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परिवार को हम किस तरह से परिभाषित करेंगे? भारत का समाज हेट्रोनॉर्मल है यानि परिवार जहां पति, पत्नी हो और दोनों इटरलिंगी हो। पुरुषों का यौन और रोमैंटिक आकर्षण महिलाओं से हो और महिलाओं का पुरुषों से। इसके अलावा यह जैविक परिवार संयुक्त परिवार हो सकता है या एकल परिवार। पारंपरिक हेट्रोनॉर्मल परिवारों के अस्तित्व से समाज हमेशा से सहज रहा है, ऐसे परिवारों पर कई लोकयुक्ति, मुहावरे भी बने हैं। जैसे “खून ही खून के काम आता है”, ‘खून आख़िर खून ही होता है।’ ‘खून के रिश्ते’ या जैविक परिवारों को लेकर बने ऐसे मुहावरों का इस्तेमाल ज्यादातर पारंपरिक जैविक परिवारों को उसके सदस्यों के लिए सबसे सुरक्षित जगह, जरूरत के समय काम आने वाली जगह के रूप चित्रित करने के लिए होता है।

निवेदिता मेनन की क़िताब ‘Seeing like a feminist’ के पहले चैप्टर में वह पूछती हैं कि क्या परिवार लोगों का वह समूह नहीं है जहां लोग एक दूसरे से प्यार करते हो और एक दूसरे का सहारा बनते हो। लेकिन कोई भी समूह जो यह करता हो उसे ‘परिवार’ की मान्यता नहीं मिलती है, जैसे, दोस्तों का एक समूह, समलैंगिक जोड़े जिन्होंने बच्चे गोद लिए हो, अविवाहित मांए, अपने भाई/बहनों के साथ रहती कोई महिला, इत्यादि। ‘परिवार’ एक संस्थान है जिसकी एक क़ानूनी पहचान है और जिसके कुछ निर्धारित लोग तय रिश्ते में हो, तभी स्टेट उसे ‘परिवार’ मानता है। ऐसे परिवार निवेदिता मेनन के मुताबिक़ केवल पितृसत्तात्मक होते सकते हैं, ‘इतरलिंगी, एक मर्द, एक औरत, ‘उसके’ बच्चे।’

अगर पारंपरिक हेट्रो, जैविक परिवार सच में इतने आदर्श होते जितना समाज इन्हें मानता है तो वहां पल रहे बच्चे बचपन में सामना किए गए ट्रॉमा से मुक्त होते। यही ट्रॉमा आगे चलकर उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाते हैं, जिससे अलग-अलग व्यक्ति अलग-अलग तरह से निपटने में जीवन लगा देता है। पहले उस ट्रिगर को पहचानना, उसे खुद में प्रोसेस करना, थेरेपी लेने के बारे में जागरूकता, थेरेपी लेने से जुड़ी अन्य बातें जैसे आसपास एक स्पोर्ट सिस्टम का होना, आर्थिक सामर्थ्य, इत्यादि। ऐसे परिवार सिस-हेट यानि जन्म के साथ मिले जेंडर की पहचान ही उनकी असल जेंडर पहचान हो और वे इतरलिंगी हो, इस पहचान के अलावा किसी और जेंडर आइडेंटिटी या सेक्सुअल ओरिएंटेशन वाले बच्चों की परवरिश यातनाओं से भरा अनुभव होता है।

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नेशनल इंस्टीट्यूशन ऑफ मेंटल हेल्थ के अनुसार ज्यादातर मानसिक परेशानियों की शुरुआत के बीज दिमाग़ में बचपन में होने वाली घटनाओं के साथ ही पड़ जाते हैं। कई लोग जो मानसिक परेशानियों से जूझ रहे होते हैं मानते हैं कि बचपन में सहायता मिल जाती तो वे एक वयस्क के रूप में बेहतर मानसिक हालात में होते। ऐसे में हास्यास्पद और दुखद है साल 1984 में दिल्ली हाई कोर्ट का एक निर्णय जिसमें अदालत ने कहा कि नागरिकों को संविधान द्वारा जो मौलिक अधिकार मिले हैं वे परिवार के अंदर लागू नहीं होता है। परिवार के अंदर उन्हें लागू करना ‘चीनी मिट्टी की दुकान में सांड छोड़ देने जैसा है’, ऐसा न्यायाधीश ने कहा था। निवेदिता मेनन अपनी क़िताब में इस फैसले का ज़िक्र करते हुए टिप्पणी करती हैं कि अगर परिवार के अंदर सदस्यों के मौलिक अधिकारों को लाया गया तो सभी सदस्यों को आज़ाद और बराबर के नागरिक की तरह देखना होगा, इससे परिवार का ढांचा गिर जाएगा। ऐसे परिवार वह संस्थान हैं जो पितृवंशिकता को मानते हैं। ज़ाहिर है मेनन यहां पारंपरिक, जैविक, हेट्रो परिवारों की बात कर रही हैं।

