब के उन सभी विषयों के बीच में पितृसत्तात्मक सोच के अलावा, पॉर्नोग्रफ़ी देखने का तथ्य समान था। नौ के नौ विषयों ने पॉर्नोग्रफी का इस्तेमाल यौन/सेक्स शिक्षा के तौर पर किया था। वही फोर्ब्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2018 में भारत लगातार दूसरे साल पोर्नोग्राफी की दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है। इस रिपोर्ट से अनुमान लगाना आसान होगा कि कैसे भारत यौन शिक्षा के लिए सस्ती पॉर्नोग्रफी का इस्तेमाल कर रहा है। 

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एक महिला होने के तौर पर इस किताब से अपने आपको जोड़ पाना मेरे लिए और आपके लिए एक आसान बात होगी। किताब में पितृसत्तात्मक सोच के परिणाम से लेकर हर उस मुद्दे पर बात की गई है जिसे हम आसानी से अपनी निजी जिंदगियों के साथ जोड़कर देख सकते हैं। इस किताब में ऐसा कुछ नया नहीं बताया गया है जिससे हम रूबरू न हो और यही बात ‘Why men rape’ किताब को खास तो नहीं बनाती लेकिन यह हमें समस्या के बारे में जागरूक करने और इसे रोकने का तरीका खोजने की दिशा में एक महत्वपूर्ण योगदान देती है।

दूसरी और देखा जाए तो केस स्टडी हमेशा से ही दिलचस्प होती है लेकिन दुर्भाग्य से यह किताब केस स्टडी, शोध और टिप्पणी के बीच झूलती नज़र आती है जिससे इसे पढ़नेवाला व्यक्ति ट्रैक और धैर्य खो सकता है या शायद, ये सभी बिंदु जिन्हें मैं कमियों के रूप में देखती हूं वह अन्य पाठकों के लिए इस किताब को एक आदर्श किताब बनाते हो। वहीं, तारा के साहस के लिए हमें उनकी सराहना करनी चाहिए की कैसे उन्होंने वेश बदलकर एक सहयोगी के साथ उन नौ पुरुषों का विश्वास जीता और वह प्रत्येक से 250 सवालों के जवाब निकलवाने में सक्षम रहीं। वहीं, आखिरी में वह अपनी किताब को खत्म करते हुए नारीवाद को अपने शब्दों में कुछ इस प्रकार समझाती हैं, “नारीवाद, एक लड़का और एक लड़की के बीच की लड़ाई नहीं है बल्कि पितृसत्तात्मक सोच और मौलिक अधिकारों के बीच की लड़ाई है।”

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तस्वीर साभार : Firstpost

मेरा नाम वांशिक पाल है| दिल्ली विश्वविद्यालय के गार्गी कॉलेज की छात्रा हूँ| दिल्ली में ही हमेशा से रही हूँ, तो दिल्ली की गलियों को ही देखा है, लेकिन ताज्जुब की बात तो यह है की अभी तक पूरी दिल्ली नहीं देखी| बात करें मेरे बारें में तो अभी तक मुझे इतना ही पता है, जितना मेरे आधार कार्ड पर फिट हो सकें| अपने बारें में कभी इतनी गहराई में सोचनें का मौका ही नहीं मिला, क्योंकि अभी तक के सारे फैसले घरवालों ने लिए है| अब सोचती हूँ, तो लगता है जैसे अभी तक तो कुछ किया ही नहीं है| बाकी पेंटिंग करना, गाने सुनना, किताबें पढ़ना और छोटे बाल रखना मेरे कुछ शौक है| हर जगह गलतियाँ करना जैसे मेरा एक मात्र काम है| बाकी ज़िंदगी में कुछ नया सीखने की कोशिश में लगी रहती हूँ, लेकिन उनसे बोर भी बहुत जल्दी हो जाती हूँ| सिनेमा देखना, गानों के साथ गाने गाना और आस पास की कहानियों को अपने फोन में रखना जैसे एक मात्र प्यार है| बाकी हर एक बात पर "क्यों?" पूछना पसंद करती हूँ|

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