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तू ख़ुदा है ना मेरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा
दोनों इंसा हैं तो क्यों इतने हिज़ाबों में मिले

कभी-कभार जब यूं ही किसी मुद्दे के निष्कर्ष तक पहुंचने के उद्देश्य से चार-पांच दोस्तों के मिलने की योजना बनती तो लीज़ा के कमरे के अलावा कोई अन्य सुरक्षित या कह लीजिए सुविधापूर्ण स्थान दिमाग के किसी भी हिस्से में गुदगुदी ना करता। बहसों के दौरान जब सभी अपनी बातों को सिर्फ़ बातूनियों की तरह नहीं बल्कि ख़ुद को मजबूती से कहने के संघर्ष में व्यस्त रहते, उसका हाथ मेरी उंगलियों के पोरों पर लिखी शंखालिपियों को पढ़ने में खोया रहता। ख़ुद को कहने के दौरान जब मेरी ज़बान अवरोधों में उलझती या फंसती तो लीज़ा इस स्थिति को भांप तुरंत मेरे हाथ को, जो अब तक उसके अपने प्रयासों से उसकी छातियों तक पहुंचा दिए गए होते थे, झटक दिए जाते। ख़ुद को किसी अनैतिक कर्म करते पकड़े जाने के अपराधबोध के भाव में लिप्त लीज़ा चाय या किसी अन्य बहाने, तेज़ी में कमरे से खुद को बाहर कर लेती।

लीज़ा एक सत्ताईस वर्षीय कामकाजी महिला है और साथी के रूप में एक स्त्री का चयन, उसका अपना सेक्सुअल अभिविन्यास है, कोई बचपना या अनुपलब्ध पुरुष की प्रतिक्रिया स्वरूप उठाया कदम तो कतई नहीं। लेकिन उसके चुनाव को सेक्सुअलिटी से जोड़ते ही वह खुद के प्रति घृणा और अपमान से भर जाती है। यह स्थिति सिर्फ लीज़ा की नहीं बल्कि क्वीयर (क्वीयर राजनीतिक समझ के साथ चुना गया शब्द है, जिसके मायने है कि सेक्सुअलिटी निरंतर परिवर्तनशील है, इस शब्द के दायरे में वे तमाम संभावित यौनिकताएं आती हैं जिन्हें विषमलिंगी यौनिकता के आदर्श की वजहों से नदारद किया जाता रहा है) आइडेंटिटी रखने वाली उन अधिकांश महिलाओं की है जो ख़ुद को अंधियारे एकांत में तो गर्व से समलिंगी या अपनी साथी के प्रति गौरव और उत्साह महसूस करती हैं लेकिन उजाला मानो उनके अस्तित्व को दो पाटों में विभाजित कर देता हो।

लीज़ा स्त्रीत्व के उस पूर्व निर्धारित सांस्कृतिक और नैतिक स्वरूप से भयभीत है जिसमें वह खुद को अनफिट पाते हुए निरंतर आहत होती रही है। वह अपनी अस्मिता को सबसे कह देने की अभिलाषी होते हुए भी, सामाजिक नैतिकता से गंभीर रूप से आतंकित है। स्त्री-पुरुष की बाइनरी में खुद को ना अटा पाने की बदौलत कई समलिंगी स्त्रियां हेट्रोसेक्सुअल संबंधों की कथित पवित्रता की भ्रामकता से इस कदर डरी हुई हैं कि वे अपनी सेक्सुअलिटी या अपने साथी के प्रति अपनी भावनात्मक अभिव्यक्ति के लिए उपलब्ध भाषा को अयोग्य और पक्षपाती पाती हैं। वे प्रेम की अभिव्यक्ति से अधिक प्रेम के प्रचलित अर्थों से बचती हैं क्योंकि मौज़ूदा दौर में प्रचलित के अर्थ से इतर का व्यवहार आपको बीमार की श्रेणी में ला खड़ा करता है। प्रचलित का अर्थ ये कतई नहीं की इससे इतर का संसार बीमार है। प्रचलित से विचलन को हमेशा दंड का भागीदार होना पड़ा है और इतिहास से लेकर वर्तमान तक की यात्रा में ऐसे उदाहरण पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं।