अगर पारंपरिक हेट्रो, जैविक परिवार सच में इतने आदर्श होते जितना समाज इन्हें मानता है तो वहां पल रहे बच्चे बचपन में सामना किए गए ट्रॉमा से मुक्त होते। यही ट्रॉमा आगे चलकर उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाते हैं, जिससे अलग-अलग व्यक्ति अलग-अलग तरह से निपटने में जीवन लगा देता है।

ऐसे पारिवारिक ढांचे केवल भारत में नहीं दुनियाभर की मुख्यधारा में ‘सामान्य और साधारण’ माने जाते हैं। ऐसे में ‘चयनित परिवार’ जिसे chosen family कहा जाता है, उनके अस्तित्व की महत्ता और उसके मायनों पर बात करना अहम हो जाता है। चयनित परिवार के अस्तित्व को समाज के पारंपरिक परिवार अपने लिए ख़तरा मानते हैं, यहां तक कि उसे परिवार मानने से भी इनकार करते हैं। इसके बावजूद चयनित परिवार के सदस्यों के लिए उनका परिवार एक परिवार की तरह क्यों है और वे खुद को ऐसे परिवारों का हिस्सा क्यों मानते हैं। इसे समझने के लिए कैथ वेस्टन की लिखी  ‘exiles from kinship‘ की ओर रूख़ करना होगा। 

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1980 के दशक में गे परिवार समाजिक रूप से उभर रहे थे। ऐसे परिवार कई सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व और आम प्रथाएं जो गे और लेस्बियन्स को पारिवारिक समानता से वंचित करते थे, उन्हें चुनौती दे रहे थे। ब्रिटिश लेखक और एड्स को लेकर जागरूकता फैलाने में सक्रिय रहे कार्यकर्ता थे सिमोन वेटनी। वेटनी कहते हैं कि गे जीवन और पारिवारिक जीवन के बीच एक रेखा खींचकर दोनों को अलग बताने वाले लोग यह जताना चाहते हैं कि दोनों आपस में कहीं नहीं मिलते। जैसे गे पुरुष का जन्म, पालन पोषण, पढ़ाई लिखाई, काम और जीवन यापन समाज से कटकर एकदम एकांत में हुआ हो। ऐसे पूर्वाग्रह भ्रामक कल्पना पैदा करते हैं। जैसे, यह विश्वास कि गे और लेस्बियन्स अभिभावक नहीं हो सकते या वे लंबे समय तक किसी संबंध में नहीं रह सकते या वे अपने जैविक परिवार से अलग हो जाते हैं जैसे ही उनकी सेक्सुअल आइडेंटिटी सार्वजनिक होती है। ‘परिवार’ की एक सीमित परिभाषा देने से केवल एक ढांचे के परिवार को सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, कानूनी मान्यता देने की बाध्यता बनती है।

इतिहासकार ब्लेंक विसेन कुक कहती हैं, “यह पूर्वाग्रह कि गे लोग प्रेम नहीं करते, काम नहीं करते” उन्हें उनकी सेक्सुअल आइडेंटिटी और सेक्स तक सीमित करना है। हम सबको मालूम है कि कोई भी व्यक्ति कई तरह की पहचानों से बना होता है। ऐसे में कुक की टिप्पणी से हमें उस साज़िश का पता पड़ता है जिसके तहत समाज गे और लेस्बियन्स को उनकी समूचे व्यक्तिगत के साथ देखने से डरते हैं। इस कुतर्क से उब्ज़े डर का कारण क्या हो सकता है? जवाब है पारंपरिक परिवार के ढांचे को आदर्श स्थिति बताना। सबूत ‘exiles from kinship’ में दर्ज़ है, कई समलैंगिकता विरोधी समूहों ने “परिवार बचाओ” और “बच्चों को बचाओ” जैसे नारे दिए हैं।

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रीडिंग में बे एरिया, सेंट फ्रांसिस्को में किए गए एक सर्वे का ज़िक्र है। क्षेत्र के लोगों का कहना था समलैंगिक लोग उनके साथ नौकरी के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। इससे ‘परिवार वाले लोगों’ को दिक़्क़त होती है, बेरोजगारी बढ़ती है। समलैंगिक लोगों का परिवार, चयनित परिवार, दोस्त, साथी उतने महत्वपूर्ण नहीं हैं और वे उनके प्रति जिम्मेदार नहीं हैं, ऐसे ही रूढ़िवादी सोच इन बातों की जड़ हैं। पारंपरिक परिवार मानने वाले लोगों के लिए प्रेम और चयन के आधार पर बने परिवार का अस्तित्व स्वीकारना बहुत मुश्किल लगता है, क्योंकि वे प्रजनन क्रिया को परिवार और उसके बढ़ने के लिए सबसे अहम मानते हैं। यह एक पितृसत्तात्मक अवगुण है।

‘परिवार’ की एक सीमित परिभाषा देने से केवल एक ढांचे के परिवार को सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, कानूनी मान्यता देने की बाध्यता बनती है।

समलैंगिक लोग अक्सर जब अपने घरों पर अपनी इस पहचान को लेकर पहली बार बात करते हैं (कमिंग आउट) उन्हें अस्वीकार किया जाता है, बीमार कहा जाता है। कई ऐसे मामले हैं जहां परिवार द्वारा उनकी हत्या कर दी जाती है। इस इतिहास और वर्तमान के कारण समलैंगिक या इतरलिंगी पहचान के अलावा कोई सेक्सुअल पहचान रखने वाले समुदाय के व्यक्तियों के अंदर पारंपरिक हेट्रो परिवार के ढांचे को लेकर मोहभंग, संशय, डर, नाराज़गी होना एक साधारण बात है। वे चयनित परिवार में एक सुरक्षित जगह पाते हैं। परिवार के बीच की छोटी नोकझोंक-असहमतियों का सिलसिला वहां भी होता है लेकिन उन्हें वहां उनकी एक पहचान के कारण इंसान के तौर पर खारिज़ नहीं किया जाता, न ही बीमार कहा जाता है। नेटफ्लिक्स पर एक सिरीज़ है, ‘पोज़’ जो ट्रांस महिलाओं द्वारा बनाये ऐसे ही परिवार और उसके सदस्यों की कहानियों पर आधारित है। यह सीरीज़ ट्रांस एक्टिविस्ट जेनेट मॉक द्वारा प्रोड्यूस की गई है और इसके पांच मुख्य ट्रांस औरतों के किरदार ट्रांस महिलाओं द्वारा ही निभाए गए हैं। ऐसे परिवारों की स्थापना और उनके सदस्यों के बीच के रिश्ते को कहती है।

वेबसाइट ‘द ऐटलैंटिक’ पर एक लेख प्रकाशित है, ‘what if friendship, not marriage, was at the center of life?’ के शीर्षक से। मुझे इस लेख से एक ऐसी दोस्त ने मिलवाया जिनके लिए ‘चयनित परिवार’ का आइडिया सिर्फ़ एक किताबी आइडिया भर नहीं है। इस लेख में रेयाना कोहेन कई ऐसे लोगों के अनुभवों को दर्ज़ करती हैं जो पारंपरिक जैविक परिवार से इतर जीवन में चयन के आधार पर एक परिवार बनाया है। दो महिलाएं हैं, कामी वेस्ट और केट टिकोशन, उनमें से एक के पुरुष मित्र को दोनों की दोस्ती समझ नहीं आती थी जबकि वेस्ट ने कहा था कि कामी उनके जीवन की “नम्बर 1” हैं। उस व्यक्ति के लिए ऐसा प्रेम समझना मुश्किल था, वेस्ट पर नज़र रखने, उनके साथ दुर्व्यवहार करने और स्ल्ट शेमिंग करने के बाद वह रिश्ता खत्म हो गया। दोनों महिलाएं कहती हैं कि वे हमेशा एक दूसरे की पहली प्राथमिकता रहेंगी ये बात उनके जीवन में आने वाले साथी को समझना होगा, “हमारे आसपास की दुनिया पिछड़ी है।”