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सेक्सुअलिटी को इस कदर गोपनीयता की श्रेणी में रखा गया कि उसके प्रति मुखर होने पर दंडित किया गया। सेक्सुअलिटी ‘आप क्या हैं’ से अधिक ‘आप क्या चाहते हैं’ के अर्थों को समेटे हुए है।

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इससे मिलता-जुलता एक और वाक़या है निक्की का, जो मुझसे पांच-छह वर्षों बाद मिल रही थी। उसके ख्यालों में, सफेद घोड़े पर सवार राजकुमार की कोई छवि नहीं थी जो एक रोज़ उसे अपने साथ बादलों के उस पार ले जाएगा, जिसे मां-बाप, आस-पड़ोस, घर के बूढ़े-बुजुर्ग पैदा होते ही लड़की के दिमाग में ठूसने लगते हैं। निक्की ऊंची कही जाने वाली जाति से थी, तो इस नाते उसे इतनी तो छूट थी कि अगर किसी अपनी ही जाति के लड़के के प्रति उसका झुकाव है तो परिवार इसके लिए भी तैयार है।बस वह ख़ुद को इस संबंध से दूर कर ले क्योंकि अगर इसका पता बाहर किसी को चला तो उसके साथ उसके परिवार को भी दबे शब्दों में ‘हिजड़ा’ कहा जाएगा। समाज में स्त्री-पुरुष संबंधों से इतर के संबंधों के लिए सिर्फ यही ख्यालात काम करते आए हैं।

निक्की ने दबाव में या कि अपनी इच्छा से परिवार ने जिसे चुना उस लड़के से विवाह कर लिया, जिसका परिणाम था उसकी गोद में आठ माह का एक बच्चा, शायद एक बच्चे की जन्म के साथ ही मृत्यु भी हो गई थी। पंद्रह मिनट की आकास्मिक मुलाकात के लौटते में उसने इतना कहा, “मुझे कहीं दूर भगा ले चलो।” मुझे पता था वह ऐसा पूर्व प्रेम के कारण नहीं बल्कि अपने विवाह से ऊब की वजह से कह रही है। मैं उसे प्रतिक्रिया दूं उससे पहले ही मानो वह अपने कहे को भूल बोल पड़ी, “मुझे जल्दी लौटना है, ये आते ही होंगे, मुझे खाने की भी तैयारी करनी है।” निक्की के लगातार कहे इन संवादों में कोई संगति ना पाकर मैं स्तब्ध थी। एक पल के लिए मुझे उससे खीझ हो उठी लेकिन अगले ही क्षण मेरे पास उसकी मानसिक दैन्यता/दरिद्रता पर कहने के लिए कुछ नहीं था। ख़ैर निक्की चली गई। उसी संस्कृति को खाद-पानी देने जहां उसका पति अक्सर उसका ‘वैवाहिक बलात्कार’ करता रहा होगा, जिसकी पुष्टि निक्की के कहे पहले संवाद से हो ही चुकी है। समलिंगी स्त्रियों का अपनी सेक्सुअलिटी के प्रति मुखर होना ना सिर्फ उन्हें चारित्रिक पतनशीलता के कठघरे में वरन् शिश्न के विरोध स्वरूप पितृसत्ता के ख़िलाफ़ खड़ा कर देता है, जिसका परिवार और समाज दोनों ही शाब्दिक और शारीरिक हिंसा ज़रूरत पड़े तो यौन हिंसा के ज़रिए भी इलाज करते रहे हैं। समाज का मानना है कि ऐसा वे ‘समलिंगी हुई स्त्री’ के भीतर स्त्रीत्व जागृति के उद्देश्य से करते हैं ताकि समलिंगी हुई स्त्री पितृसत्ता की हेट्रोसेक्सुअल व्यवस्था में फिट हो सके।

पुरुष लिंग के वर्चस्व को कायम करने के उद्देश्य से ही आदम, हव्वा के प्रति कामासक्त हुआ था। वह अपनी (पुरुष) जाति के प्रति इस कदर प्रेमासक्त था कि उनकी तादात में निर्बाध वृद्धि के लिए अपने वीर्य निष्कासन हेतु स्त्री गर्भाशय को बतौर डस्टबिन इस्तेमाल करने का विशेषाधिकार तक स्त्री को सौंप दिया, जबकि उसका असल प्रेम अपने पुरुष साथियों में ही केंद्रित रहा। ऐसे में स्त्रियों का तथाकथित पवित्र हेट्रोसेक्सुअल संबंधों से असहमति रखना और बतौर महिला यौन साथी के रूप में एक महिला का ही चुनाव करना, मर्दवादी भाषा में कहें तो अगर परिवार के पुरुषों द्वारा ही बलात्कार करके किया जाए तो सामंती, मर्दवादी, बलात्कारी और एक कुंठाग्रस्त समाज में ऐसी घटनाओं को बेहद मामूली और स्त्री हित में कहकर अक़्सर दबा दिया गया।

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सेक्सुअलिटी को इस कदर गोपनीयता की श्रेणी में रखा गया कि उसके प्रति मुखर होने पर दंडित किया गया। सेक्सुअलिटी ‘आप क्या हैं’ से अधिक ‘आप क्या चाहते हैं’ के अर्थों को समेटे हुए है जिसके फलस्वरूप अधिकांश वैज्ञानिकों का आज मानना है कि सेक्सुअल अभिविन्यास काफ़ी हद तक सांस्कृतिक परंपराओं, जैविकी और उच्च स्तरीय ज्ञान का परिणाम होता है। लेकिन महिला का अपनी यौनिकता के प्रति जागरूक होने को भारतीय समाज में ‘पाप’, ‘परिवार की प्रतिष्ठा’, ‘तुम लड़की ही हो या कुछ और’ ‘सब कुछ कह और करके’ दबा दिया जाता रहा है। सेक्सुअलिटी को सेक्स से जोड़ने के पीछे भी कुंठित लोगों का मनोविज्ञान काम करता रहा है। लेकिन सेक्स जीवन का सिर्फ एक अंग है, जीवन नहीं। इसका स्पष्टीकरण भी सिर्फ इसलिए किया जा रहा है ताकि समलिंगी होने को सिर्फ समान लिंग के साथ सेक्स से ना लेकर, अमूक द्वारा चयनित लैंगिक पहचान, जीवनशैली और अभिरुचि इत्यादि से भी ग्रहण किया जाए क्योंकि अगर दो लोग या कुछ लोगों का एक समूह भी अगर आपसी सहमति पर साथ रहने/जीने का निर्णय करते हैं तो बिल्कुल ज़रूरी नहीं कि वे आपस में सम्भोग करने को भी बाध्य या इच्छुक हो या उनके संबंधों की सफलता सम्भोग पर ही टिकी हो बल्कि कई लोग ख़ासकर समलिंगी स्त्रियां अपनी तमाम जिंदगी अपने साथी के साथ अयौनिक धरातल पर बिताने का भी निर्णय लेती हैं और ये संबंध स्त्री-पुरुष यौन संबंधों की तुलना में अधिक सफल, स्वतंत्र और पितृसत्ता से मुक्त साबित होंगे यदि इन्हें इसका अवसर दिया जाए। स्पष्ट रूप से समलिंगी संबंध, जैविक सेक्स यानि शारीरिक और आनुवांशिक लक्षणों पर आधारित स्त्री-पुरुष होना और जेंडर संरचना अर्थात सामाजिक और मानसिक स्तर पर स्त्री-पुरुष होने की भावना और सामाजिक लिंग निर्धारित भूमिका तात्पर्य जेंडर रोल के आधार पर तयशुदा सांस्कृतिक औरताना और मर्दाना व्यवहार से पूरी तरह अलग है।

सेक्सुअलिटी को सेक्स से जोड़ने के पीछे भी कुंठित लोगों का मनोविज्ञान काम करता रहा है। लेकिन सेक्स जीवन का सिर्फ एक अंग है, जीवन नहीं।