‘खून के रिश्ते’ या जैविक परिवारों को लेकर बने ऐसे मुहावरों का इस्तेमाल ज्यादातर पारंपरिक जैविक परिवारों को उसके सदस्यों के लिए सबसे सुरक्षित जगह, जरूरत के समय काम आने वाली जगह के रूप चित्रित करने के लिए होता है।

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इस तरह की दोस्ती में शारीरिक आकर्षण, रोमैंटिक आकर्षण हो भी सकता है, नहीं भी, या वो केवल इस रिश्ते में एक समय के लिए ये भी संभावनाएँ हैं या फिर रिश्ते को दोनों लोग किसी खांचे में डालकर ज़ाहिर नहीं करना चाहें ऐसी भी संभावनाएं हैं। आर्टिकल में जो रिवेरा और जॉन कैरोल का ज़िक्र है। वे गे बार में मिले थे। दोनों अपने रिश्ते को साथ घूमने वाले भाई जैसा भी कहते हैं और अपने साझे पारिवारिक जीवन को कुछ कुछ शादीशुदा दंपत्ति के जीवन के करीब भी पाते हैं। 

चयन के आधार पर बने परिवार पारंपरिक, जैविक हेट्रो परिवारों के आगे कई महत्वपूर्ण सवाल रखते हैं, जैसे क्या ‘खून का रिश्ता’ सबसे सुरक्षित है? क्या आप केवल ‘खून के रिश्तों’ के प्रति ही जिम्मेदार और संवेदनशील होते हैं? क्या परिवार इन भावनाओं पर नहीं चलता? फिर क्यों जैविक परिवार चयन के परिवार से बेहतर हैं? क्या जैविक परिवार के सदस्य हमेशा एक दूसरे को समझ लेते हैं/उनके लिए उपलब्ध होते हैं? क्या प्रेम में होने के लिए साथियों के बीच सेक्सुअल या/और रोमैंटिक आकर्षण इतना ज़रूरी है? अगर है तो क्या हेट्रो जोड़ों ये बीच यह आकर्षण हमेशा बना रहता है? अगर बच्चों की नैतिकता के लिए पारंपरिक परिवार उचित हैं तो क्या मानसिक समस्या की हालत पर आए आंकड़े झूठे हैं? मेरी और ज्यादातर पाठकों की परवरिश ऐसे ही पारंपरिक परिवारों में हुई है। उन अनुभवों के आधार पर ये सारे सवाल आप भी ख़ुद से करें और चयनित परिवार की कल्पना/आइडिया/अस्तित्व के बारे/आपने पहली बार सुना है तो उन्हें लेकर हेट्रोनॉर्मल पूर्वाग्रह से ग्रसित न हो।

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तस्वीर : रितिका बनर्जी फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

मेरा नाम ऐश्वर्य अमृत विजय राज है, मिरांडा हाउस से 2021 में दर्शनशास्त्र से स्नातक है। जन्म और शुरुआती पढ़ाई लिखाई बिहार में हुई। इसलिए बिहार के कस्बों और गांव का अनुभव रहा है। दिल्ली आने के बाद समझ आया कि महानगर से मेरे लोग मीलों नहीं बल्कि सालों पीछे हैं। नारीवाद को ख़ासकर भारतीय संदर्भ में उसकी बारीकियों के साथ थ्योरी में और ज़मीनी स्तर पर समझना, जाति और वर्ग के दख़ल के साथ समझना व्यक्तिगत रुचि और संघर्ष दोनों ही है। मुझे आसपास की घटनाएं डॉक्यूमेंट करना पसंद है, कविताओं या विज़ुअल के माध्यम से। लेकिन कभी कभी/हमेशा लगता है "I am too tired to exist".

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