समलिंगी अपने बायोलॉजिकल सेक्स के आधार पर समाज द्वारा तय और आरोपित की गई जेंडर भूमिका निभाने में साम्यता महसूस नहीं कर रहे और यही वह सबसे कह देना चाहते हैं जो कि मृत समाज की स्वीकृतियों के एकदम ख़िलाफ़ चला जाता है। परिणामस्वरूप प्रतिरोध में उठती आवाज़ों को दबा दिया जाता है। स्त्रियों के आपसी एकांत प्रेमालाप को पुरुषों की तुलना में अधिक दंडनीय समझा गया। पुरुष समलिंगियों को स्त्री समलिंगियों के स्तर का विरोध नही झेलना पड़ा क्योंकि पुरुषों के मध्य शिश्न का वर्चस्व अब भी केंद्र में था लेकिन स्त्री का स्त्री के प्रति प्रेमासक्त होने को पुरुष शिश्न के वर्चस्व को धवस्त करने के इरादतन की गई प्रतिक्रिया कहा गया। इस्मत चुगताई अपने ज़माने में उर्दू अदब की बेबाक लेखिका के रूप में सामने आती हैं और उनकी कहानी ‘लिहाफ़’ जो महिला समलिंगियों के मसले को बड़ी संवेदनशीलता के साथ रखती हैं, उसके लिए तो लाहौर हाइकोर्ट में 1941 के दौरान उन पर अश्लीलता का मुक़दमा भी चलाया गया। लेकिन पुरुषों में शायद इसे भी उद्दंडता ही कहा जाए लेकिन कह देना ज़रूरी है। पन्द्रहवीं शताब्दी तक आते-आते स्त्रीत्व और पुरुषत्व की धारणाओं का सामाजिक मनोविज्ञान के स्तर पर, गहरे जम जाने के बावजूद  कबीर और तुलसी के मन में राम की विराजित मूर्ति के प्रति समलिंगित्व गुण किसी को दृष्टिगत नही हुआ, समलिंगी कामुकता की इस  तथ्यात्मकता को आध्यात्म और ईश्वर केंद्रित आराधना कहकर मान्यता दे दी गई।

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पितृसत्ता की ब्राह्मणवादी व्यवस्था जिसमें पुरुष समलिंगियों के प्रति लचीलापन हमेशा से निहित था, उसका टकराव पश्चिम की विक्टोरियाई सभ्यता से उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध के कुछ समय बाद, इस लचीलेपन को अनुशासित करने के दौरान दृष्टिगत होता है जिसमें आधुनिक औपनिवेशिक शासकों (ब्रिटिशों) के साथ भारतीय राष्ट्रवादी तक इस मुहिम को परिणाम देने में शामिल थे जिसके फलस्वरूप हुआ यह कि समलैंगिकता को (भारतीय भूगोल के अंतर्गत जहां सिर्फ पुरूष समलैंगिकता स्वाभाविक मानी जाती थी) स्त्री-पुरुष दोनों के लिए आपराधिक कानून बना दिया गया। जबकि दो वयस्क लोगों के बीच आपसी सहमति पर बने यौन संबंधों को किसी भी नज़रिये या प्रावधान के ज़रिए आपराधिक मानना उनके निजत्व में दखलंदाजी करना है, जिसे कानूनी जामा पहनाना तो और भी घटिया और निंदनीय। ऐसे कानून भले ही मूलभूत मानवाधिकार का भोंपू आप ही आप से बजाते रहें लेकिन इनकी प्रकृति, जिसे ये कथित प्रोग्रेसिव आधुनिकता के लबादे में छिपाने की सभी कोशिशें करते आएं हैं, घोर पक्षपाती ही रहती है।

बहरहाल, स्त्री को तो इस हद तक भ्रमित और कंस्ट्रक्ट किया गया कि वे पूर्णतः यौनानंद के लिए पुरुष के अधीन है मगर तथ्यात्मक रूप से स्त्री यौनांग का क्लिइटोरिस भाग शिश्न से भी अधिक संवेदनशील और आनंददायी है, जो स्त्री को सही मायनों में ऑर्गेज्म उपलब्ध कराता है। पुरुष भयभीत है कि यदि स्त्री ने मूलभूत आनंद के लिए योनि कामोत्ताप (वेजाइना के ऑर्गेज़म) की जगह भगशिश्निय कामोत्ताप (क्लिटोरियस ऑर्गेज़म) की समझ पा ली तो पुरुष को लैंगिक रूप से फालतू करार दिया जाएगा, साथ ही भगशिश्निय ऑर्गेज्म की तथ्य के रूप में स्थापना तो इतरलिंगी संस्थान के लिए खतरा ही बन जाएगी। इसलिए पितृसत्ता की कुछ खास संरचनाओं के तहत स्त्री के इस अंग का उच्छेदन (फीमेल जेनाइटल म्यूटिलेशन) कर ताउम्र उसे पुरुष शिश्न से भरी योनि से प्राप्त आनंद (भ्रम) के अधीन कर दिए जाने का भी प्रावधान रहा।

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समलिंगी महिलाओं को अपनी पहचान उतनी ही ताकत के साथ स्वीकारने की ज़रूरत है जितनी ताकत से ‘हम भी मनुष्य हैं’ पर ज़ोर दिया जाता है। भाषा की देह सड़ गई है और आत्मा गंधाने लगी है। भाषिक अपर्याप्तता के कारण ही समलिंगी अपने साथी के अस्तित्व को प्राकृतिक प्रतिमानों के समतुल्य रखते हैं। पितृसत्ता की परिवार नामक संस्था के अंतर्गत संबंधों के संबोधन और उसकी मालिक और दासपरक व्यवहारिक अभिव्यक्ति पिता-माता, भाई-बहन, पति-पत्नी, बेटा-बेटी इत्यादि से भी ये ख़ासा परहेज़ करते रहे हैं। लाड़-दुलार पाकर अपने अधिकारों को छोड़ देने वाली स्त्रियों से हेट्रोसेक्सुअल संबंधों के नकलचिपने से मुक्त होने की मांग करना ही बेकार हैं क्योंकि समलिंगी स्त्रियों को सबसे अधिक संख्या में, घृणित और बीमार कहने वाली यही स्त्रियां हैं, जिनके कुंद पड़े दिमागों में शिक्षा भी विचार और विवेक पैदा नहीं कर पाई। ये स्त्रियां पितृसत्ता के दिए मंचों पर चढ़कर संस्कृतिवादी की तख़्ती अपने गले में लटकाए, स्त्री जाति के ही ख़िलाफ़ बतौर हथियार इस्तेमाल होती रही होती हैं।

मर्दवादी मर्दों के साथ-साथ इन संस्कृति से पोषित परजीवी महिलाओं ने इतिहास से वर्तमान तक के सभी क़िस्म के सामाजिक मानसिक संघर्षों से खुद को दूर रखते हुए, लंबे प्रयासों के उपरांत मिली आज़ादी और उससे प्राप्त सुविधाओं पर विशेषाधिकार की दावेदारी में ख़ुद को सबसे आगे रखा। इसके विपरीत जेंडर नॉर्म्स को तोड़ती समलिंगी स्त्री ज्यादा कुछ नहीं सिर्फ बेफ़िक्र हो हरी घास पर लेट घण्टों नीले आसमान में तिरते बादलों को तकना चाहती है, ऊंची इमारतों की छतों पर पैर लटकाए बैठ, पितृसत्ता के छोटे हुए कद पर हंसना चाहती है, पुरुषों के झुंड के बगल, अपना एक झुंड बना उनकी प्रोग्रेसिव कही जाने वाली बेतुकी बहसों का मज़ाक बना एक ठहाका लगाना चाहती हैं। इस पर्चे का विषय सिर्फ स्त्री समलैंगिकता पर इसलिए केंद्रित रहा क्योंकि पितृसत्ता में पुरुष स्वभाव का प्रत्येक व्यवहार स्वीकार्य रहा है मगर ऐसा भी नहीं है कि सभी पुरुषों के लिए बराबर की छूट हो बल्कि हुआ यह कि पितृसत्ता ने ना सिर्फ औरतों वरन् पुरुषों को भी एक संरचना के तहत गर कुछ आज़ादी दी तो अन्य के तहत उसे बाधित भी किया। पुरुषों की जेंडरगत मुक्तता के बावज़ूद उन्हें जाति, नस्ल, वर्ग, धर्म, राष्ट्रीय विभेदता के आधार पर उनके स्त्रियों से संबंधित व्यवहार की जकड़बंदी भी की गई। पुरुष का इन तमाम संरचनाओं के तहत, इनके संस्थापकों और संचालकों के द्वारा निरंतर दमन का खुद भुक्तभोगी होते हुए भी, स्त्री और क्वीयर (वैकल्पिक यौनिकताओं) संग हुई विभेदता से कोई ख़ासा सरोकार नहीं रहा।

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जाति, धर्म, नस्ल, वर्ग आदि स्तर पर स्त्री तथा पुरुष दोनों ही इन संरचनाओं को तोड़ने वालों के खिलाफ़ मोर्चाबंदी करते रहे हैं। विभेदता की परतों में हुआ इज़ाफ़ा, अलग अलग उत्पीड़नों  के इन्टरसेक्शनंस पर, इन परंपरा भंजकों के खिलाफ़ सम्भावित शोषण को गहराता जाता है। जैविक बनावट के आधार पर गर किसी की सामाजिक पहचान स्त्री की है फिर चाहे वह चयनित हो या आरोपित अमूक के लिए सेक्सुअल अभिविन्यास, जेंडर रोल, जेंडर एक्सप्रेशन इत्यादि के सभी दरवाजों पर सांकल लगा दी जाती है क्योंकि स्त्री होने की स्वतंत्रता और उपयोगिता प्रजनन के इर्द-गिर्द ही घूमती है। कहना गलत ना होगा गर पुरुष पैदा कर सकता तो बहुत मुमकिन है शायद औरत नामी प्राणी होती भी या नहीं, या फिर कैसी होती तब वे? आख़िर में अपनी समलिंगियों से मेरा यही कहना है कि वे हमें विवश कर सकते हैं, लेकिन अपने आदेशों में झिलमिलाते बीमार इरादों को, हमारी इच्छा कभी नहीं बना पाएंगे। एक ग़ुलाम दिमाग़ अधीनता में स्वतत्रंता महसूसता है, अनुकरण और आरोपण को अपना चयन कहता है और दासता में स्वामित्व तलाशता है, लेकिन अपने विवेक और विचार के बूते संचालित मस्तिष्क इन अंतरों की बेहतर समझ के साथ अपने विरोध को कायम रखते हुए प्रतिबद्ध रहता है। तो यह समय अलविदा कहने का नहीं, ‘यलगार हो’ से गूंज उठाने का है। अंत से पूर्व एक कविता लीज़ा के लिए :

प्रेम में इज़हार ठीक नहीं

ख़ासकर उनका,

जो प्रेम, इज नॉट इक्वल इतरलिंगी संभोग का गढ़ते हैं इतिहास।

प्रेम में, प्रजनन अनिवार्य नहीं,

और ना ही ज़रूरी है; जांघों की ताकत का प्रदर्शन।

वरन्

तुमसे प्रेम में,

तुम्हारी नब्जों के स्पंदन के साथ जी उठूंगी मैं- तुममें, हर बार।

और तुम, रक्त बन बहोगी मेरी धमनियों में हमेशा।

हमारे रिश्ते का कोई चेहरा नहीं होगा,

मगर 

मेरे पसीने और तुम्हारे आंसुओ के नमक से

वो हर बार उभर आएगा

तुम्हारे चेहरे और मेरी हथेलियों के दरम्यान।

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यह लेख आरती ने लिखा है जो दिल्ली विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रही हैं। आरती कई पत्रिकाओं के लिए लिखती रही हैं। उनके लेख हाशिये की आवाज़, अभ्युदय वेब पत्रिका, युवासृजन वेब पत्रिका, सहचर त्रैमासिक ई-पत्रिका जैसी जगहों पर प्रकाशित हो चुके हैं

तस्वीर : श्रेया टिंगल फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

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